1. प्रिय तुम हो कहाँ

गगन कहाँ धरा पर ही वो
मनोहर सौंदर्य खोजता हूँ ।
चुभन कहाँ मधुकलश लिये
भावों का मैं घूमता हूँ ।
सखा तुम हो कहाँ ?

विदाई कहाँ मिलन की स्वर लहरी
सजाये धूमता हूँ ।
लिये दृगों में वही मधुर
आमंत्रण मैं धूमता हूँ ।
मीत तुम हो कहाँ ?

सुरभि सुमन खिल चुके मैं
मंजरियां तुम्हारी खोजता हूँ ।
ढल चुका शिशिर भी अब तो ऋतुराज
मैं तुम्हें खोजता हूँ ।
स्नेही तुम हो कहाँ ?

तरुणों में, जलपातों में, खलियानों में
वही नव-जीवन ढूंढता हूँ ।
समय हो चला भ्रमरों के गुंजन का
ऋतुराज मैं तुम्हें खोजता हूँ ।
प्रिय तुम हो कहाँ ?

 

2. फिर पूरब से

आज सूरज फिर पूरब से उग आया,
देखो हठी कहीं का हठ पर उतर आया ।
कलचक्र में कितनी प्रक्रियाएं बदली हैं,
हमने खुद कितनी आदत पकड़ी और छोड़ी हैं ।

रवि ने किन्तु प्रतिदिन ही तो रश्मिकणिका बिखेरी हैं,
जग जीवन को जो अविराम अविरल गति देती है ।
बिन दिनकर के जीवन की संभावना शेष कहाँ रहती है,
वसुधा भी तो उर्जा के लिए मुख भानु का तकती है ।

कितनी सभ्यताओं का बन आधार खड़ा हुआ,
कुछ कथाओं के महानायकों का दिनमणि से प्रादुर्भाव हुआ ।
कृष्ण-कर्ण के संवादों से भी तो नया ज्ञान प्राप्त हुआ,
सात अश्व के रथ पर देखो मतवाला चित्रभानु सवार हुआ ।

ग्रीक – अपोलो, जर्मन – सोल, वैदिक – सूर्य, माया-कुकुलकन
एवं मिश्रियों के रा- कितने नामों से जाना जाता है ।
दानवीर सा बन उठ दिनेश प्रतिदिन आ जाता है,
जाने क्या-क्या किस रूप में जग को देकर जाता है ।

शीतकाल में दीनों का बन उर्जा स्रोत दिवसकर प्रकट हुआ,
ग्रीष्म की भीषणता में, दे सलोनी साँझ आदित्य चला गया ।
कितना जल चाहेगा सोचो मरू यदि पीता ही चला गया,
वो पुष्कर प्यासे मरू की प्यास को भीषणता से जला गया ।

कहाँ कहाँ से बना बादल वर्षा ऋतु दे प्रभाकर चला गया,
सोया रहता जग, चुपके से उठ प्रतिदिन विभाकर खड़ा हुआ ।
आया अपनी पर तो प्रकाश से ही बना उर्जा भास्कर चला गया,
सच में देखो तो जीवन आधार हमारा दिवाकर सिद्ध हुआ ।

3. ऋतुराज तुम आ ही गये क्या

 हेमन्त की मधुरिम शीत कब चली गयी,

अब तो शिशिर भी बस जाने को है ।

अम्बर नील पहन, नभ निमंत्रण दे चुका है,

ऋतुराज तुम आ ही गए क्या ।

 

                आकुल धरा पर नव यौवन चहक जाने को है,

                पीत रंग भी अवनि पर छा जाने को है ।

                हो हर्षित पुष्प-तरु कलिकाएँ बना चुके,

                ऋतुराज तुम आ ही गए क्या ।

देखो बौर भी आम का निकल जाने को है,

सितारों से निशा भी चमक जाने को है ।

नव उल्लास खेतों में छाने लगा है,

ऋतुराज तुम आ ही गए क्या ।

                भ्रमर गीत गुनगुनाने लगे हैं मन को भाने लगे हैं,

                संग तितलिओं के पुष्पों पर मडराने लगे हैं ।

                अलसा रही है वर्षा और थोडा सो जाने को है,

                ऋतुराज तुम आ ही गए क्या ।

सुनील कुमार शर्मा
उप महाप्रबंधक (सामान्य),
दक्षिण पूर्व रेलवे
कोलकाता

 

 

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