समाज की उन्नति का पर्याय है स्त्री – डॉ० दीपा ‘दीप’

स्त्री को बेदिमाग या ‘इमोशनल फूल’ कहकर उसकी निंदा करना बहुत ही उपहासास्पद है। या यूं कहना कि उनमें दिमाग ही नहीं होता, यह केवल समाज की संकीर्ण मानसिकता ही […]

मलयालम के श्रेष्ठ कवि श्रीकुमारन तम्पि के कविताओं का अनुवाद – डॉ. प्रिया ए.

 (शीर्षकंगल इल्लात्त कवितकल – शीर्षकहीन कविताएं) (1)                                                […]

 सॉफ्ट कॉर्नर ( कहानी संग्रह, राम नगीना मौर्य ) – भोलानाथ कुशवाहा

                      मिडिल क्लास की रोजमर्रा की जिंदगी से  रूबरू कराती कहानियाँ कथाकार रामनगीना मौर्य का एक और कहानी संग्रह “सॉफ्ट कॉर्नर” […]

पंजाबी सिनेमा में महिलाओं की भूमिका – तेजस पूनिया 

बॉलीवुड की पहली फ़िल्म आलम आरा बनने के कुछ वर्ष बाद ही पंजाबी सिनेमा भी बनने लगा था। अगर बात करें पहली पंजाबी फिल्म की तो सबसे पहले पंजाबी भाषा […]

अनुक्रमणिका

संपादकीय  डॉ. आलोक रंजन पाण्डेय शोधार्थी निर्गुण संत कवियों की संधा भाषा : परंपरा और प्रयोग – श्वेतांशु शेखर औपनिवेशिक सामाजिक-सांस्कृतिक संकट : हिन्दी कहानी और उदय प्रकाश – दीपक […]

निर्गुण संत कवियों की संधा भाषा : परंपरा और प्रयोग – श्वेतांशु शेखर

हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को ‘स्वर्ण-युग’ का दर्जा प्राप्त है। भक्ति के आरंभ और विकास को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं, लेकिन भारतीय साहित्य में भक्तिकाल के महत्व […]

औपनिवेशिक सामाजिक-सांस्कृतिक संकट : हिन्दी कहानी और उदय प्रकाश – दीपक कुमार जायसवाल

औद्योगिक क्रान्ति के आस-पास पूँजीवाद ‘व्यक्ति की स्वतंत्राता’ का नारा लेकर सामने आया। सामन्तवादी ढाँचे से मुक्ति तो हमने पायी लेकिन इस औद्योगिक क्रांति ने साम्राज्यवादी ताकतों की भूख बढ़ा […]

भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व की राह में बाधाएँ – शैलेन्द्र कुमार सिंह

इस पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य माना जाता है। प्रकृति की संरचना में स्त्री-पुरुष में भेद का भाव नहीं है। दोनों अपनी मूल संरचना में स्वतंत्र होते हुए एक-दूसरे […]

हिंदी आलोचकों की विहंगम दृष्टि ( सूरदास के परिप्रेक्ष्य में ) – अनिल कुमार

हिंदी आलोचना को परिष्कृत एवं समृद्ध करने में जिन आलोचकों का योगदान रहा हैं उनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम सर्वप्रमुख हैं। सूरदास के साहित्य […]

भारतीय भाषाओं की कृतियों के सिनेमाई रूपान्तरण का स्त्रीवादी पाठ – मनीषा अरोड़ा

स्त्री-जीवन के सच और उसकी नियति से मुठभेड़ करती हुई हिन्दी और बांग्ला के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों को भी हिन्दी सिनेमा ने अपने विस्तृत पटल पर जगह […]