
बचपन वह सौंधी सी खुशबू वह गाँव की चमक वह मिट्टी की महक मिट्टी का उड़ना अंगों का रंगना वह प्यारी सी-डाली छोटी-सी क्यारी […]

बचपन वह सौंधी सी खुशबू वह गाँव की चमक वह मिट्टी की महक मिट्टी का उड़ना अंगों का रंगना वह प्यारी सी-डाली छोटी-सी क्यारी […]

अभिमान सुबह सुबह उठकर , सोचा कि आज क्यों न, कुछ अलग किया जाये। रिवायतों से हटकर, कुछ नया किया जाए। बीवी को घर से बाहर भेजकर, घर और रसोई खुद संभाल ली। दिन के आधे होते-होते, कमर जवाब देने लगी। और अब सच में बीवी की याद आने लगी। पर एक पुरुष स्त्री से, कैसे हार मान ले। अपने हिसाब से दुनिया का , बेहतरीन खाना सबको परोसा, चुपचाप सबने लुत्फ़ लिया। कुछ तो कहें सब मेरी तारीफ़ में… मैंने सोचा। क्यों कि आज…. जो सब मैंने किया है , “वो” कभी न कर पायी। बीवी हंसने लगी, माँ भी हौले से मुस्कुराई। अब चखने की मेरी बारी आयी। तीखा, फीका, बेस्वाद था सब कुछ, शर्म से आँखें झुक गयीं। कैसे “ये” बिना शिकायत रात – दिन , बिना उफ्फ किये सबकुछ कर लेती है। और मेरे घर को बनाने के लिए , अपना तन , मन सब कुछ दे देती है। फिर जिंदगी का ये सच जाना कि , […]

वह नदी नहीं माँ है। मेरे बचपन में मेरी माँ ने एक किस्सा सुनाया कि गंगा माँ को आर-पार की पियरी चढ़ाई और बदले में पुत्ररत्नका उपहार पाया धीरे-धीरे मैं […]

1• खुल रहे ग्रहों के दरवाजे मैंने जिस मेज पर रखा अपना स्पर्श उसी से आने लगी दो खरगोशों के सिसकने की आवाज़ हाथ से होकर शिराओं में दौड़ने लगी गिलहरियाँ […]

1.तब समझो प्यार हुआ हमको जब आस मिलन की जागी हो जब हृदय बने अनुरागी हो जब मदहोशी सी छा जाए और ख़ामोशी आ जाए जब एक नाम ही रमते […]

तूने क्यों मुझे इस रिश्ते से आज़ाद कर दिया ऐसा क्या गुनाह किया था जो मेरा ही तिरस्कार कर दिया ना मोह थी ना माया थी […]

1 भूख से बेहाल होकर मरने लगे हैं लोग बेचकर खुद को बसर करने लगे हैं लोग इस शहर में गोलियां अब इस कदर चलने लगी हैं घर से कैसे […]

डोरबेल बजी जा रही थी। रामसिंह भुनभुनाये “इस बुढ़ापे में यह डोरबेल भी बड़ी तकलीफ़ देती है।” दरवाज़ा खोलते ही डाकिया पोस्टकार्ड और एक लिफ़ाफा पकड़ा गया। लिफ़ाफे पर बड़े […]

बाहर जोरों की बारिश हो रही थी। अनेक पेड़ों की पत्तियों से टकराती बॅूदों का शोर नजदीक के जंगल के सन्नाटे को भंग करने की बजाए सघन बना रहा था। […]

क्यों मौन हैं क्यों मौन हैं हम सब चीखते-चिल्लाते रहें पर हम मौन ही रहें खड़े | क्या बोले कोई सुनता ही नहीं , अतः हम मौन ही रहें खड़े […]