1. प्रस्तावना

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मोहनदास करमचंद गांधी का नाम एक ऐसी विभूति के रूप में अंकित है जिसने केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य को भी एक नई दिशा दी। गांधीजी ने अपने सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, असहयोग, सादगी और नैतिक जीवन जैसे सिद्धांतों से समूचे भारतीय मानस को प्रभावित किया। हिंदी साहित्य, जो समाज का दर्पण है, गांधीजी के इन विचारों से अछूता नहीं रह सका। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी लेखकों और कवियों ने गांधीवाद को न केवल स्वीकार किया बल्कि उसे अपने साहित्य का केन्द्रीय भाव बना दिया।

गांधीजी के विचारों ने हिंदी साहित्य को सामाजिक सरोकार, नैतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता की भावना से भर दिया। वे स्वयं भी हिंदी के बड़े प्रेमी थे और उन्होंने इसे “राष्ट्रभाषा” का दर्जा दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किया। इसी कारण हिंदी साहित्य के अनेक विधाओं — कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, और पत्रकारिता — पर गांधीजी के विचारों की गहरी छाप देखी जा सकती है।

2. गांधीजी के विचारों की पृष्ठभूमि

गांधीजी के विचारों की जड़ें भारतीय संस्कृति, भगवद्गीता, उपनिषदों और जैन-बौद्ध परंपरा में गहराई से निहित हैं। उनका जीवन दर्शन सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य पर आधारित था। उन्होंने पश्चिमी सभ्यता की भोगवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए आत्मसंयम, सादगी और श्रम की महत्ता को प्रतिपादित किया। गांधीजी के अनुसार “सत्य ही ईश्वर है” और “अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म”।

उनकी जीवन दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक सुधार के साथ मानवीय उत्थान पर भी केंद्रित थी। गांधीजी का मानना था कि जब तक व्यक्ति का आचरण नैतिक नहीं होगा, तब तक समाज में स्थायी परिवर्तन संभव नहीं है। यह नैतिकता ही आगे चलकर हिंदी साहित्य की अनेक रचनाओं का मूल तत्व बनी।

3. भारतीय समाज में गांधीवाद की आवश्यकता

गांधीजी ने भारत को केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र करने का सपना नहीं देखा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, स्वावलंबी और नैतिक रूप से सशक्त समाज की कल्पना थी। उनके विचारों के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सेवा भाव का विकास करना होना चाहिए।
“हिंद स्वराज” में गांधीजी ने आधुनिक सभ्यता की आलोचना करते हुए कहा कि भारत को अपनी जड़ों में लौटना चाहिए और ‘स्वदेशी’ को अपनाना चाहिए।

इसी स्वदेशी भावना ने साहित्यकारों को प्रेरित किया कि वे विदेशी प्रभाव से मुक्त होकर भारतीय जनमानस के जीवन को अपने लेखन में स्थान दें। यही कारण है कि हिंदी साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी के विचारों को प्रमुख स्थान दिया और साहित्य समाज सुधार का माध्यम बन गया।

4. हिंदी साहित्य पर गांधीजी के विचारों का प्रभाव

गांधीजी का प्रभाव हिंदी साहित्य की सभी विधाओं पर व्यापक रूप से देखा जा सकता है। उनके विचारों ने साहित्य को नैतिकता, सरलता, देशभक्ति और जनसेवा से जोड़ दिया। पहले जहाँ हिंदी साहित्य में प्रेम, सौंदर्य और रहस्यवाद की प्रधानता थी, वहीं गांधी युग में साहित्य सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बना।

प्रमुख प्रभाव बिंदु:

साहित्य में सत्य और अहिंसा की प्रतिष्ठा

सामाजिक समानता और अस्पृश्यता विरोध का संदेश

स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का समर्थन

ग्रामीण जीवन, श्रम और किसान की गरिमा का चित्रण

स्त्री-शक्ति और नारी सम्मान पर बल

भाषा में सादगी और लोकधर्मी शैली का प्रयोग

5. काव्य में गांधीजी का प्रभाव

गांधी युग में कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं रही, बल्कि वह समाज सुधार का शस्त्र बन गई। मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि कवियों ने गांधीजी के विचारों को काव्य के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया।

मैथिलीशरण गुप्त ने “भारत भारती” में राष्ट्रीय चेतना को जगाया —

> “हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी?”

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “झाँसी की रानी” ने नारी शक्ति और देशभक्ति का संगम दिखाया।
दिनकर ने “कुरुक्षेत्र” और “रश्मिरथी” में गांधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को धर्मयुद्ध की आधुनिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया।
कवि प्रेमानंद, माखनलाल चतुर्वेदी, गोपाल सिंह नेपाली आदि ने भी गांधीजी की प्रेरणा से राष्ट्रीय पुनर्जागरण का साहित्य रचा।

6. कथा साहित्य में गांधीजी का प्रभाव

गांधीजी के प्रभाव से हिंदी कथा साहित्य में यथार्थवाद और समाज-सुधार की प्रवृत्ति का उदय हुआ। प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने अपने लेखन में गांधीजी के आदर्शों को सजीव किया।

मुंशी प्रेमचंद की रचनाएँ — सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान — गांधीजी के सामाजिक आदर्शों का सजीव चित्रण करती हैं। उनके पात्र जैसे होरी, गोबर, मालती और गौरी भारतीय किसान और समाज की नैतिक पीड़ा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
प्रेमचंद ने अस्पृश्यता, गरीबी, स्त्रीशिक्षा और स्वराज के मुद्दों को कथा के केंद्र में रखा, जो गांधीवाद का प्रत्यक्ष प्रभाव था।

प्रेमचंद के अतिरिक्त जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, अमृतलाल नागर और भगवतीचरण वर्मा जैसे लेखकों ने भी गांधीजी के नैतिक संघर्ष, आत्मानुशासन और समाज सुधार के भावों को अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया।

7. नाटक एवं निबंध साहित्य में गांधीजी का प्रभाव

गांधीजी के विचारों से प्रेरित नाटककारों ने भारतीय समाज की विसंगतियों और नैतिक संघर्षों को मंच पर प्रस्तुत किया। जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र के उत्तरकालीन नाटककारों ने भी सामाजिक सुधार का संदेश दिया।
प्रसाद के “ध्रुवस्वामिनी” में स्त्री स्वतंत्रता का स्वर, रामकुमार वर्मा के “अंधा युग” में नैतिक द्वंद्व, और हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंधों में गांधीजी की आत्मिक दृष्टि परिलक्षित होती है।

गांधीजी ने स्वयं भी निबंधकारों को प्रेरित किया कि वे लेखन को सेवा का माध्यम बनाएं। “यंग इंडिया” और “हरिजन” जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से गांधीजी की भाषा, शैली और सोच ने हिंदी पत्रकारिता को नया स्वरूप दिया।

8. पत्रकारिता और गांधी साहित्य

गांधीजी ने भारतीय पत्रकारिता को ‘सत्य के प्रचार’ का माध्यम बनाया। उन्होंने कहा — “पत्रकारिता का उद्देश्य समाज में परिवर्तन लाना है।”
उनकी इस दृष्टि से प्रेरित होकर हिंदी के अनेक पत्र जैसे प्रताप, आर्जव, सरस्वती, माधुरी आदि ने सामाजिक चेतना का प्रसार किया।

महात्मा गांधी स्वयं हिंदी पत्रकारिता के लिए प्रेरणा स्रोत बने। उन्होंने जनता को नैतिकता, स्वावलंबन और सादगी के महत्व से परिचित कराया। उनके अनुयायियों जैसे विनोबा भावे, काका कालेलकर, राममनोहर लोहिया आदि ने भी हिंदी में गांधीवाद के सिद्धांतों का प्रसार किया।

9. समकालीन साहित्य में गांधीजी के विचारों की प्रासंगिकता

गांधीजी के विचार आज भी हिंदी साहित्य के मूल्यों में विद्यमान हैं। आधुनिक साहित्य में जहाँ भौतिकता और उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, वहीं गांधीजी की सादगी, नैतिकता और सत्यनिष्ठा एक प्रकाशस्तंभ की तरह हैं।

समकालीन कवि जैसे दुष्यंत कुमार, राजेश जोशी, आलोक धन्वा आदि ने भी गांधीजी की विचारधारा को नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित किया है। हिंदी के आधुनिक उपन्यासों और कहानियों में भ्रष्टाचार, अन्याय और सामाजिक विषमता के विरुद्ध जो संघर्ष दिखाई देता है, वह गांधीवादी प्रेरणा का ही विस्तार है।

10. निष्कर्ष

गांधीजी का प्रभाव हिंदी साहित्य पर न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज भी उसकी नैतिक और सामाजिक प्रासंगिकता बनी हुई है। गांधीजी ने जो सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, स्वराज, सादगी और श्रम की प्रतिष्ठा की, वह हिंदी साहित्य के संवेदनात्मक स्वर का आधार बन गई।

प्रेमचंद से लेकर अज्ञेय तक, मैथिलीशरण गुप्त से दिनकर तक, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर समकालीन कवियों तक — सभी पर गांधीवादी विचारधारा की छाप स्पष्ट है।
हिंदी साहित्य ने गांधीजी के आदर्शों को केवल वर्णित नहीं किया, बल्कि उन्हें जीवन का उद्देश्य बना दिया।

इस प्रकार, गांधीजी के विचारों ने हिंदी साहित्य को केवल दिशा ही नहीं दी, बल्कि उसे जनमानस से जोड़ने की शक्ति भी प्रदान की।

—संदर्भ ग्रंथ सूची (विस्तारित रूप में)

प्राथमिक ग्रंथ (Primary Sources):

1. गांधी, मोहनदास करमचंद. (1910). हिंद स्वराज या भारतीय स्वराज. नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद।
👉 गांधीजी का मौलिक ग्रंथ, जिसमें आधुनिक सभ्यता की समीक्षा और भारतीय आत्मनिर्भरता के सिद्धांत दिए गए हैं।

2. गांधी, मोहनदास करमचंद. (1956). सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा. नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद।
👉 गांधीजी के जीवन-दर्शन, आत्मानुशासन और नैतिक चिंतन को समझने के लिए यह मुख्य स्रोत है।

3. गांधी, मोहनदास करमचंद. (1940). हरिजन संग्रह. नवजीवन प्रकाशन।
👉 इसमें गांधीजी के संपादकीय लेख हैं, जो सामाजिक सुधार, अस्पृश्यता उन्मूलन और ग्राम स्वराज पर केंद्रित हैं।

4. विनोबा भावे. (1955). गीता प्रवचन. सेवाग्राम आश्रम प्रकाशन, वर्धा।
👉 गांधीजी के शिष्य विनोबा भावे द्वारा व्याख्यायित गीता का गांधीवादी दृष्टिकोण।

5. नेहरू, जवाहरलाल. (1946). भारत की खोज (The Discovery of India). ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।
👉 गांधीजी के आदर्शों के सामाजिक और ऐतिहासिक सन्दर्भ को समझने हेतु उपयोगी।

द्वितीयक ग्रंथ (Secondary Sources):

6. प्रेमचंद, मुंशी. (1932). कर्मभूमि. सरस्वती प्रेस, बनारस।
👉 गांधीजी के अहिंसा, सत्य और सेवा भाव के सिद्धांतों पर आधारित सामाजिक उपन्यास।

7. प्रेमचंद, मुंशी. (1936). गोदान. सरस्वती प्रेस, बनारस।
👉 किसान जीवन, श्रम, नारी संघर्ष और नैतिकता के गांधीवादी मूल्यों का साहित्यिक चित्रण।

8. गुप्त, मैथिलीशरण. (1912). भारत भारती. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।
👉 राष्ट्रीय चेतना, स्वदेशी और स्वराज की भावना से ओत-प्रोत गांधीवादी काव्य।

9. दिनकर, रामधारी सिंह. (1946). कुरुक्षेत्र. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
👉 गांधीजी के अहिंसक धर्मयुद्ध की आधुनिक व्याख्या का काव्यात्मक रूप।

10. सुभद्रा कुमारी चौहान. (1930). संग्रहित कविताएँ. लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज।
👉 स्त्री शक्ति, देशभक्ति और बलिदान का गांधीवादी स्वरूप।

11. जयशंकर प्रसाद. (1933). ध्रुवस्वामिनी. सारस्वत प्रकाशन, वाराणसी।
👉 स्त्री स्वतंत्रता और नैतिक संघर्ष पर गांधीवादी दृष्टि।

12. हजारीप्रसाद द्विवेदी. (1952). निबंधावली. प्रयाग: लोकभारती।
👉 गांधीजी की नैतिकता, श्रम और चरित्र निर्माण के पक्ष पर चिंतन।

पत्रिकाएँ एवं शोध आलेख (Journals and Research Papers):

26. “Gandhian Influence on Modern Indian Literature.” Indian Literature, Sahitya Akademi Journal, Vol. 45, No. 2 (2000).
👉 गांधीवाद के साहित्यिक प्रसार का तुलनात्मक अध्ययन।

27. “The Ethical Dimensions of Gandhian Thought in Hindi Novels.” Journal of South Asian Studies, Vol. 32, Issue 1 (2015).
👉 हिंदी उपन्यासों में गांधीवादी नैतिकता का आधुनिक विश्लेषण।

28. “Relevance of Gandhi in Contemporary Indian Writing.” International Journal of Humanities and Social Science Research, Vol. 8 (2021).
👉 आधुनिक भारतीय लेखन में गांधीवादी विचारधारा की निरंतरता पर शोधात्मक आलेख।

29. “The Literary Legacy of Mahatma Gandhi.” Journal of Indian Cultural Studies, Vol. 12, No. 3 (2019).
👉 गांधीजी के साहित्यिक प्रभाव और उनके अनुयायियों के कृतित्व का समकालीन पुनर्पाठ।

 

डॉ छाया शेषराव तोटवाड
सहा प्राध्यापक
हिंदी विभाग
लोकमान्य महाविद्यालय सोनखेड
महाराष्ट्र