पर्यावरणीय चेतना और लोकसाहित्य पर्यावरण शब्द अंग्रेजी के ‘Environment’ शब्द का हिंदी अनुवाद है, जिसका अर्थ है ‘चारों ओर से घेरना’। इसमें प्रकुर्ति के समस्त तत्व या घटक मिलकर पर्यावरण कहलाते हैं। उन समस्त बाहरी दशाओं और प्रभावों का योग, जिसमें जीव रहते हैं, उसे पर्यावरण कहा जाता है। पर्यावरण अनेक तत्वों का स्वीकृत नाम है, जो संपूर्ण जीव सृष्टि को नियंत्रित करते हैं, जो एक दूसरे से अंतर संबंधित हैं। सन 1980 में भारत सरकार ने पर्यावरण विभाग की स्थापना की, जो पर्यावरण नियोजन, प्रोत्साहन और संबंध के लिए केंद्र सरकार के आधुनिक ढांचे का केंद्रबिंदु है। सन 1985 में एक नया एकीकृत विभाग पर्यावरण नीति, कानून, प्रगति का मूल्यांकन, अनुसंधान को प्रोत्साहन, प्रदूषण नियंत्रण, वन तथा वन्यजीव प्रबंधन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के विभिन्न पर्यावरण के महत्त्व के विषय का संचालन करता है। सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर प्रकृति की पूजा की गई है। प्रकृति को भगवान का रूप माना गया है। किसी न किसी अवसर पर प्रकृति की पूजा लोग करते हैं, जैसे आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, तुलसी, आंवला, नीम, पीपल, बरगद आदि। प्रकृति की प्रार्थना करते हुए समस्त सजीव जाति के सुख आनंद की कामना मनुष्य करता आया है। प्रकृति या पर्यावरण का प्रभाव समस्त मानव जीवन, सजीव सृष्टि या विश्व में के सभी चराचर अंगों पर पड़ा है। मानव पर्यावरणीय शक्तियों को सम्यक् रूप से प्रयोग करके अपने सामाजिक जीवन को संतुलित बनाए रखने का प्रयत्न हो रहा है। आज पर्यावरणीय समस्या अधिक गंभीर बनती जा रही है। वैज्ञानिक तरक्की के कारण मनुष्य अपनी प्रगति करना चाह रहा है, परिणाम वह प्रकृति के कहीं तो विरोध में जा रहा है। अनेक समस्या का निर्माण जैसे वायू प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण आदि अनेक साथ में प्रदूषण का जीव जंतु पर परिणाम, मानव पर परिणाम अर्थात सृष्टी पर परिणाम हो रहा है। पर्यावरण का महत्व मानव जीवन में अनन्यसाधारण है। मानव जीवन के विकास में पर्यावरण का महत्व अधिक है। प्रकृति हर एक घटक वायू, जल, मिट्टी, पेड पौधे सभी महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरण का अस्तित्व आज खतरे में आ गया है, इसलिये पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 है।एन्व्हायरमेंटल प्रोटेक्शन के अंतर्गत नियमों का पालन न करने पर दंड की व्यवस्था की गई है।
स्वच्छ जल, हरे-भरे पेड पौधे, मिट्टी का स्तर आदि सभी बातें पर्यावरण संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि पर्यावरणी समस्या ऐसी ही बढती जाती है, तो मनुष्य अनेक रोगों का शिकार हो जाएगा। महत्वपूर्ण पेडपौधे, जीव जंतू नष्ट हो जायेगे, मानव जाती खतरे मे आ जायेगी। साहित्य मे प्रकृती चित्रन की विशेष परंपरा रही है। प्रकर्ती और मानव का संबंध अटूट है। साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य मे समाज का प्रतिबिंब होता है, इसीलिए साहित्य मानो जीवन का प्रतिबिंब है। पर्यावरण संरक्षण मे साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण है। मनुष्य प्रकर्ती मे जन्म लेता है, इसकी मिट्टी मे ही उसका पालनपोषण होता है और इसी मिट्टी मे वह विलिन हो जाता है। परिणाम मनुष्य ने पर्यावरण बचाओ की अभिव्यक्ती साहित्य मे की है। धर्म, दर्शन, कला और साहित्य सभी मे प्रकृती को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। छायावादी काव्य मे प्रकृती का अत्यंत सूक्ष्म रूप चित्रित हुआ है। छायावाद के चार आधारस्तंभ पंत, प्रसाद, निराला, महादेव वर्मा सभी ने प्रकृती को अत्यंत महत्व दिया है। ये कवी प्रकर्ती की रमनियता मे मुग्ध हो जाते है। कामायनी मे प्रकृती का उत्कृष्ट चित्रण हुआ है। मनुष्य के प्रकर्ती के प्रति भोगवादी दृष्टिकोन को उसमे उजागर किया है। जब जब मनुष्य उन्नुक्त तथा उश्रंकल हो जाएगा तब तक प्रकर्ती उस पर अपना नियंत्रण करने का प्रयत्न करेगी। यही सीख कामायनी से हमे मिलती है। नागार्जुन का ‘बंगाल’ का आकाल प्रकर्ती के विनाशकारी दुःखांत का घटनाक्रम है। भूमंडलीकरण के दौर में बाजारवादी त्रासदी का सबसे पहले शिकार पर्यावरण बना है। 21 वी सदी का आरंभ पर्यावरण के संकट के साथ शुरू होता है। केदारनाथ सिंह ने ‘पाणी की प्रार्थना’ मे भीषण संकट की चेतावणी दि है। समकालीन कवियो ने अपनी कविता मे मनुष्य और प्रकृती का सामंजस्य विद्यमान किया है। जल प्रदूषण की बिकट समस्या को लेकर कवी चिंतीत है। जल को पूजनीय माना गया है। जल के एक एक बूंद के प्रति मनुष्य मे ममता की भावना होनी चाहिये, उसके प्रति श्रद्धा और संवेदना का रिश्ता होना चाहिये। मनुष्य प्रकर्ती की गोद मे पहुचकर सुखदुःख तथा आनंद पाना चाहता है। अरुण कमल द्वारा लिखित कविता ‘गंगा को प्यार’ ये कविता केवल पर्यावरण की चिंताओंका प्रतिफल नही बल्की वर्तमान की विभीषकाँको भी रेखांकित करती है। ‘भारत की ऋतुये’ इस कविता मे साई मीरा जोशी ने भारत देश की विविध ऋतु की सुंदरता और महत्ता का भावपूर्ण चित्रण किया है। ये ऋतुये हमारी प्रकर्ती और पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने मे किस प्रकार सहाय्यक है साथ में मानवी जीवन को भरण पोषण के साथ निरोगी स्वास्थ देते है। ये ऋतुये मानव जीवन को आनंदित करती है, जिंनकी आज के प्रदूषण युक्त वातावरण मे बहुत ही आवश्यकता महसूस होती है।
जयशिंता केरे कट्टा की कविता ‘नदी, पहाड और बाजार’ इस कविता मे भी प्रकर्ती के पर्यावरण पर मानवी क्रियाओं के दुष्परिणाम से अवगत करते हुए एक तरह से प्रतिरोधका भी आव्हान कवी कर रहे है। कुमार नारायण की कविता ‘एक वृक्ष की हत्या’ इसमे भी कवी मनुष्य को प्रकर्ती के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाते हुए स्वार्थ मे अंधा होकर मनुष्य किस प्रकार पर्यावरण को नुकसान पोहोचणे का प्रयत्न कर रहा है और परिणाम खुद कोही नुकसान पहचाने का प्रयत्न मनुष्य कर रहा है। इसका बयान इस कविता मे कवी कर रहा है। आज मनुष्य को प्रकृति के प्रती बहुत ही संवेदनशील होना चाहिये क्योंकि प्रकृतीही हमारी रक्षा करने का प्रयत्न करती है परिणाम उसकी रक्षा हमे करना चाहिए । तभी जा कर समस्त सृष्टी उसमे जीने वाले सभी जीव जंतू मानव जाती चराचर सभी सुखी तथा संपन्न रहने का प्रयत्न करेंगे।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1) हिंदी साहित्य और पर्यावरणीय चेतना
संपादक डॉक्टर सुजितसिंह परिहार ।
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली.
2) जनजातीय विकास के नवीन आयाम
डॉ राजेंद्र कुमार मिश्रा ए पी एच
पब्लिकेशन कार्पोरेशन नई दिल्ली
3) जनसंचार और पत्रकारिता
प्रो फेसर रमेश जैन
मंगल दीप पब्लिकेशन जयपुर
4) पर्यावरण कल आज और कल
हरिश्चंद्र व्यास
शाम प्रकाशन जयपुर
प्रा. मानखेडकर बी एस
हिंदी विभाग
भाई किशनराव देशमुख महाविद्यालय चाकूर





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