शोध सार :- गाँधी के जीवन और उनके विचारों को कई अलग-अलग धाराओं में समझने का प्रयास किया गया उनके विचारों और दर्शन को गांधीवाद नाम दिया गया जिसे हम हिंदी साहित्य के गद्य और पद्य दोनों विधाओ में देखते हैं, गाँधी के संयम उनके अहिंसा से जुड़े विचारों ने समाज को गहराई से प्रभावित किया। जैसे कि हम जानते हैं साहित्य को देखने की एक धारा इसे समाज का दर्पण मानती है तो इस तरह गाँधी के विचारों के कारण समाज पर पड़ते प्रभावों को साहित्य ने बखूभी उभारा। स्वतंत्रता आन्दोलन में साहित्य, जो जनता के भीतर चेतना को जागृत करने का काम कर रहा था, उस साहित्य को भी प्रेरणा गाँधी के विचारों से मिली। हिंदी साहित्य के विभिन्न रचनाकारों ने गांधीवाद के दर्शन को समझ कर अपनी रचनाओं में शामिल किया। ऐसे कई नाम हैं और रचनाएँ हैं, जो गाँधी के दर्शन से प्रभावित रहे। यह दर्शन आज भी कई जगह अपनी प्रासंगिकता लिए हुए है और साहित्य भी इन विचारों को अपने भीतर अलग-अलग रूपों में जगह देता आया है।

बीज बिन्दु :- गांधीवाद, साहित्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्याग्रह, छायावाद

शोध लेख :-
महात्मा गाँधी ने अपने जीवन में आत्म-संयम और समाज-सुधार के विचारों को लक्ष्य रखते हुए दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्रों में उन्हें व्यावहारिक रूप दिया। यही प्रयोगों का समुच्चय गाँधीवाद कहलाता है। रामनाथ सुमन लिखते हैं-“इसकी वाणी में कुछ अद्भुत बल था, जिसने लक्ष-लक्ष हृदयों को स्पर्श किया। एक कोने से यह वाणी उठी और देखते-देखते सब वाणियों के ऊपर छा गई।” 1
महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व और उनके जीवन के बारे में कई लोगों ने लिखा, उन पर लिखने वालों ने उनके विचारों और अनुभवों को कभी इतिहास कभी समाजशास्त्र तो कभी मानवशास्त्र आदि से जोड़ कर देखा है। समाज में उनकी भूमिका पथ प्रदर्शक के रूप में रही जिन्होनें ना केवल स्वतंत्रता आन्दोलन के समय पथ दिखाया बल्कि जीवन में सही दिशा को भी दिखाने का काम किया। जवाहरलाल नेहरु ने भी भी उनकी वाणी का वर्णन करते हुए लिखा है- “… यह आवाज दूसरों से कुछ भिन्न थी। यह शान्त और धीमी थी, फिर भी सर्वसाधारण के शोर के ऊपर सुनाई देती थी। आज तो हम इस आवाज से परिचित हो गये हैं परन्तु फरवरी-मार्च, 1919 में वह हमारे लिए नई थी। हम ठीक तरह नहीं जानते थे कि इसका क्या करना चाहिए, पर हम पुलकित हो उठे। निन्दा की हमारी शोरगुल भरी राजनीति से यह कुछ एक बिल्कुल जुदा चीज थी उस राजनीति से यह बिल्कुल भिन्न थी, जो सदा विरोध के निस्सार और बेअसर प्रस्तावों में, जिन पर कोई ज्यादा ध्यान न देता था, खत्म होती थी। यह क्रिया की, लड़ाई की राजनीति थी, बातचीत और विवाद की राजनीति नहीं।”2 गाँधी के विचारों को जहाँ भारत के साथ विदेशों में भी अलग- अलग जगहों पर समझने का प्रयास किया गया उनके विचारों को गांधीवाद के रुप में समझा और जाना जाने लगा। गांधी स्वयं किसी खांचे में बंधने के पैरोकार नहीं थे इसलिए वह वाद का समर्थन ना करते हुए लिखते हैं कि “गांधीवाद जैसी कोई चीज मेरे दिमाग में नहीं है। मैं कोई सम्प्रदाय प्रवर्तक नहीं हूँ। तत्त्वज्ञानी होने का मैंने कभी दावा भी नहीं किया है, मेरा यह प्रयत्न भी नहीं है। “3
महात्मा गाँधी के आदर्शों उनके विश्वासों और दर्शन से जो विचार निकले उन्हें गांधीवाद कहा गया। हिन्दी साहित्य कोश में गांधीवाद की व्याख्या इस प्रकार की गई है-“गांधीवाद, महात्मा गांधी (1869-1948) की विचार पद्धति का व्यापक नाम है। गांधी के व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे। वे राजनेता, समाज-सुधारक, अर्थवेत्ता, शिक्षाशास्त्री और धर्मोपदेशक भी थे। समाज और शासन के संघटन तथा जीवन के अन्य अनेक पक्षों के बारे में उनके अपने विचार थे, जिनका प्रतिपादन उन्होंने अपनी दैनिक साधना के मध्य से गुजरते हुए किया था। मार्क्सवाद के समान कोई व्यवस्थित शास्त्रीय अध्ययन इसके पीछे नहीं है, इसी कारण उसमें किसी प्रकार की तर्कजन्य पद्धति का अभाव है। गांधीवाद का आधार तर्क नहीं, स्वानुभूति है। इस विचारधारा का प्रत्येक खण्ड आत्म-शक्ति को लेकर चलता है। इसी कारण उसमें एक प्रकार की आध्यात्मिकता और विचार-स्वातन्त्र्य है। “4
गांधीवाद कोई नया दर्शन नहीं, वह तो एक प्रकार से विचारों का संचय और संचित विचारों का कार्यान्वय है। ‘अकाल पुरुष गांधी’ के प्रस्तावना में लेखक श्री धर्मवीर ने भी संचय और कार्यान्वय की इस प्रक्रिया की व्याख्या करते हुए लिखा है : “गांधी जी सत्य के पुजारी थे और सही अर्थ में कर्मयोगी थे। उन्होंने अपने विचारों के लिए कभी मौलिकता का दावा नहीं किया। वे हमेशा यही दोहराते रहे कि उनके विचारों में कोई विशेषता नहीं है। सभी धर्म-ग्रंथों में वे विचार पहले रखे हुए हैं। जो उन्होंने किया वह यह कि उन विचारों को जाँच-परख कर श्रद्धा और साहसपूर्वक किसी दूसरे की प्रतीक्षा किए बिना अपने जीवन में उतारा है और समाज के प्रश्नों पर उन्हें लागू किया है।” 5
गांधीवाद के प्रमुख तत्त्व सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य एवं सत्याग्रह है। इन्हीं के आधार पर उन्होंने सत्याग्रह रूपी अस्त्र का व्यावहारिक प्रयोग किया। इस प्रकार उनके दर्शन की मुख्य विशेषता चिन्तन और व्यवहार रहा। प्रथम दो तत्त्वों के विषय में गांधी जी लिखते हैं: “मेरा दर्शन जिसे आपने गांधीवाद का नाम दिया है सत्य और अहिंसा में निहित है।”24. हरिजन, 26 मार्च, 1936” उनमें कुछ और सिद्धांत भी जोड़े गए थे, जैसे—
अहिंसा, सत्यं, अस्तेयं,
ब्रह्मचर्यं, असंग्रहं,
शरीर श्रमं, अस्वाद,
सर्वत्र भय वर्जनं,
सर्वधर्म समानत्वं,
स्वदेशी, स्पर्श भावना।6
इन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने पर कुछ केन्द्रीय मुद्दे सामने आए जैसे वर्ग-सहयोग, हृदय-परिवर्तन और सत्याग्रह। इनके स्थूल रूप, जिनमें शामिल थे साम्प्रदायिक सद्भाव, छुआछूत उन्मूलन, नशाबंदी, खादी-प्रचार, ग्रामोद्योग, स्वच्छता शिक्षा, बुनियादी शिक्षा, हिन्दी का प्रचार, अन्य भारतीय भाषाओं का संवर्धन, स्त्री-उत्थान, स्वास्थ्य शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, आर्थिक समता, किसान-मजदूर-विद्यार्थी संगठन तथा स्वराज के लिए निरंतर संघर्ष। अन्याय और शोषण के विरुद्ध निःशस्त्र संघर्ष करते हुए यदि आवश्यक हुआ तो प्राण तक न्योछावर कर देना। यही गाँधीवाद की सर्वाधिक पहचान है।
साहित्य समाज का आईना माना जाता है। समाज में व्याप्त अच्छाइयाँ-बुराइयाँ स्वाभाविक रूप से उसमें प्रतिबिंबित होती हैं। साहित्यकार व्यक्ति और समाज की विभिन्न प्रवृत्तियों का सूक्ष्म अवलोकन करता है, उनका विश्लेषण करता है और उन्हें इस तरह प्रस्तुत करता है कि पाठक के मन में अच्छाई व सौन्दर्य के प्रति आकर्षण तथा बुराई व कुरूपता के प्रति घृणा जागे। गाँधीजी के जीवन और प्रयोगों में जो कर्म-सौन्दर्य उभरावि शेषकर असत्य को सत्य से और हिंसा को अहिंसा से पराजित करने के प्रयोगों में जो मानवीय निखार दिखाई दिया, उसका प्रभाव विश्व के किसी भी साहित्य पर पड़ना अपरिहार्य था। गाँधीजी विश्व-नागरिक होते हुए भी मुख्य रूप से भारतीय नेता थे। उनके जीवन का उत्तरार्ध मुख्यतः भारत को परतंत्रता से मुक्त कराने के संघर्ष में बीता। उस संघर्ष से समस्त भारत जुड़ गया था। इसलिए देश की सभी भाषाओं के साहित्य पर गाँधीवाद का प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। चूँकि हिन्दी भारत के बृहद् क्षेत्र में बोली-समझी जाती रही है, इसलिए उस पर यह प्रभाव सबसे गहरा पड़ा। हिन्दी साहित्य पर गाँधीवाद का प्रभाव इतना व्यापक और गहरा है माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला, पन्त आदि की कविताओं में तथा प्रेमचन्द, जैनेन्द्र, विष्णु प्रभाकर आदि के गद्य-लेखन में गाँधीवादी चेतना सबसे स्पष्ट और प्रखर रूप में दिखाई देती है।
माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ जिसमें पुष्प को भी इस मातृभूमि के लड़ते आन्दोलनकारियों के पथ पर उनके चरणों के नीचे आकर कठोर पथ पर उनको राहत दे सके , यहाँ फूल प्रभु से यही प्रार्थना करता है-
‘मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने’। 7

इस आत्म-समर्पण भाव में गाँधीवादी बलिदान की स्पष्ट अनुगूँज सुनाई देती है। माखनलाल चतुर्वेदी स्वयं कई बार जेल गए थे।
सियारामशरण गुप्त की ये पंक्तियाँ खादी के प्रचार का अद्भुत काम करती हैं—
‘खादी के धागे-धागे में
अपनेपन का अभिमान भरा।’
और यह पंक्ति भी उन्हीं की है—
‘काम गाँधी ने किया जो
काम आँधी कर न सकती।’ 8
हिन्दी के छायावाद को कुछ आलोचक गाँधी-युग की ही उपज मानते हैं। डॉ. आलोक कुमार रस्तोगी ने लिखा है—‘महात्मा गाँधी ने विश्व-बंधुत्व, लोक-मंगल की विचारधारा को अपनाकर साम्य भाव को महत्त्व दिया। छायावादी रचनाओं में गाँधी जी के इस साम्य भाव और मानव-कल्याण की भावनाओं को भरपूर स्थान मिला। यदि छायावाद को गाँधीयुग की देन मान लें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।’ हिंदी के एक युग छायावाद में गांधीवाद के प्रभाव को डॉ. नगेन्द्र के अनुसार समझें तो ‘गाँधी की अहिंसा उस युग की चेतना की प्रतीक थी, अतएव छायावाद पर वैयक्तिक चेतना के आस्तिक अधिमानसिक रूप का ही विकास हुआ। पन्त, महादेवी जैसे सुकुमार भावनाओं के कवियों ने तो उसे आत्मसात कर लिया। प्रसाद और निराला जैसे उद्दाम कवियों ने भी उन मूल्यों को ही स्वीकार किया।’
हिन्दी के उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द गाँधीजी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और जनजागरण में लग गए। उनकी अनेक कहानियों में गाँधीवादी चरित्र जीवंत हो उठते हैं। ‘होली का उपहार’ में सुखदा इसका सुन्दर उदाहरण है। विदेशी कपड़े की दुकान पर स्वयंसेवक पिकेटिंग कर रहे हैं। अमरकान्त पिछवाड़े के दरवाजे से घुसकर एक महँगी विदेशी साड़ी खरीदता है, पर बाहर निकलते ही स्वयंसेवक उसे पकड़ लेते हैं। नेतृत्व कर रही सुखदा साड़ी वापस दिला देती है, लेकिन उसके व्यक्तित्व का इतना गहरा असर अमरकान्त पर पड़ता है कि वह साड़ी जला देता है और अगले दिन स्वयं पिकेटिंग में शामिल होकर गर्व से जेल चला जाता है।
प्रेमचन्द के उपन्यासों ‘निर्मला’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘गबन’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ में भी गाँधीवादी चेतना विभिन्न रूपों में मौजूद है। ‘गबन’ में देवीदीन के माध्यम से प्रेमचन्द स्वराज के बाद नेताओं-बाबुओं की संभावित स्वार्थपरता पर तीखा कटाक्ष करते हैं। ‘रंगभूमि’ के युवकों का सामूहिक गीत—
शांति समर में कभी भूलकर धैर्य नहीं खोना होगा
वज्र प्रहार भले सिर पर हो, नहीं किन्तु रोना होगा
अरि से बदला लेने का मन-बीज नहीं बोना होगा
देश-दाग को रुधिर वारि से हर्षित हो धोना होगा।
होगी निश्चय जीत धर्म की यही भाव भरना होगा
मातृभूमि के लिए जगत में जीना और मरना होगा’। 9

आधुनिक हिन्दी साहित्यकारों का गाँधी-दर्शन के प्रति नजरिया विष्णु प्रभाकर के इस कथन में स्पष्ट झलकता है—‘गाँधी जी ने दूसरों के लिए जीवन जीने की सीख भी दी थी। मेरे अंतरतम का विश्वास है कि यदि लोग इस पर चल सकें तो बहुत-सी समस्याएँ अपने आप सुलझ जायेंगी। इससे बेहतर मनुष्य और बेहतर नागरिक बनेंगे। फिर गाँधीवाद को, सामाजिक संगठन या शासन की विधि के रूप में, मेरा विचार है, अभी तक नहीं लाया गया। सफलता-असफलता का तो तभी पता चलेगा, जब इसे प्रयोग में लाया जाये। मेरा विश्वास है कि हमारे जैसे विकासशील देश के लिए गाँधीजी का ग्राम-स्वराज्य का तरीका ही अधिक उपयुक्त होगा।’
प्रेमचंद के साहित्य के साथ गांधीजी, तुलसीदास द्वारा अवधी भाषा में लिखी गई ‘रामचरित मानस’ से भी काफी प्रभावित थे। दरअसल अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ की प्रेरणा गांधीजी ने तुलसीदास के रामराज्य से ही ली थी। ‘रामचरित मानस’ की कई चौपाइयों को उन्होंने अपने जीवन में प्रयोग किये जा रहे सत्य, अहिंसा और दया को हथियार माना था। ये सभी चौपाइयां उन्हें कंठस्थ थीं। कामायनी’ में गांधीजी के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए वह गांधीजी के ‘हिंद स्वराज’ की तर्ज पर मशीनीकरण का विरोध करते हैं। साथ ही ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ और ‘शेर सिंह का शस्त्र समर्पण’ में भी गांधीवाद का प्रभाव साफ़ नज़र आता है। इसके अलावा, सर्वेश्वरदयाल शर्मा ने अपने नाटक ‘बकरी’ में गांधीजी के कर्मवाद को दर्शाया है। 10
वर्तमान में हम गांधीजी के मूल्यों को भूलते जा रहे है, गांधीजी के सिद्धान्त मील के पत्थर हैं, अमूल्य हैं। उनमें सर्वधर्मों व जीवनानुभवों का समावेश किया जा सकता है। यदि गांधीजी के मूल्यों के अनुरूप न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व का पुनःनिर्माण किया जाए तो आज बेहतर भविष्य के लिए गांधीजी का चिन्तन उतना ही प्रेरणादायी सिद्ध होगा जितना पूर्व में रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि हम उनके सिद्धान्तों को आँख बंद करके अपनाते जाएँ बल्कि उनके मूल्यों व संवेदनाओं के मूल को लेकर मनुष्यता के लिए कुछ उपयोगी कार्य कर पाएँ तो उनके बताएँ मार्ग का अनुगमन उचित प्रकार से कर सकते हैं पंत की निम्न पँक्तियाँ इस कथन को पुष्टि करती हैं:-
“गांधीवाद जगत में आया ले मानवता का नवमान,
सत्य अहिंसा से मनुजोचित नव संस्कृति करनें निर्माण।
गांधीवाद हमें जीवन पर देता अन्तर्गत विश्वास
मानव की निःसीम शक्ति का मिलता उससे चिर आभास।
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मनुष्य का तत्व सिखाता निश्चय हमको गांधीवाद,
सामूहिक जीवन विकास की साम्य योजना है अविवाद।’’11
पंत के व्यक्तिगत जीवन व काव्य सृजन पर समय के साथ स्वच्छंदतावाद, मार्क्सवाद व अरविन्द दर्शन का पर्याप्त प्रभाव दिखाई देता है उनकी ’वीणा’ से ’ज्योत्सना’ तक की कविताएँ छायावादी, ’युगांत’ से ’ग्राम्या’ तक की कविताएँ ’प्रगतिवादी’ जिन पर गांधीजी के जीवन मूल्यों की विशेष रंगत छाई रही।
इस प्रकार गांधीवाद ने हिंदी साहित्य को कई स्तरों पर प्रभावित किया। गाँधी दर्शन कविताओं के साथ साथ कहानी, उपन्यास, नाटक जैसी विधाओं में देखने को मिलता है साहित्य जिसके लिए रामचन्द्र शुक्ल अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में काल विभाजन में लिखते हैं कि “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही ‘साहित्य का इतिहास’ कहलाता है।” 12 तो इसी जनता पर पड़ते गांधीवाद के प्रभावों को दिखाने का कम हिंदी साहित्य ने किया।

सन्दर्भ सूची:-
1. गांधीवाद की रूपरेखा, पृष्ठ 154
2. ग्लिम्पसेस आव वर्ल्ड हिस्ट्री, 11, पृ० 1117-118
3. गांधी-वाणी, पृ० 253
4 हिन्दी साहित्य कोश, प्रथम भाग, पृ० 256-57
5 अकाल पुरुष गांधी, प्रस्तावना, पृ० ‘क’
6 हरिजन, 26 मार्च, 1936
7https://www.hindwi.org/kavita/pushp-ki-abhilasha-makhanlal-chaturvedi-kavita
8 ’https://kavitakosh.org/kk
9 रंगभूमि प्रेमचंदhttps://hi.wikisource.org/wiki
10 https://www.hercircle.in/hindi/engage/fiction/books/gandhijis-views-in-hindi-literature-7790.html
11 सुमित्रानंदन पंत समाजवाद-गांधीवाद (युगवाणी संग्रह) – सुमित्रानंदन पंत
12 https://gadyakosh.org

प्रियंका
शोधार्थी, हिंदी विभाग ( दिल्ली विश्वविद्यालय)
9560222764
Badhanipriyanka1410@gmail.com