ज्योति की कविताएं

रामबाण नुस्खा एहसास तुम्हारे जब घुटने लगे आँखे जब तुम्हारी छलकने को हो कैद कर दो खुद को भीड़ में कहीं … शब्द जब तुम्हारे खामोश होने लगें निगाहें तुम्हारी […]

विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’ की कविताएं

आभा चली गई… (स्मरण अटल जी का) बहुत दिनों से जूझ रही थी  वो जालिम आखिर सफल हो ही गई अपने मकसद में               […]

पहचान (लघुकथा)- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

वह पता नहीं कौन था! उस छोटे से सर्कस में, चाहे जानवर हो या इंसान, वह सबसे बात करने में समर्थ था। प्रत्येक के लिए वह एक ही प्रश्न लाया […]

एक महिला मजदूर – दीपक धर्मा

यदि कहीं कोई महिला मजदूरी कर रही होती है तो उसे इस तरह का कठोर परिश्रम करते देखकर जहन में अनगिनत सवाल उठते है। अरे….! ये एक महिला है। अपने सिर […]

बिखरे रंग (कहानी) – डॉ. सिम्मी चौहान

जादूगरनी हो तुम ! कितने सजीले रंग चुनती हो । चित्र की एक-एक रेखा हू-ब-हू ऐसे खींच डालती हो कि सच्चाई भी फीकी लगने लगे । उस पर ये मिश्रित […]

नीरज त्यागी की कविताएँ

बदलते लोग दीवारों की दरारों से लोग हालात भांपने लगे, आँखो में दिखती लाली से लोग जज्बात मापने लगे, खुल कर मुस्कुराया जब कोई, तब लोग उसकी मुस्कुराहट के पीछे […]

राकेशधर द्विवेदी की कविताएं

कंक्रीट के जंगल आइए मैं लू चलूं आपको कंक्रीट के जंगल में जहां आप महसूस करेंगे भौतिकता के ताप को मानवता नैतिकता दया-करुणा यहां बैठो रहे मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन […]

मोक्ष (कहानी) – राजेश कमल

“बिशेश्वर| ऐ भाई बिशेश्वर! कौना सोच में डूबे हो भैया?” “कुछ नहीं |” अनमने से बिशेश्वर ने बात टाल दी। “चाह पियोगे?” जरनैल सिंह ने बात पलट दी| बिशेश्वर ने […]

ग्लानि – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

“अच्छा हुआ बेटा जो तू आ गया | तेरे बाबा तेरे घर से जब से लौटे है गुमसुम रहते हैं| क्या हुआ ऐसा वहाँ?” “कुछ नहीं अम्मा!” “कुछ तो हुआ […]

त्राहिमाम हूजूर (कहानी) – समीर कुमार

राज के समय के जिलों की भौगोलिक सीमाएं आज के दौर के मण्डलों या प्रमंडलों से भी अधिक फैली थीं और जिला मजिस्ट्रेट का पद मूल रूप से अंग्रेजी के […]