आओ क्षण भर बैठो
देखो तो सही
वक्त नहीं बदला
हां पर तुम बदल गये हो
अब न कोई प्रणय
और न ही कोई विस्तार
प्रेम का दुःख का
स्नेह कहीं भंग हो चला
साज कहीं छूट गया
पुरानी सोच नये से इतर है
बदले भाव बदले अर्थ
भाव आत्मसात् नहीं
आओ तुम एक बार फिर
क्षण भर बैठकर
यथार्थ को देखो
मुझे क्षण भर देखो
मेरा स्थिर समर्पण
व्यर्थ नहीं धीर है मेरा
तुम आज भी तुम हो
मैं मैं से अलग कुछ
आओ लौटकर क्षण भर
एक बार फिर

२.

हंसो तुम
मुझपर खूब हंसो
रोज़ हंसो
मेरी कविता देखकर
और भी तो सब हंसते हैं
पर कोई नहीं जानता
मेरे से भाव
मेरी सी अभिव्यक्ति
चूंकि वो हंसते हैं
और शायद हंसना ही जानते हैं
कविता पर कथ्य पर
किंतु वो नहीं जानते
कविता शब्दों में नहीं वरन्
शब्दों के अंतराल से निकलती है
भाव सब में उठते हैं
पर अभिव्यक्त नहीं होते
क्योंकि सब केवल हंसते है
कविता नहीं लिखते

मनोज शर्मा

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