पहलगाँव की धरती रोई, छल से किया जो वार।
निर्दोषों के खून से लथपथ, यह अपना घर द्वार।
नही मौन अब भारत बैठा, टूट पड़ा बन सिंह प्रचंड
जैसा जिसने जहाँ किया है, देंगे उसको वैसा दंड।

सेनाएँ अंगार हो गई, हृदय दग्ध है धधकी ज्वाला
ऑपरेशन सिंदूर चल पड़ा, संग लिए राणा का भाला।
घाटी की हर गुफा-गह्वर से, चुन चुन अब गद्दार निकालो।
बिल में घुसे साँप चूहों को, उड़ा ठिकाने गिन-गिन मारो।

मानवता का मूल भाव तज, धर्म पूछकर मारा कैसे?
कायरता के प्रबल पक्षधर, छीना घर उजियारा कैसे?
आकाओं की शह में आकर, अब खेल यहाँ खेलेगा कैसे?
निर्दोषों की हत्या करके, प्रतिशोध बता झेलेगा कैसे?

दुष्टों तुम यह भूल गए, यह भारत का भूखंड है
धर्म यहाँ पर मानवता, यह भारत अभी अखंड है।
तेज है प्रताप है, शिवशक्ति अब प्रचंड है।
देश है वही वहीं, ये विराट कालखंड है।

तूफानों सा गर्जन है, अब पर्वत भी थर्राते हैं
भारत माँ के अमर पुत्र, रण-रण में लहू बहाते हैं।
आँख उठाने की जो हिम्मत, अब हमें निपटना ही होगा।
केसर घाटी के हत्यारों, अंजाम भुगतना ही होगा।

सिंधु पुत्र हम संकल्पित हैं, सब कुछ यहाँ सुनिश्चित है।
ठान लिया है हमने अब तो , विनाश तुम्हारा निश्चित है।
रणभेरी फिर गूँज उठी, पर्वत ने सीना ताना है।
करगिल,उरी,सर्जिकल, लोहे पर लोहा माना है।

गगन पुकारे, धरती बोले, जय जय जय हो वीरों की।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ चल रहा, गाथा यह रणधीरों की।
व्योमिका, सोफ़िया, मंत्री-संतरी, सब मिलकर अनुसंधान करें।
हर अड्डों को चिन्हित करके, चुन चुनकर काम तमाम करें।

दल दलदल से बाहर आओ, दोषी को दोषी मानो तुम।
नाक के नीचे छिपे हुए, हर शत्रु को पहचानों तुम।
कश्मीर के इस विकास को, कोई लूट नही सकता
जो जो शामिल उस खेमें में, कोई छूट नही सकता।

सेना को आदेश मिला है, नही कोई बच पाएगा।
संदिग्ध दिखेगा जो भी उनको, मिटा दिया वो जाएगा।
कायर निर्दय घोर अधम, तू दौड़ कहाँ तक पाएगा।
सौगंध हमें इस मिट्टी की, तू मिट्टी में मिल जाएगा।।

 

डॉ. पवन कुमार
सहायक आचार्य, पी जी डी ए वी महाविद्यालय (सांध्य)
दिल्ली विश्वविद्यालय