कृष्णा सोबती ने कभी भी अपने को स्त्री विमर्श या नारीवाद से नहीं जोड़ा, किंतु उनकी कहानियाँ या उपन्यास उन्हें स्त्री जीवन के गहरे सरोकारों से जोड़ते हैं और उन्हें स्त्री जीवन से जुड़े सामाजिक व सांस्कृतिक यथार्थ की पड़ताल की तरफ ले जाते हैं उनकी यह स्त्री अलग अलग वर्गों से आती है, पर ज्यादातर मध्यवर्गीय स्त्रियाँ ही उनके लक्ष्य में हैं। उनकी कहानी ‘बहनें’ भी इसी मध्यवर्गीय स्त्री को केन्द्र में रख कर लिखी गई है।

कृष्णा सोबती की कहानी ‘बहनें’ एक ऐसी कहानी है जो हमारे बहुत जाने पहचाने जीवन दृश्यों को इतने सहज तरीके से रखती है कि एक उपरी और सरल पाठ दिखाई पड़ने लगता है। स्त्री की गृहस्थिन भूमिका में जुटे रहने के असंतोष और खासकर सगी बहनों की जीवन त्रासदी से जुड़ी एक सीमित लगने वाले दायरे की कहानी भर है लेकिन इतना ही होता तो यह कहानी महत्वपूर्ण न लगती और तब शायद इस पर सोचने और कुछ लिखने की मुझमें कोई इच्छा न पैदा हो पाती।

मैंने जब जब इसे पढ़ा तो लगा कि यह बहनों के प्यार की और विछोह की कहानी भर नहीं है या बड़े दिनों बाद बड़ी बहन के बेटे के ब्याह के मौके पर मिली तीन बहनों की बचपन की गहरी स्मृतियों से छलछला आई स्नेहाभूति की कहानी भर नहीं है। यह कहानी सहज मानवीय रिश्तों को न जी पाने की पीड़ा से आगे संश्लिष्ट यथार्थ के कई भीतरी उधड़तेधागों को अपने पाठक के हाथ पकड़ाती चलने वाली कहानी भी है। इसीलिए इस कहानी को पढ़ते हुए मिलने वाला जो पहला पाठ है, वह इकहरा न हो कर अपनी संश्लिष्टता में अर्थ और इरादे की कई नई खिड़कियाँ खोलता है। तब सोचने की वाजिब वजहें तैयार दिखाई पड़ती हैं कि आखिर यह कहानी अगर उपर्युक्त कथानक भर नहीं है तो अपने तय कथानक के इधर उधर कुछ सूत्र छोड़ती यह क्या कह रही है? बहनों का बिछुड़ना एक परम्परागत समाज का स्वीकृत सत्य है और मिलने पर स्मृतियों की कचोट और प्यार का उमड़ना एक स्वाभाविक सत्य, फिर वे कौन से धागे हैं, जिन्हें पकड़ते ही यह कहानी अपने कथानक के बड़े भीतर धँसे किसी तत्व से टकरा कर कैसी सी कौंध पैदा करती है

और पाठक के लिए ठिठक कर कुछ विचार कर ले जाने का स्पेस खोल देती है। शायद इसीलिए यह कहानी भारतीय समाज में बहनों के साथ प्रायः घटित होने वाली एक सामान्य सी घटना का ब्यौरा देती सामान्य कहानी नहीं रह जाती। बल्कि अपने कथा सूत्रों के अर्थ खुलते ही सामान्य ब्यौरों से आगे बढ़ती अपने इरादों में जिम्मेदार और इसीलिए विशिष्ट बन जाने की तरफ खड़ी दिखने लगती है। इन कथा सूत्रों को पकड़ कर चलते हुए फिर से उसी कथानक से टकराना होगा, जो उपर से बहुत सरल शिल्प का लबादा ओढ़े हुए है।

कथा शुरू ही होती है स्नेह संबंधों से बने भावुक परिवेश के ताने बाने से -‘‘ आवेग में ओढ़नियाँ  खिसकीं,बाहें बाहों से मिली और तीनों बहनें गले लग गईं – बड़ी, छोटी और मझली। देह से लगी वर्षों की छाया क्षण भर के लिए अलग जा पड़ी। बचपन, माँ के आँगन और एक दूसरे से लिपटीं वे तीनों। मीठे सगे दिन पलकों में तैरने लगे और आँखें भीग आईं। ममता से उमड़े गहरे आलिंगन, घर गृहस्थी के डोरों में उलझे अंतर के नीचे छिपी प्यार की स्मृतियाँ  उछल उछल कर आँचल भिगोने लगीं। एक ही आँगन में खेली कूदी, पर बड़ी हो कर वे दूर दूर किनारे से जा लगीं।घर आँगन बदल गए, प्यार के नाते बदल गए और आस पास जैसे अपनी अपनी परछाइयाँ घूमने लगीं।’’1 बहनें मिली हैं लम्बे अरसे के बाद और जाहिर है कि बचपन की स्मृतियाँ मिलते ही प्रबलता के साथ वर्तमान यथार्थ पर कुछ देर के लिए छा गई हैं। इतने लम्बे विछोह में बना वास्तविक यथार्थ उनकी चेतना से इस क्षण विलग हो गया है। स्नेह संबंधों की  स्मृतियाँ निश्चित ही अपने आवेग में समय की लम्बाई को कुछ देर के लिए ढ़क देती हैं। लेकिन स्मरण रहे कि यह ढकना क्षण भर का ही है-‘‘देह से लगी वर्षों की छाया क्षण भर के लिए अलग जा पड़ी।’’ बचपन और माँ का आंगन इसी छोटे क्षण में फिर से सजीव हो उठा था। लेकिन यह आवेग क्षण भर का ही था और चॅूकि क्षण भर में ही वास्तविक यथार्थ, धुंधलेपन को चीर कर प्रकट हो उठा है, इसलिए स्मृति की सजीवता पीछे छूटी हुई जान कर आँखों का भर आना सहज प्रक्रिया बन गया है। अब मीठे सगे दिन पलकों में तैर उठते हैं और आँखें भर आती हैं। यहाँ एक बारगी यह भी लगने लगता है कि जैसे लेखिका कह डालना चाहती हों कि यही नियति है, स्त्री का भाग्य। तो क्या कृष्णा सोबती नियति को स्त्री के पल्ले सरका कर पाठक को निरी घटनात्मक भावुकता की ओर मोड़ ले जाना चाहती हैं? लेकिन नहीं, कृष्णा सोबती सावधान लेखिका हैं। वे क्षण भर की भावुकता से निकाल कर अपने पात्रों के साथ पाठक को भी यथार्थ की धरती पर पैर टिकाने के लिए बाध्य कर देती हैं। न, यह नियति नहीं है, यह शोषणकारी व्यवस्था की रणनीतियाँ हैं, जो स्त्री को अधिक निहत्था, अधिक बेचारा और अधिक सहनशील बनाती हैं।

स्त्री का उसके स्नेह संबंधों से दूर कर दिया जाना, एक थोपी गई व्यवस्था का परिणाम है जो स्त्री को कुछतय संबंधों की ही इजाजत देती है। पितृसत्ता की नियमावली में स्त्री के स्नेह संबंधों के भीतर माता पिता, भाई बहन न होकर, कुछ तयशुदा संबंध निर्धारित हैं, जिनमें पति और बच्चे हैं, पति का परिवार है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने सन् 1861 में ही इसकी पहचान कराते हूए स्नेह संबंधों के तय किए गए दायरे को प्रश्नांकित कर दिया था। स्त्री के लिए तय की गई ‘‘सारी नैतिकता उन्हें यह बताती है कि यह महिलाओं का कर्तव्य है और सभी मौजूदा भावनाओं के अनुसार यह उनका स्वभाव है कि वे दूसरों के लिए जिएं, पूर्ण आत्मत्याग करें और अपने स्नेह संबंधों के अतिरिक्त उनका अपना कोई जीवन न हो। स्नेह संबंधों से तात्पर्य सिर्फ उन संबंधों से है, जिनकी उन्हें इजाजत है-“ वे पुरूष जिनसे स्त्री संबंधित हो या वे बच्चे, जो पुरूष व उनमें एक अटूट व अतिरिक्त बंधन होते हैं।’’2

इस तरह पितृसत्तात्मक नियमावली उन्हें तयशुदा संबंधों से इतर अपने सहज स्नेह संबंधों को बनाए रखनेया उनके उत्तरदायित्व से बंधे रहने की इजाजत नहीं देती। तयशुदा संबंधों की अपनी अहमियत होती है या हो सकती है लेकिन क्या स्त्री के लिए उसके रक्त संबंधों में भाई बहन का संबंध मूल्यवान नहीं होता। क्या वह किसी आचार संहिता द्वारा खारिज कर दिए जाने से पूर्णतः खत्म हो जाता है? यदि पुरूष जन्म से प्राप्त अपने स्नेह संबंधों को बनाए रखता है तो स्त्री से ही उसके सहजात संबंधों का त्याग करा कर और इसके लिए उसे महिमा मंडित करने के पीछे आखिर सत्ता की राजनीति क्या है? क्या यह उसे जड़ से उखाड़ कर अकेली और कमजोर बना देना नहीं है? अकेला पड़ा व्यक्ति आसानी से दासत्व की पकड़ में आ सकता है। उसकी लाचारी और निरूपायता उसे अपनी अवमानना और अन्याय को सहन करने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ कर तैयार कर देती है। इसके तहत देखें तो ‘बहनें’ की बहनें अपनी जड़ों से उखाड़ कर अलग अलग दिशाओं में छिटका दी गई हैं। परंतु बचपन का जीया स्नेह और वक्त पड़ने पर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर, एक पक्ष बन कर खड़े होने का विश्वास या फिर तमाम ऐसे मौकों पर एक दूसरे की देख भाल और एक ही माता पिता की संतान के रूप में अपने को आइडेंटीफाई करना और इस तरह साहचर्य जनित गहरे प्रेम का विकास होना, जिसे अंग्रेजी में ‘बांडिंग’ कहते हैं, क्या ऐसी ‘बांडिंग’ एक परिवार की या भाई बहनों की नहीं हो जाती? जो परिस्थितियों के आलोक में मद्धिम जरूर दिखने लगती है पर खत्म नहीं होती और उसके कभी भी उभर कर बलवती हो जाने के खतरे बने रहते हैं इस ‘बांडिंग’ के खतरे को भाँप कर ही एक जमाने तक बहनों को अपनी ससुराल में अपने भाई से अकेले में बात करने की इजाजत नहीं थी। इसके पीछे के तर्क बड़े ही अश्लील और रिश्तों को अविश्वसनीय बनानेवाले थे। इस प्रेम की प्रबलता के कारण स्त्रियों और पुरूषों दोनों को इन संबंधों के त्याग को समाज और जीवन का जरूरी हिस्सा मानने के लिए, मानसिक रूप से तैयार करने हेतु वर्षों तक दिमागी कंडिशनिंग की जाती है। स्त्रियाँ स्वयं ही इसे छोड़ दें और अपनी सबसे मजबूत, भरोसेमंद स्थितियों के त्याग में पवित्र महिमा से जड़ी खुद को जड़हीन बना लें। ऐसे में बहनों का हस्तक्षेप भला कहाँ कोई जगह रखता है! अगर बहन बड़ी हुई तो पहले ही दूर दूर छिटका कर दुरभिसंधियों के किले में कैद की जा चुकी होती हैं और अगर छोटी हुईं तो कैद किए जाने की तैयारी का उनका प्रशिक्षण जारी रहता है। वे अपनी बहन की शादी शुदा जिंदगी में हस्तक्षेप करने से यथासंभव दूर रखी जाती हैं। या इस तर्क के साथ उन्हें चुप करा दिया जाता है कि ‘उन्हें अभी विवाहित जिंदगी की जटिलताओं का कोई अनुमान नहीं है। इसलिए वे क्या जानें कि बहन की जिंदगी की परेशानियाँ कैसे हल होंगी और फिर उनकी अपनी शादी पर इसका असर आ सकता है। रिश्ता बताने वाले यही रिश्तेदार होते हैं तो उनकी नजरों में आचारसंहिता का पालन करनेवाली एक अच्छी लड़की बने रहना जरूरी है।’ यह तर्क भविष्य के लिए डराता है, धमकाता है और तयशुदा स्नेह संबंधों से इतर अपने स्नेह संबंधों का मददगार बनने से रोकता है। दूसरी तरफ शादी शुदा बहन पर पति का शासन होता है। शासक की मर्जी पर है कि वह अपनी पत्नी रूपी दास के लिए कितना स्पेस तय करता है।इस स्पेस में उसकी शादी शुदा बहन का आना मुश्किल ही है। नतीजा केवल औपचारिक संबंधों तक ही इसे बनाये रखना एक तरह की विवशता बन जाती है। इसके बावजूद बचपन की बांडिंग से तैयार भीतर का तार जो है वह उन्हें आपस में कहीं जोड़े ही रह जाता है। इसी का परिणाम है कि जब तीनों बहनें, बड़ी बहन के बेटे के ब्याह में मिलती हैं तो बड़ी बहन की ममता और बड़ी होने के नाते छोटी बहनों के लिए, वह स्थगित किया प्यार और देख भाल का भाव उभर कर प्रकट हो जाता है। वह अचानक ही अपनी बहनों की सगी बन जाती है। बड़ी का छोटी बहनों की चिंता करना इसी सत्य की तरफ ले जाता है। यहाँ तक कि बड़ी बहन, छोटी बहनों की पसंद नापसंद को भी नहीं भूली है। यह तो गहराई तक जुड़े होने की हद ही है कि इतने वर्ष बीत गए इन्हें अलग हुए, इस बीच इतनी तो अलग तरह की जिम्मेदारियाँ लाद दी गईं इन पर ज़िगरा है कि उस नेह को अब तक संभाल कर रखे हैं! परंतु इस नेह का प्रदर्शन इतना आसान भी नहीं है स्त्री के लिए! इतने समय से जिस पितृसत्ता ने उसे अपने इन पुराने रूपों से बेदखल किया हुआ था, वह इस छोटे से समय के प्यार दुलार और देख भाल में थर्रा उठती है,सिंहासन डोलने का भय उसे होने लगता है। इसलिए पितृसत्ता के प्रतिनिधियों की आँखों में ये स्त्रियाँ तुरंत चुभने भी लगती हैं। इस भाव को तत्काल ही मझली और छोटी बहनें भाँप लेती हैं। इसी समय, काल नियन्त्रण के फार्मूले के तहत समाज नियन्त्रण के लिए पितृसत्ता के प्रतिनिधि पात्र बूढ़ी सास का कथा में प्रवेश होता है।‘‘ बुढ़िया में कोई फर्क नहीं। कमर झुक गई है, पर आँखों में परखने की वही तेजी है।’’3 सास का यह फ्रेम्ड चरित्र है, जिसे समाज ने जतन पूर्वक गढ़ा है। यह बुढ़ापा कोई ग्रेसफुल बुढ़ापा नहीं है, बल्कि अपनी असुरक्षा से त्रस्त, अपनों को ही अपनी सुविधाओं का हविष्य बनाता बेहद सनकी और गिद्धदृष्टि सम्पन्न बुढ़ापा है।इसके लिए लेखिका कहती हैं कि ‘कमर झुक गई है’ यानी अनुभवों ने उम्र के इस पड़ाव तक पहुँचा दिया है, परंतु इन अनुभवों से कोई सोच उनकी बनती नहीं है, सिवाय यह जान जाने के कि अब उन्हें पहले से अधिक स्वार्थी होना है, क्योंकि वह पहले से अधिक बेचारी हुई है। यहाँ उदारता का लेशमात्र भी नहीं दिखता, जिसकी समझ और उम्मीद एक अनुभवसम्पन्न वृद्ध महिला से की जानी चाहिए। बड़प्पन, जिसकी दुहाई देते देते समाज की जीभ छिल जाती है, कहीं दूर तक दिखाई नहीं देता।यह मध्यवर्गीय समाज का जाना पहचाना, स्त्रियों के हिस्से आया बुढ़ापा है, जिसमें शरीर की शक्ति क्षीण हुई है पर आँखों की शक्ति बढ़ गई है।और अब वह शरीर के ठसकपने और धौंस की बजाय आँखों की कठोरता से काम लेती दिखती है। इसीलिए ‘‘मौसी बैठने को हुई और आस पास निगाह घुमा कर बहू की बहनों के सामान पर नजर डालने से चूकी नहीं। फैली हुई चीजों में फलों और मिठाइयों के बड़े बड़े टोकरे दीखे….।’’4

आँखों की यह शक्ति अपना लाभ और दूसरों की हैसियत परखने से नहीं चूकती।यह बूढ़ी सास भी, इस उम्र में पहुँच कर बहू के मायके की हैसियत तौलने में पहले से ज्यादा पारखी हो गई है। यानी अब, जब कि उसकी बहू के बेटे की शादी का समय है, तब भी वह बहू के मायके की औकात, उसकी बहनों के लाए सामान से तौलना चाहती है। बहनों को समाज का यह नियम बखूबी पता है, इसलिए उनकी आंखों से भी यह नहीं चूकता कि बुढ़िया उनके समान पर नजर डाल रही है। वे जानती हैं कि उनके लाए सामान से बहन की इज्जत जोड़ी जायेगी, स्नेह का यहाँ कोई सामाजिक मूल्य नहीं है। समाज उपरी आवरणों को ही वास्तविक बना कर प्रचारित करता है और इस तरह नये जीवन की तरफ कदम रखनेवाली लड़की को आसानी से अपमानित करने का हथकंडा पा जाता है। चूँकि अपने स्नेह संबंधों से एकदम विरक्त हो जाना किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए सहज स्थिति नहीं है, इसलिए इन रणनीतियों के द्वारा उसे हतोत्साहित किया जाता है। हालाँकि बहनों ने यह भी देख लिया है कि नियम के विरूद्ध जाकर बड़ी बहन ने उनके सामान को वरीयता में न रख कर, उनके स्नेह को प्रमुखता दी है। और अगर बार बार उनका गला भर आता है तो इसलिए कि वे बहनों के दुख को अपने सुख के आगे कमतर कर के नहीं देख रही हैं। जबकि बूढ़ी सास बहू की बहन की दुखती रग पर बड़ी निर्ममता से हाथ रखती है-‘‘सुना था कारोबार के दो हिस्से हो गए हैं।बेटी, देवर देवरानियाँ तो वहीं हैं न? छोटे देवर के यहाँ  लड़का हुआ है, बधाई हो। उस दिन बहू ही कह रही थी कि देवर के लड़के को मझली गोद ले रही है।’’ छोटी ने मझली के मुख पर विरक्ति की फीकी सी मुस्कान देखी।’’5

मझली और छोटी, जो अपनी बड़ी बहन की खुशी में शामिल होने आई हैं और बार बार अपने संतानहीन होने के निजी दुख को पीछे रख कर प्रसन्न हैं, पर समाज को यह कैसे सहन हो सकता है? उसके द्वारा तय की गई स्त्री की प्रजनन की भूमिका ही वह नींव है, जिस पर विवाह, परिवार और समाज टिका है, इसके बिना समाज में स्त्री का अस्तित्व ही क्या है। प्रजनन की दी गई भूमिका में अयोग्य साबित हुई स्त्री के समूचे अस्तित्व को समाज खारिज कर देता है। एक समय तक ‘बाझ’ शब्द स्त्री के लिए सबसे बड़ी गाली रहा है। इस कारण उसे प्रायः ही भयानक सामाजिक अपमान और परित्यक्ता की पीड़ित भूमिका से गुजरना पड़ा है। कई बार तो उसे अपने ही हाथों अपने पति का दूसरा विवाह कराकर स्वयं के लिए भीषण अकेलेपन से घिरा दासत्व चुन लेने की विवशता भी झेलनी पड़ी है। इसे कितना भी त्याग की महिमा से जोड़ा जाए, झेलने वाला ही जानता है कि वह कितना लाचार और अकेला पड़ गया है, कि उसके इस कदम की सराहना से भी बड़ा सत्य यह है कि उसकी अनुमति की वस्तुतः कोई जरूरत नहीं रही है।

रीप्रोडक्शन, समाज व्यवस्था को बनाये रखने की ऐसी जरूरत है जो स्त्री के बिना संभव नहीं हो सकती।लेकिन इसी कारण पितृसत्ता इसे स्वतंत्र रखने से भयभीत भी होती है और उसे नियन्त्रित करने के हजार तरीके अपनाती है। स्त्री को समान अधिकार रखने वाले मनुष्य की बजाय पति की सम्पत्ति में रीड्यूज करना, उसकी इसी राजनीति का हिस्सा है। ‘मनुसंहिता’ इस बारे में एकदम स्पष्ट और मुखर है। मनु, पत्नी को पति की वैवाहिक सम्पत्ति घोषित करते हैं और उसे ‘‘गायों, घोड़ी, उंटनी, दासी, भैंस, बकरी, भेंड़’’6 के वर्ग में रखते हैं। इस पत्नी नामक सम्पत्ति का मुख्य काम वंश वृद्धि है और इस काम में यदि वह असमर्थ साबित होती है तो वह समाज, परिवार के किसी काम की नहीं रह जाती, क्योंकि दास भाव में स्थापित अन्य स्त्री भी पूर्णतः समर्पण और सेवा में जुटी है, जो कि रीप्रोडक्शन में भी उपयोगी है।इसलिए प्रजनन में असमर्थ स्त्री को समाज से अलग रखा गया है। उसे जीवन से जुड़े उत्सवों, विवाह आदि शुभ कार्यों से भी अलग रखा गया। ‘बांझ’ शब्द को गाली की तरह प्रयुक्त करने के पीछे स्त्री की इसी भूमिका के महत्व और इसके पूरा न होने पर स्त्री के अस्तित्व को ही नकार देने की रणनीति निहित थी।

स्त्री के दिमागी अनुकूलन में यह बात बैठा दी जाती थी कि यही एक ऐसा कर्तव्य है, जो वह समाज के लिए कर सकती है, इसके कारण ही घर, परिवार से ले कर समाजव्यवस्था के भीतर उसकी बहुत थोड़ी लेकिन कुछ जगह बन पाती है।

‘मनुस्मृति’ के द्वारा तय की गई आचार संहिता में साफ निर्देश दिए गए हैं कि-‘‘ संतानहीन स्त्री की आठवें वर्ष में, मृत संतान वाली स्त्री की दसवें वर्ष में, कन्या को ही जन्म देने वाली स्त्री की ग्यारहवें वर्ष में और अप्रियवादिनी स्त्री की तत्काल उपेक्षा करके उसके जीवित रहने पर भी पति दूसरा विवाह कर ले।’’7

प्रस्तुत कहानी में भी बड़ी बारीकी से, समाज द्वारा बांझ स्त्री को धीरे किंतु धारदार तरीके से खारिज किया जाना शामिल दिखता है। इसलिए बड़ी की सास को अगर अपनी बहू की बांझ बहन का इस शुभ अवसर पर आना कोई सुखद अहसास नहीं जगा पाता तो यह अकारण नहीं है। समाज ने उसकी मनः रचना के भीतर ऐसी ही चीजें बसा डाली हैं कि वे खुशनुमा माहौल के बीच भी मझली को उसकी संतानहीनता के लिए छीलने काटने में संकोच नहीं कर पातीं हैं। यह बोध कराते रहना दरअसल समाज द्वारा संतानहीन स्त्री को पग पग पर दिया गया दंड है, जो लगातार उसके आत्मविश्वास को ध्वस्त करता चलता है और उसे एक अज्ञात नियति के हाथों अपने को निष्क्रिय छोड़ देने की तरफ ढ़केलता है। न कि प्रतिरोध में खड़े हो कर अपने तर्क रखने की हिम्मत पैदा करने लायक बनाता है, जो कि एक निहायत मानवीय जरूरत है। इस तरह स्त्री के आत्मविश्वास को तोड़ते रहना, स्त्री पर नियन्त्रण बनाये रखना आसान बनाता है।मझली के भीतर पैदा हुई विरक्ति भी सामाजिक जीवन से निष्क्रियता की तरफ ले जाने का संकेत देती है। आखिर उसकी सोच का सिर्फ यही केन्द्र रह जाता है कि संतानहीनता के कारण परिवार और समाज में उसने अपना स्थान खो दिया है। यह सोच उसे पल भर में ही अपने संसार से बेगाना बना सकती है और उसमें विरक्ति भर सकती है। हालाँकि आज शिक्षा और विज्ञान की अनेक जानकारियाँ स्त्री को तमाम पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की तरफ ले गई हैं। तथापि आज भी समाज के भीतर ‘पुत्रवती’ वाली मानसिकता गहरे जड़ जमाए दिखती रहती है। अनेक स्त्रियों का कटुतापूर्ण वैवाहिक जीवन इन्हीं पूर्वाग्रहों की देन है। पुत्रवती वाला पूर्वाग्रह एक कंटीले तार की तरह समाज को जकड़े हुए है जो न तो स्त्री को सहज रूप से जीवन के उल्लास में शरीक होने देता है, न ही पुरूष को सामान्य रह जाने देता है। स्त्री की इसी मातृ शक्ति का उपयोग पूरे समाज के कल्याण में हो सकता था अथवा उसकी अन्य प्रतिभा का उपयोग समाज की उन्नति में किया जा सकता था, किंतु इस एक शर्त से स्त्री की बुद्धि और अन्य क्षमताएं समाज से बाहर धकेल दी जाती हैं, इससे निश्चित तौर पर समाज का नुकसान होता है। किंतु हम किस नुकसान की बात सोच रहे हैं? एक संतुलित और मानवीय समाज के बारे में! क्या यह संरचनागत कमी के रूप में नहीं दिखाई पड़ेगा कि एक खास प्रजाति के मनुष्य की बुद्धि को सीधे तौर पर खारिज कर दिया जाए! क्या यह समाज व्यवस्था के जनकों के असुरक्षा बोध और मानसिक कमजोरी को नहीं दर्शाता! क्या सत्ता का मोह और उसे बनाये रखने के सारे निर्मम औज़ारों के बरक्स भावी पीढ़ी का मनुष्यता के पक्ष में विकास कोई अहमियत नहीं रखता! निश्चित ही ये प्रश्न हर उस, प्रगतिशील मानस में उपजते होंगे जो मानव मूल्यों के पक्षधर विवेक की तरफ खड़ा होगा, जिसकी चिंता में भावी पीढ़ी की विकास यात्रा में अकेलापन और निराशा के पड़ाव भी शामिल होंगे।लेखिका एक कदम और आगे बढ़ते हुए समाज की उस हस्तांतरण प्रक्रिया की पहचान भी कराती हैं, जो कब चुपचाप इस द्वंद्व फंद को अपनी आगामी पीढ़ी की तरफ सरका देता है। कब सत्ता अपने पुराने प्रतिनिधि से अधिकार उठा कर नए प्रशिक्षित प्रतिनिधि के सुपुर्द करने लगती है! सामान्यतः इसका पता तब चलता है जब कुछ बहुत खुल कर सामने आ जाता है या कोई घटना घटित होते हुए इसकी तरफ ध्यान दिला जाती है। लेकिन इस कहानी में मामला इतना खुला हुआ नहीं है, इसलिए पहचान भी उस बारीक तंतु की तरह  है जो स्वभाव की सूक्ष्मताओं के भीतर से आ रहा है और वाक्यों की परतों के पीछे छिपा हुआ है। इसलिए आते ही बहनों को बड़ी बहन में आया परिवर्तन दिख जाता है। हालाँकि यह इतने मुलायम ढंग से कहा जाता है कि अपनी सारी आक्रामकता को छिपा ले जाता है, तब भी, मन्तव्य छिपा नहीं रह पाता है, झलक उठता है -‘‘ छोटी ने देखा, आज नाते रिश्तों से भरे ब्याह वाले घर में बहन सचमुच ही मालकिन सी लगती है।सगुणों की लाल ओढ़नी में उसका साफ रंग और भी निखर उठा है। चाल में अधिकार है और हृदय में दूल्हे की माँ होने कीउमंग।’’8 यह सचमुच की मालकिन सी लगना और चाल में अधिकार भाव का आ जाना अचानक घटित हुई घटना नहीं है, वरन धीरे धीरे सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया से गुजर कर आज यह प्रत्यक्ष हो सका है। यह प्रक्रिया धीमी किंतु गहन है। बड़ी बहन को बोध तक नहीं है कि कब वह अपनी सास के अधिकार पद की स्वामिनी बनने की तरफ चलती चली गई है और आज इसे ऐलानिया तौर पर उसकी सत्ता का प्रदर्शन तय करता है। सास का चौंकना और स्वीकार करना भी आज अपनी सारी कटुता के साथ प्रत्यक्ष हो पाया है  कि वह भी कटु से कटु होने की तरफ बढ़ती चली जाएगी क्योंकि सत्ता के हस्तांतरित हो जाने पर, उसकेपास ठगे जाने की पीड़ा और अस्थायित्व कीकुंठा के अलावा क्या बचता है!

एक तरफ बड़ी बहन की बचपन में अपनी बहनों के साथ बनी‘बांडिंग’ है, जो वक्त मिलते ही उभर आती है तो दूसरी तरफ उसका अधिकार बोध है, दोनों भाव मिल कर बड़ी की वह छवि रचते हैं जिसे हमारी समाज व्यवस्था ने स्त्री के उपर रीति, रिवाजों, मर्यादाओं, नीति, नियमों, आदर्शों, नैतिकता जैसे तमाम बंधनों और काल्पनिक महानताओं की ओवर लोडिंग से रचा है। इसलिए एक तरफ तो बड़ी बहन क्षण भर को ही सही, अपनी बहनों को अपने स्नेह और देख भाल की इच्छा का अहसास करा देना चाहती है और दूसरी तरफ अपनी सास को बिना खास शब्दों के भी यह जता देना चाहती है कि अब उनके दिन लद गए और अब अधिकार स्थानान्तरित हो कर उसमें प्रतिष्ठित होने का वक्त आ गया है। लेखिका इसे अपने खास चुटीले अंदाज में कह जाती हैं- ‘‘ सास को लगा, जैसे बहू आज्ञा दे रही हो। …. जैसे बहू उसे सुना सुना कर कह रही है। उसका जी जल उठा। कभी था, जब उसकी आज्ञा के बिना बहू किसी को पानी तक न पूछ सकती थी और आज हाथ में हुक्म हासिल आते ही अपने सगों के चोंचले मानने लगी।’’9 यह हुक्म हासिल आखिर इस तरह बहू के भीतर कब दाखिल हो गया? और अचानक ही सास को यह कैसा बोध सालने लगा! क्या देख लिया इस बुझी अनुभव पकी स्त्री ने? क्या अपना अधिकारहीन लाचारी की तरफ बढ़ता समय या अपने ही हाथों जिसका शोषण करने में रत्ती भर न सोचना पड़ा था, उसी के हाथों में हुक्म हासिल आ जाना! क्या सत्ता च्युत होना और अधिकार भाव खो देना बुढ़िया को किसी उदारता से भर सकेगा? या कि अपने आस पास की दुनिया के लिए उसे और निर्मम ही बना पायेगा, जैसा कि बड़ी बहन की छोटी बहनोंके दुख को कुरेदने के उसके कौशलमें पाठक देख ही लेता है। एक क्षण को यह उम्मीद जगती है कि बड़ी बहन इस व्यवस्था को कुछ तोड़ फोड़ कर अपने मनोनुकूल कर ले जाने की कोशिश की तरफ बढ़ने वाली है। पर ऐसा नहीं हो पाता। इसका कारण बड़ी की कोशिश का नाकाफी होना नहीं है, बल्कि बहनों का अपने अपने परिवार की जद में इस तरह घिरा होना है और स्वयं बड़ी बहन के सिर भी अपने परिवार की सार संभाल का ऐसा गहरा जिम्मा है कि इनमें से कोई भी इन दीवारों को तोड़ कर अपना मनचाहा कर ले जाने की तरफ नहीं जा सकता। वे स्पष्ट रूप से एक दूसरे का सुख दुख बाँट सकने से बहुत दूर पहुँचाई जा चुकी हैं।ध्यान देने की बात है कि वे दुख भी नहीं बाँट सकतीं और सुख भी बाँट पाने की काबिलियत खो देती हैं। वे केवल दुखी हो सकती हैं और वह भी क्षण भर के लिए।

दूसरी तरफ बड़ी के हिस्से यह अधिकार भाव इतनी देर में आया है कि उसके हाथ से तमाम चीजें जा चुकी हैं। यह अधिकार इसलिए दिया भी नहीं गया है कि वह इसमें अपनी विवेक बुद्धि का बेजा इस्तेमाल करने लगे। ऐसी स्थिति में यह अधिकार वापस भी लिया जा सकता है। यह तो सास की जगह लेना, उनका स्थानापन्न बन जाना और आने वाले भविष्य के साथ लगभग वैसा ही सलूक बनाए रखने की तरफ ले जाने के लिए है। यह चली आ रही व्यवस्था को मेंटेन करने का मजबूत तरीका है। स्त्री के मन में इस अधिकार भाव को पा लेने की ख्वाहिश तभी से जगा दी जाती है जब वह बहू बन कर आती है, क्योंकि यही एक जगह है जहाँ से उसकी कोई बात सुनी जा सकती है। इसी के साथ यह भय भी नत्थी है कि यदि वह सास वाले अधिकार भाव अपने में न भर पाई तो उसकी बहू, उसकी क्या खाक सुनेगी!

जब एक स्त्री को बूढ़ी होने के कारण अथवा उसकी बहू के सास के पद पर आ जाने के कारण, उसके एक व्यक्ति पर निरंकुश शासन के अधिकार से हटा कर विकल्पहीनता की तरफ धकेल दिया जाता है और उसकी आँखों के सामने ही उसी के गुलाम को यह पद थमा दिया जाता है तब यह प्रक्रिया बूढ़ी सास को किसी गौरवमय बुढ़ापे की तरफ न ले जाकर प्रायः ही निरीहताओं और उनके भीतर से उपजी कठोरताओं और कभी कभी क्रूरताओं की तरफ भी लेता जाता है जबकि बहू को सास बनते ही निरंकुश शासन के उन्हीं पैंतरों की तरफ। इसमें अपनी चेतना कोथोड़ा सा पा जाने वाली स्त्रियाँ स्थिति को बदतर होने से बचा ले जाने की बेहतर कोशिशों की तरफ जाती भी दिखती हैं। कहानी में सास की निरीहता खुलती है तो खुलती ही चली जाती है, उनमें चिड़चिड़ाहट और कड़ुआहट भरती हुई  ‘‘बुढ़िया ने तेवर चढ़ा कर बहू की ओर देखा। कभी जमाना था, सास की इन आखों के सामने बड़ी का सिर न उठता था। पर आज…. आज बुढ़िया की आखों में नहीं, बड़ी के चेहरे पर उस अधिकार का बोध है। …… क्रोध और दुख से सास का मन भर आया। जिन बेटों और पोतों के पीछे वह मनौतियाँ मना मना कर बूढ़ी हो गई, उसी बहू के ये लच्छन!’’10

यहाँ मन में यह ख्याल आए बिना नहीं रहता कि यदि बूढ़ी सास ने एक स्त्री के तौर पर इन स्थितियों को समझने की कोशिश पहले की होती और समय रहते परिवार में आई दूसरी स्त्री को दमन के अनेक रूपों से नियन्त्रित करने के बजाय कुछ दोस्ताना विकसित करने की तरफ गई होती तो शायद स्थिति थोड़ीबेहतर बन पाई होती। पर पितृसत्ता इन्हीं पैंतरों से स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ी किए रहती है। अन्यथा प्रायःपरिवारों में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या अधिक या बराबर होती है।किंतु संगठित होने और एक दूसरे का विश्वास अर्जित करने की तरफ जाना उनके लिए इस संरचना के भीतर प्रायः मुश्किल ही बना रहता है। दूसरे पितृसत्ता की विश्वसनीयता अर्जित करने के लिए किए गए कार्य व्यवहार भी प्रायः स्त्री को स्त्री के खिलाफ अधिक निर्दय और निरंकुश बना डालते हैं, जबकि इसका कुल हासिल क्या मिलता है? क्या सास का यह निरीहता की तरफ लुढ़कता हुआ चित्र इस हासिल की स्पष्ट पहचान नहीं कराता? और इस सबको ओझल करता बड़ी का ठसकदार व्यवहार कुछ नहीं कहता? और इन सबके बीच रोशनी, जगमगाहट और खुशबुओं से सराबोर जीवन का उत्सव चलता नहीं रहता?

 

संदर्भ –

1. बहनें, कृष्णा सोबती, सहोदर, कहानियाँ रिश्तों की,

संपादक-अल्पना मिश्र, प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,

दिल्ली. पृ. 72

2. स्त्रियों की पराधीनता, जॉन स्टुअर्ट मिल, राजकमल प्रकाशन

प्रा. लि., दिल्ली. पृ.46-47

3. बहनें, कृष्णा सोबती, सहोदर, कहानियाँ रिश्तों की,

संपादक- अल्पना मिश्र, प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,

दिल्ली. पृ. 73

4. वही

5. वही, पृ. 74

6. मनुस्मृति, नवम्, 48- 51

7. वही, 80-81

8. बहनें, कृष्णा सोबती, सहोदर, कहानियाॅ रिश्तों की,

संपादक- अल्पना मिश्र, प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,

दिल्ली. पृ. 73

9. वही, पृ. 75

10. वही, पृ. 74

 

प्रो. अल्पना मिश्र
प्रोफेसर,
हिंदी विभाग,
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली -7