राकेश धर द्विवेदी की कविताएँ

(क) ऋण वैसे तो दोनों का नाम श से प्रारम्भ होता था एक शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था और दूसरा शोषक वर्ग का दोनों ने ही ऋण लिया था […]

शहर जो आदमी खाता है – तेजस पूनिया

एक बड़ी दानवाकार कृति मेरे ऊपर आ बैठी है और एक विराट स्वरूप धारण करती जा रही है । अचानक मैं उठ बैठा पसीने से तरबतर । आज मुझे पूरे […]

लव कुमार ‘लव’ की कविताएँ

(क) उद्घोष  न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का पक्षपात के रोग से ग्रसित होना कानून की देवी के तराजू का कम्पन किसी उद्घोष की आहट है किसी क्रांति का […]

विन्ध्य प्रकाश मिश्र की कविता

आंगन के कोनो में आकर ची ची गीत सुनाती थी चावल के  दाने पाकर पूरा परिवार बुलाती थी। मीठी मीठी मधुर स्वरों में गुनगुन गीत गाती थी। गौरेया आंगन में […]

कृष्णार्जुन संवाद – कृष्णानंद

(भाग-1)   धृतराष्ट्र बोले संजय से क्या हुआ कुरुक्षेत्र में? पाण्डुपुत्रों और मेरे पुत्रों के बीच में? देखा सजंय ने दिव्यदृष्टि से ,दुर्योधन खड़े द्रोण के पास। कह रहे देखो […]

वैष्णो देवी यात्रा और वो स्वाभिमानी लड़की – ध्रुव भारद्वाज

जम्मू रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी बच्ची, उम्र लगभग दस साल होगी, कश्मीरी शॉल बेच रही थी | उसकी माँ भी उसके साथ थी, शायद अगले प्लेटफार्म पर ; […]

अभिषेक चन्दन की कविताएँ

(क) हरामी के सकोरा में भात सीरिया में राहतकर्मी सेक्स के बदले बेच रहे भोजन’ बी.बी. सी. का समाचार पढकर रफीक आजाद की अशोक भौमिक अनुदित कविता को याद करते […]

संजय वर्मा “दॄष्टि” की कविताएँ

समर्थन   *विधवा शब्द कहना कठिन उससे भी कठिन अँधेरी रात में श्रृंगार का त्याग श्रृंगारित रूप का *विधवा में विलीन होना जीवन की गाड़ी के पहिये में एक का […]

कंचन पाण्डेय की कविता

बचपन  वह सौंधी सी खुशबू वह गाँव की चमक वह मिट्टी की महक मिट्टी का उड़ना अंगों का रंगना वह प्यारी सी-डाली छोटी-सी क्यारी             […]

दीपा दिन्गोलिया की कविता

अभिमान   सुबह सुबह उठकर , सोचा कि आज क्यों न, कुछ अलग किया जाये। रिवायतों से हटकर, कुछ नया किया जाए। बीवी को घर से बाहर भेजकर, घर और रसोई खुद संभाल  ली। दिन के आधे होते-होते, कमर जवाब देने लगी। और अब सच में बीवी की याद आने लगी। पर एक पुरुष स्त्री से, कैसे हार मान ले। अपने हिसाब से दुनिया का , बेहतरीन खाना सबको परोसा, चुपचाप सबने लुत्फ़ लिया। कुछ तो कहें  सब मेरी तारीफ़ में… मैंने सोचा। क्यों कि आज…. जो सब मैंने किया है , “वो” कभी न कर पायी। बीवी हंसने लगी, माँ भी हौले से मुस्कुराई। अब चखने की मेरी बारी आयी। तीखा, फीका, बेस्वाद था सब कुछ, शर्म से आँखें झुक गयीं। कैसे “ये” बिना शिकायत रात – दिन , बिना उफ्फ किये सबकुछ कर लेती है। और मेरे घर को बनाने के लिए , अपना तन , मन सब कुछ दे देती है। फिर जिंदगी का ये सच जाना कि , […]