कोई भी लोकप्रिय कला रूप ,स्वतः-स्फूर्त,एकल आर्ट-फॉर्म नहीं होता ,यह एकाधिक कलाओं का संघटन होता है । इसके कई कारण हो सकते हैं जिनमें से एक स्वाभाविक सा कारण है कि मनुष्य एकरस जीव नहीं है,उसका चित्त अनेक भावों के संघटन से निर्मित इकाई है ,इसलिए उसे एकाधिक रसयुक्त कला-विधा सहज ही आकर्षित कर लेती है।20वीं सदी में  उत्तर भारत में एक लोकनाट्य विधा बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हुई जिसका नाम है “नौटंकी”। इसके नाम और उद्गम को लेकर अनेक मत हैं परंतु इसमें कोई दो राय नहीं की 20वीं शताब्दी के बीच के दशकों में इसका अभूतपूर्व उत्थान हुआ ।उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर नेपाल तक यह बहुत लोकप्रिय रही है ,यहाँ तक कि इसे उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़कर देखा जाने लगा और भारत-सरकार ने इसे उत्तर भारत की सांस्कृतिक धरोहर भी घोषित किया।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है,कि कला का वह रूप जो जनता के हृदय को छू जाता है अनेक कलाओं का संघटन होता है,नौटंकी भी इसका अपवाद नहीं ,यह भी कोई स्वतःसफूर्त लोककला नहीं है ,इसका निर्माण भी अनेक कलाओं के संयोजन से हुआ है जिसमें शिल्प संस्कृत रंग-मंच से लिया गया,उसमें शास्त्रीय संगीत का मिश्रण कर के इसे गेय-नाट्य की शक्ल दी गई ।समय के साथ नौटंकी विकसित होती रही और इसका दायरा भी बढ़ता रहा,बीसवीं शताब्दी में विशेषकर कानपुर शैली नें इसमें -ठुमरी ,आल्हा,दादरा जैसे लोक गीतों से नौटंकी का शृंगार किया और इसने अपना कथ्य लिया लोक कथाओं से । लोक में फैली अनेक कथाओं को आधार बनाकर नौटंकियाँ तैयार की गईं जैसे राजा हरिश्चंद्र की कथा ,सुल्ताना डाकू की कथा ,लैला-मजनूँ इस तरह की अनेक कथाएँ जो लोक में प्रचलित थी उनका मंचन नौटंकी ने अपने अन्दाज़ में किया और लोगों नें भी इसे हाथों हाथ लिया ।

   नौटंकी को उत्तरप्रदेश में इतनी लोकप्रियता मिलने का एक बड़ा कारण था यहाँ प्रचलित लोककथाओं को नाटकीय रूप देना ,कथा को आगे बढ़ाने के लिए प्रचलित लोकगीतों में कथा को पिरोया जाता था।लोकगीतों में लोक की छवि है,लोक की भावनाएँ हैं,उनका सुख-दुख उनके उत्सव है ,इन्ही में इनका इतिहास भी संजोया गया है और भविष्य के सपने भी हैं।अतः ये लोकगीत लोक रस का भंडार हैं।नौटंकी नें इसी रस स्रोत से रस  भर- भर कर दर्शकों पर उड़ेला जिससे वे रस्मग्न हो उठते थे ।इसी रसवर्षा के कारण नौटंकी का  नक्कारा दूर-दूर तक गूंज उठा।

आज नौटंकी शब्द का प्रयोग जिस संदर्भ में होता है उससे वह नाटक के अधिक क़रीब मालूम पड़ती है, वह चाहे विधागत रूप में हो या ताना मारने के लिये।पर जब हम नौटंकी का बारीकी से अध्ययन करते हैं तो पाएँगे कि इस विधा की केंद्रीय वस्तु  इसकी गायकी है , अभिनय इस विधा का गौड़ तत्व है। इसमें चल रहा अभिनय ,अभिनय जैसा ही दिखता है,इसमें अतिरिक्त उछल-कूद होती है और घटनाओं को इस क्रम में रखा जाता है कि वो दर्शक को हैरान कर दें और उसके भीतर कौतूहल पैदा कर दें।सत्य तो यह है कि कोरे अभिनय के बल पर नौटंकी-कलाकार कभी भी दर्शक को साधारणीकरण की अवस्था तक नहीं ले जा सकते ,यह कार्य तो गीतों द्वारा ही सिद्ध होता है।आज हम इन्ही लोक गीतों की बात करेंगे जो उत्तर भारत के लोक की थाती हैं और जिनके प्रयोग से नौटंकी रस-सिक्त हुई है।

   नौटंकी में अनेकानेक लोकगीतों का प्रयोग होता रहा है उदारणतः ‘रसिया’

रसिया उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र की भारतीय लोक कला की एक लोकप्रिय शैली है । रसिया की शैली में कई उप-शैलियाँ शामिल हैं और विभिन्न प्रकार के संदर्भों में इसका प्रदर्शन किया जाता है। गीतों को विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला को चित्रित करने के लिए जाना जाता है, हालांकि, ये कृष्ण और राधा के प्रेम को दर्शाते हैं।

 ‘दादरा’

दादरा वस्तुतः ठुमरी शैली का गायन है । दादरा गीत शृंगार रस प्रधान गीत है इसकी प्रकृति ठुमरी के समान प्रतीत होती है । इसी कारण दादरा गायन शैली को अधिकतर ठुमरी अंग के रागों में गाया जाता है । यह शैली कोठों पर विकसित हुई थी, इसका जन्मस्थान उत्तरप्रदेश माना जाता है।

‘बहरे तवील'(यह चार पंक्तियों और दो तुकों में कहा जाने वाला चालीस मात्राओं का सम्मात्रिक दंडक छंद है ।उर्दू में इसे मुतदारिक छंद भी कहते हैं) ‘सोरठा’,’आल्हा'( बुंदेलखंड और कुछ अवध के क्षेत्रों में प्रचलित एक वीर रस प्रधान लोक-गीत शैली जिसमें दो बुंदेला वीरों आल्हा व उदल की कथा गाई जाती है ,’लावणी'(यह फ़सलो की कटाई के समय में गाया जाने वाला गीत है ), ‘झूलना'( यह ठुमरी का ही एक हल्का अर्थात् लोक रूप है , यहाँ झूलना का आशय जगूमने से है) ,’ग़ज़ल’और ‘कौवाली ‘का सामान्यतः प्रयोग होता था । हाथरस नौटंकी में शुरुआत में  गायन पर ही अधिक ज़ोर रहता था, पर कानपुर आकर इसका रंग कुछ बदल गया और इसमें अभिनय और हावभाव का मिश्रण करके इसे नाटक के कुछ अधिक क़रीब लाया गया साथ ही साथ लोकगीतों का अधिक प्रयोग भी कानपुर शैली में ही हुआ । अब हम कुछ लोकगीतों के बोल देखेंगे जिससे की हमें इनके या यूँ कहें तत्कालीन लोक के मिज़ाज का पता चल सके।

यह रसिया देखिए :

 ” पाँच रुपइया दे दे बालम ,मैं मेला देखन जाऊँगी।

  पाँच आना की पाव जलेबी, बैठी सड़क पे खाऊँगी।

   कहा कहे कछु समझ ना आवइ,ऐ मेरे दिल की प्यारी

   मेला देखन जाया ना करती,भले घरों की नारी।। ” (नौटंकी की मल्लिका गुलाब बाई,पृष्ठ संख्या-72)

यहाँ एक पत्नी अपने पति से मेला देखने जाने के लिए पैसा माँग रही है और बता रही है कि वो उस पैसे से जलेबी ख़रीदकर सड़क पर बैठ के खाएगी ।इसपर पति कहता है कि -तुम्हें कुछ समझ आ रहा है तुम क्या कह रही हो प्यारी , भले घरों की औरतें मेला देखने नहीं ज़ाया करती। रसिया सीधा और सादगी से युक्त है और यह लोक व समय के विषय में कितना कुछ बता जाता है ।

अब इसी तरह का एक दादरा देखिए :

“अकेली  डर लागे मारी अम्मा

जब सिपाहिया ने घूँघट पट खोला

नयन दोनों झुक गए रात मोरी अम्मा,

जब रे सिपाहिया ने चोलीबंद खोली

जोवन दोनों डट गए रात मोरी अम्मा ,

जब रे सिपाहिया ने मोर लहंगा पकड़ो

भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा

अकेली डर लागे रात मोरी अम्मा…”(नौटंकी की मल्लिका गुलाब बाई,पृष्ठ संख्या-133)

 इस दादरे में शारीरिक संबंध का खुले तौर पर ज़िक्र हो रहा है जो उस समय के हिसाब से बहुत अनोखी व असामान्य बात है , जहां एक तरफ़ उस समय तथाकथित शिष्ट समाज में विक्टोरियाई आदर्शों का साया है ,वहीं हम नौटंकी में गाए जा रहे इन लोक-गीतों में समाज के दूसरे छुपे हुए पक्ष को बखूबी देख सकते हैं।इन गानों में ना तो संकोच है, ना ही कोई बनावटीपन।इन गीतों में विशेषकर स्त्रियों ने अपने अनुभवों को बिना किसी छुपाव , दुराव के व्यक्त किया है ।क्यूकी इन गीतों पर स्त्रियों का ही एकाधिकार रहा है (आल्हा व फगुआ को छोड़कर) अतःइनमें स्त्रियों की आंतरिक भावनाओं व स्थिति का साफ़ – साफ़ वर्णन मिलता है।ये बातें बहुत बार ऐसी बातें होती हैं जिनके बोलने पर सामान्यतःनिषेध है।जैसे-

“आओ मेरे सजना मिलन हुई जाए

मचले है मनवा रूत है रंगीली

तुम भी रसीले मैं भी रसीली

दोनों का मन ललचाए

आओ मेरे सजना मिलन हुई जाए।

गाँव की नारी ,चादर के पीछे

रतियाँ बिताऊँ अमवा के नीचे

नैनों में दीप जलाए,

आओ मेरे सजना मिलन हुई जाए।

कैसे बताऊँ हिरदे की बातियाँ

देहियाँ जलाएँ फागुन की रतियाँ

सेज़िया पे निंदिया ना आए

आओ मेरे सजना …”(वही,पृष्ठ संख्या-133)

इन गीतों से  उत्तर-भारतीय स्त्रियों के विस्तृत व्यक्तित्व और भावनाओं के विस्तार का ज्ञान होता है।इन गीतों में उनके रोज़मर्रा के अनुभव भी संकलित होते हैं,अक्सर दिन का काम करते-करते ही वे इन्हें गाया करती थीं ,इनमें इतना खुलापन और शारीरिक इक्षाओं अर्थात् यौन-सुख का इतनी साफ़गोई के साथ ज़िक्र इसी कारण हो पाया क्योंकि स्त्रियाँ इनका गायन इकट्ठी होकर करती हैं ।  इन लोकगीतों के प्रयोग का एक दूसरा पक्ष भी है ,और वो यह है कि जिस समय नौटंकी अपने चरम पर पंहुची थी उस समय हर नौटंकी मंडली के पास एक हिरोइन हुआ करती थी जो जनता के आकर्षण का केंद्र होती थी। इन नौटंकियों के प्रमुख दर्शक पुरुष थे , और इन्हीं की लालसाओं और वासनाओं के अनुसार नौटंकी को ढाला जाता था , जिस समय बाहर किसी स्त्री का चेहरा दिखना या स्त्री का ही दिखना दूभर था उस दौर में नृत्य करती , गीत गाती और अपने हाव-भाव से दर्शकों को मदहोश करती स्त्री कितना बड़ा आकर्षण हो सकती है इसका सहज ही अनुमान लगाया का सकता है। गीत भी कुछ ऐसे वैसे नहीं स्त्री-सुलभ चेष्टाओं से भरपूर (यहाँ स्त्री -सुलभ से तात्पर्य है स्त्री को प्रकृति से मिले गुण और कामनाएँ न कि पुरुष सत्ता द्वारा थोपे हुए आदर्श)अतः दर्शकों को इन गीतों में बहुत रस आता था । लोक- धुनों में पिरोए गये इन गीतों में सामान्य पात्र यूँ छिड़क दिये जाते थे जैसे फूल के गुलदस्ते पर  पानी,जिससे उनकी ताजगी बनी रहती है और छींटे ख़ुद भी आकर्षक मालूम होते हैं। समाज के कई सारे वर्गों को गीतों में लाकर उस वर्ग के दर्शकों को नौटंकी के  साथ जुड़ाव का एहसास दिलाया जाता था ।जैसे की इस गीत को देखिए:

“मोर पनवाड़ी रे नज़रिया तोंसे लागी

सोना कहे मैं सबसे बड़ा हूँ,अजी सोना कहे मैं सबसे बड़ा हूँ

एक सोनार से हारो।

हाय पीट-पीट के नथुनी बनाई

गलवा कीकर गुलज़ारो

रे नज़रिया तोसे लागी

मोर पनवाड़ी नज़रिया तोसे लागी।

फुलवा कहे मैं सबसे बड़ा हूँ

एक माली से हारो

अजी गूथ गूथ के गजरा बनायो

हे बलवा कीकर गुलज़ारो

रे नज़रिया तोसे लागी …”(वही,पृष्ठ संख्या-135)

इसी तरह इस गाने में लोहार ,दर्ज़ी आदि का भी ज़िक्र है ।ग़ौरतलब है कि हम यहाँ कानपुर नौटंकी शैली की विशेषताओं पर बात कर रहे हैं, जैसा कि हमें पता है की उस समय कानपुर एक औद्योगिक नगर के रूप में विकसित था और किसी भी औद्योगिक नगर में मज़दूरों का जमाव सामान्य बात है । नौटंकी के दर्शकों में से ज्यादातर मज़दूर प्रवासी ही हुआ करते थे।कुछ गाने उनको ध्यान में रखकर भी नौटंकियों में शामिल किए जाते थे,जैसे:

“नदी नारे ना जाओ शाम पाइयाँ पड़ूँ,”

नदी नारे गए तो जइबै करो

बीच धारा ना जाओ श्याम पाइयाँ पड़ूँ

नदी नारे…(वही,पृष्ठ संख्या-118)

यह गुलाब बाई द्वारा गाया गया बहुत मशहूर दादरा है , जिसे बाद में वहीदा रहमान की आवाज़ में भी रिकॉर्ड किया गया।

इस गीत में ‘श्याम’ रूपक है पति का वो पति जो पत्नी से दूर रहकर कमा रहा है या काम के सिलसिले में बाहर आता जाता रहता है , पत्नी उससे विनती कर रही है कि पति उसकी सौतन ना ले आए और इसके लिए वो बहुत से जतन भी कर रही है , और फिर वो कह रही है की अगर सौतन ले भी आए तो कम से कम उसे ना भुलाए। यह गीत उस समय के उत्तर- भारत की स्त्रियों की दशा को बखूबी  वर्णित करता है।क्या मज़दूर वर्ग की स्त्री और क्या सेठ , साहूकारों और सामंतों की बीवियाँ सबको यही चिंता सताए रहती थी की उसका ‘शाम’ किसी शाम उसकी सौत न ला बैठाए,एक बात जिसका ज़िक्र बहुत महत्वपूर्ण है कि- यह गाना गुलाब बाई ने स्वयं नहीं लिखा।

जब वहीदा रहमान की आवाज़ में इस दादरे को रिकॉर्ड किया गया तब इस गीत को  लेकर विवाद हुआ कि इसका कॉपीराइट तो गुलाब बाई के पास है,  बिना उनकी अनुमति के कैसे कोई इस गाने को रिकॉर्ड करके इसके कैसेट बेच सकता है। कुछ शुभचिंतकों नें गुलाब बाई से इसपर आपत्ति दर्ज कराने को कहा तो उन्होंने कहा-” ये तो बिरज के गीत हैं, इन्हें क्या तो कोई लिखेगा , क्या कोई धुन बनाएगा …। वो बृजवासिने ना होतीं, अरे वहीं जो ढोलक बजाय-बजाय के गाया करती हैं, जाने कब से गाती आ रही हैं। कितनी पीढ़ियों से … ये तो लोकगीत हैं…” (वही,पृष्ठ संख्या -138)

गुलाब बाई द्वारा कही गई यह बात इस और इशारा करती है कि उनके व्यक्तित्व में कितनी निश्छलता है , ठीक उन वनवासियों की तरह जिनसे एक अंग्रेज़ अफ़सर द्वारा फल मंगाए जाने पर उन्होंने टोकरी भर कर फल उन्हें  दिया और पैसे दिए जाने पर उन्होंने कहा “ पैसा किस बात का यह फल तो जंगल का है,” धरती माता का है और इसपर सभी का समान अधिकार है ।यही भारतीय लोक की सहज निश्छलता है इसी के दर्शन हमें रामचरित मानस के राम और केवट संवाद में होते हैं ,एकलव्य इसी निश्छलता का उदाहरण है। यहाँ  दूसरी बात जो गौर करने योग्य है,वह है नौटंकी का गहराई से लोकजीवन के साथ जुड़ाव ,इन नौटंकियों में लोक जीवन के लगभग सभी रंग देखने को मिलते हैं, इनमें प्रेम होता है , विरह होती है, वीरता के उद्घोष होते हैं ,शोक होता है , भक्ति होती है और हास्य तो भरपूर होता है।इन सब गुणों से युक्त नौटंकी यदि आमजन का पसंदीदा मनोरंजन बन जाए तो इसमें आश्चर्य कैसा,और यह कहना  भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इसमें लोकजीवन के इतने रंग सजाने का बहुत कुछ श्रेय लोक गीतों को जाता है ।

भारतीय लोक नें अपने अनुभव और अपने इतिहास को याद रखने का एक नायाब तरीक़ा ढूँढ निकाला है , ‘लोकगीत’, इन गीतों में ये अपने अनुभव पिरोते हैं और  समय के साथ वह इतिहास बन जाता है ,फिर अगली पीढ़ी उन्हें कथा की तरह याद रखती है और उसकी अगली पीढ़ियों के लिए यह गाथा हो जाती है ।जैसे हमारे सामने आल्हा, बिरहा और अंचलों में फैले तमाम भक्ति गीतों का उदाहरण उपलब्ध है।जब कोई विधा किसी समाज से इतनी गहराई के साथ जुड़ी हो तो उसका संरक्षण उस समाज की और उसका प्रतिनिधित्व कर रहे व्यक्तियों और संस्थाओं की ज़िम्मेदारी हो जाती है। आज बाजारवाद, वैश्वीकरण और सोशल मीडिया के इस दौर में नौटंकी और लोकगीत दोनों पर ख़तरे के बादल मंडरा रहे हैं और इनका संरक्षण बहुत आवश्यक हो चला है। यदि हम इन्हें नहीं बचा सके तो अपनी संस्कृति को खो देंगे ,और संस्कृति का खोना अस्तित्व का खो जाना है।

सहायक ग्रंथ सूची:

1 )’नौटंकी की मलिका गुलाब बाई’-दीप्ति प्रिया महरोत्रा,Penguin Books ,2023

पृष्ठ-72,118,133,135,138

2) ‘लोक नाट्य – नौटंकी :एक विवेचन’  – नन्दल हितैषी, राका प्रकाशन इलाहाबाद,उत्तर प्रदेश ,2018

3) ‘नौटंकी लोक-परंपरा और संघर्ष’ – ज्योतिष जोशी,सेतु प्रकाशन,सी-21,sector-65,नोएडा,उत्तर प्रदेश,2021

4)’ रंगदर्शन’ – नेमीचन्द जैन, राधाकृष्ण प्रकाशन,जी-17,जगतपुरी, नई दिल्ली ,1983

5) नौटंकी का उदय विकास और वर्तमान स्थिति- राम नारायण अग्रवाल

6)हिन्दी रंगमंच का इतिहास- डा.चंदूलाल दुबे, जवाहर पुस्तकालय ,मथुरा(उत्तर प्रदेश )

7)परफार्मेंस ट्रेडिशन इन इंडिया-सुरेश अवस्थी, नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली ,2001

8)’ग्राउंड्स फॉर प्ले-द नौटंकी थिएटर ऑफ़ नार्थ इंडिया’ – कैथेरिन हैंसन, मनोहर दिल्ली 1993

9) रंगपट- आभा गुप्ता ठाकुर (संपादक),सेतु प्रकाशन,प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट पटपड़गंज,नई दिल्ली (लेख:हिंदी कविता की वाचिक परंपरा और रंगमंच)

10)पारसी थिएटर-रणवीर सिंह,सेतु प्रकाशन सी-२१ ,सेक्टर-65 नोएडा , उत्तर प्रदेश, 2020

 

अमित
शोधार्थी
दिल्ली विश्वविद्यालय