हिंदी सिनेमा में चित्रित आदिवासी समाज और उनकी समस्याएँ – ज्ञान चन्द्र पाल

19वीं सदी की महत्वपूर्ण खोजों में से सिनेमा की खोज विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस समय किसी के भी चित्र को रूपहले पर्दे पर प्रकट कर देना किसी आश्चर्य […]

भूमंडलीकरण को असग़र वजाहत का संदेश – प्रियंका कुमारी

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी सम्पूर्ण मानव जाति को एक परिवार की तरह देखने-मानने की अवधारणा हमारे आर्ष ग्रंथों में मिलती है। ‘जियो और जीने दो’ का सह अस्तित्ववादी सूत्र विश्व समाज को सूत्र बद्ध […]

सहित्य और पर्यावरण का अंतर्सबंध – डॉ. गरिमा जैन

संसृति के प्रारम्भ में मानव ने जिज्ञासा, जिजीविषा और चिन्तन के आधार पर अपनी बौद्विक  चेतना का विकास किया है। उसी का उत्स साहित्य है। मानव की गतिषील चेतना ने […]

आजादी का अमृत महोत्सव और श्रमजीवी वर्ग: कुछ साहित्यिक कुछ जगबीती – मुन्नी चौधरी

भारत अपनी आजादी का 75वां साल पूरा करने जा रहा है। इतनी लम्बी अवधि किसी देश के निवासियों के लिए एक गर्व की बात है। इस बीच भारत ने वह […]

भूमण्डलीकरण, लोकतन्त्र और भारतीय किसान की ‘फाँस’ – राम विनय शर्मा

‘‘भूमण्डलीकरण के आक्रामक दौर में नष्ट होती हुई ग्राम संस्कृति और आत्महत्या के लिए विवश किसानों को केन्द्र में रखकर किया जाने वाला कथा-सृजन ही अपनी सार्थकता प्रमाणित कर सकता […]

सुशांत सुप्रिय जी की कविताएं

१. गिरना ———– बचपन में जब कभी मैं चलते–चलते गिर जाता तो दौड़े चले आते उठाने माँ–बाबूजी   किशोरावस्था में जब कभी चलाते हुए फिसल जाती मेरी साइकिल और गिर जाता मैं सड़क पर तो मदद करने आ जाते साथ चलते राहगीर   पर यह कैसा गिरना है कि कोई कितना भी उठाए उठ नहीं पाता मैं एक बार जो गिर गया हूँ अपनी ही निगाहों में     २.ग़लती ———— शुरू से ही मैं चाहता था चाँद–सितारों पर घर बनाना आकाश–गंगाओं और नीहारिकाओं की खोज में निकल जाना   लेकिन एक ग़लती हो गई आकाश को पाने की तमन्ना में मुझसे मेरी धरती खो गई […]

मजमाबाज (लघु-कथा) – संजय कुमार सिंह

देश की राजनीति में हर तरफ जादू हो रहा है। कोई लटक रहा है, तो कोई लटका रहा है।कोई उछल रहा है, तो कोई उछाल रहा है। गरीबी, भुखमरी, मँहगाई, […]

गौरीशंकर वैश्य विनम्र की कविता

गीतिका  ===== उर को चुराने वाले, ये नयन हैं तुम्हारे मदिरा पिलाने वाले, ये नयन हैं तुम्हारे लगती रहस्यमय है, मेंहदी रची हथेली सच को छिपाने वाले, ये नयन हैं […]

साहित्य को लोकतान्त्रिक बनाने की आवश्यकता है : प्रो॰ श्यौराज सिंह बेचैन (व्याख्यान) – अनुज कुमार

दिनांक 9 सितंबर 2021,  सुबह 9:30  बजे, आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के बी०ए० प्रोग्राम की संस्था ‘लक्ष्य सोसायटी’ द्वारा ‘अस्मितामूलक विमर्श और […]