प्रस्तावना –

     प्राचीन काल से ही नहीं बल्कि युगो-युगो से लोकसाहित्य् और पर्यावरण का गहरा संबंध रहा है, और यह एक दूसरे के पूरक है। इन दोनों का संबंध सदियों से स्थापित है और दिनों दिन यह और भी विस्तार होते जा रहे है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय साहित्य हो या पर्यावरण जब भी चर्चा की जाती है तो भारत की संस्कृति, लोक साहित्य और धर्म का विषय हमारे सामने खुद-ब-खुद उभरकर आ ही जाता है। इसका एक ही कारण है कि इनका आपसी में घनिष्ठ संबंध। इसलिए अगर आप इन किसी भी विषय पर अगर चर्चा करते है तो यह एक दूसरे के पूरक बनकर हमारे सामने आएंगे ही इसे हम नकार नहीं सकते।

     भारत में लोक साहित्य और पर्यावरण का संबंध आपको पूरे भारत में सभी राज्यों में भिन्न-भिन्न जाति जन-जातियों, धर्मों आदि में आपको इन दोनों का संबंध पूर्ण रुप से देखने को मिलेगा। इससे वंचित रह कर कोई भी व्यक्ति अपनी दैनिक कार्य हो या कोई विशेष कार्य वह अपनी कार्य की पूर्ति नहीं कर सकता। पर्यावरण का संबंध हर उस वस्तु जीव-जंतु प्रकृति से है जिसमें प्राण है। पर्यावरण का जिक्र आपको तब अधिक मात्रा में पूरा होने का पता चलेगा जब आप किसी धार्मिक स्थल पर उपस्थित हो।

     हम धरती को पृथ्वी या वसुधा भी कहते है, मानव जाति से जुडी है। वसुधैव कुटुम्बकम भारतीय संस्कृति का उदघोष है। अत: पृथ्वी का संरक्षण, मानव जाति का संरक्षण और पशु पक्षियों का संरक्षण समान रुप से आवश्यक है। उनके जीवन का संरक्षण होणा ही संसार है। सम्पूर्ण प्राणी जगत का एक लम्बा इतिहास है और इस इतिहास को जब हम देखते है तो पाते है कि पर्यावरण भी उतने ही प्राचीन काल से चला आ रहा है, जब से प्राणी जीवन का आरम्भ हुआ है।

प्राचीन वैदिक कालों में पर्यावरण का महत्व :

     ऋग्वैदिक काल में, ऋषियों ने वृक्षों को परमात्मा के विभिन्न गुणों का प्रतीक माना है। ऋग्वेद का एक पूरा स्त्रोत, वृक्षों की, मुख्यतया उनकी रोगमुक्त करने की विशेषताओं की प्रशंसा में रचा गया है। सबसे बढकर, यज्ञ सम्बन्धी उपकरणों को देवता कहा गया है। इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण बलि-स्तम्भ है, जिसकी प्रशंसा एक श्लोक में गाई गई बाद की संहिताओं में किया गया है।

विभिन्न धर्मों में पर्यावरण चेतना :

     हिंदू धर्म में लोग वृक्षों को ईश्वर के विभिन्न रुपों का निवास-स्थान भी मानते है। कूर्मपुराण (36 26) के अनुसार भगवान महेश्वर वट वृक्ष में निवास करते है। अन्य बहुत से वृक्षों को हिन्दू लोग एक या अनेक देवी-देवताओं से जोडते है। विविध प्रकार की वस्तुएँ जो वृक्ष से मिलती है, वे बहुत से धार्मिक-अनुष्ठान और उत्सव में प्रयुक्त होती है। उदाहरण के लिए, त्रिपत्री बेल शिव पर चढाया जाता है। साल वृक्ष में विष्णु का निवास माना जाता है। भवन निर्माण में साल की एक लकडी का उपयोग भी सुख-समृद्धि देने वाला माना जाता है। वामन पुराण के अनुसार कुछ वृक्षों को एक न एक विशेष देवी-देवताओं के अंग-विशेष से उत्पन्न कहा गया है। बाराह पुराण में वन-महोत्सव या वृक्षारोण समारोह का भी वर्णन है।

     इस्लाम धर्म में मुकद्दस कुरान शरीफ में कई जगहों पर कुदरत (प्रकृति ती हिफाजत (संरक्षण) और उसे सरसब्जी शादाब (हरा-भरा) रखने का जिक्र आया है। पैगम्बर मुहम्मद साहब प्रकृति के दुश्मनों से त्रस्त होकर मक्का से मदीने जाने के लिए विविश हो गये और जब वहाँ से इस्लाम धर्म का प्रचार करते हुए पुन: मक्का लौटे तो सबसे पहले अपने अनुयायियों से मुखातिब होकर फरमाया कि जब तुम मक्का में दाखिल हो तो पानी में जहर न घोलो, पेड न काटो ताकि इन्सानियत उसके साये से महरुम न हो जावे और गर्मी की तपिश से इन्सानों के जिस्म झुलस न जाये।

     सिख धर्म में भी इसी तरह वनों की महत्ता दिखती है। सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव जी ने कहा कि वन ही जीवनदायी शक्ति है, जल ही जनक है, विशाल पृथ्वी सब की जननी है। गुरु नानक देव जी के इन शब्दों में प्रकृति के प्रति, जीवनदागिनी शक्ति के प्रति, पृथ्वी पर हमारे सुख-समृद्धि के स्त्रोत के प्रति, आदर व्यक्त करने की भारतीय  परंपरा का सार निहित है। सृष्टि के अनंतकाल से हमने प्रकृति को सर्वोपरि माना है। भारतीय परंपरा में उस पर विजय पाने एवं जीत पर गर्वोवित करने का कोई स्थान कभी नही रहा है लकडहारे उस वृक्ष को मत काटो। उसकी एक शाखा का भी बाल बांका नहीं होना चाहिए। इस वृक्ष ने अपने यौवन काल में मुझे शरण दी, अब मै उसकी रक्षा करुंगा।

     इसाई धर्म में तुलसी का पौधा भारत में ही नही पश्चिमी देशों में भी प्रसिद्ध है। ईसाई लोग तुलसी को देवस्वरुप मानते है। ऐसी मान्यता है कि ईशा की कब्र पर यह पौधा उगा था। बाइबिल के अनुसार मनुष्य अपने मित्र (वृक्ष एवं वन्य पशुओं) के लिए प्राणों की आहुति दे दे, इससे बढा प्रेम का सबूत और क्या हो सकता है।  बाइबिल मे वृक्षों के विषय में अनेक सुन्दर कथन मिलते है जो कि लोकोक्ति के रुप में प्रसिद्ध है।

     यदि हम अन्य धर्मों की बात करें तो,बौद्ध धर्म में वनों की रक्षा को प्राथमिकता देने को कहा है। महात्मा बुद्ध के अनुसार वन प्रकृति की ऐसी जीती-जागती देन है, जिसमें प्राणियों के लिए अपार दया और परोपकारिता का आगार है। वन दूसरों के प्रति करुणा के स्त्रोत है एवं बदले में अपने लिए कुछ याचना नही करते। वे बडी उदारता से जीवनदायक पदार्थ भेंट करते है। इससे अधिक और क्या हो सकता है कि जो मनुष्य कुल्हाडी लेकर उसको काटने जाता है वे उसे भी सूर्य की गर्मी से बचाते है।

 

लोकसाहित्य में पर्यावरण और भारतीय संस्कृति :

     भारतीय संस्कृति में जिस पूजा-भाव का विकास हुआ उसमें उपयोगिता और पारलौकिकता का मेल है। हिन्दू वृक्षों और पौधों को विभिन्न देवी-देवताओं का परिचित रहे है और यह भी जानते है कि उनको अविवेक पूर्वक नष्ट करने का परिणाम प्रदूषण होगा अनेक पेड पौधों के आरोग्यवर्धक गुणों का महत्व समझा गया है तो दूसरे पौधों का धार्मिक या पारलौकिक-देवी शक्ति के निवास के रुप में। अनेक परम्परावादी हिन्दुओं के घरों के भीतर तुलसी का पौधा रहता है और बाहर नीम का वृक्ष। उनके उद्यान में केला, आँवला, पीपल, वट और कभी कभी गूलर के वृक्ष होते है। स्त्रियाँ इस वृक्ष की पूजा करती है और त्योहार के अवसर पर पूरा परिवार पूजा करता है। भारतीय संस्कृति का प्रादुर्भाव उतुंग पर्वतश्रेणियाँ, वन प्रान्तों, हरित हिमाच्छादित घाटियों, वन प्रान्तों हरित हिमाच्छादित घाटियों, सुरभ्य नदियों के स्वच्छ तटों एवं विशाल सागर के वनाच्छादित प्रदेशों से हुआ है। मन्त्रद्रष्ट्रा ऋषियों एवं साधु-सन्तों ने अपने जीवनोत्कर्ष एवं जनकल्याण की कामना से सतत चिन्तन एवं मनन कर लोक कल्याण की कामना की है। प्रकृति को ईश्वर मानकर इसकी पूजा, अर्चना एवं स्तुति का विधान बनाया है। इस प्रकार से कतिपय मंत्र वेदों, उपनिषदों एवं धर्मग्रन्थों में मिलते है।

निष्कर्ष :

     इस तरह उपर्युक्त स्पष्ट् रुप में कहा जा सकता है कि लोकसाहित्य में मानव संस्कृति और पर्यावरण का गहरा संबंध रहा है। इस प्रकार हम देखते है कि हमारे लोक-साहित्य परम्परा में पर्यावरण चेतना के भाव का और वनों का हमारे जीवन से शाश्वत सम्बन्ध रहा है। परंतु आज विज्ञान के युग में जहाँ एक और मनुष्य को लाभ प्राप्त हुए है वही दूसरी-ओर वनों के अंधाधुंध कटान व शहरीकरण में परिवर्तित होते वनों से पर्यावरण अस्थिरता का सामना करना पड रहा है। यदि यही हाल रहा तो एक दिन हमें वृक्षों को देख-पाना भी दुर्लभ हो जायेगा। और यदि ऐसा हुआ तो मान जाति का खुद का अस्तित्व भी खतरे में पड जायेगा। अत: हमें पर्यावरण की शुद्धता पर ध्यान देना ही होगा। निम्न वृक्ष व वनस्पतियों पर्यावरण को संतुलित रखने में लाभकारी सिद्ध हो सकती है। अत: इन्हे उगाने व संरित करने हेतु कदम उठाये जाने चाहिए।

     शुद्ध हवा प्रदान करने वाले वृक्ष – बट, पीपल, नीम, पाकड, जामुन, मोलसरी एवं पथ्थशीरी वृक्ष, अशोक कुटज, देवदारु,वरुण व बहंडा वृक्ष।

     प्रदूषण को रोकना पादप – नीम, फरहद, मौलसरी, कपूर, तुलसी, भरश गन्धतृण, सीताबनी, व नैरपती। इनके रोपण एवं धूपन से प्रदूषणमें लाभ होता है। जटामास, तगर, मुरामासी, वचा, कूठ, गुग्गुलु सर्ज, चम्पा, नागरमोथा, कर्पूर व तुलसी आदि। पतियाँ वायु में मिले प्रदूषण पदार्थों के सूक्ष्मकणों को सोख लेती है। इसलिए वृक्षारोपण का महत्व है। पत्थर के कोयलों से उत्पन्न प्रदूषण रोकने के लिये जंगल जलेबी का रोपण लाभदायक है।

     इस तरह आइये प्रदूषणमुक्त वातावरण का निर्माण करने एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए हम सभी एकजुट होकर कार्य करें। इस प्रकार वर्तमान समय में समाज, गांव, शहर एवं शासन स्तर तक सभी ने पेडों को लगाना और उसका रक्षण करना अपना परम कर्तव्य समझकर कार्य किया तो निश्चितही पेड में ही हमें परमात्मा का अस्तित्व प्राप्त हो सकता है। इसलिए कहा गया है कि जल ही जीवन है।

संदर्भ ग्रंथ :

1) लोकसाहित्य और भारतीय संस्कृति खंड-2 – देवेंद्र सत्यार्थी।

2)  लोकसाहित्य की भूमिका – डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी।

3) लोकसाहित्य की अवधारणा व क्षेत्र – डॉ. उत्तम पटेल।

4) वनों का धार्मिक एवं संस्कृतिक महत्व – डी. एन. तिवारी।

5) लोकसाहित्य् में वनस्पति विज्ञान – सुधांशु कुमार।

6) धरती हांफ रही है – बिभूति भूषण बंडोपाध्याय।

 

प्रा.डॉ.सादिकअली हबीबसाब शेख
(हिन्दी विभाग प्रमुख)
कर्मयोगी तुळशीराम पवार महाविद्यालय, हडोळती
ता. अहमदपूर जि. लातूर
                     Email :  drsadikshaikh73@gmail.com