साहित्य की अनेक विधाऍं होती हैं । उनमें से एक है-‘अलिखा साहित्य’  जो मौखिक रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरण किया हुआ आ रहा है ।उस साहित्य के लोकगीत विख्यात और प्राबल्य है । ये शहरीय वातावरण में इतने प्राबल्य नहीं, जितने ग्रामीण वातावरण में ।टी. वी. वीडियों आदि आधुनिक मनोरंजन साधनों के बावजूद आज भी लोकगीत ग्रामो में मनबहलाव के साधन बने हुए हैं ।

लोकगीत –(Folk songs)-

    लोकगीत ग्रामीण वातावरण में अनेक संदर्भों मे लोगों से गाये जाते हैं ।ये सोच समझकर कल्पना के आधार पर नहीं लिखे जाते, बल्कि दैनिक कार्यो में मन मे उभरे भावों को व्यक्त करते हुए विभिन्न् अवसरों पर लोग इन्हें गाते जाते हैं ।रस,शब्द, छंद, अलंकार आिद अपने आप जुड जाते हैं ।ये गीत मानव समुह को एक सूत्र में बॉंधते हुए तत्कालीन सामाजिक प्रवतृतियों को प्रतिफलित करते हैं । साथ ही मानव की जीवन रीति नागरिकता कलाचार इत्यादि का भी आईना माने जाते हैं ।

      लोकगीत ‘नाट्टुप्पुरप्पाडल’ नाम से प्रचलित हैं । ये अनातीत काल से विभिन्न् जाति लोगों द्वारा गाये जा रहे हैं । ये भावबोधक, चित्तकार्षक  गीत अतीत,वर्तमान और भविष्य का अमर गीत काव्य माने जा सकते हैं ।तमिल साहित्य के लाक्षणिक आचार्यों ने इसे ‘पण्णति’ कहा है । हर एक प्रदेश के लोकगीत उस प्रदेशवासियों  के रीति रिवाजों ,आचार –व्यवहार और संस्कृति को प्रतिफलित करते हैं । अपनढ गामीण लोग अपने मनोभावों के अनुरूप बोलचाल के शब्दों को लेकर गीत गाते हैं । इनके प्रयत्न बिना ही छंद रस अपने आप जुड़ जाते हैं । राग और शब्द सभी से गाने लायक बहुत ही सरल होते हैं । ये लोगों के विश्वास, चिन्तन और सुख दुख को प्रकट करते हैं । विभिन्न प्रकार के गीत भिन्न् भिन्न् राग ताल में रचित हैं ।हरेक प्रकार के अलग अलग छंद भी होते हैं किसान लोग बीज बोते समय ,फसल काटते समय एवं घास –पात उखाड़ते समय गीत गाते हुए काम करते हैं । अलग अलग गीत अलग अलग छंद में रचित हैं :

      सरल शब्द ही लोक गीत का मुकुट है । हर प्रांत में प्रचलित शब्द इन गीतों में उपयुक्त हुए हैं । इन गीतों में पंक्तियों  की सीमा नहीं है । परिवेश या संदर्भ के अनुसार पंक्तियॉं ज्यादा या कम होती हैं । इन गीतों का अपना लाक्षणिक नियम न होने पर भी अनुप्राषतंक अलंकारिक शब्दों की भरमार इन्हें मनारंजक और चित्ताकर्षक बना देते हैं । गति-विध एवं कार्य के अनुसार ये घर में या खुली जगह में गाये जाते हैं । गायकों को पेशागत रूप में, गानेवाले ,मन बहलाव के लिए गानेवाले इति दो प्रकार में बॉंट सकते हैं – लोकगीत का विभाजन इस प्रकार है-

  • तालाट्टुप्पाडल (लोरी गीत )
  • तोळिल पाडल (व्यावसायिक गीत )
  • कादल पाडल (प्रेम गीत)
  • विलैयाटटुप्पाडल (खेल कूद में गाया गीत)
  • केलिप्पाडल (मजाक करने में गाया गीत)
  • ओप्पारिप्पाडल (मृतों की याद में गाया गीत)
  • वळिप्पाटटुप्पाडल (प्रार्थना गीत)
  • कदैप्पाडल (कथा गीत)

तालाटटुप्पाडल सारी दुनिया में गाया जाता है। इसे मानव से सुना पइला गीत एवं मां बच्चे के प्रेम पाश में खिला गीत कह सकते हैं । गानेवाली मॉं कवयित्री  बन जाती है । काल्पनिक लोक में संचरित होकर वह अपने ह्रदय की लहरों में उठी स्मृतियों एवं भावनाओं को गीत का रूप देकर सुस्वर में गाती है । इस कारण उसमें पंक्तियों की सीमा नहीं होती । मॉं के मनोभावों के अनुरूप लोरी गीत लम्बे या संक्षिप्त होते हैं । श्रेष्ठतम वस्तुओं से शिशु की तुलना करती है –

   तालाटटुप्पाडल इन पंक्तियों से शुरू होता है-

             आरारो आरीररो

             आरारो आरीररो

               रारारो रारीररो

             रारारो रारीररो

             लु…लु..आइ..लु…लु…लाई ….

इस छंद पर मॉं अपना गीत रचती है । इसे साधारणतया नीलाम्बरी नामक राग में गाते हैं । यह गीत बच्चे को सुलाने के लिए दिन रात गाया जाता है । कभी कभी शिशु को गोद में लिटाते हुए या कंधे पर डालते हुए भी मॉं गाती है । ज्यादाती गीत शिशु की महिमा गानेवाले होते हैं कभी कभी मॉं बच्चो से रोने का कारण पूछती है ।

            अडित्तारैच्चोल्लि अळु

          आकिकनै  च्चेयदिडुवोम

            तोटटारैच्चोल्लियुळ

            तोळ विलडृ.माटिटडुवोम ।

(जिसने पीटा तुझे, बताकर रोओ

जरूर उन्हें दण्ड देगे ।

जिसने छुआ है बताकर रोओ

जरूर उन्हें पीटेंगे

संयुक्त परिवार में रहनेवाली मॉं ननद, सास और ससुर को भी गीत में खींच लेती है –

           पाटिट अडित्ताळो पालवाडृगुम चगाले

           अत्तै अडित्तळो अरळिप्पुच्चेण्डाले ।

            (दादी ने पीटा क्या दूध की शक्कर से

           बुआ ने पीटा क्या फूलों के गुच्छे से )

इस प्रकार रोनेवाले शिशु को सुलाने के लिए मॉं तरह ताह के गीत गाती है ।वह आज भी गॉंव में सुनाई पडता है ।

तोळिलन पाडल –थकान दूर करके जोश भरनेवाले ये गीत कठिन काम करते समय मर्द औरत दोनों द्वारा गाये जाते हैं । गीत में तन्मय होने से काम की कठिनता भूल जाते हैं । पेशे के अनुसार अकेले या झुंड में लोग इसे गाते हैं । ‘एलेलो कुइले’ ,’एलकुइडिलेले’, ‘एलेलो अन्नक्किळि’ इनमें से एक को प्रस्तावना के रूप में गाकर फिर गीत शुरू करते हैं ।इन गीतों में दाम्पत्य जीवन का वृत्तात ,खाने की रीति ,आचार व्यवहार, विश्वास , अनुभव एवं सामाजिक रिश्ता उभरा रहता है। कार्य करने के पहले देवताओं की वंदना करते हैं । खेत में बीज बोते समय, फसल काटते समय और घास -पत्ते उखाडते समय समुदाय गीत गाते हैं ।इससे दिन भर काम करने पर भी थकान का अनुभव नहीं करते । कभी- कभी काम करनेवाले युवक युवतियों के बीच प्रेम व्यवहार भी होता है । मामा का बेटा बुआ की बेटी से मिलने बीज बोने के समय उसकी ओर आता हे । वह लडकी तब यूँ गाती है-

               नात्तु नडवु कालम

               नमम वयल उळवुकालम

               वेळे समयमुद

               वेराळैप्पात्तुक्कुडगो।

               (धान रोपने का समय

                खेत में जोतने का समय

               काम करने का समय

               कोई और को देख लो )

      इसमें लडकी यह इंगित करती है कि उसे मामा का लडका पंसद नहीं है । एक और संदर्भ में एक नारी कहती है कि अपने पति के पानी खीचंकर हन्दी खेत में सिंचाने के कारण सारे हल्दी खेत में पानी अमूल्य रत्न माणिक्य जैसे बहता है

              मणक्काटिटले पात्ति कटिट

             एम्म मणजक्काम्बि पालम पोटटु

               मणवरू पाच्चुम तणि

               माणिक्कमाप पायुदुगों ।

            (हल्दी खेत में क्यारियॉं बनाकर

            बीच में अनेक पुल बनाकर

             मेरे राजा से सिंचाया पानी

              माणिक्य जैसे बहता रे )

      पानी खींचते समय कभी कभी इष्टदेवता पर गाते हैं –

              पिळळलैयारे वारीर

              पेरूमाने वारीर

              शिवनारे वारीर

              मथिलोने वारीर

             (विनायकजी आइए

              विष्णु जी आइए

              शिवजी आइए

              कार्तिकयजी आइए )

      ‘तोळिलनाडल’ दिन- रात काम करनेवाले श्रमिकों से थकान और श्रम मिटाने वक्त गाया जाता है।अधिकतया किसान लोग इसे गाते हैं । अन्य व्यवसायों के लोग ‘तेम्मागुपूपाडल’ ‘कुम्मिप्पनाडल’ जैसे गीत गाते हैं । मशीनों के आगमन से श्रमिकों का काम कम हुआ है और वे थके-मांदे नहीं बनते । इसलिए आजकल ये गीत धीरे –धीरे गायब से हो रहे हैं ।

प्रेमगीत-

      जीवन में प्रेम का महत्वपूर्ण स्थान है। मॉं बच्चे कास प्यार, देवता-भक्त का प्यार और मित्र मित्र का प्यार भी प्रेम के अन्दर रखे जा सकते हैं । फिर भी युवक युवती के बीच का प्यार तो अत्यंत महत्वूपर्ण है, क्योंकि दाम्पत्य जीवन में प्रविष्ट होने के पहले मिलन और सभ्भाषण दोनों ही अधिक रूचिकर होते हैं । अपने मनोभावों को गीत के दवारा प्रकट करते हैं । साहित्यिक प्रेम और लोक गीत प्रेम में अन्तर यह है कि साहित्यिक नायक –नायिका सहेली के जरिये अपने मन की बातें व्यक्त करते हैं । उसमें नायिका नायक का नाम तक नहीं लेती । इस गीत में कल्पना की प्रचुरता रहती है । लेकिन नाटटुप्प्पुरप्पाडल में युवक और युवती एक दूसरे से विवाद करते हुए खुले ढंग से अपने मन की बाते प्रकट करते हैं । युवक को नाम से पुकारती है ।प्रश्नोत्तरी एवं पहेलियॉं भी प्रचुर मात्रा में दीख पडती हैं ।

        एक युवती नदी पार करने नावक –युवक की सहायता मॉंगती है ।

                    ओडे कडक्क वेणुम अयया नाड्ग

                     ओरू करैयैत्ताण्ड वेण्डुम

                    (नदी पार करना है जी

                     उस किनारे जाना है ।)

      नायक कहता हैकि अपने को युवती प्रेमी कहकर पुकारने से ही उसे नाव में बिठाएगा । युवती से मिलने की आतुरता से युवक यूँ गाता है-

                   तडक्किळिये एन

                   तायमान प्रेट्र पेण्णे

                   मैयिटट पोर्च्चरमें उन्नै

                   मरन्विदरूक्कक कूडविल्ले

                   (सोने की तोती-मेरे

                    मामा की पुत्री

                    मृगनयनी तुझे मैं

                   भूल नहीं सकता )

जवाब में युवती गाती है –

                   निलवु एळुम्पटटुम

                   निर्कुम चनम पोकटटुम

                     अप्पबुम उरगटटुम

                  अप्प वन्दाल सम्मदन्तान

                  (चॉंदनी आने दो

                   खड़े लोग जाने दो

                   बापूजी सोने दो

                  तभी आना स्वीकृत है )

      भार लेकर बैलगाडी में जाते समय प्रेमी को प्रेमिका की याद सताती है-

                  आत्तोरम कोडिक्कालम

                  अरूम्बरूम्बा वैततलैयाम

                  पोटटा चित्रक्कुदिल्लै

                  पोन मयिले उन मयक्कम…

                  (नदी के पास पान की लता

                   नन्हें नन्हे पान के पत्ते

                   खाने से मुँह लाल न बनता

                   सोने की मंजूरी तेरे वियोग से)

      प्रेमिका के फसल काटते समय प्रेमी यूँ गाता है –

                  पुळिळ पोटट रविक्कैकारी

                  पुळियगो टटे चेलैक्कारी

                  नेल्लरूक्कप्पोकुम पोतु नान

                  नेल्लिमरक्कावलडि

                  (बिंदु भरी चोली पहनकर

                   रंगबिरंगी साडी पहनकर तुम

                   फसल काटने जाते समय

                   अमला पेड के नीचे रहूगा )

      प्रेम गीत का ‘नाटटुप्प्पुरप्पडल’ में मुख्य स्थान है । प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे से मिलकर गाते हैं या अकेले एक दूसरे की याद में गाते हैं ।

विळैसाटटुप्पाडल –

      इसे अधिकतर बालक-बालिकाऍं गाते हैं ।इसकी पंक्तियॉं चार से दस तक होती है । इसे अकेले, दो व्यक्ति या झुंड में वे गाते हैं । ‘पल्लाग्कुळि’ ,दायम’, ‘कण्णप्पूच्ची ‘, ‘चडुकुडु,’ ‘नोण्डि’ , ‘कुम्मि’ इत्यादि खेलौं को लोग गाते हुए खेलते है ।इसके अलावा ‘ओडिप्पिडत्त्ल’(दौड-पकड़) ‘वीडुकटटि विळैयाडल’ (घर बनाकर खेलना ) और ‘कल्ल मण्णा,’( पत्थर या भूमि) खेलते समय भी  गाया जाता है । लडकियों के खेल में कुम्मि गीत (गोलाकार रूप में खडे होकर कर ताल के साथ गाना) प्रसिद्ध है । कवि भारती का एक कुम्मिगीत इस प्रकार है –

                      औन्त्र मम्मिटिट मण्णु वेटिट

                       करूम्बे वी कणुवे वा

                      करूंगुलत्तु  मीने वा…

                    (फरसे से खोदकर

                     ऊख का बगीचा बनाकर

                    है ऊख आ, ऊख का टुकडा आ)

                      करूंगुल्ल्तु (कालातालाब का )मीन आ)

      कोलाटटम (डांडी नृत्य) रंगीन छडियों हाथ में रखाकर उन्हें बजाकर गाना बचाना भी लडकियों का खेल है ।

      लडको के खेल में चडुकुडे आज देशीय खेल बन गया है ।दो झुंड रेखा के इधर उधर रहकर दम पकडकर गाते हुए विपरीत पक्ष के लोगों को पकडते हैं गाना बंद करने से या विपरीत दल से पकडे जाने पर वह आउट हो जाता है ।

      उसका एक गीत है –

                     नान्ताण्डा ओडगप्पन

                     नल्लमुत्तु पेरन

                    वेळहिचिच्म्बेडुतु

                    विळैयाड वारेन

                    वारेन…वारेन….वारेन

                  (मैं तो तेरा बाप

                   नल्लमुत्तु का पोता

                   चॉंदी की छड़ी लेकर

                   खेलने आया

                   सोने की छडी लेकर

                   शादी करने आया

                   आया..आ..आया )

      कभी कभी मॉ बच्चे के हाथ शरीर हिला हिलाकर गाती है –

                   चाउचाडम्मा वाउचाड

                   चायक्किळिये चाएचाडु

                   (हिला हिलाकर मजा उठा

                   नन्ही तोते हाथ हिलाओ ।

      इसी प्रकार खिलाते समय भी पक्षियों को दिखाते हुए मॉं भात खिलाती है ।

      मज़ा गीत –(मजा़क करने गाया गीत )

            बच्चों से लेकर बूढ़ो तक मज़ाक करते हुए लोग गाते हैं । इन गीतों से खुद भी खुशी का अनुभव करते और दूसरो को भी खुश बना देते हैं । बूढ़े की दादी की जत़ाक करते हुए कोई गाता है –

                  दाड़ी नीण्ड ताता

                   तडवि ओरूनाळ पार्तार

                  माडप्प्पुरा रेण्डु

                  काटकुरवि रेण्डु

                  करूंकुरूवि रेण्ड

                  दाडिक्कुळळले तगि

                  मुटटेयिटटन रेण्डु

                  (लम्बी दाढ़ीवाला बूढ़ा

                  दादी को एक दिन देखा

                  कबूतर जुडुवे

                  मैना जुडुवे

                 गौरेया जुडवे

                  काल गारेया जुडवे

                  (दाडि के अन्दर वास करके

                  अण्ड दो डाल चुके हैं )

ओप्पारिप्पाडल –

                  तमिलनाडु के नाटटुप्प्ुरप्पाडल में तालाटटुप्पाडल के बाद ओप्पारिप्पडल बहुत प्रसिद्ध है । मृतों की याद में लोग गाते है । जिस घर में मृत्यु होती है, वहॉं गॉंव की औरतें आकर मृत की याद में प्रशंसा करके गाती हैं । मृत की याद मेंगाया गीत सुनकर उसके पति या पत्नी या अन्य बंधु लोग जोर से रोवें और मन का दुख हल्का करें जिससे उनका मानसिक रोग कम होवे । इस ख्याल से शायद ओपाप्पारिप्पडल गाती हैं –

                  मृत पुत्र को देखकर  मॉं यूँ गाती है –

                  कालळळगुम कैयळगुम

                  कटटैविरल लक्षणमुम

              तोळळगुम कासलळगुम

              चुण्डुविरल लक्षणमुम

              पात्ता  पंसुकिळिया

              पातवगं कोण्चुवाडगा

             (पैर की सुन्दरता

              अंगूठे की सुंदरता

              कंधे पैर की सुंदरता

              छोटी अंगुली की सुन्दरता

              देखने में नन्हीं तोता

              देखनेवाले प्रेम करेंगे )

      शिशु के हर अंग की खूबसूरती का वर्ण करते हुए मॉं रोती है ।बेटे के खोने से घर की सारी सम्पति व्यर्थ हो जाती है । ग्रामीण लोगों के अनुसार पुत्रविहिन एक माता यूँ गाती है – मदुरै नगर में चमेली, गुलदाऊदी के फूलों से भरे बगीचे के मध्य एक विस्तार घर हमने बनाया है। हर कहीं फूल ही फूल इनका सुगंध सूँघनेवालों में एक पूछता है –किसका बगीचा है यह ?तब दूसरा  व्यक्ति जवाब देता है-यह तो पुत्रविहिन घर है । पुत्रविहिन घर होने के नाते न तो चमेली से और न गुलदाऊदी से संगंध निकल सकता है ।

      इसे व्यक्त करते हुए गाती है अभाग्यशाली मॉं-

                        मदुरैयिले एडम वागिं

                        मल्लि पडन्दिरूकुम

                        मदिलरिप्पूरूक्म

                        मदिलोरम मोकुम चनम,मल्लकेप्पू वासमिल्ल

                        मैंदनिल्ल माळिकैम्पार

                        (मदुरै में जगह खरीद कर

                         चमेली का बगीचा बनाया

                         चमेली विकसित होकर

                         बाडे पर सरकती है

                         बाडे की ओर जानेवाले

                         बात तो यह कहेगें

                         चमेली का सुगंध रहित

                        पुत्रविहिन भवन है यह )

      अन्य लोक गीतों में प्रार्थना गीत कथा गीत और पहलेी भरा गीत मुख्य है । इस प्रकार हम बता सकते है कि  हब इस दुनिया में मानव जाति की व्युत्पति हुई तभी से लोक साहित्य उत्पन्न् हुआ होगा । ग्रामीण लोगों के आचार –व्यवहार, विश्वास रीति नीति का प्रतिबिम्ब लोक साहित्य में देख सकते है । यह मानव चिंतन, भावना एवं कल्पना का भंडार है ।आदिकाल में अलिख कविता के रूप में उत्पन्न् यह लोक गीत हर पीढ़ी की जनता से गाया हुआ होकर आज भी ग्रामीण वातावरण में गुंजरित हुआ होता है ।

संदर्भ

1.तमिल साहित्य और संस्कृति-संपादक –डॉ अमर सिहं वधान लेख्क-प्रो.डॉशारण रमणी , पृष्ठ सं 256 -258

                                                             डॉ. सुनील   पाटिल
                                                            सहायक प्रवक्ता –हिंदी
                                             द्वारकादास गोर्वधनदास वैष्णव कालेज
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