औरत, औरत की दुश्मन – अमन कौशिक

हर शाम की तरह आज भी ऑफिस से आने के बाद घर का वही माहौल था। सब बैठ कर, एक टीम बना कर इधर उधर की बातें कम और चुगलियां […]

और मुन्ना ने सुनी कहानी (कविता) – सुषमा सिंह

आज की भाग दौड़ भरे जीवन में माता पिता के पास बच्चों की भावनाओं को समझने का, उनकी बातें सुनने का समय ही नहीं है। दादा दादी दूर हो गए […]

मेरी पहचान (कविता) -अमर

मेरी पहचान रोते हुए दुनिया की दहलीज पे जब रखा पहला कदम, माँ की ख़ुशी का एक  अलग सा था  एहसास , एक अजीब  सी खामोशी का आलम छाया था हर चेहरे पे सोचो मुझे देखते ही क्यों हो गए हैं सब बेरहम मां कभी पिताजी के मायूस चेहरे को देखती, तो कभी देखती मेरी नन्ही सी मुस्कान, कभी खुद की किस्मत को कोसती तो कभी जानके सब बन जाती अनजान मैं समझ ही न पाया कि ये कैसा है इंसान जो एक नए मेहमान के आने से हो गए हैं सब परेशान तभी मेरी माँ जैसे दिखने वाले आ गए और इंसान और मुझे छीन के ले जाने को करने लगे घमासान माँ का रो रोके हो गया था तब बुरा हाल पिता जी को भी सूझ नही रहा था कोई समाधान अब समझने लगा मैं की यही है विधि का विधान माँ के पेट से पैदा नही हुआ था कोई इंसान मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, पसंद है बस करना श्रंगार साडी, सूट, तालियों के बिना नही चल पाता मेरा संसार अब खोने को अपना मेरा कोई नही रहा इंसान बस याद आता है आज भी माँ का बलिदान अब सब ने दी मुझे एक नई पहचान सीता, रेखा, विमला नाम बहुत पर बुलाते हैं सब मुझे किन्नर हाँ चौकने की है ये बात जो अब समझ मे आयी जिंदगी भर दुनिया मे आने के लिए लड़ता रहा जो अब ये दुनिया ही है उसके लिए परायी मैं किन्नर हूँ पर मैं भी हुँ एक इंसान, दुनिया का ठुकराया हुआ पर,मेरे भी हैं कुछ अरमान, मुझे कुछ मत दो बस जीने दो भाई जान […]

आलोक मिश्रा की दो कविताएँ

तू सबला है तेरे आँचल से अमृत पीकर संसार पनपता खिलता है प्रेम त्याग उपनाम हैं तेरे गंगा सी शीतलता है कर पन्ना धाय को कोटि नमन अपनी शक्ति पहचान […]

पढ़ता रहूँगा तेरा चेहरा (कहानी)-गोपाल निर्दोश

बाप तो उसे उसकी माँ की गोद में ही छोड़कर जाने किस जादूगरनी के साथ कहीं लापता हो गया था। एक माँ का ही सहारा था, वह भी परसों ही […]

प्रेमचंद की कहानी ईदगाह का नाट्य रूपांतरण : तेजस पुनिया  

अमीना – उम्र 50-55 साल ( पुराना घाघरा और सिर पर पुरानी सा चिथड़ा {कपड़ा}) हामिद – उम्र 5 साल  ( छोटी सी निकर और शर्ट जिसका बटन टुटा हुआ) गाँव के चार-छह बच्चे […]

नई किरण (कहानी) : डॉ.संतोष खन्ना

सुबह के दस बजते-बजते वह तीनों पार्क में पहुँच गए। कोहरा काफी छट चुका था, क्योंकि सूर्य अपनी पूरी प्रभा के साथ पूर्व दिशा से आगे बढ़ रहा था, किंतु […]

साथी थी तुम (कविता) – शैलेंद्र कुमार सिंह

आज बहुत दिनों बाद तुमसे मेरी नज़रें मिलीं, पिछली बार का याद नहीं एक लंबा अरसा गुज़र गया है! चलते-चलते अचानक ठिठक गया मेरे क़दम मेरा साथ नहीं दे रहे […]