
“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” — यह वचन न केवल सत्य है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक महान है। एक राष्ट्र को तभी राष्ट्र कहा जा सकता है जब उसकी सीमाओं के भीतर रहने वाले लोग दीर्घकाल तक एक साथ रहकर सुख-दुख साझा करें और एकता का भाव बनाए रखें। विविध धर्म, भाषा और संस्कृति के बावजूद जब सब एक ही सांस्कृतिक बंधन में बंधे हों, तभी सच्चा राष्ट्रवाद विकसित होता है। राष्ट्रवाद का भाव किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य है। कोई भी देश तभी प्रगतिशील हो सकता है जब उसके नागरिक अपनी संस्कृति, परंपरा और राज्य-व्यवस्था पर गर्व करें और उन्हें संरक्षित रखने का प्रयास करें। इस संदर्भ में कवि कुवेम्पु के शब्द अत्यंत सार्थक हैं —
“देश मेरा है,
यह धरती मेरी है,
ऐसा न कहने वाले का हृदय श्मशान समान है।”
एक सच्चे नागरिक को अपनी मातृभूमि पर गर्व होना चाहिए। क्योंकि —
“अपनी धरती का नीला पक्षी,
इस धरती की हरियाली,
इस देश की पहाड़ी,
अपने देश की पश्चिम धारा —
यही उसकी जीवनशैली, यही उसकी मां है।”
यदि कोई व्यक्ति इस भाव से वंचित है, तो वह देशद्रोही है; ऐसा व्यक्ति न जीवित अवस्था में समाज में स्थान का अधिकारी है, न मृत्यु के पश्चात् अग्निदाह का। शंकराचार्य ने कहा है — “स्वदेशे भुवनत्रयम्” अर्थात् अपने देश में ही तीनों लोक समाहित हैं। ऐसे योगियों ने, जिन्होंने सभी सांसारिक संबंधों का त्याग कर मातृभूमि के लिए स्वयं को समर्पित किया, यह सिद्ध किया कि देशभक्ति की भावना मनुष्य के चरित्र की सर्वोच्च पहचान है।
साहित्य और राष्ट्रभाव:
साहित्य समाज और मानव जीवन का दर्पण होता है। किसी भी कवि या लेखक के भीतर उत्कृष्ट सृजन तभी संभव है जब उसके परिवेश में वह संवेदना, चिंता, साहस और उत्साह विद्यमान हों जो उसे रचना के लिए प्रेरित करें। जैसे इंग्लैंड में राष्ट्रप्रेम की भावना ने वहां के साहित्य को समृद्ध किया, वैसे ही फ्रांसीसी क्रांति के लिए रूसो, डिडरो और वोल्टेयर जैसे चिंतक उत्तरदायी थे। इतिहास साक्षी है कि लेखनी वह कार्य कर सकती है जो सैकड़ों तलवारें नहीं कर सकतीं।
कन्नड़ साहित्य में भी इसी दिशा में देशभक्ति का सृजन हुआ। यद्यपि यह स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि कन्नड़ साहित्य में राष्ट्रभक्ति की भावना कब और कैसे विकसित हुई, परंतु प्राचीन काल से ही राजाओं के प्रति निष्ठा और राज्य-प्रेम की भावना जनमानस में विद्यमान थी। आधुनिक काल में यह दृष्टिकोण और अधिक व्यापक एवं शुद्ध रूप में सामने आया।
स्वतंत्रता संग्राम और कन्नड़ साहित्य:
नवीन कन्नड़ साहित्य की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई। उस काल में “करो या मरो” का नारा जन-जन के हृदय में जोश भर रहा था। कन्नड़ कवियों ने भी देश की स्वतंत्रता के लिए जनजागरण का दायित्व उठाया और साहित्य के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में असंख्य सत्याग्रही राष्ट्र की मुक्ति के लिए अहिंसक संघर्ष में प्रवृत्त हुए। कुवेम्पु ने अपनी कविता ‘सत्याग्रही’ में इन वीरों के त्याग और साहस का वर्णन किया है। एक सच्चा सत्याग्रही वह है जो कष्ट सहते हुए भी सत्य का साथ नहीं छोड़ता, अहिंसा का पालन करता है और अत्याचार के समक्ष झुकता नहीं। कवि ने ऐसे सत्याग्रही की छवि इन शब्दों में चित्रित की है —
“वह सत्याग्रही जिसने कलियुग को
एक महान बलिदान में परिवर्तित कर दिया।”
देश की आज़ादी के लिए अनगिनत लोगों ने अपना जीवन बलिदान किया। कुवेम्पु ने मोतीलाल नेहरू के निधन पर भी एक मार्मिक कविता लिखी। इन सभी रचनाओं के प्रेरणास्रोत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही थे। कुवेम्पु की कविता “महात्मा गांधी” में यह भाव व्यक्त हुआ है कि स्वतंत्रता आंदोलन के धधकते वातावरण में भी बापूजी शांति और स्थिरता के प्रतीक बने रहे।
“इस महान स्वतंत्रता के धुएँ में
एक स्रोत ज्वाला जलता है,
यह स्थिर और दीप्तिमान है,
नीले आकाश में एक प्रकाश-पुंज की तरह
यह निरंतर चमकता है।”
इस प्रकार बापूजी केवल व्यक्ति नहीं, एक युग-पुरुष हैं जिनके आदर्शों ने विश्व को नई दिशा दी।
कन्नड़ साहित्य पर गांधी जी का प्रभाव:
कन्नड़ साहित्य में गांधी जी की छवि अत्यंत प्रभावशाली रही है। कुवेम्पु, द.रा. बेंद्रे, शिवराम कारंत, यू. आर. अनंतमूर्ति और पी. लंकेश . तेजस्वी जैसे रचनाकारों ने गांधी के विचारों को अपनी रचनाओं में विविध रूपों में अभिव्यक्त किया।
कुवेम्पु की रामायण दर्शनम् में “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” का भाव गांधी के सर्वोदय दर्शन से मेल खाता है।
द.रा. बेंद्रे की कविताओं में करुणा, मानवीय संवेदना और आत्मबल की झलक मिलती है — जो गांधी के अहिंसा और प्रेम के सिद्धांतों से प्रेरित हैं।
शिवराम कारंत के उपन्यास मूकज्जिया कनसुगलु में समाज, परंपरा और नैतिकता पर गहन चिंतन है — जो गांधी के आत्मपरीक्षण और सत्याग्रह की दिशा में साहित्यिक अभिव्यक्ति बनता है।कन्नड़ नाट्य साहित्य में भी गांधी का प्रभाव स्पष्ट है; कई नाटकों में पात्र सत्य, ईमानदारी और समानता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। गांधी की ग्राम-स्वराज और श्रम-गौरव की अवधारणा ग्रामीण जीवन पर आधारित अनेक कन्नड़ कृतियों में दृष्टिगोचर होती है।
गांधी के जीवन-दर्शन और कन्नड़ साहित्य:
सत्य और अहिंसा – गांधी के इन सिद्धांतों को कन्नड़ कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रमुख स्थान दिया है। उन्होंने अहिंसा को ऐसा नैतिक अस्त्र बताया है जो अन्याय और दुख का निवारण कर सकता है।
सर्वोदय और अंत्योदय – “सभी का कल्याण” और “सबसे वंचित का उत्थान” जैसे विचारों को लेखकों ने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के संघर्षों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
ग्राम-स्वराज – ग्रामीण आत्मनिर्भरता और श्रम-सम्मान के गांधीवादी आदर्श कन्नड़ उपन्यासों व कहानियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हैं।
स्त्री-सशक्तिकरण – गांधी जी ने स्त्रियों को स्वतंत्रता आंदोलन का अंग माना। कन्नड़ लेखकों ने अपनी रचनाओं में दहेज, अशिक्षा और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते हुए स्त्रियों के उत्थान का संदेश दिया।
मानव मूल्य और सादगी – गांधी के “सादा जीवन, उच्च विचार” का प्रभाव कन्नड़ लेखकों के पात्रों और कथानकों दोनों में झलकता है।
हृदय-परिवर्तन और सहिष्णुता – कन्नड़ साहित्य में शोषक के हृदय-परिवर्तन की अवधारणा तथा साम्प्रदायिक सद्भावना का संदेश गांधी के विचारों से प्रेरित है।
पर्यावरण चेतना – गांधीवादी दर्शन में प्रकृति-सम्मान की भावना भी कन्नड़ साहित्य में अभिव्यक्त होती है, जहाँ मनुष्य और प्रकृति के संतुलन को महत्व दिया गया है।
प्रमुख कन्नड़ लेखक और कृतियाँ:
एच. एस. अनुपमा ने अपने उपन्यास “नानू कस्तूरी” में कस्तूरबा गांधी के दृष्टिकोण से गांधी के व्यक्तित्व और आदर्शों को प्रस्तुत किया है, जो एक नारीवादी दृष्टि से गांधी की व्याख्या करता है।
गोपालकृष्ण अडिग ने गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर बहुत सारे कविताएँ लिखीं।
बेलुवार मोहम्मद कुवीं ने बालसाहित्य के रूप में गांधी पर आधारित रचनाएँ कीं।
कर्नाटक गांधी स्मारक निधि द्वारा प्रकाशित लघु कन्नड़ पुस्तिकाएँ गांधीवादी विचारधारा के प्रसार में सहायक रही हैं।
आधुनिक संदर्भ में गांधी:
आधुनिक कन्नड़ लेखक गांधीवादी विचारों को डिजिटल युग के परिप्रेक्ष्य में पुनः व्याख्यायित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं। वे मानते हैं कि गांधी के आदर्शों को आज की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के संदर्भ में पुनर्स्थापित करना अनिवार्य है ताकि नई पीढ़ी उन्हें व्यवहारिक रूप में समझ सके। यद्यपि कुछ विद्वानों का मत है कि कन्नड़ साहित्य में गांधी की राजनीतिक विचारधारा या उनकी हत्या के पीछे की मानसिकता पर पर्याप्त विमर्श नहीं हुआ, फिर भी यह निर्विवाद है कि गांधी आज भी साहित्यिक और नैतिक चेतना के केंद्र में हैं।
निष्कर्ष:कन्नड़ साहित्य में गांधी जी के जीवन-दर्शन और मानव-मूल्यों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेखकों ने अपने सृजन के माध्यम से सत्य, अहिंसा, सर्वोदय, समानता और सामाजिक न्याय जैसे गांधीवादी सिद्धांतों को गहराई से व्यक्त किया है। स्वतंत्रता के पश्चात् ‘नव्या’ आंदोलन के दौर में जहाँ कुछ लेखकों ने गांधी के विचारों की आलोचनात्मक दृष्टि से पुनर्व्याख्या की, वहीं कई आधुनिक रचनाकारों ने उन्हें समकालीन सामाजिक-संस्कृतिक विमर्शों में जीवंत बनाए रखा है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि गांधी केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि कन्नड़ साहित्य के लिए एक निरंतर प्रेरणा-स्रोत हैं — जो आज भी सत्य, नैतिकता और मानवता के प्रतीक के रूप में प्रासंगिक बने हुए हैं।






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