
नामवर सिंह हिंदी की लिखित-वाचिक परंपरा के बड़े आलोचक रचनाकार हैं। आलोचक और रचनाकार का काम निर्भयता के साथ प्रचलित, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देना कहा जा सकता है। तमाम […]

नामवर सिंह हिंदी की लिखित-वाचिक परंपरा के बड़े आलोचक रचनाकार हैं। आलोचक और रचनाकार का काम निर्भयता के साथ प्रचलित, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देना कहा जा सकता है। तमाम […]

आधुनिक समय में सिनेमा जीवन का एक ऐसा अंग बन चुका है जिसे उससे अलग कर पाना संभव नहीं है। सिनेमा ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा समाज के विभिन्न […]

प्रेमचंद कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है किंतु फिल्म निर्माता और निर्देशक अनुराग कश्यप का कहना है कि सिनेमा भी समाज का दर्पण है। भारतीय सिनेमा अपने सौ वर्ष पूर्ण […]

भाव और भाषा का अविच्छिन्न सम्बन्ध साहित्य सर्जना का मुख्य उपादान और लक्षण है। आशय की अनुरूपता के साथ भाषा का स्वरूप विधान कविता की भाषा योजना का मुख्य नियामक […]

शताब्दियों की गुलामी से मुक्त होकर स्वतत्रंता के पचास वर्ष पूर्ण होने के पश्चात् जब हम हिन्दी की स्थिति पर विचार-चिन्तन करते हैं तब ज्ञात होता है कि अंग्रेजी के […]

हिंदी नाटक के क्षितिज पर मोहन राकेश का उदय नाटक और रंगमंच दोनों दृष्टियों से श्रेयस्कर था। उन्हें आधुनिक हिंदी नाटकों के अग्रदूत के रूप में पहचाना जाता है। लीक […]

बौद्ध दर्शन में महायान सम्प्रदाय का हीनयान सम्प्रदाय की तुलना में अत्यधिक महत्व था। बौद्ध धर्म में महायान सम्प्रदाय के बहुत बड़ी संख्या में अनुयायी थे। महायान धर्मावलम्बी देवी देवताओं […]

इतिहास हमेशा अतीत का प्रवक्ता न होकर वर्त्तमान और भविष्य का उद्घोषक भी होता है | इसी से प्रेरणा लेकर नाटककारों ने समाज को उद्बोधित करने का कार्य किया है […]

हाल के दशकों में राज्यव्यवस्थाओं का वैधीकरण इतिहासकारों के मध्य विशेष रूचि का विषय बनकर उभरा है। इस रुचि की नींव इस एहसास में जमी है कि राज्यव्यवस्थाओं का अस्तित्व […]

‘आँसू’ छायावादी काव्य का ऐसा कीर्तिमय स्तम्भ है जिसमें प्रसाद जी ने अपने विरही मन की वेदना को विराट रूप में प्रकट किया है। यह ’प्रसाद के संसारी प्रेम व्यापार […]