भारत में लोक और लोक में भारत

भारतीय संस्कृति और उसकी परंपराओं का निर्माण अनेक कारकों से हुआ है। इन कारकों में जितना क्षेत्रीय विविधता की भूमिका है, उतनी हीउनकी एकत का भी। हमारे आदि ग्रंथ वेदों को माना गया और उनमें इन्द्र आदि के साथ प्रकृति का पूजन किया गया। पूरी भारतीय परंपरा की आत्मा लोक से पाई गई है और इस प्रकार लोक भारत में व्याप्त हुआ। वहीं भारतीय जीवन शैली में जो भारतीय अस्मिता का तत्व है वह हर अंचल में व्याप्त है, जिससे की भारत भी लोक में व्याप्त होता दिखाई देता है। यह जो लोक की परंपरा हमारे यहाँ है—वह प्राचीन काल में अथर्ववेद में सबसे पहले केंद्र में आती है, जब अनेक लोक के पूजन-विधान को वेद में स्थान दिया जाने लगा। इसी क्रम में आगे चलकर हनुमान, शिव और अनेक देवताओं को हम लोक से अपनाते चले गए। इस प्रकार यह प्रक्रिया प्राचीन भी है और इसका नवीनीकरण भी होता रहता है।
‘भारत में लोक और लोक में भारत’ विषय को देखें तो इसके दो हिस्से होते हैं। पहले हिस्से का स्पष्ट अर्थ है कि भारतीय इतिहास, भूगोल और समाज में जो अनेक कथाएँ, नृत्य और कलाएँ लोक से आती हैं। ये भारत के लगभग सत्तर प्रतिशत ग्रामीण हिस्सों मे व्याप्त हैं और नगरीय तथा शहरी जीवन में आवागमन करती रहती हैं। हाल ही में ‘कचौड़ी गली सून कईल बलमू’ का कोक स्टूडियो से वायरल होना इसका पुख्ता प्रमाण है। अब विषय का दूसरा हिस्से अर्थात ‘लोक में भारत’ को देखा जाय तो यह हमारी पूरी भारतीय विचार प्रणाली से जुड़ा हुआ है। इसकि यात्रा भी पुरातन है। अद्वैत-दर्शन को लेकर सुदूर बनारस के गाँव में जब किसी तथाकथित चांडाल ने शंकरचार्य से जब प्रश्न किया था, तभी हमें दिखाई पड़ गया था कि भारतीय चिंतन प्रणाली कितनी गहरी है। आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम में अनेक आदिवासी, कृषक, मजदूर और ग्रामीण, जब आंदोलन में भागीदारी करते हैं तो उससे लोक में भारत की व्याप्ति समझ आती है। इस प्रकार विषय समग्र रूप में उस पूरे अंतःक्रिया को समझने का प्रयास है जिससे लोक और भारत के अंतर्संबंधों को समझा जा सकता है।
जब कोई देश भारत जैसा विविध हो तो उसमें लोक की महत्ता बढ़ जाती है। लोक हमें उस कोमलता और प्रकृति के करीब रहने की शैली प्रदान करता है जो एक मनुष्य के रूप में व्यक्ति का निर्माण करता है। वहीं भारत की अवधारण जब इस मनुष्य के समझ में आती है तो वह एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित होता है। इससे होता यह है कि व्यक्ति के भीतर एक संपूर्णता आती है। वह मधुबनी, वारली जैसी कलाओं, बीहू, बाउल, कजरी, सोहर जैसे गीतों, भांगड़ा, घूमर, छाऊ जैसे नृत्यों से निकटता स्थापित करता है। ये सभी चीजें उसके कलात्मक संवेदना का निर्माण करती हैं और उसे जागृत रखती हैं। यह लोक विविधताओं का उत्सव है। भारतीय लोक की अवधारणा पाश्चात्य आयातित न होकर इसी देश की पैदावार है, यह लोक वह है जिसमें प्रकृति और पर्यावरण किसी विमर्श की तरह नहीं आए बल्कि नैसर्गिक रूप से भारतीय आत्मा के हमेशा से अंग रहे हैं। व्यष्टि के रूप में भारतीय संस्कृति को देखने पर जहाँ लोक के दर्शन होते हैं, वहीं समष्टि में हमें पूरी भारतीय संस्कृति दिखाई देती है। इस स्तर से हम विचार करें तो इतनी सारी विविधताओं के बाद भी हमारे सांस्कृतिक मूल्य लगभग समान हैं। बड़ों का सम्मान, प्रकृति पूजन, फसलों का उत्सव जैसे मूल्य पूरे भारतीय परिदृश्य में एकत दर्शाते हैं। इसी प्रकार त्योहारों, साझा इतिहास और मिथक भी हमें एक बनाए रखते हैं। होली, दीपावली, ईद और क्रिसमस जैसे त्योहार हर भारतीय मनाता है। रामायण, महाभारत की कहानियाँ भारत के हर हिस्से में हर व्यक्ति को ज्ञात है। इन सबमें कोई भेद आड़े नहीं आता है। यह भारतीय सांस्कृतिक वैभव पूरे लोक में भी व्याप्त है। इस प्रकार हमें वह अंतर्संबंध दिखाई देता है जो भारत और लोक की अवधारणा में कोई पार्थक्य नहीं दिखाता बल्कि एक गुंफित संरचना को पूरे वैश्विक पटल पर रखता है, जो अन्यत्र दुर्लभ है।
समय के साथ संस्कृतियों में बदलाव आता रहता है, जो जरूरी है अन्यथा एक संस्कृति एक जगह जमे पानी की भाँति गंदी हो जाती है, विकृति के रूप में बदल जाती है। इस बदलाव में अनेक चुनौतियाँ भी आती हैं। भारतीय संस्कृति इस मामले मे बहुत लचीली रही है। लोक कलाएँ भी समय-समय पर अपना स्वरूप परिवर्तित करती रहती हैं। रामलीला और रासलीला में अनेक आधुनिक तकनीकों के प्रयोग ने इसे और अधिक जादुई बनाने काम किया। अतः ये नहीं कह सकते कि इससे हमारा नुकसान हुआ है, बल्कि आधुनिक तकनीकी और विचार एक कदम और बढ़ाने का संकेत हैं। जिस समय हम इस बिन्दु से भारत और उसके लोक को देखना शुरू करते हैं तो हम पाते हैं कि इससे पहले भी लोक ने कैसे तत्कालीन संदर्भों और विचारों को अपने भीतर समाहित किया। महेंदर मिसिर का ‘हँसी-हँसी पनवा खियउले गोपिचनवा’ स्वतंत्रता संग्राम से उपजा वहीं फिल्म में आकर वो ‘हँसी-हँसी पनवा खियउले बेइमनवा’ होकर एक प्रेम का गीत बन जाता है। इसी प्रकार अनेक अवधी के गीतों के धुन फिल्मों में आए। यह लोक का भारतीय पटल पर आते हुए बदलाव का ही सूचक है। जब कोई ऐसी कला भारतीय पटल पर आती है तो इससे पूरा भारत परिचित होता है और एक राष्ट्र के रूप मे जो जुड़ाव है वह और भी मजबूत होता है।
यह अंक इन्हीं अंतर्संबंधों को समझने के प्रयास के लिए तैयार किया गया है। यह हिंदी भाषा में ज़रूर है, लेकिन इसके भीतर पूरे राष्ट्र का लोक बसा हुआ है। इसमें राजस्थान की बात है तो तमिलनाडु के लोकगीत, असमिया विवाह गीत, कन्नड़ लोक साहित्य भी है। यह किसी एक पक्ष पर भी आधारित न होकर पर्यावरण, वैश्वीकरण, ग्रामीण जीवन शैली, बंजारा जीवन शैली जैसे अनेक पक्षों से मिलकर बना हुआ है। यह लोक से बने ताने-बाने का ऐसा अंक है जिसमें पूरी भारतीय संस्कृति की अवधारणा दिखाई देती है। इस अंक में देश के हर हिस्से से बौद्धिक लोगों के लेख हैं, जिससे उस क्षेत्र विशेष के लोक को समझने में मदद मिलती है। पूरे भारत को समझने के लिए जिस प्रकार से महात्मा गांधी ने भारत के हर हिस्से की यात्रा की थी, उसी प्रकार से यह अंक पूरे भारतीय परिदृश्य को एक जगह पर एकत्रित करने का प्रयास है। उम्मीद है, यह अंक भारत की आत्मा को और भी बेहतर ढंग से समझने में मददगार साबित होगा।

 

डॉ. आलोक रंजन पांडेय