भारतीय साहित्य ही नहीं अपितु विश्व साहित्य पर भी महात्मा गांधीजी के विचारों का गेहरा प्रभाव दृष्टिकोचर होता है l महात्मा गांधी के दर्शनशास्त्र का आकर्षण सारे विश्व साहित्य मे प्राप्त होता है l सत्य अहिंसा मानवतावाद सहिष्णुता समन्वयवाद इन तत्त्वों के आधार पर जीवन व्यतित करने वाले महात्मा गांधी जी ने संपूर्ण भारत वर्ष को अपने इन अलौकिक तत्त्वों से प्रभावित किया था l परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य की सभी विधाओं में महात्मा गांधी के दर्शन शास्त्र के चिंतन का प्रभाव प्रतिबिंबित होता है l हिंदी साहित्य मे गांधी और गांधी में साहित्य यह विशेष समीकरण माना जाता है l आज भारत के साहित्य पर ही नही बल की विश्व की सभी भाषाओं के साहित्य पर गांधीवाद के विचारो का प्रभाव परिलक्षित होता है l
हिंदी साहित्य की एक भी ऐसी विधा नहीं हैं ,जिसमे गांधीवाद एवं गांधी विचारों का दर्शन न होता हो l कविता,कहानी,उपन्यास, नाटक,निबंध,एकांकी आदि हिंदी की सभी विधाओं को गांधीवादी विचारधाराने प्रभावित किया है l ललित निबंधकार विवेकी राय जी का ‘ लौटकर देखना’ इस कविता संग्रह में ‘पूज्य बापू के इर्द- गिर्द’ इस कविता में महात्मा गांधी जी के त्याग,बलिदान का अप्रतिम चित्रण प्राप्त होता है l
हिंदी साहित्य की विधाओं का जब हम अवलोकन करते है तो गांधीवाद के समृद्ध विचारों का गहरा प्रभाव हमें हिंदी साहित्य पर प्राप्त होता है l बिना गांधीवादी विचारों के हिंदी साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती l भारतीय जनमानस मे गांधीवाद और गांधी विचार रचता बसता है l ऐसा कहना अतिशय नही होगा की भारतीय हिंदी साहित्य की नीव में गांधीवाद एवं गांधी विचारों का समृद्ध योगदान है l
हिंदी साहित्य के ललित निबंध का बगिया महात्मा गांधी जी के विचारों के लालित्य से ही पनपा है l हिंदी ललित निबंध साहित्य मे गांधी विचारों के अलग – अलग रंग के फूल खिले मिलते है l जो आज आधुनिक युग में भी गांधीवादी विचारों पर चलने की हमे प्रेरणा देते है l
वास्तव में गांधीवाद कोई राजनीतिक वाद नहीं है l यह तो नैतिक जीवन दर्शन है , जो व्यक्ती और समस्ती का नियमन करता है l गांधीवाद हर व्यक्ति के अंतर्मन की पूजा है l गांधीवाद सर्वोदय,नारा,वाद,पंथ न होकर स्वतंत्रता एवं आजादी का साध्य है l गांधीवाद के संदर्भ में डॉ. विवेकी राय अपने आस्था और चिंतन इस निबंध में लिखते है “गांधीवाद मे राष्ट्रीयता एक बौद्धिक व्याख्या नहीं है, वह सात्विक पूजा है l जिसकी कल्पना में स्वराज्य ,भौतिक सुख- सुविधाओ की प्राप्ती का साधन मात्र नहीं है l वह अंतरिक अध्यात्मिक वैभव का प्रस्तोता भी है l” 1
महात्मा गांधी ने अपने संपूर्ण जीवन में अपने कर्म कार्य से मानव मुक्ती का संदेश दिया है l महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन का प्रयोजन मानव की मुक्ती को मानते थे l मुक्ती केवल अंग्रेजों के शासन से नहीं बल्कि मन के जो आंतरिक शत्रूओं से जैसे काम, क्रोध,मद,मोह, द्वेष आदि मनोविकृतीयों के बंधन से बापू समस्त मानव जाति को मुक्त करना चाहते थे l किंतु लोग उनके इस बात को समझ नहीं पाए l डॉ. विवेकी राय अपने ललित निबंध में इस संदर्भ में लिखते है – “लोग गांधी जी के विचारों को कठोर,कष्टदायक मानकर द्रवित चकित हो रहे है उसे ये बूढा आनंद कहता है l इसमें क्या आनंद है l इस प्रकार ठंडे फर्ज पर एक मामुली चादर ओढकर बैठे रहने में l” 2
श्रद्धेय बापू ने अपने जीवनभर जिन जीवन मूल्यों एवं नैतिक मूल्यों की स्थापना अपने स्वयं के जीवन में की थी,उन्ही जीवनमूल्यों को भारतीयों ने अपने जीवन में अत्याधिक आत्मीयता से उन्हे अपनाया था l किंतु आज आधुनिक तकनीकी युग में उन जीवन मूल्यों का ऱ्हास होता हुआ दिखाई देता है l स्वातंत्र्योत्तर काल में गिरते नैतिक मूल्यों से दुःखी होते हुए डॉ. विवेकी राय अपने निबंध मे लिखते है – “यह सोचकर ग्लानी हो रही है कि जिस युग मे गांधी जैसा महामानव पैदा हुआ उस युग का आदमी कैसे हीन – का – हीन ही रह गया l भारत में स्वराज्य होते ही उनकी सारी शिक्षाएं भुला कर लोग स्वार्थ के मानस पर गिद्द की भाती टूट पडे l आज तो गांधी बस जैसे बोलने के लिए रहे हैं l आचार,व्यवहार, रीति और नीति सब पर से गांधी की छाया जैसे हटती चली जा रही है l” 3
ललित निबंधकार डॉ. विवेकी राय गांधीवादी चिंतकों में अग्रणी रहे हैं l उनका ललित साहित्य गांधी जी के विचारों से प्रभावी था l डॉ. राय मानते थे की गांधी जी के विचारों में भारतीयताका एवं भारतीय संस्कृति का वास है l किंतु आजादी के बाद गांधी विचारों का जिस शिघ्रता से विस्मरण हो रहा है , उस पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. विवेकी राय लिखते है – “क्या हो गया युग को ? क्या बापू के पावन पथ की अब इस देश को कोई आवश्यकता नही रह गई ? क्या सचमुच हम उन्हें भूलते जा रहे है ? उद्योग,मशीन,विद्युत विविध भौतिक विज्ञान और अंतरिक्ष युग की नव्य अवधारणा के नक्कार खाने में सत्य,अहिंसा आदि पर आधारित गृह उद्योग,स्वावलंबन, रचनात्मक कार्य और ग्राम सुधार आदि के स्वर यदि बंद नहीं हो रहे है , तो मंद अवश्य होते जा रहे हैं l” 4
आज समस्त हिंदी साहित्य में प्राप्त गांधीजी के विचार दीपस्तंभ के समान हम सबको मार्गदर्शक है l इस महामानव तपस्वी ने भारतीय मन और मस्तिष्क को इस प्रकार झकझोर दिया था कि बापू के एक इशारे पर लोग मर मिटने के लिए तैयार थे l सत्य,अहिंसा पर आधारित गांधीवाद चिरंतर रहेगा और अनेक सदियों को प्रभावित करता रहेगा l इस संदर्भ में डॉ. विवेकी राय लिखते हैं – ” गांधी का स्वर सबसे अंतिम है l अतः उसमे समस्त पूर्ण चिंतकों के आत्मानुभव का समन्वय है l वह शुद्ध हमारे युग का योग है l जिस विशाक्त वायुमंडल में हम सांस ले रहे है , उसके समस्त विनाशक किटाणूओंके मारक तत्व गांधीवाद में समाहित है l” 5
महात्मा गांधी केवल भारत के ही नहीं अपितु विश्व के और विश्व- साहित्य के पथदर्शक है l राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होने धर्म को व्यावहारिक रूप दिया l यह मुक्ती का युद्ध न होकर मानव मुक्ती का आंदोलन रहा है l उन्होंने राजनीति के आध्यात्मिकरण पर बल दिया है l इस संदर्भ में डॉ. विवेकी राय लिखते है – “बापू ने धर्म,अध्यात्म और दर्शन को आकाश से धरती पर उतार दिया है l” 6
महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित डॉ. श्रीराम परिहार भी अपने जीवन में महात्मा गांधी और उनके विचारों को आदर्श मानते है l उनका मानना है कि भारत का राष्ट्रध्वज महात्मा गांधी के त्याग का, कवियों की वाणी के सत्य का, और जन- जन के विश्वास का प्रतीक है l राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पूर्ण व्यक्तित्व त्याग सत्य और विश्वास का पर्याय था l डॉक्टर परिहार राष्ट्रपिता, राष्ट्रध्वज इस ललित निबंध मे लिखते है – “विश्ववंद्य राष्ट्रपिता में किसान का त्याग, कवी का सत्य और नेतृत्व का अटूट विश्वास छलकता रहता था l बापू का रोम – रोम इन तिनों से अनुप्राणित था l बापू निरंतर त्यागते रहें l पँट – कोट पहने वाले मोहनदास ने देखा की देश के मूल आदमी के पास लंगोटी भर है l तो वे भी त्याग के कारण धोती – पगडी, धोती- बंडी बाद में केवल धोती और फिर मात्र पंचा पर आ गये l यह ताकत त्याग सत्य और विश्वास ने उन्हें दी थी l” 7
आज देश के प्रत्येक नागरिको को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास हो रहा है l इसकी नीव भी महात्मा गांधी जी ने रखी थी l गांधी जी ने अपने जीवन तत्त्वों के आधार पर ग्राम स्वराज्य का सपना देख हर भारतीय को आत्मनिर्भर बनाने की प्रतिज्ञा ली थी l इस संदर्भ में डॉ. परिहार जी लिखते है – “गांधी का राम राज्य का सपना नहीं था l वह ग्राम स्वराज्य पर केंद्रित ऐसी व्यवस्था थी जिसमें प्रत्येक जन मानव को कर्म से जोड़कर आत्मनिर्भरता और आत्म – चेतना से युक्त बनाने का प्रयास था l” 8
महात्मा गांधी युगपुरुष थे l उन्होने भारतीय हिंदी साहित्य को ही नहीं अपितु विश्व- साहित्य को भी प्रभावित किया है l आज ‘साहित्य मे गांधी’ यह विषय आने वाले पिढियों को चेतना और ऊर्जा प्रदान करता रहेगा l
 संदर्भ ग्रंथ सूचि –
1. आस्था और चिंतन -डॉ विवेकी राय, प्रकाशन – प्रतिभा प्रकाशन, नई दिल्ली, (1991), पृष्ठ क्र.84.
2. आम रास्ता नहीं हैं – डॉ विवेकी राय, प्रकाशन – पारिजात प्रकाशन, पटना, पृष्ठ क्र.14.
3. फिर बैतलवा डाल पर – डॉ विवेकी राय, प्रकाशन – भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली -1962, पृष्ठ क्र.172.
4. आस्था और चिंतन -डॉ विवेकी राय, प्रकाशन – प्रतिभा प्रकाशन, नई दिल्ली, (1991), पृष्ठ क्र.82.
5. आस्था और चिंतन -डॉ विवेकी राय, प्रकाशन – प्रतिभा प्रकाशन, नई दिल्ली, (1991), पृष्ठ क्र.85.
6. आस्था और चिंतन -डॉ विवेकी राय, प्रकाशन – प्रतिभा प्रकाशन, नई दिल्ली, (1991), पृष्ठ क्र.87.
7. झरते फूल हर सिंगार के – डॉ श्रीराम परिहार, प्रकाशन – सृजन सम्मान प्रकाशन , रायपूर ( छत्तीसगढ) पृष्ठ क्र.92.
8. देश जो हमारी पहचान है – धूप का अवसाद – डॉ श्रीराम परिहार, प्रकाशन – आस्था प्रकाशन , नई दिल्ली,पृष्ठ क्र. 90.
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डॉ. जितेंद्र पीतांबर पाटिल
सहयोगी प्राध्यापक,
हिंदी विभाग,
संगमनेर नगरपालिका कला,दा ज मालपाणी वाणिज्य एवं ब ना सारडा विज्ञान महाविद्यालय (स्वशासी) संगमनेर,जिल. अहिल्यानगर,महाराष्ट्र.
drjitendrapatil7383@gmail.com