प्रस्तावना
लोक साहित्य किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत और उर्जावान दर्पण होता है। यह वह साहित्य है जो लोक-मानस की सहज अभिव्यक्ति है और मौखिक परंपरा के माध्यम से युगों-युगों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक प्रवाहित होता रहा है। भारतीय समाज की संस्कृति बहुत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। इस संस्कृति को समझने में लोक साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। लोक साहित्य केवल मनोरंजन के साहित्य की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि इसमें समाज के लोगों के अनुभव, उनके जीवन के संघर्ष, भावनाएँ और सामाजिक जीवन की झलक भी दिखाई देती है। इसलिए लोक साहित्य को समाज के जीवन का एक सच्चा चित्र भी माना जाता है। लोक साहित्य की एक खास बात यह है कि इसमें समाज के उन लोगों की आवाज़ भी सुनाई देती है जिन्हें लिखित साहित्य या इतिहास में अक्सर जगह नहीं मिलती। स्त्रियाँ भी ऐसे ही वर्गों में शामिल रही हैं। लंबे समय तक पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण उनकी भावनाएँ, दुख और संघर्ष लिखित साहित्य से गायब रहे। लेकिन लोक साहित्य में वे प्रारम्भ से ही अपने मन की बात कहती और अपने अनुभव व्यक्त करती आ रही हैं। ये उनके अनुभवों को साझा करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। लोकगीतों, लोककथाओं, कहावतों और लोकगाथाओं के माध्यम से स्त्रियों ने अपने जीवन के अनुभवों, सामाजिक बंधनों, विवाह, परिवार, श्रम, प्रेम और पीड़ा को अभिव्यक्ति दी है। इन रचनाओं में केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था के प्रति एक सूक्ष्म प्रतिरोध और आत्मसम्मान की चेतना भी दिखाई देती है। इस दृष्टि से लोक साहित्य को स्त्री जीवन और उसके संघर्षों को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जा सकता है।
इस विशाल साहित्य के केंद्र में यदि कोई सबसे जीवंत और प्रभावशाली स्वर है, तो वह ‘स्त्री’ का है। लोक साहित्य में स्त्री मात्र एक चरित्र नहीं है, बल्कि वह इस पूरे साहित्य की रचनाकार, संरक्षिका और मुख्य स्वर भी है। जहाँ एक ओर लोक साहित्य में स्त्रियों के कोमल भावों, ममता और संस्कारों का चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर उनके जीवन के गहन संघर्षों, सामाजिक बंधनों के विरुद्ध मौन विद्रोह और उनकी अदम्य जिजीविषा की गूँज भी सुनाई देती है। जहाँ लिखित साहित्य में अक्सर पुरुषों की दृष्टि से स्त्रियों को देखा गया, वहीं लोक साहित्य में स्त्रियों ने स्वयं अपने संघर्षों, घरेलू प्रताड़नाओं, सामाजिक बंधनों और अपनी अस्मिता की लड़ाई को स्वर दिया है।
लोक साहित्य: अर्थ एवं परिभाषा
‘लोक’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘लोक दर्शने’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है ‘देखने वाला’। आधुनिक विद्वानों ने इसे जन-सामान्य की चेतना से जोड़कर परिभाषित किया है। ‘लोक’ शब्द की अवधारणा अत्यंत प्राचीन और व्यापक है, जिसका अर्थ सामान्य जनता या आम आदमी की उस सत्ता से है जहाँ जाति-पाति, अमीर-गरीब और शिक्षित-अशिक्षित की सीमाएँ टूट जाती हैं। लोक साहित्य वह वाचिक परंपरा है जो सामूहिक रचना शक्ति पर आधारित होती है। लोक साहित्य की प्रकृति प्रवाहपूर्ण है, जो समय के साथ बदलती रहती है और लोक-मानस की नई अवधारणाओं को अपने भीतर समेटती रहती है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार, “लोक हमारे जीवन का महासमुद्र है, जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान सभी संचित हैं।”[1] डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं।”[2]
अतः लोक साहित्य वह साहित्य है जो साधारण जनता की वाणी में रचा गया है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के शब्दों में, “साधारण जनता जिन शब्दों में गाती है, रोती है, हँसती है, खेलती है, उन सबको लोक साहित्य के अंतर्गत रखा जा सकता है । लोक-साहित्य अपनी विभिन्न विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखता है. जनसंस्कृति का जैसा सच्चा तथा सजीव चित्रण इसमें उपलब्ध है वैसा अन्यत्र नहीं.सरलता,स्वाभाविकता और सरसता में यह अपना सानी नहीं रखता ।”[3] लोक साहित्य वाचिक परंपरा पर आधारित होता है और समय के साथ इसमें परिवर्तन और परिष्करण होता रहता है। इसमें लोकगीत, लोकगाथा, लोककथा, लोकनाट्य और प्रकीर्ण साहित्य (मुहावरे, लोकोक्तियाँ आदि) शामिल हैं। डॉ.विद्या सिन्हा लोकसाहित्य की विशेषता हो रेखांकित करते हुए कहती हैं, “मनुष्य की अस्मिता को प्रस्तुत करने की प्रबल क्षमता लोक साहित्य और लोक संस्कृति में विद्यमान है। इसके दो कारण स्पष्ट हैं—एक तो यह कि लोक साहित्य और लोक संस्कृति समूह या समुदाय के भीतर से व्यक्ति की अस्मिता को उभारते हुए सामुदायिकता की शक्ति को रेखांकित करते हैं। दूसरे, लोक के पास विवेक की ऐसी अद्भुत छन्नी होती है जिसमें अर्थहीन और अनावश्यक बातों को छोड़कर केवल प्रासंगिक और मूल्यवान तत्वों को ही स्वीकार कर आगे बढ़ने की क्षमता होती है।”[4]
लोक साहित्य में स्त्रियों की भूमिका
लोक साहित्य के सृजन और संरक्षण में स्त्रियों की भूमिका सर्वोपरि रही है। यदि लोक साहित्य से स्त्रियों के स्वर को निकाल दिया जाए, तो यह साहित्य नितांत नीरस और निर्जीव हो जाएगा। लोक साहित्य के बनने और उसे आगे बढ़ाने में स्त्रियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय ग्रामीण समाज में अधिकतर लोकगीत स्त्रियों द्वारा ही बनाए और गाए जाते हैं। विवाह, बच्चे के जन्म, त्योहारों, खेतों में काम करते समय, घर के कामों के दौरान और धार्मिक अवसरों पर जो गीत गाए जाते हैं, उनमें से अधिकतर स्त्रियाँ ही गाती हैं। “स्त्रियाँ इस लोक साहित्य का प्रमुख आधार हैं, देखा जाय तो यही इस संस्कृति की धुरी भी हैं।”[5] इस तरह स्त्रियाँ लोक साहित्य में केवल पात्र नहीं होतीं, बल्कि उसके निर्माण और उसे आगे पहुँचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय का मानना है कि वर्तमान समय में भी लोक साहित्य का अधिकांश भाग स्त्रियों के कंठों में ही सुरक्षित है।
संस्कारों की संवाहिका, सर्जक और संरक्षिका के रूप में: “गांवों में संस्कार सम्बन्धी अनेक लोकगीत प्रचलित हैं जिन्हें स्त्रियाँ विशेष मांगलिक अवसरों पर गाती हैं। ये गीत चिरकाल से परंपरागत रूप से चले आ रहे हैं। इन गीतों की रचना किसने की यह बतलाना कठिन है। आज भी स्त्रियाँ समुदाय रूप में ‘झूमर’ गाती हैं। वे गीत गाने के साथ ही साथ उसके आगे की पंक्तियों की रचना भी करती जाती हैं। एक स्त्री एक कड़ी बनाती है तो दूसरी स्त्री अन्य पंक्ति जोड़ देती है। इस प्रकार गीत तैयार हो जाता है ।”[6] अधिकतर लोकगीत स्त्रियों द्वारा ही बनाए गए हैं। ग्रामीण जीवन में स्त्रियाँ अपने सुख-दुख और जीवन के अनुभवों को गीतों के माध्यम से व्यक्त करती हैं। समय के साथ ये गीत लोगों के बीच फैल जाते हैं और धीरे-धीरे लोक परंपरा का हिस्सा बन जाते हैं। मौखिक परंपरा होने के कारण लोक साहित्य मुख्य रूप से स्त्रियों के कंठों में ही सुरक्षित रहा है। संस्कार गीतों (सोहर, विवाह, कोहवर) से लेकर व्रत-त्योहारों के गीतों तक, अधिकांश सामग्री स्त्रियों द्वारा ही रची और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाई गई है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सोलह संस्कारों में स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले गीत समाज को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं। सोहर, मुंडन, यज्ञोपवीत और विवाह के गीत लोक संस्कृति को जीवंत रखते हैं।
श्रम और मनोरंजन का मेल: स्त्रियाँ चक्की पीसते समय (जाँत के गीत), धान रोपते समय (रोपनी के गीत) या खेतों में काम करते समय गीतों के माध्यम से अपनी थकान मिटाती हैं और अपने सुख-दुख साझा करती हैं। उनमें उनके जीवन का सच्चा यथार्थ छिपा होता है। ग्रामीण समाज में स्त्रियाँ कृषि कार्य और घरेलू कार्य दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खेतों में काम करते समय गाए जाने वाले श्रम गीतों में स्त्रियों के कठिन जीवन और श्रम की झलक मिलती है। इन गीतों में स्त्री के परिश्रम, थकान और सामाजिक उपेक्षा का चित्रण मिलता है।
संकलन का संघर्ष: मौखिक परंपरा होने के कारण इस साहित्य को संकलित करना भी एक संघर्ष रहा है। पूर्व में ‘पर्दे की प्रथा’ के कारण स्त्रियाँ बाहरी पुरुषों के सामने गाने में संकोच करती थीं, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय संकलन में आने वाली कठियाओं का उल्लेख करते हुए बताते हैं इस पर्दे की प्रथा के कारण संग्रहकर्ताओं को रात-रात भर घरों के पीछे खड़े होकर इन गीतों को लिखना पड़ता था।
लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष की अभिव्यक्ति
लोक साहित्य में स्त्रियों का संघर्ष उनके जीवन के हर पड़ाव पर दिखाई देता है। यह संघर्ष केवल भौतिक अभावों का नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था, सामाजिक रूढ़ियों और भावनात्मक शोषण के विरुद्ध भी है। इसी कारण लोक साहित्य में स्त्रियों के संघर्षों का बहुत मार्मिक और सच्चा चित्र मिलता है। भारतीय समाज में लंबे समय तक स्त्रियों को पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण कई सामाजिक और पारिवारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
जन्म और अस्तित्व का संघर्ष: भारतीय समाज में लोक गीतों में पुत्र के जन्म पर ‘सोहर’ गाकर खुशियाँ मनाई जाती हैं, जबकि पुत्री के जन्म पर मौन या उदासी का वातावरण छा जाता है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय अपनी पुस्तक में बताते हैं एक लोकगीत में माता कहती है कि पुत्री के जन्म पर उसका हृदय इस प्रकार काँप रहा है जैसे पुरइन (कमल) का पत्ता हवा के झोंके से काँपता है। यह एक स्त्री का अपने अस्तित्व के प्रति पहला संघर्ष है। जहाँ उसे पैदा होते ही अपनी ‘अवांछनीयता’ का अहसास कराया जाता है।
विवाह और विदाई की पीड़ा: विवाह के गीतों में जहाँ एक ओर उत्सव है, वहीं दूसरी ओर ‘बेटी’ के लिए यह अपने घर और पहचान को छोड़ने का संघर्ष है। गवना (विदाई) के गीतों में हृदय-द्रावक वेदना व्यक्त होती है। विदाई के समय भाई, पिता और माता से बिछड़ने का दुख लोक साहित्य में बहुत मार्मिकता के साथ अंकित है। ऐसे कई गीत हैं जहाँ बेटी अपने पिता से पूछती है कि जिस घर में वह जन्मी, वहाँ से उसे क्यों निकाला जा रहा है। विवाह के अयोग्य वर पर माता का आक्रोश: “जरइ रे नउवा तोरी नउवरिया, जरइ पण्डित तोरा वेद। जेन मोरा धिया के अस वर खोजेन, सेजिया वे सूतई अकेल।” यहाँ स्त्री का संघर्ष उस व्यवस्था के विरुद्ध है जो उसे एक वस्तु की तरह किसी अयोग्य व्यक्ति को सौंप देती है।
ससुराल और सामाजिक पराधीनता: ससुराल पहुँचने के बाद स्त्री का असली संघर्ष शुरू होता है। वह बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र की अधीनता में जीने को विवश है। लोक साहित्य में साँस और ननद के कठोर शासन का वर्णन मिलता है। एक भोजपुरी लोकगीत में बहू अपनी माँ से कहती है: “हँसुआ खुरपी बर्तन बासन, जोरत जुगुत जुटे ना राशन। सासु ननद क कर्कश शासन, ठोनहच से रोजे अगरासन।” यह संघर्ष केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है, जहाँ उसे हर कदम पर पुरुष और उसके परिवार की अधीनता में जीना पड़ता है।
पति के परदेश जाने का दुख (विरह संघर्ष): आर्थिक अभावों के कारण पति अक्सर परदेश (कलकत्ता या अन्य शहर) चले जाते थे। पीछे अकेली रह गई पत्नी का विरह और सामाजिक असुरक्षा लोक साहित्य का एक बड़ा हिस्सा है। ‘बटोहिया’ और ‘बिरहा’ जैसे गीतों में यह तड़प साफ़ दिखाई देती है। ये लोक गीत इसी विरह और एकाकीपन के संघर्ष के दस्तावेज हैं। चक्की पीसते समय गाए जाने वाले गीतों में विधवा या विरहिणी स्त्री की करुण गाथा बहुत मर्मस्पर्शी होती है।
पौराणिक पात्रों के माध्यम से संघर्ष (सीता का उदाहरण): लोक साहित्य में स्त्रियाँ केवल पीड़ित नहीं हैं, वे विद्रोही भी हैं। लोक साहित्य ने महान पौराणिक पात्रों को भी ‘लोक’ के धरातल पर उतारा है। लोक गीतों की सीता शास्त्रीय रामायण की सीता से भिन्न और स्वाभिमानी है। वह एक साधारण स्त्री की तरह उपेक्षित और अपमानित महसूस करती है। सीता का मौन प्रतिरोध: “सीता अंखियों में भरली विरोग एकटक देखिन हो। सीता धरती में गइली समाई कुछों नहिं बोलिन हो।” राम द्वारा परित्यक्त सीता अग्नि परीक्षा देने के बाद भी समाज के व्यंग्य सहती है। जब राम उसे वापस बुलाने भेजते हैं, तो सीता का स्वाभिमान जाग उठता है और वह अयोध्या लौटने के बजाय धरती में समा जाना बेहतर समझती है। यह उसका समाज के प्रति सबसे बड़ा मौन विद्रोह है। यह मौन प्रतिरोध स्त्री संघर्ष की पराकाष्ठा है।
प्रतीकात्मक प्रतिरोध: लोक साहित्य में स्त्रियों का प्रतिरोध हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होता। कई बार यह प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त होता है। उदाहरण के लिए लोकगीतों में स्त्री अपने दुख को प्रकृति से जोड़कर व्यक्त करती है—जैसे नदी, पेड़ या पक्षियों के माध्यम से। यह अभिव्यक्ति सामाजिक बंधनों के भीतर रहते हुए भी अपनी पीड़ा को व्यक्त करने का एक माध्यम बनती है।
लोक साहित्य, प्रकृति और स्त्री: लोक साहित्य में स्त्रियों और प्रकृति के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। कई लोकगीतों में स्त्रियों को प्रकृति के साथ जोड़ा गया है। स्त्रियाँ जल, जंगल और भूमि से जुड़ी होती हैं और इन संसाधनों के संरक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए कई लोककथाओं में स्त्रियों को प्रकृति की संरक्षक के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।
स्त्री संघर्ष के विविध रूप और प्रतिरोध
लोक साहित्य केवल स्त्रियों के दुख का रोना नहीं है, बल्कि यह उनके प्रतिरोध (Resistance) का भी सशक्त माध्यम है।
गालियों के माध्यम से भड़ास: विवाह के समय गाई जाने वाली ‘गालियाँ’ दरअसल पितृसत्तात्मक मर्यादाओं के बीच स्त्रियों द्वारा अपनी दबी हुई कुंठाओं और भड़ास को निकालने का एक तरीका है।
संवाद और व्यंग्य: आधुनिक लोकगीतों में नारी स्वयं को वस्तु नहीं मानती और पुरुष की अनुचित आदतों का विरोध करती है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता की चाह: यद्यपि स्त्रियाँ श्रम करती थीं, लेकिन उनके धन पर उनका अधिकार नहीं था। वर्तमान समय में लोक साहित्य में भी स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के स्वर मुखरित हो रहे हैं।
आधुनिक स्त्री विमर्श और लोक साहित्य
आज जिस ‘स्त्री विमर्श’ की चर्चा अकादमिक जगत में हो रही है, उसकी जड़ें लोक साहित्य में बहुत गहरी हैं। प्रसिद्ध लेखिका सीमोन द बुवा का कथन लोक समाज पर भी उतना ही सटीक बैठता है। “स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है।” लोक साहित्य यह दिखाता है कि कैसे संस्कारों और गीतों के माध्यम से स्त्री को ‘परतंत्र’ बनाया गया, लेकिन उन्हीं गीतों के माध्यम से उसने अपनी मुक्ति की राह भी तलाशी। विवाह की ‘गालियाँ’ दरअसल स्त्रियों द्वारा पितृसत्तात्मक मर्यादाओं के विरुद्ध अपनी दबी हुई कुंठाओं को निकालने का एक सशक्त माध्यम हैं।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोक साहित्य स्त्री संघर्ष की वह मौखिक महागाथा है जो सदियों से लिखित इतिहास के समानांतर चलती रही है। लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष के अनगिनत आयाम हैं। यह साहित्य हमें बताता है कि सदियों से स्त्रियों ने किन परिस्थितियों में खुद को बचाए रखा। आज जो ‘स्त्री विमर्श’ लिखित साहित्य में चर्चा का केंद्र है, उसकी जड़ें लोक साहित्य में बहुत पहले से मौजूद हैं। लोक साहित्य की स्त्रियाँ केवल सहने वाली नहीं हैं, बल्कि वे गीतों और कथाओं के माध्यम से अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रही हैं। उनकी आवाज़ भले ही धीमी हो, लेकिन वह समाज की जड़ों तक पहुँचती है और सामाजिक बदलाव की चेतावनी भी देती है।उन्होंने लोकगीतों, कथाओं और लोकनाट्यों के माध्यम से अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस मौखिक ज्ञान को केवल ‘मनोरंजन’ न समझकर इसे स्त्रियों के सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष के एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में स्वीकार करें।
[1] वासुदेव शरण अग्रवाल, लोक का प्रत्यक्ष दर्शन, सम्मलेन पत्रिका, लोक संस्कृति अंक (प्रयाग, हिंदी साहित्य सम्मलेन, सन् 1974), पृष्ठ-67
[2] हजारी प्रसाद द्विवेदी, जनपद पत्रिका, वर्ष-1, अंक-1, (कशी हिन्दू विश्वविद्यालय, अक्टूबर, 1952) पृष्ठ-65
[3] डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, लोक-साहित्य की भूमिका, हिन्दी साहित्य प्रेस, इलाहबाद, प्रथम संस्करण, 1957, पृष्ठ-9
[4] डॉ. विद्या सिन्हा, भारतीय लोक साहित्य परम्परा और परिदृश्य, प्रकाशन विभाग, संस्करण,2011, भूमिका से-
[5] डॉ. संध्या गर्ग, सं. डॉ. संगीता गुप्ता, लोक साहित्य, श्रुति बुक्स, संस्करण-2015, पृष्ठ-27
[6] सं. महापंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ.कृष्णदेव उपाध्याय,हिंदी साहित्य का बृहत् इतिहास(षोडश भाग) हिंदी का लोक साहित्य, नगरी प्रचारणी सभा काशी, संवत् 2017, पृष्ठ-88






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