तटस्थता और सूक्ष्मता से भारत का अवलोकन करनेवाले किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति को दो परस्पर विरोधी विशेषताएँ अवश्य दिखाई देंगी :अनेकरूपता के साथ-साथ एकता ।

यहाँ की अंतहीन विविधता आश्चर्यजनक, प्रायः बेमेल जान पड़ती है। वेश-भूषा, भाषा, लोगों का शारीरिक रंग-रूप, रीति-रिवाज, जीवन स्तर, भोजन, जलवायु, भौगोलिक विशेषताएँ- सभी में अधिक से अधिक भिन्नताएँ दिखाई देती हैं। धनी भारतीय लोग या तो यूरोपीय पोशाक में दिखाई देंगे, या मुस्लिम प्रभाववाली पोशाक में, अथवा भारतीय ढंग के रंग-बिरंगे और ढीले ढाले कीमती परिधान में सामाजिक अवस्था के निम्न छोर पर ऐसे भी भारतीय हैं जो  चिथड़े पहनते हैं और कमर से घुटनों तक की धोती के अलावा प्रायः नंगे बदन ही रहते हैं। सारे देश की कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं, राष्ट्रलिपि नहीं। दस रुपए के नोट पर दर्जन भर भाषाएँ और लिपियाँ दिखाई देती हैं। भारतीय जाति-जैसी भी कोई चीज नहीं है। भारत में गौर वर्ण और नीली आँखोंवाले लोग हैं, तो श्याम वर्ण और काली आँखोंवाले भी हैं। इन दोनों के बीच हर संभव मध्यवर्ती प्रकार के लोग भी हमें देखने को मिलते हैं, यद्यपि आमतौर पर बाल सभी के काले होते हैं। विशिष्ट प्रकार का कोई भारतीय भोजन भी नहीं है, यद्यपि यूरोप की अपेक्षा यहाँ भात, मसाले तथा साग-सब्जियाँ अधिक खाई जाती हैं। उत्तर भारत के निवासी को दक्षिण भारत का भोजन अस्वादिष्ट लगता है, तो दक्षिण भारतीय को उत्तर भारत का भोजन। कुछ लोग मांस, मछली और अंडों को छूते तक नहीं। बहुत से लोग मर जाएँगे, लेकिन गोमांस खाना पसंद नहीं करेंगे। पर ऐसे भी लोग हैं जो इन पाबंदियों को नहीं मानते। भोजन-संबंधी ये रिवाज रुचि पर नहीं, बल्कि धार्मिक भावना पर आधारित हैं। देश की जलवायु भी सतरंगी है: हिमालय में सदा बर्फ जमी रहती है, कश्मीर में उत्तरी यूरोप-जैसा मौसम रहता है, राजस्थान में तप्त रेगिस्तान हैं, दक्षिणी प्रायद्वीप में बैसाल्ट की पर्वत श्रेणियाँ और ग्रेनाइट के पहाड़ हैं, दक्षिणी छोर पर उष्णकटिबंधीय गरमी और पश्चिमी घाट की कंकरीली मिट्टी में घने जंगल हैं। दो हजार मील लंबा समुद्रतट, जलोढ मिट्टी की चौड़ी और
उपजाऊ घाटी में महान गंगा और उसकी सहायक नदियों का समूह, छोटे
समूहवाली अन्य बड़ी नदियाँ, कुछ प्रमुख झीले, कच्छ और उड़ीसा के
दलदल- इन सबसे इस उपमहाद्वीप का मानचित्र पूरा हो जाता है।
एक ही प्रांत के, यहाँ तक कि एक ही जिले अथवा नगर के भारतीय निवासियों में उतनी ही अधिक सांस्कृतिक असमानता है जितनी कि भारत के विभिन्न भागों में प्राकृतिक असमानता है। विश्व साहित्य में गौरव का स्थान पाने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म आधुनिक भारत में हुआ; परंतु ठाकुर के अंतिम निवास (शांतिनिकेतन) से थोड़ी ही दूर पर रहनेवाले ऐसे भी संथाल और अन्य अनपढ़ आदिवासी लोग मिलेंगे जो रवींद्र के बारे में आज भी कुछ नहीं जानते ? इनमें से कुछ आदिवासी आज भी अन्न संग्रह की अवस्था से विशेष आगे नहीं बढ़े हैं। किसी भव्य आधुनिक शहरी इमारत का-जैसे बैंक, सरकारी कार्यालय, कारखाने अथवा वैज्ञानिक संस्थान का डिज़ाइन किसी यूरोपीय वास्तुविद अथवा उसके भारतीय शिष्य ने भले ही तैयार किया हो, परंतु इमारत खड़ी करनेवाले दरिद्र मजदूर अनपढ़ हैं और आमतौर पर पुराने किस्म के औजारों का ही इस्तेमाल करते हैं। उनकी मजदूरी का एकमुश्त भुगतान उस फोरमैन अथवा चौधरी को भी किया जा सकता है जो उनकी छोटी सी श्रेणी का प्रधान होने के साथ-साथ उनकी जमात का मुखिया भी होता है। निश्चय ही ये मजदूर उन लोगों की गतिविधियों के बारे में कुछ भी नहीं जानते जिनके लिए ये इमारतें खड़ी की गई हैं। वित्त व्यवस्था, नौकरशाही, कारखानों में पेचीदा मशीनों से होनेवाला उत्पादन और विज्ञान की मूलभूत मान्यताएँ उन इंसानों की समझ से परे की चीजें हैं जो सीमांत तक अतिकर्षित भूमि अथवा जंगलों में बसकर तगहाली का जीवन व्यतीत करते रहे। जंगल में भुखमरी की हालत पैदा होने से इनमें से अधिकांश लोग विवश होकर शहरों में चले आए हैं और कोल्हू के बैल की तरह कड़ी मेहनत करनेवाले सबसे सस्ते मजदूर बन गए हैं।
परंतु इस प्रत्यक्ष अनेकरूपता के बावजूद यहाँ दोहरी एकता भी मौजूद है। शासक वर्ग के कारण ऊपरी स्तर में कुछ समान विशेषताएँ हैं। भारतीय पूँजीपतियों का यह वर्ग भाषा, प्रादेशिक इतिहास आदि के मामले में विभक्त होने पर भी समान स्वार्थों के कारण दो समूहों में एकत्र है। पूँजी और कारखानों का यांत्रिक उत्पादन असली उद्योगपतियों-पूँजीपतियों के हाथों में है, और उत्पादन के वितरण पर मुख्यतः उन दूकानदार निम्न पूँजीपतियों का प्रभुत्व है जो अपनी बड़ी संख्या के कारण बड़े शक्तिशाली बन गए हैं। अनाज का उत्पादन अधिकतर छोटे-छोटे खेतों में होता है। करों और कारखानों में उत्पादित वस्तुओं की कीमत का भुगतान नकद पैसों में करना जरूरी है, इसलिए किसान को निम्न पूँजीपतियों के एक अनिच्छुक और पिछड़े हुए पक्ष की शरण में जाने के लिए विवश होना पड़ता है। खेती की सामान्य अतिरिक्त उपज पर भी उन आढ़तियों और महाजनों का कब्जा रहता है जो आमतौर पर बड़े पूंजीपति नहीं बन पाते। सबसे धनी किसानों में और महाजनों में कोई खास अंतर नहीं है। चाय, कॉफी, कपास, तंबाकू, पटसन, काजू, मूंगफली, गन्ना, नारियल आदि की नकदी पैदावार अंतर्राष्ट्रीय बाजार अथवा कारखानों में होनेवाले उत्पादन से जुड़ी हुई है। कभी-कभी आधुनिक पूंजीपति भी बड़े-बड़े भूखंडों में मशीनों की सहायता से इन चीजों का उत्पादन करते हैं। इनमें लगाई जानेवाली पूँजी से, जो अक्सर विदेशी होती है, इन वस्तुओं का मूल्य निर्धारित होता है और मुख्य लाभांश भी वही पूँजीपति हथिया लेते हैं। दूसरी ओर, दैनिक आवश्यकता की बहुत सी चीजें, मुख्यतः भाँड़े-बर्तन और वस्त्र, आज भी दस्तकारी के तरीकों से तैयार होती हैं और कारखानों में होनेवाले उत्पादन के साथ प्रतिस्पर्धा होने पर भी ये उद्योग जीवित हैं। देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर पूँजीपति वर्ग के इन दो समुदायों का पूर्ण प्रभुत्व है, और पेशेवर (वकील आदि) तथा बाबू लोगों का वर्ग इन्हें विधान-मंडलों और शासन तंत्र के साथ जोड़ने का काम करता है।
यह ध्यान देने की बात है कि भारत में, ऐतिहासिक कारणों से, सरकार ही एकमात्र सबसे बड़ी व्यवसायी ठेकेदार भी है। एक बड़े पूंजीपति-जैसी इसकी संपत्ति भारत के सारे स्वतंत्र पूँजीपतियों की संपत्ति के बराबर है, यद्यपि यह खास प्रकार के विनियोगों में लगी हुई है। रेलें, हवाई सेवाएँ, डाक-तार, रेडियो और टेलीफोन, कुछ बैंकें, जीवन बीमा और सुरक्षा उद्योग तो पूरी तरह राज्य के हाथ में हैं ही, कुछ हद तक बिजली और कोयले का उत्पादन भी राज्य द्वारा ही होता है। तेल के कुओं पर राज्य का अधिकार है। बड़े-बड़े तेल शोधक कारखाने आज भी विदेशी कंपनियों के हाथों में हैं, परंतु सरकारी तेल शोधक कारखाने जल्दी ही अपना पूरी क्षमता से उत्पादन करने लग जाएँगे। इस्पात का उत्पादन अधिकतर निजी अधिकार क्षेत्र में होता था, परंतु अब सरकार ने भी बड़े पैमाने पर लोहे और इस्पात का उत्पादन शुरू कर दिया है। इसके विपरीत, सरकार अनाज का उत्पादन नहीं करती। जब अनाज की दुर्लभता (प्रायः दुकानदारों और दलालों द्वारा पैदा किए गए नकली अभाव) के कारण सस्ते मजदूरों के शहर छोड़कर चले जाने की स्थिति पैदा होती है, तो सरकार विदेश से मंगाए गए अनाज का प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में राशन-व्यवस्था द्वारा वितरण करती है। इस व्यवस्था से बड़े और छोटे दोनों वर्गों के पूँजीपति खुश रहते हैं, क्योंकि इससे दोनों में से किसी के भी मुनाफे पर कोई आंच नहीं आती। अनाज की इस अस्थिर स्थिति को सुस्थिर बनाने का स्पष्ट उपाय यही है कि कृषि कर जिसों में लिए जाएँ और अनाज भंडार तथा वितरण की कारगर व्यवस्था सरकार अपने हाथ में ले ले। यह सुझाव कई बार दिया गया है और प्राचीन भारत में भी यही प्रथा थी-परंतु इस दिशा में कुछ भी नहीं हुआ है। आयात किए हुए अनाज को न ही कारगर चूषण-पंपों द्वारा जहाजों से उतारा जाता है, न ही आधुनिक ढंग के उत्थापित भंडारों में जमा रखा जाता है,
और न ही इसे यात्रिक तरीकों से साफ किया जाता है। उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन निजी क्षेत्र में होता है। इस क्षेत्र में भी दो कारणों से सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है। एक, इसके बिना अर्थ व्यवस्था, असंयत लोभ और अनियंत्रित उत्पादन के कारण, छिन्न-भिन्न हो जाएगी, विशेषतः इसलिए भी कि बहुत सा कच्चा माल और प्रायः सारी मशीनें विदेशों से मँगानी पड़ती है, जिसके लिए विदेशी मुद्रा की बड़ी कमी है। दूसरे, पूँजीपति वर्ग ने दोनों महायुद्धों से जनित अभावों के दिनों में वस्तुओं की दुर्लभता नियंत्रित उत्पादन और काले बाजार के अर्थशास्त्र का पूर्ण ज्ञान हासिल किया और इसी के बल पर सत्ता हथिया ली। दरअसल, इन्हीं महायुद्धों और अभावों के कारण पूँजी का संचय हुआ, और अंततः अंग्रेजों के हाथों से सत्ता भारतीयों के हाथों में आ गई। सरकार को, उदाहरण के तौर पर, प्रतिजैविक पदार्थों (एंटीबायोटिक्स) और औषधियों का एकाधिकारी उत्पादक बनने के लिए विवश होना पड़ा है; क्योंकि इस क्षेत्र में भी निजी उद्योग ने अपने लोभ और मानव कल्याण के प्रति अतिघातक अवहेलना का परिचय दिया है। नियंत्रण का काम सँभालनेवाली और भविष्य के विकास की योजनाएँ बनानेवाली सरकार सभी वर्गों से परे जान पड़ती है। अंग्रेज़ों से उत्तराधिकार में मिले हुए प्रशासन तथा उच्च अधिकारी तंत्र की यह खूबी है कि वह सदा से ही अपने को भारतीय स्तर से ऊपर समझता रहा है, और वैसा आचरण करता रहा है। निस्संदेह, अंतिम विश्लेषण में, सरकार का संचालन पूर्णतः एक ही वर्ग के हाथ में है। अतः सरकार किसको और कैसे नियंत्रित करती है, यह इस बात पर भी निर्भर है कि सरकार पर किसका नियंत्रण है। हाल में चीन के साथ हुई सीमा-संबंधी झड़पों के कारण केंद्रीय राजसत्ता को विशेष तानाशाही अधिकार ग्रहण करने का मौका मिला है, जिसके फलस्वरूप समाजवाद अथवा अन्य किसी लक्ष्य तक जल्दी से पहुँचा जा सकता है। यदि तब भी देश पहले की तरह ही समाजवाद से कोसों दूर रहता है, तो फिर इस व्यंग्योक्ति में कुछ सचाई अवश्य होगी कि हमने सही दिशावाला मार्ग नहीं पकड़ा है। इसके बावजूद, कट्टर-से-कट्टर आलोचक को भी यह स्वीकार करना होगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रगति हुई है, फिर वह जितनी अधिक होनी चाहिए थी या हो सकती थी उतनी भले ही न हुई हो। ब्रिटिश शासन के अंतिम दिनों में जिन अनावश्यक मानव-निर्मित अकालों के कारण बंगाल और उड़ीसा में लाखों लोगों की जानें गई, वे आज उतने ही अयथार्थ लगते हैं जितने कि औपनिवेशिक कुशासन के जमाने के अन्य भयावह दुःस्वप्न।

आधुनिक शासकवर्ग

शहरों में बाबाद भारतीय पूँजीपति वर्ग की सबसे स्पष्ट विशेषता है-विदेशी प्रभाव। आजादी के बाद चौदह साल गुजर गए, फिर भी भारत में प्रशासन, बड़े व्यवसाय और उच्च शिक्षा की भाषा आज भी अंग्रेजी ही है। इस स्थिति को बदलने के ठोस प्रयास नहीं हुए, यद्यपि असमर्थ समितियों ने नेक इरादे के प्रस्ताव पास किए हैं। बुद्धिजीवी, न केवल अपने वस्त्रों में, बल्कि उससे भी बढ़कर साहित्य और कला में नवीनतम ब्रिटिश फैशन की नकल करता है।आधुनिक उपन्यासों और कथाओं की रचना, देशी भाषाओं में भी विदेशी नमूनों अथवा विदेशी प्रेरणा पर आधारित है। भारतीय नाटक दो हजार साल से भी अधिक पुराना है, किंतु आज के भारत का शिक्षित रंगमंच, और उससे भी बढ़कर भारतीय सिनेमा, दूसरे देशों के रंगमंच और सिनेमा की नकल करता है। भारतीय काव्य में यह विदेशीपन कुछ कम है, यद्यपि विषयवस्तु और मुक्तछंदों के चुनाव में यह विदेशी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
इस बुद्धिजीवी वर्ग ने यूरोपीय महाखंड की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा के रत्नकोष की प्रायः उपेक्षा ही की है। इस निधि से इनका संपर्क अंग्रेजी माध्यम की घटिया पुस्तकों तक ही सीमित रहा है। दरअसल, भारत में पूँजीपति वर्ग के संपूर्ण ढाँचे का विकास बाह्य शक्तियों से प्रभावित हुआ है। देश में सामंती और सामंती-पूर्व काल की संपत्ति का अपार संचय था, जो सीधा आधुनिक पूँजी में नहीं बदला। इसके काफ़ी बड़े अंश को अंग्रेज अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में लूट ले गए। यह धन जब इंग्लैंड पहुँचा तभी उस देश में महान औद्योगिक क्रांति हुई और तभी यह धन यांत्रिक उत्पादन से जुड़कर सही अर्थ में आधुनिक पूंजी में रूपांतरित हुआ। इस परिवर्तन के कारण भारत का अधिक शोषण होने लगा; क्योंकि प्रशासन और सैनिक प्रबंध का बोझ लगातार बढ़ता ही गया। पेंशन, लाभांश तथा ब्याज का पैसा अधिकतर इंग्लैंड को ही जाता था। विजेता ही भारत के कच्चे माल की कीमत निधारित करते थे। नील पटसन, चाय, तंबाकू तथा कपास की खेती इतने बड़े पैमाने पर की गई कि पूरे जिलों की अर्थव्यवस्था ही बदल गई। नियंत्रण विदेशियों के हाथों में रहा, विशेषतः इसलिए कि पक्का माल इंग्लैंड में तैयार होता था। इस तैयार माल का एक अंश काफ़ी अनुकूल कीमत में भारत के बहुत बड़े बाजार में बेचा जाता था। मुनाफा लंदन के पूँजीपतियों और बरमिघम तथा मैन्चेस्टर के कारखानेदारों की जेबों में पहुँचता था। साथ ही बंबई, मद्रास और कलकत्ता के नए शहरों में भी पूँजी की आनुषंगिक वृद्धि हुई। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यह आविष्कार किया गया कि भारतीय श्रमिकों से सस्ती मजदूरी पर मशीनों का काम कराया जा सकता है। इस आविष्कार के फलस्वरूप और 1857 के विद्रोह के दमन का खर्च निकालने के लिए ब्रिटिश कपड़ों पर लगाए गए करों के कारण ही बंबई में सूती वस्त्रों के कारखाने और कलकत्ता में पटसन के कारखाने अस्तित्व में आए। रेलों के लिए भी मशीनी जानकारी वाले कर्मियों की जरूरत थी। और पहले ही किए गए जिस आविष्कार के कारण भारत में पहले-पहल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई, वह यह था कि प्रशासन तथा हिसाब-किताब के लिए विदेश से कलकों का आयात करने की बजाय भारतीय क्लर्क को प्रशिक्षित करने में निश्चय ही कम खर्च पड़ता है। भारतीयों ने काम को न केवल जल्दी सीख लिया, बल्कि एक विदेशी को दिए जानेवाले वेतन के तीसरे में दसवें हिस्से तक का वेतन पाकर भी वे कुशलता और ईमानदारी से काम करते थे। निस्संदेह, सभी ऊँचे पद विजेता शासक वर्ग के लिए सुरक्षित थे। अंततः भारतीय बिचौलियों ने देखा कि वे अपने स्वतंत्र कारखाने स्थापित कर सकते हैं। इस क्षेत्र में पहल बबई के पारसियों ने की। इनमें से अनेक पारसियों ने इंस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारी सहयोगी बनकर, विशेषतः चीन पर थोपे गए अफीम के व्यापार में महयोग देकर काफी धन जमा कर लिया था। भारत के इन बड़े पूंजीपतियों और कारखानेदारों के साथ-साथ ही सन् 1880 से एक नए प्रकार के भारतीय राष्ट्रवाद का और एडमंड बर्क और स्टुअर्ट मिल से बाह्यतः उत्प्रेरित भारतीय राजनेताओं का अधिकाधिक उत्थान हुआ।
यद्यपि इस पुँजीपति वर्ग का उदय विदेशी व्यापारियों के सहयोगियों के रूप में हुआ था, परंतु इसमें वर्ण-विभाजन पर आधारित प्राचीन भारतीय समाज के कई वर्ग सम्मिलित थे। दरअसल, आधुनिक भारतीय पूँजी का एक बड़ा हिस्सा पुराने सामतों और महाजनों की जमा संपत्ति के रूपांतरण से ही बना है। आधुनिक काल में भारत के सामंती राजाओं को भी अपनी कलंकित संचित संपत्ति शेयरों और ऋणों में लगानी पड़ी, अन्यथा उनका दिवाला निकल जाता। सामंतों और सेठ-साहूकारों के परिवार, विशेषतः इनका स्त्री समाज, धार्मिक अंधविश्वासों के बाहयाडबर से कभी भी मुक्त नहीं हुए। बुद्धिजीवी और पेशेवर लोग इन दोनों से भिन्न वर्गों से आए इन्होंने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन को हिलाने के लिए छेड़े गए संघर्ष के दौरान देशभक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान को जगाने की तीव्र आवश्यकता महसूस की। फलस्वरूप यह बुद्धिजीवी वर्ग अपने देश के अतीत की खोज करने में जुट गया, और कभी-कभी ऐसा भी गौरवमय अतीत खोज निकाला कि जिसका कहीं कोई अता-पता ही नहीं था। (एशियाई देश जापान ने भी हाल ही में आधुनिक युग में कदम रखे हैं, परंतु वहाँ यह समस्या कभी पैदा नहीं हुई। जापान की राष्ट्रीय परंपरा सदैव सशक्त और सुलिखित रही। जापान का औद्योगीकरण राष्ट्रीय और स्वदेशी पुँजीपति वर्ग द्वारा विदेशी आधिपत्य के बिना ही हुआ। फिर भी, जापानी बुद्धिजीवी वर्ग ने अपने मेइजी युग में पाश्चात्य संस्कृति के अध्ययन और अनुकरण का काम बड़ी कर्मठता से किया। इससे स्पष्ट होता है कि ऐसे सांस्कृतिय परिवर्तनों के गहरे और बुनियादी कारण होते हैं। सैनिक आधिपत्य अथवा नए लोकाचार के अनुकरण के आकर्षण से इस प्रवृत्ति की व्याख्या संभव नहीं है।) परंतु भारत के इसी पूंजीपति वर्ग ने एक लंबे और कटु संघर्ष के बाद शक्तिशाली ब्रिटिश शासकों को देश से बाहर निकाल दिया। यदि भारतीय जनता का एक बड़ा भाग इस पूँजीपति वर्ग के एक समुन्नत पक्ष का
नेतृत्व स्वीकार न करता तो अंग्रेजों को देश से निकालना संभव न होता। इस संघर्ष में भारतीय पक्ष शस्त्रसज्जित नहीं था। महात्मा गाँधी के, जिन्होंने मुक्ति आंदोलन का संचालन किया, और तिलक-जैसे अनेक पूर्ववर्ती नेताओं के भी, तरीके और सिद्धांत भारतीय विशेषता के जान पड़ते हैं, यद्यपि गाँधी स्पष्ट रूप से तॉलस्ताय, और इस प्रकार सिल्वियो पैलिकों से जुड़े हुए हैं। वर्तमान सदी के आरंभ में जैसी विशिष्ट परिस्थितियाँ थीं, उनमें इन तरीकों को अपनाए बिना कोई नेतृत्व कारगर सिद्ध होता, इसमें संदेह है। इसलिए यह तथ्य कि, इस संघर्ष के दौरान और इसके बाद भी मध्यवर्ग का पाश्चात्य संस्कृति के प्रति लगाव बढ़ता ही गया, तो इसके कुछ विशिष्ट और बुनियादी कारण हैं। सांस्कृतिक परिवर्तन के मूलाधार की खोज हमें उन बाह्य अभिव्यक्तियों के परे करनी होगी, जिन्हें अक्सर हम संस्कृति का सारतत्त्व समझ बैठते हैं।
तकनीकी योग्यता के मामले में भारत का नया पूंजीपति वर्ग, जर्मनी और इंग्लैंड की बात तो दूर रही, जापान की तुलना में भी पिछड़ा हुआ था। इस वर्ग को किसी नए यांत्रिक साधन अथवा महत्त्व के आविष्कारों का श्रेय प्राप्त नहीं है। औद्योगिक उत्पादन की आधुनिक मशीनों का वित्त प्रणाली का, यहाँ तक की राजनीतिक सिद्धांतों का भी, ज्यों-का-त्यों इंग्लैंड से आयात किया गया। चूँकि देश में भूमिहीन गरीब मजदूरों का एक बड़ा वर्ग पहले से मौजूद था, इसलिए भारत के यंत्रकुशल सर्वहारा वर्ग की अपेक्षा यहाँ के नए पूंजीपति वर्ग का अधिक तेजी से विकास हुआ। औद्योगीकरण की वास्तविक समस्याएँ स्वाधीनता के बाद ही सामने आई। इस दिशा में भारत ने अंग्रेजों के संपूर्ण शासन काल में जितनी प्रगति की थी. उससे कहीं अधिक प्रगति पिछले पंद्रह सालों में की है। शेष कहानी भविष्य का हिस्सा है। आइए, अब हम सुदूर अतीत की ओर मुड़ें। इस अतीत से भारतीय पूँजीपति वर्ग का कोई संबंध नहीं है, यद्यपि कभी-कभी इस अतीत का उसकी मनःसृष्टि पर गहरा प्रभाव पड़ता है; परंतु इससे कठोर परिश्रम या तकनीकी निपुणता के बिना ही शीघ्र लाभ कमाने की उसकी लालसा में कोई रुकावट पैदा नहीं होती।

इतिहासकार की कठिनाइयाँ

अब तक जो कुछ कहा गया है, उससे यदा-कदा व्यक्त की जानेवाली इस धारणा को बल मिल सकता है कि भारत कभी भी एक राष्ट्र न था. कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति विदेशी- चाहे मुस्लिम, चाहे ब्रिटिश-विजय की ही उपज है। यदि ऐसा होता तो लिखने योग्य भारतीय इतिहास केवल विजेताओं का ही इतिहास होता।

डॉ0 नीलम सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर

5 thoughts on “भारत की झाँकी – डॉ0 नीलम सिंह”

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