विद्यासागर नौटियाल के उपन्यास ‘सूरज सबका है’ में अभिव्यक्त यथार्थ – शिवानी

विद्यासागर नौटियाल जी यथार्थवादी लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। प्रेमचन्द की लेखन परम्परा के समान ही नौटियाल जी की भी लेखन कला है। वह भी प्रेमचन्द की […]

शमशेर की काव्य- रचना प्रक्रिया – रीता रानी

शमशेर प्रयोगशील कवि हैं जो प्रयोगवाद से चलकर प्रगतिवाद की और आकर्षित हुए फिर नई कविता से जुड़े है। अपनी स्वगत संलाप शैली में कविता करना उनके कवित्व को उनके […]

समकालीन समाज के भाषिक संवर्धन में अनुवाद की उपयोगिता – सुमन

आज के इस सूचना प्रधान युग में अनुवाद अस्मिता के उत्कर्ष छू रहा है। यही कारण है कि विद्वान वर्तमान युग को अनुवाद युग की संज्ञा देते हैं। सूचना प्रौद्योगिक […]

नीरज त्यागी की कविताएं

1. है कैक्टस सा व्यक्तित्व मेरा अनभिज्ञ नहीं मैं,अज्ञात नहीं मैं, जीवन की अब हर कठिनाई से, अनजान बना रहता  हूँ  मैं, अब मौत की भी सच्चाई से। ज्ञान मेरे मन […]

तमाशा मज़ेदार न था (कविता) – सलिल सरोज

वो खरीद लेता था सबके आँसू बेधड़क वो इस ज़माने के लिए अभी समझदार न था कुछ तो कमी थी जो तू किसी की न हो सकी तेरा हुश्न कातिल […]

ज्योति की कविताएं

रामबाण नुस्खा एहसास तुम्हारे जब घुटने लगे आँखे जब तुम्हारी छलकने को हो कैद कर दो खुद को भीड़ में कहीं … शब्द जब तुम्हारे खामोश होने लगें निगाहें तुम्हारी […]

विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’ की कविताएं

आभा चली गई… (स्मरण अटल जी का) बहुत दिनों से जूझ रही थी  वो जालिम आखिर सफल हो ही गई अपने मकसद में               […]

पहचान (लघुकथा)- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

वह पता नहीं कौन था! उस छोटे से सर्कस में, चाहे जानवर हो या इंसान, वह सबसे बात करने में समर्थ था। प्रत्येक के लिए वह एक ही प्रश्न लाया […]

एक महिला मजदूर – दीपक धर्मा

यदि कहीं कोई महिला मजदूरी कर रही होती है तो उसे इस तरह का कठोर परिश्रम करते देखकर जहन में अनगिनत सवाल उठते है। अरे….! ये एक महिला है। अपने सिर […]

टीवी में दृश्य नहीं बोलते ! – डॉ. कुमार कौस्तुभ

‘टीवी में दृश्य नहीं बोलते’- यह पढ़कर आपको अटपटा लग रहा होगा, आपको कुछ अजीब लग रहा होगा क्योंकि टीवी यानी टेलीविजन तो दृश्य माध्यम ही है जिसमें चलती-फिरती-घूमती तस्वीरें […]