शोध-तत्त्व: : भारतीय ज्ञान परम्परा भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं का संगठित स्वरूप है, जिसमें भारत के सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलयुग के प्राचीन, समृद्ध, बहुआयामी बौद्धिकता, सांस्कृतिक ज्ञान की धारा बहती है। भारत के प्राचीन साहित्य वेद, पुराण, उपनिषद, योग, न्याय, रामायण, महाभारत, गीता, भक्तिकालीन साहित्य ज्ञानेश्वरी, रामचरितमानस, भक्तिकालीन संत-साहित्य और सत्यार्थ प्रकाश इत्यादि ग्रन्थों से विकसित भारतीय ज्ञान परम्परा भारतीय ज्ञान का कोठार है। भारतीय ज्ञान परम्परा केवल आध्यात्मिकता के इर्द-गिर्द ही नहीं घूमती है, बल्कि यह वैज्ञानिकता, कलात्मकता, नैतिकता, सामाजिकता के ज्ञान को समेटने वाली, चरित्र निर्माण, समग्र दृष्टिकोण और गुरु-शिष्य परम्परा पर केन्द्रित ज्ञान धरोहर है, जो स्पर्श प्रौद्योगिकी युग के आधुनिक व्यक्ति के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान करने में सहायक है। आज आधुनिक व्यक्ति अनावश्यक इच्छाओं का शिकार होकर मानसिक तनाव, मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों का ह्रास, संवेदनहीन, अमानवीय कृत्य जैसे अवसादों से ग्रसित एवं पर्यावरण संकट का सामना कर रहा है। इन सभी समस्याओं से मुक्ति के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा एवं लोक साहित्य में संकलित वाणी प्रासंगिकता महत्त्वपूर्ण है।
केन्द्रीय-ध्वनि: गुरु-शिष्य, संस्कृति, मूल्य, आधुनिकता, भक्तिकाल, समाज
शोध-रूप: भारत सदियों से सृष्टि एवं आध्यात्मिकता का अनुसंधान केन्द्र रहा है। यहाँ किसी भी कार्य को करने से पहले गुरु को महत्त्व दिया जाता है। भारतीय समाज गुरु एवं प्राकृतिक दर्पण में अपना भविष्य देखता है, इसीलिए भारत के लोग गुरु, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और सूर्य आदि सृष्टि के संवेदनशील तत्त्वों को देवताओं की तरह पूजते हैं, जो भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रतीक हैं। पेड़ों की यदि बात करें तो पीपल, बरगद, पौधों में तुलसी, जंतुओं में गाय, बैल, बंदर और सूर्य जो पृथ्वी को ऊर्जा प्रदान करता है आदि की पूजा की जाती है, जो पर्यावरण को संतुलित रखने में मदद करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा में गुरु द्वारा दी गई शिक्षा पर्यावरण और व्यक्ति के बीच संतुलन बनाने में मदद करती हैं, जो विश्व कल्याण के लिए आवश्यक है, जिनका उल्लेख प्राचीन लोक साहित्यों में भी मिलता है। लोक साहित्य जनमानस की भावनाओं, सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओं को वाणी के माध्यम से व्यक्त करने की कला है, जिसे गीतों, रागिनियों, कथाओं, गाथाओं, नाटकों, पदों, कविताओं के रूप में लोगों की बातों को लोगों द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें मुहावरे, पहेलियाँ और उलटबाँसियों का भी मिश्रण होता है। लोक शब्द का उपयोग ऐसे लोगों के लिए किया गया है, जो दिखावे, चमक-धमक, साज-सज्जा और औपचारिक शिक्षा से दूर, परन्तु मानवता के क़रीब रहते हैं। ऋग्वेद में ‘लोक’ शब्द को ‘जन’ पर्यायवाची शब्द के रूप में उल्लेखित किया गया है। यदि लोक साहित्य में भक्तिकालीन संत-कवियों के योगदान की बात करते हैं तो संत-कवि नामदेव, कबीर साहब, रवि साहब (रैदास), तुलसी साहब, सूर साहब, दादू दयाल और संत-कवयित्री मीरा साहिबा आदि की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है, जिन्होंने भारतीय समाज के लोगों को उनकी ही लोक भाषाओं जैसे मराठी, सधुक्कड़ी, ब्रज, राजस्थानी, अवधी आदि में उपदेश दिए। इन्होंने भारतीय समाज को भक्ति से जोड़ा। भक्तिकालीन संत-कवियों ने भारतीय ज्ञान परम्परा को जीवंत रखते हुए, समाज में जातिवाद, पाखंडवाद, भेदभाव का विरोध, लिंग समानता, मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों की स्थापना और समन्वयवादी दृष्टिकोण के माध्यम से लोक चेतना को जागृत करने में अहम योगदान दिया। संत-कवयित्री मीरा साहिबा ने नारी सशक्तिकरण को मजबूत करते हुए, सामाजिक बंधनों को दरकिनार किया, जो नारी स्वावलंबन का प्रतीक है। उन्होंने प्रेम भक्ति को नृत्य और संगीत में बांधकर भजनों के माध्यम से लोक जीवन में उतारा। संत-कवयित्री मीरा साहिबा पुरुष प्रधान समाज, बड़ी जाति और कुल की परम्पराओं पर प्रहार करते हुए कहती हैं:—
“राणाँजी हो जाति रो कारण म्हारे को नहीं, लागो म्हारो हरि भगताँ सूँ हेत॥”1
संत-कवि सूर साहब के लोक गीतों (पद) ने संगीतात्मकता हासिल कर जनप्रिय बन गए। भक्तिकालीन संत-कवियों ने खुद को लोकहित के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं और मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों को जीवंत रखा। इसीलिए संत-कवि तुलसी साहब को लोकनायक की उपाधि से नवाज़ा जाता है। उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ में ‘लोक और वेद’ शब्दों का चित्रित वर्णन मिलता है, उन्होंने लोक सत्ता को स्वतंत्र रूप से परिभाषित किया है। वे लिखते हैं:—
“लोकहूँ बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥”2
हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी लोक साहित्य पर अपने विचार व्यक्त किए। वे कहते हैं कि “ऐसा मान लिया जा सकता है, जो चीजें लोकचित्त से सीधे उत्पन्न होकर सर्वसाधारण को आंदोलित, चालित और प्रभावित करती हैं, वे ही लोक साहित्य, लोकशिल्प, लोकनाट्य, लोक-कथानक आदि नामों से पुकारी जा सकती हैं।”3 भारतीय प्राचीन साहित्य में भी लोकहित की बात कही गई है। जहाँ भारतीय ज्ञान परम्परा सृष्टि और मानव के बीच अटूट संबंध दर्शाती है तो वहीं उपनिषद में भी सृष्टि को मनुष्य के जीवन से जोड़ा गया है। महा उपनिषद के प्रथम अध्याय में सृष्टि के तत्त्वों का वर्णन किया गया है:—
“अथातो महोपनिषदं व्याख्यास्यमस्तदाहुरेको ह वै नारायण
आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नापो नाग्नीषोमौ नेमे द्यावापृथिवी न
नक्षत्राणि न सूर्यो न चन्द्रमाः। स एकाकी न रमते। ॥1-3॥”4
भारतीय ज्ञान परम्परा का उल्लेख उपनिषद् में भी मिलता है। जिसमें प्रकृति के साधनों का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि ईश्वर की प्रार्थना के बाद महोपनिषद् की व्याख्या का प्रारंभ किया जाता है। सृष्टि के आरम्भ में केवल प्रभु नारायण ही थे। इनके अतिरिक्त इस ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा, वायु, जल, अग्नि और सोम आदि देवता भी नहीं थे और न ही देवलोक, पृथ्वी लोक, नक्षत्र, चन्द्रमा और सूर्य थे। ऐसी परिस्थिति में पुरुष का एकाकी रहना अच्छा नहीं लगा। इसीलिए प्रभु नारायण ने सृष्टि को देवलोक और पृथ्वी लोक के साथ मनुष्य को तोहफ़े के रूप में समर्पित कर दिया, जिसका संरक्षण करना मानव समाज का धर्म है। भारत विश्व को अपना कुटुम्ब मानता है। भारत की पवित्र धरती पर अवतरण लेने वाले संत-ऋषि, मुनि-संन्यासी, गुरु-शिष्य, कवि-कवयित्र और विद्वान-विदुषी सृष्टि को अपना घर मानते हैं, जिनका सृष्टि से गहरा नाता रहा है। महा उपनिषद के अध्याय छह में उल्लेख मिलता है कि “यह मेरा मित्र है, वह मेरे मित्र नहीं है, ऐसी मानसिकता रखने वाले निकृष्ट विचार अधम मनुष्य के होते हैं। जबकि उदार चरित्र वाले मनुष्य के लिए तो सारी पृथ्वी ही एक परिवार है। भारतीय समाज उच्च चरित्रवान समाज है, जो किसी को पराया नहीं समझता। इसलिए भारत समस्त वसुधा को अपना परिवार मानता है:—
“अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥71॥”5
भक्तिकालीन संत-साहित्य में मनुष्य को भक्ति के मार्ग की ओर ले जाने वाले गुरु की महिमा का सुंदर चित्रित वर्णन किया गया है। महा उपनिषद के चतुर्थ अध्याय में भी गुरु महिमा का चित्रित वर्णन देखने को मिलता है:—
गुरुवाक्यसमुद्भूतस्वानुभूत्यादिशुद्धया।
यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते॥26॥”6
व्याख्या: “गुरु एवं शास्त्रों वचनों के अनुसार तथा अन्त: अनुभूति के माध्यम आदि से जो अन्त: की शुद्धि होती है, उसी के सतत अभ्यास से आत्म-साक्षात्कार किया जा सकता है।”
भारतीय समाज सदैव सृष्टि के प्रति सजग और संवेदनशील रहा है। भारत विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देता है, अर्थात् इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जन्तु, जल-नभ और पेड़-पौधे एक ही परिवार का हिस्सा मानता है। इसीलिए भारतीय समाज के व्यक्ति की जीवन शैली सृष्टि और मौलिकता के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका श्रेय गुरु-शिष्य परम्परा को ही जाता है, जिसने व्यक्ति का सुंदर चरितार्थ विकास किया है। भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य के संत-कवियों ने गुरु और शिष्य के पवित्र रिश्तों का चित्रित उल्लेख किया है। संत-कवि दादू दयाल गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं:—
“भवसागर में डूबताँ, सतगुर काढ़े आइ।
दादू खेवट गुर मिल्या, लीये नाव चढ़ाइ॥”7
संत-कवि दादू दयाल कहते हैं कि जहाँ गुरु अपने शिष्यों को जीवन का पवित्र मार्ग दिखाते हैं तो वहीं शिष्यों को भी गुरु द्वारा दी गई शिक्षा को अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है, अन्यथा शिष्यों का जीवन सुखमय नहीं होगा। वे कहते हैं:—
“ज्ञान लिया सब सीखि सुणि, मन का मैल न जाइ।
गुरु बिचारा क्या करै, सिष विषै हलाहल खाइ॥”8
संत-कवि दादू दयाल जहाँ शिष्य को गुरु की शिक्षा पर ध्यान देने की हिदायत देते हैं तो वहीं दूसरी ओर वे अनाड़ी, पाखंडी और अज्ञानी गुरु से दूर रहने को भी कहते हैं:—
“गुर अपंग पग पंख बिन, सिष साख का भार।
दादू खेवट नाव बिन, क्यूँ उतरैंगे पार॥”9
संत-कवि दादू दयाल की शिक्षा आधुनिक व्यक्ति के लिए आज भी प्रासंगिक है, जो आधुनिकता के अनावश्यक उपयोग और प्रयोग में लगा हुआ है। स्पर्श प्रौद्योगिकी युग का आधुनिक व्यक्ति परिग्रह की ओर निरंतर बढ़ता जा रहा है, जिसका वहाँ से वापस लौटना कठिन होगा। ऐसे व्यक्ति गुरु ज्ञान से अनभिज्ञ होते हैं, जिन्हें सांसारिक सुख का बोध नहीं होता है। ऐसे लोगों के लिए भक्तिकालीन संत-कवियों की वाणी प्रासंगिक है। भक्तिकालीन संत-कवियों के ज्ञान के कारण ही भारत विविधता में एकता की संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं का बोध कराने वाला विश्व का एकमात्र देश कहलाता है। क्योंकि भारतीय समाज का आधार ही संस्कृति, सभ्यता और परम्पराएँ हैं। संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं को जीवंत रखने में गुरु-शिष्य परम्परा की भूमिका महत्त्वपूर्ण है, जो व्यक्ति की जीवन शैली से जुड़ी है। भारतीय समाज में सकारात्मक जीवन शैली को महत्त्व दिया जाता है, जबकि नकारात्मक जीवन शैली से मुक्त रहने के लिए व्यक्ति गुरु-शिष्य परम्परा में शिक्षा ग्रहण करता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों से लेकर वर्तमान ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। व्यक्ति को किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से मुक्ति के लिए शिक्षित होना आवश्यक है, जो प्राचीन काल से गुरु के आश्रय में दी जाती रही है। भक्तिकालीन संत-कवियों ने व्यक्ति को नकारात्मक जीवन शैली से मुक्त करने के प्रयास किए। उन्होंने भक्ति के माध्यम से समाज में सकारात्मकता लाने के लिए लोक भाषा में सुधारवादी आंदोलन चलाए। संत-कवि नामदेव ने मनुष्य के जीवन को अमूल्य बताते हुए कहा है कि मनुष्य को परमात्मा का दिया गया जन्म का तोहफ़ा बार-बार नहीं मिलता:—
“नहीं ऐसो जन्म बारुंबार।
कहीं पूरब लै पाईयौ। मनिषा औतार॥
ग्रभ बास मैं प्रतिपाल कीन्हीं। ताहि सुमरि गंवार।
कहा उतर देहगौ। राजाराम कै दरबार॥
बधत पल पल घटत छिन छिन जात न लागै बार।
तरवर सूं फल झड़ि पड़ै। बहौरि न लागै डार॥
संसार सागर मंडी बाजी। सुरति कीन्हीं सारि।
मनिष जन्म का हाथि पासा। जीति भावै हारि॥
संसार सागर विषम तिरणां। निपट उंडी धार।
सुरति निरति का बांधे भेरा। उतरिये लै पार॥
काम क्रोध मद लोभ लालच। ताहि बंध्यौ संसार।
दास नामैं जग जीति लीया। केवल नांव अधार॥”10
(श्रीनामदेव गाथा, अभंग 2272)
भक्तिकालीन संत-कवियों ने व्यक्ति की जीवन शैली में मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों के महत्त्व को समझाया। जीवन शैली से तात्पर्य एक व्यक्ति के रहन-सहन का ढंग है। व्यक्ति के रहन-सहन का वह ढंग सकारात्मक या नकारात्मक दोनों में से एक प्रकार का हो सकता है। व्यक्ति की सकारात्मक जीवन शैली सृष्टि द्वारा प्रदान की गई मौलिक जीवन शैली है, जो मौलिक गुणों से संपन्न होती है। जबकि व्यक्ति की नकारात्मक जीवन शैली प्रौद्योगिकी साधनों द्वारा विकसित की गई आधुनिक जीवन शैली है।
भारतीय ज्ञान परम्परा की जड़ें बहुत गहरी हैं, जो सदियों से मानव कल्याण और सृष्टि की संरक्षक है। भारतीय ज्ञान परम्परा गुरु-शिष्य परम्परा के इर्द-गिर्द घूमती परम्परा है, जिसकी मुख्य विशेषता व्यक्ति को सृष्टि के साथ जोड़कर मानवता का मार्ग दिखाती है। भारतीय ज्ञान परम्परा आधुनिक व्यक्ति के लिए दार्शनिक और आध्यात्मिक, साहित्यिक और लोकतत्त्व, वैज्ञानिक और तकनीकी तथा सांस्कृतिक और लोकज्ञान का कोठार है, जिसमें प्राचीन काल से लेकर आधुनिकता के स्पर्श प्रौद्योगिकी युग तक का ज्ञान ही ज्ञान समाहित है। वेद, उपनिषद, योग, न्याय, वेदांत, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, आर्यभटीय, आर्यभट्ट सिद्धांत (ज्योतिषशास्त्र व गणितशास्त्र), गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त, खगोलशास्त्री शुल्ब सूत्र (संस्कृत के सूत्रग्रन्थ), रामायण, गीता, महाभारत, पुराण, कला, संगीत, पारम्परिक खेल और समूह भाषाएँ भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रमुख स्रोत हैं, जो भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो वेद, पुराण, उपनिषद्, शास्त्र, लोक साहित्य और संत साहित्य पर आधारित विविध अनुसंधानित ज्ञान प्रणाली है। भारतीय ज्ञान प्रणाली न केवल आध्यात्मिकता एवं दार्शनिकता पहलुओं पर केन्द्रित है, बल्कि आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को भी समेटे हुए हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा के महत्व को समझते हुए इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में पुनर्स्थापित किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अध्याय 22 में उल्लेख किया गया है कि “भारत संस्कृति का समृद्ध भण्डार है, जो हज़ारों वर्षों में विकसित हुआ है। भारत की कला, साहित्यिक कृतियों, प्रथाओं, परम्पराओं, भाषाई अभिव्यक्तियों, कलाकृतियों, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के स्थलों इत्यादि में परिलक्षित होता हुआ दिखता है। भारत में भ्रमण, भारतीय अतिथि सत्कार का अनुभव लेना, भारत के खूबसूरत हस्तशिल्प एवं हाथ से बने कपड़ों को खरीदना, भारत के प्राचीन साहित्य को पढ़ना, योग एवं ध्यान का अभ्यास करना, भारतीय दर्शनशास्त्र से प्रेरित होना, भारत के अनुपम त्यौहारों में भाग लेना, भारत के वैविध्यपूर्ण संगीत एवं कला की सराहना करना और भारतीय फिल्मों को देखना आदि ऐसे विभिन्न आयाम हैं, जिनके माध्यम से दुनिया भर के करोड़ों लोग प्रतिदिन इस सांस्कृतिक विरासत में सम्मिलित होते हैं, इसका आनन्द उठाते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं। यही सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक संपदा है, जो भारत के पर्यटन स्लोगन के अनुसार भारत को वास्तव में “अतुल्य ! भारत” बनाती है। भारत की इस सांस्कृतिक संपदा का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रसार, देश की उच्चतर एवं प्राथमिकता होना चाहिए, क्योंकि यह देश की पहचान के साथ-साथ इसकी अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।”11 जिसे भारतीय शिक्षा संस्थाओं में लागू किया जाना अनिवार्य किया है, जिससे भारतीय ज्ञान परम्परा और लोक साहित्य को संरक्षित किया जा सकेगा।
निष्कर्ष: भारतीय ज्ञान परम्परा भारतीय समाज का एक ऐसा अंकुरित मूल्यों का पौधा है, जिसके फलों का सेवन करने से व्यक्ति का समग्र विकास हो जाता है। इस पौधे को अंकुरित करने में गुरु-शिष्य परम्परा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जो भारत के प्राचीन साहित्यों से लेकर स्पर्श प्रौद्योगिकी साहित्यों तक के जीवन दर्शन को केन्द्रित करती है। लोक साहित्य भारत की मिट्टी से जुड़ा हुआ साहित्य है, जिसके बिना भारत की संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं को समझा नहीं जा सकता है। भारतीय ज्ञान परम्परा और लोक साहित्य का अध्ययन स्पर्श प्रौद्योगिकी युग के आधुनिक व्यक्तियों की आवश्यकता है, जिसके बिना उनका समग्र विकास संभव नहीं है। आज आधुनिक व्यक्ति के पास सांसारिक सुख-सुविधाओं का तो अंबार है, परन्तु उसके पास नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान की कमी है, जिससे उनका जीवन मशीनों तक ही सीमित रह गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, भारतीय शिक्षा संस्थानों में भारतीय ज्ञान परम्परा को शामिल किया गया है, जिससे बच्चों के भविष्य का निर्माण नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों के अनुरूप हो सके, जिसे अनिवार्य रूप देने की आवश्यकता है। भारतीय ज्ञान परम्परा को जीवंत रखने और उसे भावी पीढ़ी में स्थानांतरित करने के लिए भक्तिकालीन संत-कवियों ने गुरु-शिष्य परम्परा पर जोर दिया, जिससे आज की भावी पीढ़ी दूर हो गई है। इसीलिए भक्तिकालीन संत-कवियों की वाणी अभियंताओं अर्थात् कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विकसित करने वाले अभियंताओं के लिए प्रासंगिक है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकें, जो आज विभिन्न अवसादों का शिकार हो रहे हैं। भक्तिकालीन संत-साहित्य और स्पर्श प्रौद्योगिकी तकनीकी के बीच सामंजस्य स्थापित करने की अत्यंत आवश्यकता है, जिससे भारतीय समाज पश्चिमी समाज के प्रभाव से मुक्त होकर भारतीय ज्ञान परम्परा के अनुरूप विकसित हो सके।
संदर्भ: 1. सेठी, वीरेन्द्र, मीरा प्रेम दीवानी (अ.मा.पु.सं.:978-81-19078-37-0), ब्यास, डी.के.सीकरी, सेक्रेटरी राधास्वामी सत्संग ब्यास डेरा बाबा जैमल सिंह, सत्रहवाँ संस्करण 2023, पृ. 20.
2.श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास कृत; श्रीरामचरितमानस: रामायण (सम्पूर्ण आठों कांड) (अ.मा.पु.सं.: 978-81-310-0726-6), दिल्ली, मनोज पब्लिकेशन्स, बारहवाँ संस्करण: 2020, पृ. 52.
3.लोक साहित्य, एम.ए. (हिंदी) (पूर्वार्द्ध), MAHIND-403, अरुणाचल प्रदेश, इंस्टिट्यूट आफ़ डिस्टैन्स एजुकेशन, राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, पृ. 8.
https://rgu.ac.in/wp-content/uploads/2021/02/Download_600.pdf
4.महा उपनिषद, प्रथम अध्याय (1-3), पृ. 5,
5.षष्ठ अध्याय (71), उपरिवत्, पृ. 138.
6.चतुर्थ अध्याय (26), उपरिवत्, पृ. 50.
7.संपादक, बेलवीडियर, दादू दयाल की बानी (जीवन चरित्र सहित) भाग-1(साखी), इलाहाबाद, बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स, संस्करण 2016, पृ. 2.
- उपरिवत्, पृ. 11.
- उपरिवत्, पृ. 12.
- पुरी, जे.आर. व अन्य, सन्त नामदेव (अ.मा.पु.सं.:978-81-8256-854-9), ब्यास, जे.सी. सेठी, सेक्रेटरी राधास्वामी सत्संग ब्यास डेरा बाबा जैमल सिंह, दसवाँ संस्करण 2009, पृ. 62.
11.राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, 29 जुलाई 2020, पृ. 86.






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