
शोध सारांश –
महात्मा गांधी का साहित्य उनके भाषणों, लेखों, पत्रों तथा आत्मकथाओं का बहुत वृहद संग्रह है , जो सत्य , अहिंसा तथा स्वदेशी जैसे उनके सिद्धांतों पर आधारित है ,जिनमें उनकी आत्मकथा “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” भी शामिल है । दूसरी ओर साहित्य में महात्मा गांधी का प्रभाव उनके दर्शन , व्यक्तित्व तथा संघर्ष से प्रेरित कई कवि तथा रचनाकारों के माध्यम से स्पष्ट होता है जो की नैतिक चरित्र , सामाजिक सुधार, स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति करते हैं । गांधी के साहित्य में उनकी लेखन शैली सरल, प्रत्यक्ष, स्पष्ट तथा सादगी पूर्ण थी , जो उनके जीवन को दर्शाती है । महात्मा गांधी जी ने स्वयं गुजराती तथा हिंदी साहित्य से प्रेरणा ली तथा बहुत सी भाषाओं में उनके कार्यों का अनुवाद हुआ है । “गांधीवादी चेतना “ बहुत से लेखकों के लिए एक शक्तिशाली रूपक बन गई है ,जो आदर्शों का प्रतिनिधित्व करती है । गांधी जी का चिंतन समाज , साहित्य तथा राजनीति बल्कि ऐसा कहे कि जीवन के कई क्षेत्रों को प्रभावित करता है , इसे कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी ।गांधीवाद में नैतिक मनुष्य ही वह धूरी है जिसके चारों ओर उनका समस्त चिंतन घूमता है। गांधीजी के अनुसार सत्य और अहिंसा पर आधारित व्यवस्था ही नैतिक और सर्वहिनकारी व्यवस्था होगी।
अतः कहा जा सकता है की हिंदी साहित्य में गांधीवादी विचारधारा में हिंदी साहित्य में सृजन की नई दिशाएं विकसित की है।
बीज -शब्द – गांधी, साहित्य , अंतर्संबंध
प्रस्तावना –
महात्मा गांधी द्वारा लिखित “सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी “में उनकी आत्मकथा शामिल है, जो गांधी जी के आत्मिक विकास ,व्यक्तित्व विकास तथा सत्य की खोज की यात्रा का वर्णन करती है । उन्होंने यह पुस्तक अपने जीवन के नैतिक संघर्षों तथा इन संघर्षों ने उनके दर्शन को कैसे आकर दिया, इसका बहुत ही ईमानदार विवरण प्रस्तुत करने के लिए लिखी थी। गांधीजी ने अपने गद्य में यथार्थ एवं वीभत्स प्रश्नों का भी वर्णन किया है क्योंकि उनके पास जो मूल तत्व था , वह था सत्य । गांधीवादी विचारधारा ने कई साहित्यकारों को सामाजिक बुराइयों जैसे अस्पृश्यता, दहेज और वेश्यावृत्ति के खिलाफ लिखने के लिए प्रेरित किया। उदाहरण के लिए, प्रेमचंद के उपन्यासों में दहेज की पीड़ा को उजागर किया गया है, और लक्ष्मी नारायण ने ‘आने वाला कल’ में गांधी के हरिजनोद्धार के प्रभाव को दर्शाया है। यह कथन सर्वविदित और सत्य है कि महात्मा गांधी पर जितना साहित्य लिखा गया , उतना शायद ही किसी अन्य मनीषी, चिंतक, विचारक अथवा साहित्यकार पर लिखा गया है । यहाँ प्रतीत होता है कि साहित्य और समाज एक-दूसरे को बहुत प्रभावित करते हैं। महात्मा गांधी ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने सत्य के अपने प्रयोग के विषय में लगातार लिखा । दुनिया का शायद ऐसा कोई भी जीवनोपयोगी विषय होगा , जिस पर गांधीजी ने प्रयोग नहीं किया हो तथा शायद ही उनका कोई प्रयोग हो जिस पर उन्होंने लेखनी चलाई।गांधीजीके जीवन-दर्शन और मानव-मूल्य प्रासंगिक है। इनका युगीन महत्व है। आत्मसंयम, आत्मानुशासन इनके जीवन का संस्कार है।
गांधी का साहित्य –
महात्मा गांधी का साहित्य उनकी सरल ,स्पष्ट तथा प्रत्यक्ष शैली में लिखे गए लेखन को दर्शाता है । गांधीजी ने गद्य , कविता तथा गैर काल्पनिक लेखन जैसी कई शैलियों में योगदान दिया है । महात्मा गांधी के विचारों पर भगवद् गीता का भी प्रभाव दिखाई देता है ।साहित्य का भी गांधीजी के चिंतन में महत्वपूर्ण स्थान था । जहॉं गांधी जी ने अपने व्यक्तित्व से अपने वक्त के क्षेत्रीय , देशी -विदेशी बहुत से छोटे-बड़े साहित्यकारों के लेखन को प्रभावित किया है , वहीं उनके चिंतन के निर्माण में साहित्य की भी काफी नियामक भूमिका रही है । गांधी जी का साहित्य पर बहुत ही गहरा प्रभाव रहा है तथा गांधी जी ने भी साहित्य से प्रभाव ग्रहण किया था । गांधी जी के विचारों की अभिव्यक्ति साहित्य में बहुत ही बार हुई है। वास्तव में गांधीजी के देश के आदि समय से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्य का बहुत ही अच्छा ज्ञान था । इसके अलावा विदेशी साहित्यकारों को भी उन्होंने पढ़ा था । गांधी जी पर साहित्यकार टॉल्ससटॉय का प्रभाव भी है , किंतु उन पर उससे भी अधिक भारत के मध्यकालीन भक्ति कवियों – नरसिंह मेहता, अखा भगत, भोजा भगत, मीराबाई, तुलसी ,कबीर इत्यादि का प्रभाव पड़ा था । इसी के साथ में साहित्य के संबंध में गांधी जी का अपना दृष्टिकोण भी विकसित हुआ था जिसके प्रकाश में वे साहित्यिक कृतियों की जांच परख किया करते थे। उनसे प्रभावित साहित्यिक रचनाशीलता को लेकर तो हिंदी में बहुत काम हुए हैं , किंतु उनके साहित्य संबंधी सरोकारों को लेकर बहुत कम चर्चा हुई है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के शब्दों में “ गांधीजी एक क्रांतिकारी चिंतक थे , उन्होंने राजनीति को शुद्ध बनाने के लिए मानव स्वभाव के परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान दिया “। वर्ष 2015 में गांधीजी देश लौटे तथा उन्होंने राष्ट्रीय ,सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर तत्काल अपना प्रभाव डालना प्रारंभ किया था । भारतीय साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा । हिंदी कविता और उपन्यास पर गांधी जी का प्रभाव पड़ा । गांधीवादी साहित्य में महात्मा गांधी की अपनी रचनाएं शामिल हैं, उदाहरण रुप में “एन आटोबायोग्राफी “तथा “हिंद स्वराज “ जो उनके अहिंसा और सत्य के दर्शन को रेखांकित करती है । इसमें समकालीन साहित्य का विशाल भंडार भी शामिल हैं ।
साहित्य में गांधी –
साहित्य में महात्मा गांधी का प्रभाव उनके दर्शन तथा व्यक्तित्व पर आधारित है , जो बहुत से रचनाकारों के लिए आत्मविश्वास और प्रेरणा स्रोत बना है । उनके साहित्य में सत्य, अहिंसा, भाईचारा ,शांति, अंत्योदय तथा सर्वोदय जैसे विभिन्न विषयों की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है तथा साहित्य में गांधीवाद ने सामाजिक समस्याओं उदाहरण रुप में दहेज प्रथा तथा अस्पृश्यता के चित्रण के साथ-साथ ग्राम स्वराज की अवधारणा को भी प्रकट करता है । वास्तव में साहित्य में गांधी को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है –
1.गांधीवाद का प्रभाव –
गांधीवाद ने बहुत सारे रचनाकारों ,साहित्यकारों को प्रभावित किया , जिससे उनकी कृतियों में उनके दर्शन तथा विचारों की झलक मिलती है ।महात्मा गाँधी की विचारधारा से रामधारी सिंह दिनकर काफी प्रभावित रहे। सत्य को आत्मसात करने की योग्यता इनमें अतुलनीय थी। ओज गुण के काव्य को अधिक पसंद करते थे। गांधी जी देशव्यापी राष्ट्रीय-आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। 1922 में असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया था। इससे पूरे देश में अनिश्चितता की स्थिति आ गयी थी। स्वतंत्रता पास होकर भी दूर नजर आ रही थी। जनता में निराशा थी। गाँधीजी इस अनिश्चितता की स्थिति में भी साहित्य अध्ययन करते रहते थे।
2.प्रेरणा स्रोत –
महात्मा गांधी के आदर्शों तथा व्यक्तित्व ने भारतीय लेखकों , विशेषकर इंडो – एंगि्लयन उपन्यासकारों के लिए एक प्रेरणा स्रोत का कार्य किया है।साहित्य में लिखी बातों से काफी प्रेरित होते थे। सामाजिक एकता की संदेश परक रचनाएँ काफी प्रिय थीं। उनकी साहित्यिक कसौटी किसी विचारधारा पर केंद्रीत नहीं रही है। भक्ति और मानवीय एकता को प्रतिष्ठित करने वाले विचारों पर बल देते थे।
3. कवियों तथा लेखकों का प्रभाव-
हिंदी साहित्य के कई कवियों तथा लेखकों जैसे रामधारी सिंह दिनकर, जैनेंद्र कुमार , मैथिलीशरण गुप्त , प्रेमचंद्र , सियाराम शरण गुप्त एवं सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे लेखकों तथा कवियों ने अपनी रचनाओं में गांधीवादी आदर्शों को प्रकट किया है । “निर्मला “उपन्यास में गांव के जीवन को और वेश्यावृति जैसी समस्याओं को गांधीवादी विचारधारा से दिखाया गया है । आर. के. नारायण ,वेटिंग फार द महात्मा , में गांधीवाद के अनुयायी के रूप में नायक को प्रकट किया गया है । फणीश्वर नाथ रेणु के मैंला आंचल में गांधीजी के ग्राम स्वराज की भावना को दर्शाया गया है । रामधारी सिंह दिनकर की कई कविताओं में गांधी जी के व्यक्तित्व और मूल्यों को दिखाया गया है । दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र में गाँधीवादी सेवा भावना को महत्व दिया –
“जाओं शामिल करों, निज तप से नर के रागानल को बरसाओ पीयूस करो अभिषिक्त प्लीज दग्ध भूतल को । ”
गांधी जी “ग्राम स्वराज और बहुजन हिताय “ के विचारों से सदा ही समाज को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर रहे हैं । जिसका प्रभाव हिंदी साहित्य में प्रेमचंद और उनके बाद के रचनाकारों पर देखा जा सकता है । गांधी जी के बराबर ही प्रेमचंद का व्यक्तित्व सरल तथा सादगी से परिपूर्ण था । प्रेमचंद ने “गोदान “, ‘ गबन ‘, ‘कर्मभूमि ‘ , ‘ कायाकल्प ‘ जैसे उपन्यासों के माध्यम से कृषक जीवन को चित्रित किया है । प्रेमचंद का सूरदास गांधी जी का ही प्रतीक है । प्रेमचंद के उपन्यासों में कहीं ना कहीं गांधी की अभिव्यक्ति हुई है । प्रेमचंद पर गांधी का बहुत ही प्रभाव दिखाई देता है । प्रेमचंद के बाद के लेखकों पर भी गांधी जी का प्रभाव दिखाई देता है , जैसे जैनेंद्र ,फणीश्वर नाथ रेणु । जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भी गांधी जी के विचारों प्रकट होते हैं । कामायनी में भी गांधी जी के दृष्टिकोण दिखाई देते हैं । सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाटक ‘ बकरी ‘ में गांधी जी के कर्मवाद का प्रभाव दिखाई देता है । मैथिलीशरण गुप्त के साकेत में राम धरती को स्वर्ग बनाने के लिए आए हैं , यह गांधीवाद के प्रभाव के कारण ही संभव हो पाया है । भारत भारती में गांधीवाद के आदर्शों की बात की है ।सुमित्रानंदन पंत ने गाँधी जी को संबोधित करते हुए लिखा हैं –
तुम मांस-हीन, तुम रक्त-हीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थि हीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन !
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव- शून्य लीन,
आधार अमर होगी, जिस पर,
भावी की संस्कृति समासीन !
इसके बाद प्रगतिवादी काव्यधारा में भी गाँधी जी का प्रभाव दिखता है।
मैथिलीशरण गुप्त पर एक ओर जहां गांधी जी का अमिट प्रभाव रहा तो वहीं दूसरी ओर गांधी जी विश्व जी गुप्त जी के अनन्य प्रशंसक थे, महादेव वर्मा ने एक स्मृति में लिखा है – “ बीसव शती में राष्ट्रकवि को युग पुरुष गांधी जैसा प्रशंसक मिल गया । जिन्होंने अपने व्यस्त समय में .. साकेत को तीन दिन में समाप्त किया .. राष्ट्रकवि की पदवी भी बापू ने उन्हें दी है “
साहित्यिक अभिव्यक्तियों में निम्नलिखित है-
1. ग्राम स्वराज – मुंशी प्रेमचंद ने गोदान जैसे उपन्यास में तथा फणीश्वर नाथ रेणु का उपन्यास “मैला आंचल “ गांधी के ग्राम स्वराज की भावना को दर्शाते हैं।
2. सत्य और अहिंसा – सियारामशरण गुप्त एवं माखनलाल चतुर्वेदी की कविताओं में गांधी के सत्य और अहिंसा के दर्शन की सुंदर अभिव्यक्ति मिलती है ।
3. सामाजिक मुद्दें- इलाचंद जोशी की लेखनी में वेश्यावृत्ति एवं मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास “निर्मला “ में दहेज की समस्या जैसे सामाजिक मुद्दों पर गांधी के प्रभाव को देखा जा सकता है ।
4. अहंकारी साहित्य – गांधी के जीवन एवं हत्या के बाद “गांधीवादी बवंडर “ ने इंडो -इंग्लिश कथा साहित्य को समृद्ध किया ,जिसमें मुल्कराज आनंद एवं राजाराव जैसे लेखकों में गांधीवादी चेतना को अपने लेखन में प्रकट किया है।
5. दृष्टिकोण का प्रसार- गांधीजी ने अपने दृष्टिकोण तथा विचारों को प्रसार के लिए साहित्य का उपयोग एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में किया । वे अहिंसा तथा सत्य के सिद्धांत को फैलाने के लिए पत्रकारों, लेखकों, तथा साहित्यकारों के साथ-साथ लोक साहित्य , संस्कृति एवं पारंपरिक माध्यमों की भी मदद लेते थे।
निष्कर्ष-
किसी भी व्यक्तित्व और दृष्टिकोण का साहित्य पर प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है तथा उसको निश्चित रूप से सांकेतिक करना बहुत ही कठिन कार्य होता है । महात्मा गांधी जी की रुचि साहित्य में सदैव रही है, उनकी लेखन कला और शैली की विशेषता रही है कि जिनके कारण उन्हें सदैव याद किया जाता रहेगा । वो सरल और प्रत्यक्ष बोलते हैं तथा वैसी ही शैली का उपयोग अपने लेखन में भी करते थे । गांधी जी की शैली सादगी , स्पष्टता तथा सटीकता के लिए जानी जाती थी ।वास्तव में साहित्य में सत्य तथा समकालीन यथार्थ पर गांधी जी के बल ने कथा साहित्य में यथार्थवाद का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने शक्तिशाली संदेश तथा दर्शन से कई लेखकों को प्रेरित किया और भारतीय साहित्य में , विशेष रूप से उत्तर औपनिवेशिक संदर्भ में, एक प्रमुख शक्ति बन गए । उनकी साहित्यिक पत्रकारिता में हिंद स्वराज जैसी कृतियों ने व्यक्तियों तथा समाज को बदलने के लिए साहित्यिक तकनीकों को पत्रकारिता के उद्देश्य के साथ मिश्रित किया । व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज , राष्ट्रधर्म , अध्यात्म, राजनीति, नैतिकता , प्रेम आदि से जुड़ी कई समस्याओं के संदर्भ में गांधीजी को हिंदी साहित्य से सदैव प्रेरणा मिलती रही है और गांधीजी से प्रभावित हो कर कई रचनाकारों ने उन्हें अपनी रचनाओं में किसी ने किसी रूप में स्थान दिया है । इस प्रकार कह सकते हैं कि गांधी जी लोगों के मनो मस्तिष्क में अहिंसा, सत्य, एकता ,प्रेम ,शांति ,सद्भाव, समानता , मानवता , समभाव , की भावना उत्पन्न करने के लिए लगातार संघर्षरत रहे हैं और साहित्य साधना के द्वारा समाज में नए आदर्श और मूल्य स्थापित कर पाए हैं ।
संदर्भ ग्रंथ सूची –
1. गांधी का साहित्य और भाषा चिंतन,
लेखक श्री भगवान सिंह प्र.97
2. गांधी एक भविष्यवाणी, बसंत कुमार मल्लिक , अंग्रेजी में अनुवाद नंदकिशोर आचार्य, वर्ष 2019 प्र.57
3. गांधी चिंतन का महायान ,कुबेरनाथ राय, मनोज कुमार राय ,रामानुज अस्थाना वर्ष 2021,प्र 81
4. सियारामशरण गुप्त, बापू पृष्ठ 05
5. महात्मा गांधी, कर्मवीर , 4 दिसंबर, 1920
6. रामधारी सिंह दिनकर, कुरुक्षेत्र , प्रकाशन 1946
7. संपादक -विजय अग्रवाल , राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (प्रणाम -महादेवी वर्मा),प्रकाशन – प्रकाशन विभाग (1994)
डॉ.परमानंद पाटीदार
सहायक प्राध्यापक,हिंदी
माता जीजाबाई शासकीय(स्वशासी)स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय मोती तबेला इंदौर
ई-मेल -parmanandpatidar124@gmail.com
मोबाईल नम्बर -8889119008






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