शोध सार
यह शोध-अध्ययन मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि भारतीय लोकगीत हमारे लोकजीवन, सांस्कृतिक पहचान और मानवीय भावनाओं के अत्यंत महत्वपूर्ण वाहक हैं। लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि वे समाज की सामूहिक चेतना, अनुभवों और जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम हैं। भारतीय लोकजीवन में लोकगीतों की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है और ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से प्रसारित होते हुए आज भी हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग बने हुए हैं।
इस शोध-लेख में विशेष रूप से हिंदी सिनेमा की प्रसिद्ध फिल्म तीसरी कसम के गीतों और उसके कलात्मक पक्ष के माध्यम से लोकगीतों के महत्व को समझने का प्रयास किया गया है। यह फिल्म आंचलिक साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित है और इसमें ग्रामीण जीवन, लोक-संस्कृति तथा मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सजीव और यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है। फिल्म के गीतों में लोकजीवन की सादगी, प्रेम, विरह, नैतिकता और सामाजिक अनुभवों का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
फिल्म के गीतों के भावपक्ष का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि लोकगीत समाज की गहरी भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम हैं। “सजन रे झूठ मत बोलो” जैसे गीत जीवन के नैतिक मूल्यों और सत्य के महत्व को रेखांकित करते हैं, जबकि “सजनवा बैरी हो गए हमार” जैसे गीतों में विरह, पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं की गहन अभिव्यक्ति दिखाई देती है। वहीं “पान खाए सैयां हमार” जैसे गीत लोकजीवन की चंचलता, उत्सवधर्मिता और आनंदपूर्ण वातावरण को प्रस्तुत करते हैं। इन गीतों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि लोकगीत समाज के विविध भावों—हर्ष, विषाद, प्रेम, विरह और उल्लास—की अभिव्यक्ति के प्रभावी माध्यम होते हैं।
शोध के दूसरे पक्ष अर्थात् कलापक्ष में फिल्म के संगीत, वाद्ययंत्रों, भाषा और प्रस्तुति शैली का अध्ययन किया गया है। फिल्म के संगीत में ढोलक, मंजीरा और बांसुरी जैसे पारंपरिक भारतीय वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया गया है, जो लोकधुनों की सरलता और मधुरता को जीवंत रूप प्रदान करते हैं। इन वाद्ययंत्रों की ध्वनि में ग्रामीण जीवन की सहजता और भारतीय संस्कृति की सोंधी महक का अनुभव किया जा सकता है। साथ ही गीतों की भाषा अत्यंत सरल, आंचलिक और लोकजीवन के निकट है, जिससे गीतों की प्रभावशीलता और बढ़ जाती है।
इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि फिल्म तीसरी कसम केवल एक मनोरंजक फिल्म नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोक-संस्कृति, लोकगीतों और ग्रामीण जीवन की संवेदनाओं का सशक्त चित्रण प्रस्तुत करती है। फिल्म के गीतों और उसके कलात्मक पक्ष के माध्यम से लोकजीवन की सादगी, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
अतः यह कहा जा सकता है कि लोकगीत भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। वे समाज की सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखते हैं और मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं। इसलिए आवश्यक है कि लोकगीतों और लोक-संस्कृति के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास किए जाएँ, ताकि हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ और मानवीय मूल्य आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुँच सकें।
बीज शब्द : लोकगीत, भावपक्ष, कलापक्ष, तीसरी कसम, मानवीय संवेदनाएँ, स्त्री-संघर्ष, भारतीय वाद्य यंत्र, मिट्टी की खुशबू।
मुल आलेख:
लोक शब्द की उत्पत्ति और अर्थ:
लोक शब्द संस्कृत के ‘लोक’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है – देखने वाला। ‘लोक’ शब्द को सामान्यतः उस समुदाय से जोड़ा जाता है, जो भरण-पोषण के लिए श्रम और मेहनत करते हैं तथा जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए संघर्ष करते हैं। हिंदी जगत में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग परंपरागत रूप से सामान्य जन को दर्शाने के लिए किया जाता है।
प्रमुख विद्वानों की परिभाषाएँ:
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि –
“लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम नहीं है, बल्कि नगर और ग्रामों में फैली हुई वह समूची जनता है, जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं।”
इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि लोक साहित्य का संबंध सामान्य जन से है, जो अपनी संस्कृति को मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते हैं। लोक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी भी प्रकार के कठोर नियमों में बँधा नहीं होता। लोक साहित्य की बनावट कृत्रिम न होकर स्वाभाविक रूप से उत्पन्न भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है, जो अत्यंत सरल और सहज होती है।
लोक साहित्य की विधाएँ और लोकगीत:
लोक साहित्य के अंतर्गत लोककथा, लोकगीत, लोकगाथा, लोकनृत्य और लोकशास्त्र जैसी विधाओं का समावेश किया जाता है। लोक जीवन में लोकगीतों का विशेष महत्व है। लोक-मानव के हृदय में अनेक प्रकार के भाव होते हैं, जैसे – हर्ष, विषाद, विजय, पराजय आदि। इन्हीं भावों की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति लोकगीतों के माध्यम से होती है। इन भावों के पीछे एक पूरा सांस्कृतिक परिवेश और मनोवैज्ञानिक वातावरण कार्य करता है। इसी से लोक के रागात्मक जीवन का आरंभ होता है।
लोकगीत की परिभाषा
डॉ. सत्येंद्र के अनुसार –
“लोकगीत वह है, जिसमें लोक-मानव की भावनाओं और अनुभूतियों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति होती है।”
डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय लोकगीत की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि “लोकगीत किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं, बल्कि सामूहिक रचना है जो जन कंठ में जीवित रहती है। ”
लोकगीत की परिभाषा देते हुए विभिन्न साहित्यकार ने अलग-अलग मत दिए हैं, परंतु इन सभी पर भाषण में एक बार समान पाई जाती है। की लोकगीत कोई दिव्य शक्ति नहीं बल्कि यह असर में आम मनुष्य के हृदय की आवाज है ।जो अपनी भाषा में वह प्रकट करते हैं वह सरल और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है जो पीढ़ी दर पीढ़ी अनेक द्वारा सीखी और आगे बढ़ाई जाती है। लोकगीत वास्तव में हृदय किस भाव है जो किसी बनावट के बिना, मनुष्य के राग -रंग और उसके जीवन के अनुभव के रूप में सामने आते यही कारण है। यही कारण है कि किसी शास्त्रीय नियम में ना बंद कर लोग की संवेदनाओं से जुड़ता है।
‘डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय ’द्वारा दी गई लोकगीत की परिभाषा इस बात को पुष्टि करती है डॉ त्रिलोचन पांडे के अनुसार “लोकगीत किसी जनसमूह की स्वाभाविक और रागात्मक अभिव्यक्ति हैं, जो न तो किसी के द्वारा लिखे जाते हैं और न ही किसी विशेष कलाकार की कृति होते हैं, बल्कि सामूहिक रूप से विकसित होते हैं”।
भारतीय संस्कृति और लोकगीत पर अत्यंत गहरा संबंध रहा है लोकगीत वैदिक काल से हम भारतीय संस्कृति का अभिध अंग रहे हैं विशेष रूप से वैदिक काल के सामवेद में हमें इन गीतों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है लोकगीतों की बड़ी विशेषता यह है कि यह हर काल की परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को ढाल लेते हैं चाहे भक्ति काल हो या आधुनिक लोकगीतों के माध्यम से उन विशेष काल कि मान्यताओं की ओर सामाजिक संरचनाओं को सामान्य रूप से देखा जा सकता है उदाहरण के लिए यदि हम देखे तो भक्ति काल के समय में मनुष्य के हृदय में ईश्वर के प्रति जो अटूट श्रद्धा थी जिसके कारण उसे समय भक्ति पारक लोकगीतों का निर्माण हुआ उदाहरण के लिए कबीर के दोहे मीरा के भजन और जैसी अनेक रचनाएं उसे कल में देती गई आधुनिक का आधुनिक समय में मनुष्य के चिंतन के केंद्र में प्राकृतिक समाज प्रेम संस्कृति तीज त्यौहार आए तो इस हिसाब से लोकगीतों का स्वरूप भी बदल गया और लोकगीत प्राकृतिक से जुड़े समाज से जुड़े साथ ही लोकगीतों का निर्माण तीज त्यौहार के अनुरूप किया जाने लगा
जैसे होली के लिए धमार और जोगीरा जैसे लोग लोकगीत विख्यात है। इन गीतों के लेखकों के बारे में कोई जानकारी नहीं है बल्कि यह गीत आम मानस की उपज है जो सदियों से एक एक पीढ़ी तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आई है।
इन गीतों की विषय-वस्तु में मानव जीवन के लगभग हर पहलू का समावेश होता है, जिसमें प्रेम, विरह, प्रकृति के रंग, खेती-बाड़ी का संघर्ष, धार्मिक मान्यताएँ, विभिन्न उत्सव और सामाजिक रीति-रिवाज मुख्य आधार होते हैं। भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता इन गीतों की विषय-वस्तु में स्पष्ट रूप से झलकती है, जहाँ हर क्षेत्र की अपनी बोली और विशिष्ट धुन वहाँ के परिवेश को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, जहाँ भोजपुरी अंचल के गीतों में ‘अरे मईया मोरी’ जैसे शब्दों के माध्यम से ममता और करुणा के भाव उमड़ते हैं, वहीं राजस्थान की रेतीली धरती पर ‘केसरिया बालम’ की गूँज प्रेम और स्वागत की परंपरा को जीवंत कर देती है। वास्तव में, लोकगीतों की विषय-वस्तु मानवीय संवेदनाओं और अनुभवों की एक सहज, सरल और अत्यंत सशक्त अभिव्यक्ति है जो समाज की मान्यताओं और सामाजिक संरचना को दर्शाती है।
20वीं सदी से लेकर अब तक मनोरंजन के क्षेत्र में सबसे ज्यादा किसी विधा का विकास हुआ है, तो वह सिनेमा है. हमारी भाषा में फिल्मों की विशिष्ट उपस्थिति इस बात का परिणाम है कि हमारे क्रियाकलाप और जीवन व्यापक स्तर पर इससे प्रभावित हुए हैं और हो रहे हैं. ऐसे में लोकगीत भला किस प्रकार फिल्मों से कटकर रह सकते हैं? हिंदी सिनेमा की शुरुआत से कहीं पहले से भारतीय संस्कृति में लोकगीत रहे हैं, परंतु जब से इनका उपयोग सिनेमा में होने लगा, तब से लोकगीतों को एक अलग ही दिशा और रूप मिला है. इसका मुख्य कारण यह है कि सिनेमा में गीत परिस्थितियों के अनुसार प्रयोग किए जाते हैं.
हिंदी सिनेमा में कई ऐसी फिल्में रही हैं जिन्होंने लोकगीतों को अपने भीतर समेटा और उन्हीं लोकगीतों की वजह से उन्हें अपार ख्याति प्राप्त हुई. इन्हीं उदाहरणों में से एक प्रमुख नाम हमारे सामने फिल्म ‘तीसरी कसम’ का आता है. आज भी ऐसी कई फिल्में हैं जो लोक-ध्वनियों से भरपूर हैं और जिन्हें सुनते ही हृदय खुद-ब-खुद लोक और अपनी संस्कृति से जुड़ जाता है. इन फिल्मों में लोकगीत की मूल ध्वनियों का जो पुट दिखाई देता है, वह हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है. उदाहरण के लिए, फिल्म ‘तीसरी कसम’ आज भी यथार्थ का सबसे सुंदर और सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है.
फिल्म ‘तीसरी कसम’ आंचलिक साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित है। यह फिल्म अपने भौतिक ग्रामीण परिवेश और काव्य उत्तम अनुवाद संवेदना के लिए जानी जाती है। इस फिल्म की कथावस्तु ही नहीं बल्कि गीत भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस फिल्म में गीतों के माध्यम से ग्रामीण जीवन की प्रवृत्ति, परिवेश, उनके विश्वास, उनके दर्शन और मान्यता तथा ग्रामीण समाज में विभिन्न मतों को दर्शाया जाता है। हीरामन और हीराबाई द्वारा गाए गए गीत इस बात का परिणाम हैं।
हीरामन द्वारा गाए गए गीत एक ग्रामीण व्यक्ति के चरित्र की विशेषताओं का वर्णन करते हैं, जिसमे सच्चाई है, ईमानदारी हो और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व है। दूसरी ओर, हीराबाई द्वारा गाए गए गीत स्त्री जीवन की समस्याओं को उजागर करते हैं, साथ ही यह भी दिखाते हैं कि किस प्रकार एक स्त्री अपने संघर्षों और भावनाओं को लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त करती है।
फिल्म ‘तीसरी कसम’ के गीतों में भाव पक्ष का पुट बहुत ही साफ दिखाई देता है। फिल्म के सारे गीत लोक जीवन, लोक की समस्याएं और लोक के भावों की अभिव्यक्ति को बहुत ही स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं:
सजन रे झूठ मत बोलो: यह गीत केवल एक चलचित्र का हिस्सा नहीं है, बल्कि भारतीय लोक-मानस में रचे-बसे ‘निर्गुण’ दर्शन का आधुनिक रूप है। यह गीत जीवन के उन शाश्वत नैतिक मूल्यों और सच्चाई के महत्व को प्रस्तुत करता है, जो मनुष्य को मृत्यु और परलोक की वास्तविकता से परिचित कराते हैं। आज के तकनीकी युग में यह गीत और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वर्तमान समय का मानव अपनी मानवीय संवेदनाओं और आत्मिक बोध को भूलता जा रहा है। “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” जैसी कहावतों के माध्यम से यह गीत संसार की नश्वरता और लोभ-मोह से मुक्ति का संदेश देता है, जो शोध की दृष्टि से लोक-दर्शन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सजनवा बैरी हो गए हमार: इस गीत में हीराबाई के माध्यम से उन सभी मानवों के हृदय की गहरी विरह-वेदना और अकेलेपन की भावना को अभिव्यक्त किया गया है, जिसने जीवन में अपने किसी अत्यंत प्रिय को खोया है। यह गीत स्त्री जीवन की उन आंतरिक समस्याओं और विवशताओं को भी उजागर करता है, जहाँ समाज की बेड़ियाँ उसे अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने से रोकती हैं। लोक-धुनों में पगा यह विरह केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विछोह का प्रतीक है, जहाँ दो आत्माएँ जुड़कर भी सामाजिक संरचनाओं के कारण अलग हो जाती है।
पान खाए सैयां हमार: यह गीत लोक-जीवन की स्वाभाविक चंचलता, श्रृंगार और खुशी मनाने के उन अनोखे तरीकों को दर्शाता है, जो ग्रामीण अंचलों की पहचान हैं। इसे सुनते ही श्रोताओं के भीतर एक हर्ष और उल्लास की भावना उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि यह गीत नौटंकी, मेलो और ग्रामीण हाट-बाजारों के जीवंत परिवेश को सजीव कर देता है। शोध के दृष्टिकोण से यह गीत दर्शाता है कि अभावों और संघर्षों के बावजूद लोक-समाज किस प्रकार अपनी छोटी-छोटी खुशियों को उत्सव में बदल देता है और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखता है।
लोकगीतों का दूसरा महत्वपूर्ण रूप यानी कला पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण व स्वाभाविक होता है।
तीसरी कसम गीत केवल भाव पक्ष से ही नहीं बल्कि कला पक्ष की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है । गीत केवल शब्दों के चयन तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें संगीत और मधुर धुनों का भी उतना ही महत्व होता है:
इस फिल्म के संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने इन गीतों को तैयार किया है। उन्होंने गायकों ने अपनी आवाज देकर बहुत ही मधुर बना दिया है।
भाषा की आंचलिकता: इस फिल्म के गीत शैलेंद्र द्वारा लिखित हैं, जिनमें बिहारी-यूपी की छाप पूरी तरह से देखी जा सकती है। गीतों में कोई भी कृत्रिम बनावट नहीं है। गीतों की भाषा अत्यंत सरल और लोक में बोली जाने वाली भाषा है, जैसे— ‘मउआ’, ‘बैल’, ‘बैर’, ‘मुसाफिर’ आदि।
फिल्म के गीतों में प्रयुक्त वाद्य यंत्रों का चयन इस शोध का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इन गीतों में आधुनिक या विदेशी वाद्य यंत्रों का लेशमात्र भी प्रयोग नहीं किया गया है। इसके स्थान पर उन यंत्रों को प्राथमिकता दी गई है जो सदियों से भारतीय घरों, आँगनों और ग्रामीण समाज का अभिन्न अंग रहे हैं। उदाहरण के लिए, गीतों में ‘कुम्भी’ जैसे पारंपरिक लोक-साजों का प्रयोग यह प्रमाणित करता है कि हमारी लोक-संस्कृति कितनी सहज और स्वाभाविक है।
इन वाद्य यंत्रों का प्रयोग केवल स्वर उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि मिट्टी की सोंधी सुगंध और ग्रामीण परिवेश को सजीव करने के लिए किया गया है। जब हम इन गीतों में ढोलक की थाप, बांसुरी की सुरीली गूँज और मंजीरों की झंकार सुनते हैं, तो यह सीधे हमारे मन को अपनी जड़ों से जोड़ देती है। ‘कुम्भी’ जैसे यंत्रों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि भारतीय लोक-संगीत में दैनिक उपयोग की वस्तुओं को भी कलात्मक रूप देने की अद्भुत क्षमता है। वास्तव में, इन शुद्ध भारतीय वाद्य यंत्रों का स्वर ही इस संगीत को ‘लोक-संस्कृति’ का सच्चा संवाहक बनाता है, जो बिना किसी दिखावे के सीधे हृदय को स्पर्श करता है।
प्रतीक और बिम्ब: फिल्म के गीतों में ग्रामीण जीवन के ऐसे प्रतीक हैं जिसके बारे में सुनते ही हमारे सामने पूरा चित्र सजीव हो उठता है, जैसे— ‘बैलगाड़ी की आवाज़’, ‘नौटंकी की धुन’, या ‘हीरामन यार’ इस शब्द की बार-बार आवृत्ति आदि।
फिल्म ‘तीसरी कसम’ के कला-पक्ष का एक और सबसे मजबूत स्तंभ इसका ब्लैक एंड व्हाइट (श्वेत-श्याम) छायांकन है। यह छायांकन केवल तकनीक नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवेश की आत्मा को पकड़ने का एक माध्यम है। सुब्रत मित्र का अद्भुत कैमरा वर्क धूल भरे कच्चे रास्तों, रात के गहरे सन्नाटे और ग्रामीण मेलों के शोर-शराबे को एक कालजयी (timeless) रूप प्रदान करता है। इसमें लोक-तत्वों को बिना किसी बनावटी सजावट के वैसे ही पेश किया गया है जैसे वे वास्तव में होते हैं।
शोध की दृष्टि से देखें तो फिल्म का यथार्थवाद इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। बैलगाड़ी की धीमी गति, लालटेन की मद्धम रोशनी और बाँस के झुरमुटों के बीच से छनकर आती चाँदनी—ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं जो दर्शक को सीधे 1960 के दशक के ग्रामीण भारत में ले जाता है। यह चित्रांकन ‘हीरामन’ के भोलेपन और ‘हीराबाई’ की रहस्यमयी संवेदनशीलता को शब्दों से अधिक दृश्यों के माध्यम से व्यक्त करता है। सुब्रत मित्र ने कैमरे के जरिए उन सूक्ष्म भावनाओं को भी कैद किया है जिन्हें अक्सर रंगीन और तड़क-भड़क वाली फिल्मों में नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही कारण है कि यह फिल्म आज भी यथार्थवादी सिनेमा के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में जीवित है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत शोध लेख के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकगीत केवल सुरों और ताल का मेल नहीं हैं, बल्कि ये हमारी सभ्यता की वह सामूहिक स्मृति हैं, जो मौखिक रूप से सदियों का सफर तय करके हम तक पहुँची हैं। लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी मौलिकता और यथार्थवाद है। जैसा कि हमने देखा, हिंदी सिनेमा ने जब-जब अपनी जड़ों की ओर रुख किया है, लोकगीतों ने उसे एक नई संजीवनी प्रदान की है। लोकगीत वास्तव में जन-सामान्य के सुख-दुख, उनके रीति-रिवाजों, संघर्षों और उत्सवों की सजीव अभिव्यक्ति हैं। ये किसी शास्त्रीय अनुशासन के मोहताज नहीं होते, बल्कि ये उस मिट्टी की उपज हैं जहाँ मनुष्य प्रकृति के सबसे करीब होता है।
आज के वैश्विक परिदृश्य और आधुनिकता की अंधी दौड़ में, जहाँ डिजिटल मनोरंजन ने हमारी पारंपरिक कलाओं को हाशिए पर धकेल दिया है, वहाँ लोकगीतों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। आज का मानव तकनीक के शोर में अपनी आंतरिक संवेदनाओं और सांस्कृतिक पहचान को खोता जा रहा है। ऐसे समय में, ये लोक-धुनियाँ ही हमें अपनी जड़ों की याद दिलाती हैं। लोकगीतों में निहित नैतिकता और जीवन-दर्शन—जैसे कि सत्य, ईमानदारी और सादगी—हमें एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं। ये गीत हमें सिखाते हैं कि खुशी केवल भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि सामूहिकता और उत्सव की भावना में निहित है।
सिनेमा और लोक-साहित्य का यह अंतर्संबंध यह प्रमाणित करता है कि कोई भी कला तब तक अमर नहीं हो सकती जब तक वह अपने ‘लोक’ से न जुड़ी हो। लोकगीत हमारे समाज की वह सांस्कृतिक धरोहर हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होकर हमारे अस्तित्व को बचाए हुए हैं। चाहे वह खेती-बारी के गीत हों, विरह की वेदना हो या त्योहारों की उमंग, ये सभी मनुष्य की आत्मा की पुकार हैं। अतः, यह अनिवार्य है कि हम अपनी इन लोक-ध्वनियों को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर, अपनी अस्मिता के रूप में संरक्षित करें।
अंततः, लोकगीत ही वह सेतु हैं जो अतीत को वर्तमान से और वर्तमान को भविष्य से जोड़ते हैं। जब तक हमारे गाँवों की चौपालों, मेलों और गलियों में ये लोक-स्वर गूँजते रहेंगे, तब तक हमारी संस्कृति की जीवंतता अक्षुण्ण रहेगी। यह शोध पत्र इस बात पर जोर देता है कि लोक-संस्कृति को बचाए रखना केवल इतिहास को सहेजना नहीं है, बल्कि अपनी मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखना है। वास्तव में, लोकगीत हमारी मिट्टी की वह खुशबू हैं जिसे कोई भी कृत्रिम सुगंध कभी मात नहीं दे सकती।
संदर्भ सूची
शर्मा, डॉ. गीता (लेखक) एवं मिश्र, प्रो. गिरीश्वर (संपादक). लोक गीत: रूप और अंतर्वस्तु (इकाई M10). हिंदी प्रदेश का लोक साहित्य (P8). ई-पी.जी. पाठशाला (e-PG Pathshala), एम.एच.आर.डी., भारत सरकार।
सिंह, डॉ. शशि किरण (2019). हिन्दी लोक-गीत. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ अप्लाइड रिसर्च, 5(9): 377-378. ISSN (Print): 2394-7500.
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रेणु, फणीश्वर नाथ. मारे गए गुलफाम (तीसरी कसम). ‘ठुमरी’ (कहानी संग्रह), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। (फिल्म का मूल आधार)
मजूमदार, शैलेंद्र (निर्माता) एवं भट्टाचार्य, बासु (निर्देशक). तीसरी कसम (1966). इमेज मेकर्स (फिल्म प्रोडक्शन)
द्विवेदी, डॉ. हजारी प्रसाद. ‘जनपद’ और ‘लोक’ की अवधारणा पर आधारित लेख एवं साहित्यिक निबंध।
सिमरन सिंह
जीसस एंड मेरी कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय






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