शोधसार: हिंदी साहित्य में भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण तत्व सामासिकता हमेशा से लक्षित होता रहा है। इसी के साथ विभाजन के पहले और बाद में इस सामासिकता पर सांप्रदायिकता का संकट जब भी उत्पन्न हुआ, उसको भी कई उपन्यासों में कथानक बनाया गया। हिंदी का साहित्यकार सामाजिक लोकतान्त्रिक प्रवृत्ति और अपने इतिहास को लेकर हमेशा से जागरूक रहा है। राही मासूम रज़ा इस सामासिकता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में देखे जाते हैं। उनके उपन्यास ‘ओस की बूँद’ में विभाजन के बाद भारत के नगरीय परिवेश में सांप्रदायिकता के जहर के घुलने और उससे उत्पन्न हो रही समस्याओं के साथ, समाज के अंतर्विरोधों को चित्रित किया गया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में इस उपन्यास में सांप्रदायिकता और सामासिकता के जो तत्व हैं, उन्हें रेखांकित करते हुए उनके बीच के संबंध और विरोधों को दिखाया गया है।
बीज शब्द: सामासिकता, सांप्रदायिकता, संस्कृति, विभाजन, पाकिस्तान, हिन्दू, मुसलमान।
शोध आलेख: हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में विभाजन और सांप्रदायिकता को केंद्र में रखते हुए लिखे गए उपन्यासों ने सांप्रदायिकता की समस्या को देखने की दृष्टि का विस्तार किया है। वर्तमान समय सांप्रदायिकता और विभाजन की समस्या को एक निश्चित दृष्टि से देखने का अभ्यस्त होता जा रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि इस समस्या पर केंद्रित उपन्यासों को पुनः देखा जाए और समस्या को सामाजिक परिघटना के तौर पर देखते हुए उसमें शामिल घटकों और व्यक्ति की उन सूक्ष्म मानसिक विचलनों को पकड़ें जो पहचान के संकेतों से संचालित होती हैं। इसी के साथ इस समस्या को हवा देने वाली राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में हमेशा से सामासिकता की प्रवृत्ति रही है। कई विद्वानों ने उसे अनेक प्रकार से देखा है, साने गुरुजी जैसे विद्वानों ने उसे अद्वैत से प्रभावित मानते हैं। वह भारतीय संस्कृति के संबंध में लिखते हैं, “भारतीय संस्कृति संग्रह करनेवाली है। यह सबको पास-पास लाने वाली है। यह संस्कृति संकुचितता से परहेज करनेवाली है। इससे त्याग, संयम, वैराग्य, सेवा, प्रेम, ज्ञान, विवेक आदि बातें हमें याद आ जाती हैं… भारतीय संस्कृति का अर्थ है मेल, सारे धर्मों का मेल, सारी जातियों का मेल, सारे ज्ञान-विज्ञान का मेल, सारे कालों का मेल। इस प्रकार के मेल पैदा करने की इच्छा रखनेवाली, सारी मानव जाति के बेड़े को मंगल की ओर ले जाने की इच्छा रखनेवाली यह संस्कृति है।” इसी संस्कृति को हम सामासिकता कहते हैं। वहीं किसी भी संप्रदाय में अपने संप्रदाय को लेकर कट्टरता का भाव सांप्रदायिकता के रूप में पहचाना जा सकता है।
सांप्रदायिकता और सामासिकता में संबंध और द्वंद्व को दिखाने के लिए हिंदी साहित्य में राही मासूम रज़ा से बेहतर शायद कोई नहीं है। आधा गाँव जहाँ विस्तृत कलेवर में इस क्षेत्र का एक क्लासिक उपन्यास उभरकर आता है वहीं ‘ओस की बूँद’ और ‘टोपी शुक्ला’ जैसे उपन्यास संक्षिप्त कथानक में भी औपन्यासिक हैं। ‘ओस की बूँद’ 1970 में प्रकाशित होता है और यह ग़ाज़ीपुर में विभाजन के प्रभाव पर आधारित उपन्यास है। हालाँकि यह उपन्यास कहीं-कहीं ‘आधा गाँव’ के छूटे धागे सा दिखाई देता है। ग़ाज़ीपुर में कोई बलवा वास्तव में नहीं हुआ था जबकि उपन्यास में हुआ। इस बारे में राही मासूम रज़ा लिखते हैं, “परंतु हर वह शहर और क़स्बा और गाँव ग़ाज़ीपुर है जहाँ बलवा हो। मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान के हर शहर का बेटा हूँ। जो घर जलता है वह मेरा है। जिस औरत के साथ ज़िना किया जाता है, वह मेरी माँ, मेरी बहन और मेरी बेटी है।… इसलिए मुझसे यह न पूछा जाए कि ग़ाज़ीपुर में तो कोई बलवा नहीं हुआ फिर तुमने दो-दो बलवे कैसे दिखा दिए।”
इस उपन्यास के मूल कथ्य का आधार विभाजन का प्रभाव है। लेकिन भारतीय संस्कृति के मूल में जो सामासिकता की भावना रही है वह भी अपने टूटते स्वरूप में इस उपन्यास में परिलक्षति होती है। यह उपन्यास इसी टूटन की दास्तान है। भारतीय सामासिकता किसी नए समय में उछला टर्म नहीं है बल्कि यह परंपरागत रूप से भारत में बसा हुआ है। रज़ा साहब की भाषा में देखें तो—“वज़ीर हसन का घर लगभग चार हज़ार बरस पुराना था। आप इस पर आश्चर्य न करें। घर दीवारों का नाम नहीं बल्कि एक कल्पना का नाम है। वज़ीर हसन के पुरखों में से किसी ने पिछली शताब्दियों की धुन्ध में इस्लाम स्वीकार किया था। परन्तु इस्लाम स्वीकार करने से पहले भी तो घर रहा होगा। वज़ीर हसन की आत्मा उम्र में ग़ाज़ीपुर से बड़ी है। तब गनग के तट पर वह किला नहीं बना था, जिसमें आज का डी. ए. वी. डिग्री कॉलेज है। तब भितरी में अशोक की वह लाट नहीं गड़ी थी, जो अब बनारस में है। तब अयोध्या के राजा दशरथ शिकार खेलने नहीं निकले थे…” इस परिचय मात्र से वह जड़ों की तलाश में जाते हैं लेकिन यह जाना उस तरीके से नहीं है कि वह वज़ीर हसन को जड़ से अलग-थलग खड़ा कर दे। इस आधार पर सामासिकता की समस्त इमारत खड़ी हुई है। जैसे-ही इस मूल से काटकर किसी समूह को देखा जाता है, तो उसपर विदेशी होने की मोहर लग जाती है। लेकिन भारत की अवधारणा ही अनेकता में एकता की है। बिना इसके वह अधूरी है। इसी बात का विस्तार करते हुए मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद का कहना है, “हमारे 1100 वर्ष के मिले-जुले इतिहास में हमारी समानधर्मी सर्जनात्मक और रचनात्मक उपलब्धियों ने हिन्दुस्तान को समृद्धिशाली बनाया है। हमारी भाषाओं, हमारे काव्य, हमारे साहित्य, हमारी संस्कृति, हमारी कला, हमारी वेशभूषा, हमारी जीवनचर्या और रीति-रिवाजों पर इस समानधर्मी जीवन की छाप लगी हुई है।”
साझी संस्कृतिक विरासत की जो अवधारणा रज़ा साहब के अंदर थी, लगभग वही भारत की नींव रखने वाले नेताओं में भी थी लेकिन इसी के साथ कुछ विरोध भी रहे। सांप्रदायिकता किसी संस्कृति के विकृति की तरफ बढ़ने का ढंग है। राजनीति इसे अपने ढंग से प्रयोग में लाती है। मामूली जनता यदि राजनीति से अपना फायदा लेना चाहती है तो वह सामाजिक स्तर पर भी टूटन नहीं चाहती है। यह भी एक वजह रहा कि हयातुल्लाह अंसारी को कभी यह लगा भी नहीं था कि पाकिस्तान कभी बन सकता है। “श्री हयातुल्लाह अंसारी बेचारों ने कभी सोच भी नहीं था कि पाकिस्तान वाक़ई बन जाएगा। उनका तो ख़याल था कि अंग्रेज़ जाने वाले ही नहीं है। सर सैयद अहमद ख़ाँ से लेकर श्री हयातुल्लाह अंसारी तक बहुत-से मुसलमान बुद्धजीवियों का यही ख़याल था कि ब्रिटिश सरकार का सूर्य अस्त होने के लिए नहीं निकला है।… जो श्री हयातुल्लाह अंसारी को ज़रा भी यक़ीन होता कि पाकिस्तान बन जाएगा, तो वह उन बयानों पर कभी दस्तख़त न करते, जो उनके नाम से लीग की अंग्रेज़ी और उर्दू की पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे।” यह सिक्के का दूसरा पहलू था। हिन्दुस्तान की अधिकतर जनता राजनीतिक अज्ञानता का शिकार रही है अतः वह बस फायदे के लिए एक तरफ से दूसरी तरफ लुढ़कती रही।
असल समस्या उस वक्त भी समकालीन राजनीति द्वारा निर्मित की गई थी लेकिन विभाजन के बाद वह दूसरा रूप धारण कर लेती है। उपन्यास में वह इस ढंग से आती है, “उन्हीं दिनों म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव आ गए। दीनदायल चेयरमैन बनना चाहते थे। उन्हें पक्का यक़ीन भी था कि कांग्रेस का टिकट उन्हीं को मिलेगा। परंतु जब कांग्रेस का टिकट श्री हयातुल्लाह अंसारी को मिल गया तो दीनदायल का ख़ून खौलने लगा। और यों ग़ाज़ीपुर नगर के इतिहास में पहली बार जनसंघ चुनाव के मैदान में आई। अब आप जानिए कि चुनाव में तो क्या-क्या करना पड़ता! जरूरत पर दाम का ख़याल कौन करता है! चुनाँचे जिस दीनदयाल ने आज तक किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया था, उसी दीनदायल को वोटों के लिए हाथ फैलाना पड़ा। हयातुल्लाह को हारने की एक ही सूरत थी कि पाकिस्तान बनवाने की सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं के सिर पर थोप दी जाए।” विभाजन के बाद इस प्रकार से छोटे राजनीतिक मुद्दों में भी पाकिस्तान काफी अहम हुआ और इसी के साथ सांप्रदायिक राजनीति भी अपने स्वरूप का विस्तार एवं गहरी पैठ बनाने लगा।
चुनाव के अवसर पर यदि दो संप्रदायों में टकराव हो हो एक दूसरे पर आक्षेप लगना तय है। ऐसे में यदि यह चुनाव हिंदू बनाम मुसलमान का बन जाता है तो वहाँ देशप्रेम और देशद्रोह जैसी स्थितियाँ आज भी बन जाती हैं। समाज का एक वर्ग जो अभी भी इन बहसों का हिस्सा नहीं बनना चाहता, वह इस पूरी बहस की चपेट में आता है। यहीं से सामाजिक-विभाजन के बीज पड़ने लगते हैं। लेकिन इतिहास की धारा इतनी सीधी और सरल नहीं है। जो तत्व कभी एक पक्ष में है, वहइ किसी समय दूसरे के पक्ष में रहा होगा। उपन्यास का मंदिर इस मामले में एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है और प्रतीक भी। उसका इतिहास इस प्रकार बताते हैं—“मंदिर का इतिहास यह है कि उसे वज़ीर हसन के बुजुर्गों में से किसी ने बनवाया था। यह उन दिनों की बात है, जब ये लोग मुसलमान नहीं हुए थे। उदयभान सिंह और जयपाल सिंह दो भाई थे। उदयभान बड़ा और जयपाल छोटा। उदयभान मुसलमान हो गया। परंतु उसने उस मंदिर का चार्ज जयपाल को नहीं दिया, क्योंकि मंदिर उसकी हवेली के अंदर था और हवेली उदयभान को मिली थी। जयपाल ने दावा किया कि उदयभान सिंह मुसलमान हो गया है, इसलिए मन्दिरवाली हवेली उसके हवाले की जाए। परंतु उदयभान सिंह नहीं माने। बोले, ‘मुसलमान हो जाने से क्या होता है। राजपूत हूँ। कुल देता हुँ कि मेरी आल-औलाद इस मंदिर की देखभाल करेगी।” मंदिर न केवल एक ढांचा है बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रतीक भी है। जहाँ एक तरफ ऐसी सांस्कृतिक एकता का स्वरूप है वहीं दूसरी तरफ राजनीति-प्रेरित सांप्रदायिकता भी बढ़ रही है और उसका तनाव पूरे मोहल्ले को ग्रसित करने के लिए तैयार है।
उपन्यास में वज़ीर हसन का किरदार इसी सांस्कृतिक ताने-बाने के टूटन के रूप में आता है। जिस प्रकार का माहौल मोहल्ले में बन रहा होता है; पुराना हिंदुस्तान उसका अभ्यस्त नहीं था। वह इस नए को पहचान भी नहीं पा रहा था। लेकिन आने वाले समय की धमक सुनाई दे रही थी। जो राजनीति आज यहाँ परिणति पाती है वह सुभाषचंद्र बोस बहुत पहले ही देखकर लिखते हैं, “हिंदुओं और मुसलिमों के बीच सांप्रदायिक गतिविधियाँ बढ़ने से अंतर-सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ने लगा। इस मौके का तीसरे पक्षों ने फायदा उठाया, जो चाहते थे कि दोनों समुदाय आपस में लड़ते रहें, ताकि राष्ट्रवादी ताकतों को कमजोर किया जा सके। अंतर-सांप्रदायिक दंगों का कारण बननेवाले मुद्दे सामान्य तौर पर गौवध के होते थे, जिनसे हिंदू भावनाएँ आहत होतीं। नमाज के समय मसजिदों के सामने संगीत बजाया जाता, जिससे मुसलिम भावनाएँ भड़क जातीं। यदि किसी मसजिद या मंदिर को अशुद्ध कर दिया जाता तो भी टकराव पैदा हो जाता था। एक बार किसी विशेष इलाके में दोनों समुदायों के बीच कोई तनाव पैदा हो जाता तो इस प्रकार की घटनाओं की चिनगारी से सांप्रदायिक आग आसानी से भड़काई जा सकती थी और ऐसे में तीसरे पक्षों के लिए अपने दलालों को इस गंदे खेल को अंजाम देने के काम में लगाना मुश्किल नहीं था।” चुनाव के वक्त यही माहौल तैयार हो रहा था। वज़ीर हसन इसी दरार को मिटाने के लिए बेचैन था। वह सुबह उठकर मंदिर का शंख कुएँ से बाहर लाता है। “मंदिर में दीया जल रहा था। वज़ीर हसन ने महसूस किया कि हिंदुस्तान का इतिहास और भविष्य दोनों ही मंदिर में खड़े उन्हें गौर से देख रहे हैं।”
यह उपन्यास उस समय की राजनीति को जमीनी स्तर से जाकर पकड़ता है। क्या जो मुस्लिम लीग से जुड़े हुए थे, वे सब पाकिस्तान जाना चाहते थे? या क्या उन सबने पाकिस्तान का समर्थन किया? बहुत बड़ी जनता जो आखिरी पायदान पर थी वह तो राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण पार्टी से जुड़ जाती है लेकिन पार्टी की पहचान और अपनी पहचान, अपने जगह के प्रति लगाव, उस पूरे समाज से लगाव ये अलग चीजे हैं। इस कारण से यह उपन्यास एक ढंग का अन्डर्टोन लेकर चलता है जो राजनीतिक महत्वाकांक्षा से भरी हुई है, जबकि ऊपर से सिर्फ सांप्रदायिकता ही दिखती है। इनका जवाब ही यहि है कि वज़ीर हसन का बेटा भले पाकिस्तान चला जाता है लेकिन वज़ीर हसन स्वयं नहीं जाता, उसका परिवार नहीं जाता। इस प्रकार के जो टुकड़े हैं जहाँ ब्लैक एण्ड व्हाइट से अलग एक तस्वीर है उसे देखना आवश्यक है। यहाँ से देखने पर सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ और भी गहन दिखाई देती हैं, लेकिन समस्या को सुलझाने का सिरा भी देती हैं। उदाहरण के लिए, वजीर हसन ये हाल दोस्ती में देखते हैं और कहते हैं, “मियाँ तुम नहीं समझोगे ये बातें। वह दीनदयाल जो अब बाबू दीन दयाल हो गया है न, और जो मुसलमानों को हर वक़्त गालियाँ दिया करता है न, मेरा लँगोटिया यार है।… जो मैं चला जाऊँगा तो उसके बिना मैं वहाँ अधूरा रहूँगा और मेरे बिना वह यहाँ। ऐसी बहुत-सी बातें हैं मेरे पास, जो मैं सिर्फ दीनदयाल से कह सकता हूँ; और उसके पास भी ऐसी हजारों बातें हैं, जो सिर्फ मुझी से कह सकता है। तो उन बातों का क्या होगा? मुस्लिम लीग हो या महासभा, वह दीनदयाल और वज़ीर हसन से बड़ी नहीं है।”
तत्कालीन भारत में धर्म को लेकर जो राजनीति की पृष्ठभूमि बन चुकी थी, वह आने वाले समय में हिंदुस्तान के लिए बहुत खतरनाक साबित हुआ। इसने मुसलमानों के प्रति एक संदेह का भाव भरने का और मुसलमानों में असुरक्षा और पराएपन की भावना भरने का भी कारण बना। इससे सांप्रदायिक शक्तियाँ मजबूत हुईं। इसी के विस्तार में देखें तो ऐसी ही परिस्थितियों में टोपी जैसे किरदार के पास आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। राही मासूम रज़ा भारतीयपन, हिंदूपन और मुस्लिमपन के भीतर भी जाकर उनके अंतर्विरोधों को देखने का प्रयास करते हैं। शहला से जिना करने वाला हिन्दू नहीं होता है और वहशत की वकालत भी बैठने के पीछे हिन्दू नहीं होते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे बिहारीलाल की हत्या के पीछे मुस्लिम नहीं होते और शंख के बजने के पीछे कोई भगवान नहीं होते। ये जो मानव की प्रवृत्ति के साथ राजनीति का मेल होता है वह सत्य के ऊपर एक पर्दा डालता है जिससे साफ दिखने वाली घटनाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, “उन्माद एक सूरज की तरह उगता और फैलता है जबकि उसकी प्रतिरोधक शक्तियाँ ओस की तरह बेमलूम होती हैं।राही के यहाँ स्थितियाँ भले ही कभी-कभी आरोपित सी लगती हैं, लेकिन वे अंतर्विरोधों को गहरी दृष्टि से देखने वाले लेखक हैं।”
निष्कर्षतः ‘ओस की बूँद’ उपन्यास भारतीय संस्कृति के भीतर सामासिकता के तत्व को तो दिखाता ही है, उसी के साथ इनमें किस प्रकार से सांप्रदायिकता का प्रवेश करता है, इसे तोड़ने का प्रयास करता है, को भी रेखांकित किया गया है। सामासिक संस्कृति दो चार वर्षों में नहीं बनी थी, बल्कि पीढ़ियाँ खपने से बनती है। यही कारण है कि वजीर हसन जैसे लोग इसे टूटता देख, खतरे से नहीं डरते हैं। वे बलवे में मृत्यु कॉ स्वीकार कर लेते हैं। संस्कृति में किसी समाज के भीतर भी विकृति को भी उसके अंतर्विरोध के रूप में दिखाना भी रज़ा की एक खूबसूरती रही है। इसीलिए वह जिस परिस्थिति में किसी कथा को उठाते हैं, उससे न्याय भी करते हैं। इस उपन्यास की संक्षिप्तता, उपन्यास के भीतर सामासिकता बनाम सांप्रदायिकता की राजनीति को रेखांकित करते हुए, तत्कालीन समय के नगरीय, ग्रामीण परिवेश को चित्रित करती है। क्योंकि विभाजन की लपटें सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं रह गई थीं बल्कि वे गांवों तक भी पहुँच रही थीं।
संदर्भ ग्रंथ:
1.साने गुरुजी, भारतीय संस्कृति, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली पृष्ठ 5
2.राही मासूम रज़ा, ओस की बूँद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 151
3.वही, पृष्ठ 27
4.मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद, संघीय भारत की सांप्रदायिक समस्या; सांप्रदायिकता का ज़हर (सं) डॉ. रणजीत, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, पृष्ठ 38
5.राही मासूम रज़ा, ओस की बूँद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 17
6.वही, पृष्ठ 57
7.वही, पृष्ठ 61
8.सुभाषचंद्र बोस, भारत का संघर्ष, प्रभात प्रकाशन, पृष्ठ 126
9.राही मासूम रज़ा, ओस की बूँद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 67
10.वही, पृष्ठ 25
11.मधुरेश, हिंदी उपन्यास का विकास,लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ 148
उज्ज्वल शुक्ला
शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय





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