हिंदी साहित्य में मिथक की अवधारणा – राहुल प्रसाद

हिंदी साहित्य का प्रारंभ एवं विकास निरंतर मिथकों से जुड़ा प्रतीत होता है । समय समय पर मिथकों की उपज साहित्य को नव आयामों से विभूषित करती रही है । […]

सिनेमा, साहित्य और भारत-विभाजन – आशीष कुमार

साहित्य और सिनेमा का पुराना एवं गहरा सम्बन्ध रहा है। साहित्य और सिनेमा ऐसे माध्यम हैं जिसमें समाज को बदलने की ताकत सबसे अधिक होती है। कोई भी साहित्य युगीन-जीवनमूल्यों […]

पलायन की समस्याऔर अनुसूचित जाति :ग्रामीण परिवेश के मुसहर समाज के सन्दर्भ में – जोखन शर्मा

एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर रहना और अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास करना पलायन कहलाता है । पलायन (माइग्रेशन) को किसी व्यक्ति के विस्थापन के […]

भीष्म साहनी के नाटक (हानूश का विशेष संदर्भ) – डॉ॰ बृज किशोर

भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे हिन्दी गद्यकारों में अग्रिम पंक्ति के रचनाकार हैं। वे मूलतः कथाकार हैं लेकिन, “स्वाभाविक-यथार्थपूर्ण चरित्रों की जीवंत सृष्टि, क्षणों की सूक्ष्म पकड़, सहज […]

राकेश धर द्विवेदी की कविताएँ

(क) ऋण वैसे तो दोनों का नाम श से प्रारम्भ होता था एक शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था और दूसरा शोषक वर्ग का दोनों ने ही ऋण लिया था […]

शहर जो आदमी खाता है – तेजस पूनिया

एक बड़ी दानवाकार कृति मेरे ऊपर आ बैठी है और एक विराट स्वरूप धारण करती जा रही है । अचानक मैं उठ बैठा पसीने से तरबतर । आज मुझे पूरे […]

लव कुमार ‘लव’ की कविताएँ

(क) उद्घोष  न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का पक्षपात के रोग से ग्रसित होना कानून की देवी के तराजू का कम्पन किसी उद्घोष की आहट है किसी क्रांति का […]

विन्ध्य प्रकाश मिश्र की कविता

आंगन के कोनो में आकर ची ची गीत सुनाती थी चावल के  दाने पाकर पूरा परिवार बुलाती थी। मीठी मीठी मधुर स्वरों में गुनगुन गीत गाती थी। गौरेया आंगन में […]

कृष्णार्जुन संवाद – कृष्णानंद

(भाग-1)   धृतराष्ट्र बोले संजय से क्या हुआ कुरुक्षेत्र में? पाण्डुपुत्रों और मेरे पुत्रों के बीच में? देखा सजंय ने दिव्यदृष्टि से ,दुर्योधन खड़े द्रोण के पास। कह रहे देखो […]

वैष्णो देवी यात्रा और वो स्वाभिमानी लड़की – ध्रुव भारद्वाज

जम्मू रेलवे स्टेशन पर एक छोटी सी बच्ची, उम्र लगभग दस साल होगी, कश्मीरी शॉल बेच रही थी | उसकी माँ भी उसके साथ थी, शायद अगले प्लेटफार्म पर ; […]