सारांश:-
भारतीय लोक संस्कृति में विविध जाति, धर्म एवं समाज के प्रति लोक साहित्य पाया जाता है। मराठी लोक साहित्य, हिंदी लोक साहित्य, अहिराणी लोक साहित्य, राजस्थानी लोक साहित्य इस प्रकार से बंजारा लोक साहित्य भी बंजारा समाज के प्रति पाया जाता है। भारत में फली-फूली बंजारा संस्कृति बंजारा समाज की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। बंजारा समुदाय को विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे लमानी, बंजारा, गोर बंजारा, गवारिया, बालदिया आदि। बंजारा समाज की भाषा को गोरबोली, लंबाडी भाषा, लमानी भाषा एवं गोरमाटी भाषा आदि नामों से उच्चारित किया जाता है, परंतु यह मूलतः एक ही बोली भाषा है।
बंजारा लोक साहित्य में लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, मुहावरे, पहेलियाँ, लोकनाट्य और धार्मिक भजन मुख्य रूप से शामिल हैं। इन रचनाओं के माध्यम से बंजारा समाज की पारिवारिक संरचना, सामाजिक एकता, धार्मिक विश्वास, अंधविश्वास, टांडा व्यवस्था, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, प्रकृति के प्रति प्रेम तथा ऐतिहासिक घटनाओं का चित्र अभिव्यक्त होता है। बंजारा लोक साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान, नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक एकता बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
भाषावैज्ञानिक अध्ययन के अंतर्गत बंजारा लोक साहित्य और बंजारा भाषा का ध्वन्यात्मक, वाक्य-विन्यासात्मक, रूपात्मक तथा अर्थगत समाज-भाषा विश्लेषण करना है। बंजारा लोक साहित्य का भाषावैज्ञानिक अध्ययन करने से उसकी सामाजिक संरचना, सामाजिक एवं भाषिक विकास और सांस्कृतिक महत्व को स्पष्ट किया जा सकता है।
बंजारा लोक साहित्य लिखित एवं मौखिक रूप में विद्यमान है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा के लोक साहित्य का भाषावैज्ञानिक अध्ययन केवल बंजारा भाषा की संरचना को समझने का प्रयास नहीं है, बल्कि संपूर्ण बंजारा समुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक चेतना एवं ऐतिहासिक अनुभव को समझने का माध्यम भी है। इस प्रकार बंजारा लोक साहित्य, लोक संस्कृति एवं भाषा विज्ञान के स्वरूप में बंजारा भाषा का योगदान बंजारा समाज की एकजुटता को टिकाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में बंजारा लोक साहित्य का भाषावैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण किया गया है तथा भाषा संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर बल देने का प्रयास किया गया है।
बीज शब्द: –
बंजारा समाज,गोरबोली,भाषाविज्ञान,लोकगीत,लोककथा,लोकगाथा,मोखिक साहित्य
प्रस्तावना:-
मानव जीवन से ही लोक साहित्य का उदय मौखिक रूप से हुआ है।दस्तावेजीकरण के माध्यम से देखा जाए तो भारतीय लोक साहित्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है। भारतीय जनजातियाँ एवं समुदायों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को लोक परंपराओं के माध्यम से सुरक्षित रखा है। गोर बंजारा समाज को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है, जिनमें लमानी, गोर बंजारा, बंजारा, गोरमाटी आदि नाम प्रमुख हैं। इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से पहचाने जाने के बावजूद अपनी समृद्ध परंपरा के कारण बंजारा समाज की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी हुई है।
बंजारा लोक साहित्य केवल मनोरंजन का साधन न होकर सामाजिक संरचना, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक मूल्य एवं आर्थिक जीवन का प्रतिबिंब है। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से यह अध्ययन भाषा के जीवंत और प्राकृतिक रूप का विश्लेषण करता है तथा सामाजिक एकजुटता की मुख्य भाषा गोर बोली का अध्ययन करता है।
२) बंजारा समुदाय और भाषा का परिचय :-
बंजारा समुदाय भारत की एक प्रमुख घुमंतू जनजाति है। इस समुदाय को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। बंजारा समाज गाँव से दूर टांडा बसाकर रहता है, जिसका नेतृत्व नायक करता है। विवाह, त्योहार एवं सामाजिक निर्णय पंचायत के माध्यम से संपन्न होते हैं। इस संदर्भ में डॉ.बी.एन.भालेराव का मत है कि बंजारा समुदाय अस्थिर रूप से जीवन जीने वाला था, परंतु आज यह लगभग जंगलों और पहाड़ियों में प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थायित्व प्राप्त कर जीवन-यापन करने वाली जाति है। विभिन्न प्रांतों में इसे पृथक-पृथक नामों से पहचाना जाता है, जैसे बंजारा, लभान, लभानी, लमानी, लंबाडा, गोर बंजारा,बालदिया बंजारा आदि। इस प्रकार बंजारा समुदाय भारतीय जनजातियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बंजारा समुदाय की भाषा को गोर बोली, लमानी, बंजारी और गोरमाटी नामों से जाना जाता है। मौखिक परंपरा प्रधान इस भाषा के लोक साहित्य के दस्तावेजीकरण में क्षेत्रीय लिपियों का योगदान रहा है। बंजारा भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि नहीं है, इसी कारण इसे देवनागरी, तेलुगु, कन्नड़ आदि लिपियों में लिखा जाता है।
गोर बोली बंजारा समाज की प्रमुख बोली है। गोर बोली संपूर्ण भारत में बसे लगभग 8 से 10 करोड़ बंजारों की बोली है। भारत की घुमंतू और आदिवासी परंपरा से जुड़े बंजारा समाज की इस बोली को गोर बोली, गोरमाटी, लंबाडा, लमानी, सुगाली, बंजारा आदि नामों से भी जाना जाता है।
३) बंजारा लोक साहित्य की प्रमुख विधाएँ :-
बंजारा लोक साहित्य में लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, कहावतें, मुहावरे एवं पहेलियाँ प्रमुख विधाएँ मानी जाती हैं।
३.१) लोकगीत:-
बंजारा लोक साहित्य की प्रमुख एवं मुख्य विधा लोकगीत है। बंजारा समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाए जाने वाले गीत गोर बोली के माध्यम से अपने रीति-रिवाज, परंपरागत त्योहार, सुख-दुख के सभी अवसरों पर उत्साहपूर्वक प्रस्तुत किए जाते हैं। इस संदर्भ में डॉ. गणपत राठोड कहते हैं— “बंजारा जनजाति के सभी त्योहारों में जो गीत गाए जाते हैं, वे भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण होते हैं। प्रत्येक गीत व्यापकता का संदेश देकर जाता है। अपनी विशेष संस्कृति का परिचय इन विविधता से भरे गीतों के माध्यम से हो जाता है। बंजारों के बहुमूल्य गीत सुख-दुख, जीवन-मृत्यु आदि प्रसंगों के साथ मुखरित हो जाते हैं।”बंजारा समुदाय की सहज रूप से हृदय से निकली गोर बोली की मधुर वाणी ही बंजारा लोकगीत है। गाँव, जंगल, पहाड़ों और टांडा में बसे लोगों के मुख से प्रवाहित होने वाले गीतों को ही लोकगीत कहा जाता है।
३.२) लोककथा :-
भारतीय समाज में पौराणिक कथाएँ, प्रकृति से संबंधित पशु-पक्षी, राजा-प्रजा आदि विषयों पर आधारित सैकड़ों कथाएँ कहना और सुनना बंजारा समाज की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। लोककथा के संदर्भ में डॉ. देवीदास यादव लिखते हैं—“बंजारा समाज में कथा को ‘सारी’ कहते हैं। बंजारा लोक साहित्य में लोककथाओं का विशेष महत्व है। इस समाज में लोककथा की प्राचीन परंपरा है। लोककथा उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। सदियों से विभिन्न प्रकार की सैकड़ों लोककथाएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से पहुँचने में बंजारों ने सफलता पाई है।”
बंजारा समाज में छोटे बच्चों से लेकर दादा-दादी तक लोककथाएँ सुनाई और सुनी जाती हैं। बुजुर्ग हमेशा बच्चों को अनेक लोककथाएँ सुनाते रहते हैं। लोककथा को बंजारा समाज में ‘साकी’ कहा जाता है। साकी कोई कहानी होती है जिसे सुनने वाले उत्साहपूर्वक सुनते हैं। इन कथाओं में पहचान, नियति और जीवन के अनेक पहलुओं की झलक मिलती है। उदाहरणस्वरूप, एक राजा और एक राक्षस की साकी में राजा की बेटी का विवाह राक्षस से होता है, किंतु बाद में राजा का बेटा पंचायत बिठाकर राक्षस को धमकाता है और अपनी बहन को घर वापस लाता है। इस प्रकार बंजारा समाज की लोककथाएँ विविध प्रसंगों से भरी पड़ी हैं।
३.३) लोकगाथा :-
लोकगाथा को बंजारा समाज में ‘लड़ी’ कहा जाता है। इसमें समाज की छुपी हुई ऐतिहासिक घटनाएँ एवं महापुरुषों की सत्यता का वर्णन किया जाता है। सेवालालेर लड़ी, संकर सामकार लड़ी, चिंगारेर लड़ी, गीता भैया लड़ी, सत्य अनसूया लड़ी आदि अनेक लोकगाथाएँ समाज की सामाजिक दशा एवं सामाजिक एकता को बनाए रखने में सहायक होती हैं।
लोकगाथाओं के माध्यम से बंजारा समाज ऐतिहासिक प्रेरणा लेकर भविष्य में अच्छे कार्य करने हेतु समाज को प्रभावित करता है। लड़ी गाने वाले को ‘गांवन्या’ कहा जाता है। लड़ी गायन करने वाले व्यक्ति को ‘गवन्य’ कहते हैं। इस संदर्भ में डॉ. देवदास जाधव का मत है—
“आंचल विशेष की बोली भाषा के माध्यम से गीतों के आवरण से विस्तृत कथावस्तु की अभिव्यक्ति लोकगाथा कहलाती है। इसमें गीत और कथा का सुंदर समन्वय होता है। लोकगाथा में चित्रात्मकता की प्रधानता होती है। लोकगायक अपने चरित्र-नायक का समग्र जीवन संगीत तत्व के समान प्रवाह में चित्रित करता है। यदि लोकगीतों को मुक्तक कहा जाए तो लोकगाथा को खंडकाव्य तथा महाकाव्य कहना होगा।”
महाकाव्य एवं खंडकाव्य इसलिए कहा जाता है क्योंकि संपूर्ण सेवालाल महाराज का जीवन और उनके कार्य इस लड़ी में समाहित होते हैं। ‘पृथ्वीराज रासो’ जो पृथ्वीराज चौहान पर लिखा गया है, उसी प्रकार किसी राजा अथवा महापुरुष की लड़ी में वर्णनात्मक उल्लेख किया जाता है। बंजारा समाज का गौरवगान भी लड़ी के माध्यम से होता रहता है।
३.४) कहावतें, मुहावरे और पहेलियाँ :-
कहावतें, जिन्हें बंजारा समाज में ‘कहानी’ कहा जाता है, काल्पनिक स्वरूप देकर बनाई जाती हैं। कहानियाँ बनाकर बंजारा समाज में लोग मनमौजी होकर हँसते-सुनते रहते हैं। कहावतें भी लोक साहित्य का एक अभिन्न अंग हैं। मुहावरे बंजारा समाज में बहुत प्रचलित हैं। जैसे—
‘साटाम सोटा कोणी पटकनु’ अर्थात एकजुट होकर काम करते समय झगड़ा नहीं करना।
‘आकीम आँसू मुंडेम कोळ’ अर्थात न सुखी रहना, न दुःखी होना।
इस प्रकार अनेक मुहावरे बंजारा लोक साहित्य की मौखिक परंपरा में मिलते हैं।
पहेलियाँ भी बंजारा समाज में विशेष स्थान रखती हैं। इन्हें एक व्यक्ति पूछता है और दूसरा हल करता है। जैसे—
‘नानकिसी डबलीम तोताबाई नाचरी’ अर्थात छोटी-सी डिब्बी में तोताबाई नाच रही है। इसका उत्तर है—जीभ।
‘फुल पड धाणीरो, गळ जाव घाणीरो, कुट खाव धणीरो’ अर्थात फूल पड़ता है धनी का, बरसता है घनी का, मार खाती है पति का। इसका उत्तर है—महुआ की शराब।
इस प्रकार कहावतें, मुहावरे और पहेलियाँ बंजारा समाज के मौखिक एवं आधुनिक लिखित लोक साहित्य के मुख्य अंग माने जाते हैं।
४) ध्वन्यात्मक एवं ध्वनिवैज्ञानिक अध्ययन :-
सभी भाषाओं पर वहाँ की क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव दिखाई देता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं और उन भाषाओं का प्रभाव बंजारा भाषा पर भी देखा जा सकता है। किंतु उस भाषा की टोन में कोई बदलाव नहीं होता। बंजारा समाज की भाषा गोर बोली का ध्वन्यात्मक एवं ध्वनिवैज्ञानिक अध्ययन करते समय बंजारा बोली को देवनागरी लिपि तथा क्षेत्रीय भाषाओं की लिपियों में लिखा जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि गोर बोली भाषा की कोई स्वतंत्र लिपि नहीं है।
उच्चारण के आधार पर स्वर :-
स्वर उन वर्णों को कहते हैं जिनका उच्चारण बोलते समय स्वतंत्रता से होता है और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक होते हैं। बंजारा बोली के ध्वन्यात्मक रूप से स्वर प्रणाली में अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ इस प्रकार के स्वर पाए जाते हैं। इसमें ऋ का स्थान लुप्त दिखाई देता है।
उच्चारण के आधार पर व्यंजन :-
व्यंजन वे वर्ण होते हैं जो बिना स्वर की सहायता के नहीं बोले जा सकते।
१) कंठ्य – क, ख, ग, घ
२) तालव्य – च, छ, ज, झ
३) मूर्धन्य – ट, ठ, ड, ढ, ण
४) दन्त्य – त, थ, द, ध, न
५) ओष्ठ्य – प, फ, ब, भ, म
इस प्रकार व्यंजन पाए जाते हैं।
ध्वनि परिवर्तन :-
ध्वनि परिवर्तन में बंजारा (गोर बोली) में ‘न’ की जगह अनेक स्थानों पर ‘ण’ का प्रयोग होता है। जैसे—
हिंदी गोर बोली
पानी पाणी
बाल बाळ
पालना पाळणो
समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन :-
बंजारा समाज की भाषा गोर बोली का भाषावैज्ञानिक अध्ययन करते समय यह स्पष्ट होता है कि समाज और उसकी बोली-भाषा का गहरा संबंध है। बिना गोर बोली भाषा के व्यक्ति की सामाजिक पहचान करना कठिन हो जाता है। कुछ बंजारा बोली के शब्द ऐसे हैं जो किसी अन्य भाषा में नहीं मिलते, केवल इसी बोली में प्रचलित हैं। समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन करते समय भाषा और समाज के संबंध का स्तर विश्लेषित किया जाता है। इस संदर्भ में डॉ. अंबादास देशमुख कहते हैं— “समाज-भाषाविज्ञान में भाषा और समाज का संबंध तथा समाज के विभिन्न स्तरों पर प्रयुक्त भाषा की ध्वनि, रूप, वाक्य और अर्थ आदि की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।”
इस प्रकार यदि हम बंजारा भाषा का स्तर देखें तो गोर बोली केवल समाज द्वारा समाज में बोली जाने वाली बोली है। इसकी स्वतंत्र लिपि नहीं होने के कारण इसे देवनागरी में लिखा जाता है। ध्वनि, रूप, वाक्य और अर्थ का अध्ययन मौखिक एवं लोक साहित्य में स्थित बंजारा भाषा पर क्षेत्रीय अन्य भाषाओं के प्रभाव से क्षेत्रानुसार बदलता रहता है।
तुलनात्मक अध्ययन :-
तुलनात्मक अध्ययन का अर्थ है एक भाषा की तुलना दूसरी भाषा से करना अथवा किसी भाषा पर अन्य भाषाओं के प्रभाव का विश्लेषण करना। गोर बोली भाषा की तुलना हम भारत में स्थित सभी भाषाओं से कर सकते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि बंजारा समाज संपूर्ण भारत में निवास करता है। जहाँ-जहाँ बंजारा समाज रहता है, वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव गोर बोली पर क्षेत्रानुसार भिन्न-भिन्न रूप में दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप, महाराष्ट्र में मराठी और हिंदी का प्रभाव, जबकि तेलंगाना में तेलुगु भाषा का प्रभाव देखा जा सकता है।
तुलनात्मक अध्ययन करने वाले व्यक्ति को बंजारा भाषा तथा तुलनीय भाषा दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है। बंजारा भाषा और अन्य भाषाओं की ध्वनि, शब्द, वाक्य, अर्थ, रचना और व्याकरण की तुलना करके भाषाओं के संबंध को पहचाना जा सकता है। इस संदर्भ में डॉ. सुभाष राठोड का मत है— “बंजारा समाज प्राचीन काल से भारत के विभिन्न भागों में बसा हुआ है। आज भी यह समाज भारत के कोने-कोने में दिखाई देता है। इसी कारण इस समाज की बोली भाषा—बंजारी या लमानी—का संबंध भारत की अन्य भाषाओं के साथ दिखाई देता है। लमानी भाषा के हर स्तर पर भारतीय भाषाओं के प्रभाव को देखा जा सकता है।” इस प्रकार भारत की भाषाओं के साथ बंजारा बोली का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
ऐतिहासिक अध्ययन :-
मुख्य रूप से बंजारा बोली की उत्पत्ति के संदर्भ में भिमानी पुत्र मोहन गाणुजी नायक का मत है— “बोली म्हणजे सार्थ, एका पिढीकडून दुसऱ्या पिढीकडे सुपूर्द केली जाणारी धावण्यांतर गुणधर्म असलेली समाजमान्य सावनियम व्यवस्था होय. भाषा व्यवस्थेचा डोलारा हा मुख्यतः ध्वनीच्या साठ्यावर उभा असल्याचे अभ्यासक मान्य करतात. भाषा ही मानवाला परंपरेने मिळालेली नैसर्गिक देणगी होय।” अर्थात, लिखित भाषा नहीं है, बोली एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पारंपरिक माध्यम से ध्वनियों के द्वारा बंजारा समाज की नैसर्गिक देन है। इसका अर्थ यह है कि इस बोली की उत्पत्ति समाज की उत्पत्ति के साथ हुई है।
बंजारा लोक साहित्य को ध्यान में रखकर ऐतिहासिक भाषा का अध्ययन करते हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति के प्रति गाए जाने वाले गीत “वड फुनदी मारे मोहनारो देश” जैसे प्राचीन गीतों से लेकर भारत की स्वतंत्रता के गीतों और आधुनिक लोक साहित्य तक, बंजारा भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन करते समय भाषा के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखना पड़ता है।
प्राचीन समय के शब्द जैसे ‘याडी’ शब्द का स्वरूप आज ‘आई मम्मी’ में बदलता दिखाई देता है। ऐसे अनेक शब्दों पर अन्य भाषाओं का प्रभाव भी देखा जा सकता है, जो बंजारा भाषा में समाहित हो गए हैं।
भाषा संरक्षण की आवश्यकता :-
बंजारा संस्कृति, सामाजिक एकता और सामाजिक अस्तित्व को बनाए रखने तथा अपनी पहचान सुरक्षित रखने के लिए बंजारा भाषा का संरक्षण आवश्यक है। इस संदर्भ में कामता प्रसाद गुरु अपनी हिंदी व्याकरण में लिखते हैं— “भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्ट रूप से समझ सकता है। मनुष्य के कार्य उसके विचारों से उत्पन्न होते हैं और इन कार्यों में दूसरों की सहायता अथवा संपत्ति प्राप्त करने के लिए उसे अपने विचार दूसरों पर प्रकट करने पड़ते हैं। जगत का अधिकांश व्यवहार बोलचाल अथवा लिखित रूप से चलता है, इसलिए भाषा जगत का मूल है।” ठीक इसी विधान की तरह गोर बोली बंजारा समाज की मूल है।
गोर बोली भाषा बंजारा लोगों की सामाजिकता, परंपरागतता और विचार-विनिमय से समाज को जोड़ने का कार्य करती है। “पारंपरिक सहयोग, संपर्क और विचार-विनिमय की आकांक्षा ने ही भाषा का विकास किया है। भाषा व्यक्ति और समाज को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है।”
इस प्रकार बंजारा समाज के विचार-विनिमय और व्यक्ति-समाज को जोड़ने का मुख्य कार्य गोर बोली भाषा करती है।
गोर बोली भाषा को सुरक्षित रखने के संदर्भ में मोहन गुणुजी नायक कहते हैं— “गोरमाटी बोलीभाषा ही गावंढळ लोकगणाची भाषा नसून ती एक वाङ्मयीन दृष्ट्या प्रौढ असलेल्या गोरमाटी गण समाजाची शास्त्रीय भाषा असल्याचा पुरावा गोर याडीने आजतागायत आपल्या मौखिक परंपरेने जपून ठेवलेले आहे।” इस प्रकार बंजारा की बोली भाषा मौखिक परंपरा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने समाज का अस्तित्व एवं सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी है। आगे भी बंजारा समाज का संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने हेतु बंजारा बोली भाषा का संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
निष्कर्ष :-
बंजारा लोक साहित्य के भाषावैज्ञानिक अध्ययन में संपूर्ण गोर बंजारा समाज और उसे संगठित रखने वाली गोर बोली का परिचय देते हुए बंजारा लोक साहित्य के दृष्टिकोण के मुख्य पहलुओं—लोकगीत, लोककथाएँ, लोकगाथाएँ, कहावतें, मुहावरे, पहेलियाँ आदि—पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
गोर बोली समाज की भाषा मौखिक रूप में ही प्रचलित है। फिर भी स्वर, व्यंजन और ध्वनि के माध्यम से समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन कर भारतीय क्षेत्रों में बसे बंजारा समाज और उनकी भाषा का तुलनात्मक विश्लेषण किया जा सकता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनका प्रभाव बंजारा भाषा पर भी पड़ता है।
प्राचीन काल से ही बंजारा समाज की उत्पत्ति के साथ गोर बोली की शुरुआत हुई होगी। हड़प्पा संस्कृति से लेकर आधुनिक काल तक बंजारा समाज के मौखिक लोकगीतों और शब्दों के माध्यम से ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान को समझा जा सकता है। भाषा संरक्षण की आवश्यकता समाज एवं सांस्कृतिक अस्तित्व हेतु अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार बंजारा भाषा का अध्ययन किया गया है।
संदर्भ सूची :-
१) जनजातियों की बोली, समाज और संस्कृति – डॉ. वी. एन. भालेराव, पृष्ठ क्र. ३७
२) घुमंतू जनजातियों का संस्कृत अध्ययन – डॉ. गणपत राठोड, पृष्ठ क्र. ६३
३) बंजारा लोक साहित्य : स्वरूप और संवेदन – डॉ. देवदास जाधव, पृष्ठ क्र. १६४
४) बंजारा लोक साहित्य : स्वरूप और संवेदन – डॉ. देवदास जाधव, पृष्ठ क्र. १४३
५) भाषा विज्ञान के अधुनातन आयाम एवं हिंदी भाषा – डॉ. अंबादास देशमुख, पृष्ठ क्र. ७०
६) लमानी बोली भाषा का समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन – डॉ. सुभाष राठोड, पृष्ठ क्र. ६२
७) गोरमाटी बोली भाषेचे सामाजिक आविष्कार आणि लोकजीवन – भीमणी पुत्र मोहन गाणुजी नायक, पृष्ठ क्र. २४
८) हिंदी व्याकरण – कामता प्रसाद गुरु, पृष्ठ क्र. १७
९) भाषा विज्ञान के अधुनातन आयाम एवं हिंदी भाषा – डॉ. अंबादास देशमुख, पृष्ठ क्र. ३५
१०) गोरमाटी बोलीभाषा : वाङ्मय व कलांचे स्वातंत्र्य सौंदर्यशास्त्र – मोहन गणुजी नायक, पृष्ठ क्र. ८७
Research scholar:- जेटालाल नामदेव राठौड़
Research Guide:- डॉ. एस. के. मोहम्मद शाकिर एस. के. बाशिर
Research Center:- Ramkrishna more art’s commerce and science
Mail-id:- rathodjetalal98@gmail.Com
Mail-id:- shakir.shaikh@poonacollege.edu.in






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