भूमिका

भारतीय साहित्य में बीसवीं शताब्दी का काल सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक चेतना के उदय का काल रहा है। इस काल में स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रवाद, अहिंसा, सत्य और स्वदेशी जैसे मूल्य साहित्य के केंद्र में आ गए। इन मूल्यों के प्रवर्तक महात्मा गांधी थे, जिन्होंने भारतीय जीवन और विचार को नई दिशा दी। जब संपूर्ण राष्ट्र में जातीयता, प्रांतीयता,सांप्रदायिकता,भाषावादिता की आग सुलग रही थी,उसे समय महात्मा गांधी ने भारत के पुरातन विचार वसुधैव कुटुंबकम को लेकर सभी को एकता के सूत्र में बांधकर मानवता के प्रचार प्रसार का महत्वपूर्ण कार्य किया। हिंदी साहित्य में अनेक कवि और लेखक गांधीवादी विचारों से प्रभावित हुए, जिनमें भवानी प्रसाद मिश्र का नाम अग्रगण्य है।

भवानी प्रसाद मिश्र न केवल कवि थे, बल्कि एक विचारक, समाज-सुधारक और कर्मशील व्यक्ति भी थे। उनके जीवन और साहित्य में गांधीवादी आदर्शों की गहरी छाप मिलती है। उन्होंने कविता को केवल भावाभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। उनकी कविताएँ और लेख गांधीजी के सत्य, अहिंसा, सादगी, स्वदेशी, श्रम और नैतिकता जैसे सिद्धांतों को अभिव्यक्त करते हैं।

शोध का उद्देश्य

इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य भवानी प्रसाद मिश्र के साहित्य में गांधी दर्शन की उपस्थिति और उसकी अभिव्यक्ति का विश्लेषण करना है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष रूप से विचार किया गया है—

  1. भवानी प्रसाद मिश्र के जीवन पर गांधीवादी विचारों का प्रभाव।
  2. उनकी कविताओं और लेखों में गांधी दर्शन की प्रमुख अभिव्यक्तियाँ।
  3. गांधीवादी जीवन-मूल्यों जैसे सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, श्रम और आत्मनिर्भरता का प्रतिफलन।
  4. मिश्रजी की रचनाओं में सामाजिक चेतना और नैतिक मूल्य का गांधीवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण।

भवानी प्रसाद मिश्र का जीवन और गांधी से संबंध-

भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च 1913 को टिगरिया,होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) में हुआ। माता श्रीमती गोमती देवी के मातृत्व एवं पंडित सीताराम मिश्र के पितृत्व की स्नेहिल छाया में उनका बचपन बीता। उन्होंने प्रारंभ से ही सादगीपूर्ण जीवन अपनाया। जब गांधीजी के असहयोग और स्वदेशी आंदोलनों की लहर पूरे भारत में उठी, तब अत्यंत संवेदनशील हृदय वाले युवा भवानी प्रसाद मिश्र पर भी उसका गहरा प्रभाव पड़ा। वे गांधीजी के विचारों और कार्यों से इतने प्रभावित हुए कि अपने जीवन में उन्होंने गांधी जी के मूल विचारों सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन, स्वदेशी और आत्मसंयम को अपनाया।

डॉ० संतोष कुमार तिवारी के शब्दों में-”गांधी की प्रखर वाणी, तेजस्विता और शालीनता की छाया में कवि का पुष्ट व्यक्तित्व वर्धा में शिक्षकीय जीवन में संलग्न हुआ, राष्ट्रभाषा के प्रचार में रमा और उसने सही अर्थों में समझा तथा समझाया कि हिन्दी में कितना बल है।….  ‘गांधी वाङ्मय’ कवि को गहरी मानववादी चेतना से प्रज्ञा शिखर की सीढ़िया तक ले आया।”

उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और गांधीजी के ‘हिन्दी के प्रचार-प्रसार’ आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। वर्धा के निकट गांधीजी की शिक्षा-धारा “नई तालीम” से भी वे जुड़े। यही कारण है कि उनके जीवन और लेखन दोनों में गांधीवादी सरलता, सादगी और सच्चाई का भाव दृष्टिगोचर होता है।

 भवानी प्रसाद मिश्र की काव्य-दृष्टि और गांधी दर्शन-

भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में जीवन का यथार्थ, मानवीय करुणा, नैतिकता और आत्मसंयम की भावना प्रमुख है। वे कविता को केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन का प्रतिबिंब मानते हैं।  ‘सप्तक’ के प्रमुख कवि होने के नाते उन्होंने अपने ‘वक्तव्य’ में लिखा है दर्शन में अद्वैत, वाद में गांधी का और टेकनीक में सहज लक्ष्य ही मेरे बन जाये-ऐसी कोशिश है।” युग कितना ही हिंसा से क्यों न भरा हो,लेकिन उस हिंसा को तोड़ने का अचूक माध्यम सिर्फ अहिंसा और प्रेम ही है। गांधी जी के इस विचार से वे गहरे तक प्रभावित थे ।गांधीजी की तरह वे भी “कविता” को “सत्य” से जोड़ते हैं। उनकी रचना ‘सतपुड़ा के जंगल’ में प्रकृति, श्रम और सादगी का यथार्थ चित्रण मिलता है।

भवानी प्रसाद मिश्र प्रेम के पुजारी गांधी की शपथ दिलाता हुआ कुछ आक्रोश से भरकर कहता है-

है शपथ तुम्हें करुणाकर की,

 है शपथ तुम्हें उसे नंगे की,

 जो स्नेह भीख की मांग मांग,

 मर गया कि उसे भीखमांगे की!

 हे सखा बात से नहीं

 स्नेह से काम जरा लेकर देखो

 अपने अंतर में नेह

 अरे, देकर देखो । (दूसरा सप्तक)

उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे उपदेश नहीं देते, बल्कि सहज भाषा में जीवन के सत्य प्रस्तुत करते हैं। यही शैली गांधीजी की शिक्षाओं की तरह सीधे हृदय को छूती है।

गांधीवादी आदर्शों की अभिव्यक्ति-

(क) सत्य और अहिंसा का तत्व

गांधीजी के दर्शन की आधारशिला सत्य और अहिंसा है। भवानी प्रसाद मिश्र की रचनाओं में यह सिद्धांत बार-बार व्यक्त होता है। वे मनुष्य को सत्यनिष्ठ, सहिष्णु और नैतिक बनने की प्रेरणा देते हैं। कवि का कथन है -”गांधी पंचशती में मैंने गांधी पर कम गांधी के विचार पर ज्यादा कविताएं लिखी है -गांधी के विचार मेरे विचार बनकर कविता में उतरे हैं, जो एक बड़ी बात है।” गांधी जी के सर्वोदयी चिंतन को ग्रहण करते हुए भवानी प्रसाद मिश्र ने कविताओं एवं साहित्य में इस विचारधारा को उकेरा है। उनकी कविता ‘सत्य बोलना अच्छा है’ में वे लिखते हैं—

“सत्य बोलना अच्छा है,

पर इतना नहीं कि चोट लगे।”

यहाँ कवि गांधीजी की तरह ‘सत्य’ को जीवन का मार्ग मानते हुए भी उसकी व्यावहारिकता को स्वीकार करते हैं।

(ख) सादगी और स्वदेशी की भावना

गांधीजी का जीवन सादगी और स्वदेशी का प्रतीक था। भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘कपड़े और हम’ में यह भावना झलकती है—

“कपड़े उतने ही पहनूँ

जितने से तन ढँक जाए,

फैशन नहीं, आवश्यकता जानूँ।”

यह गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन और सादगीपूर्ण जीवन की सीधी अभिव्यक्ति है। वे उपभोक्तावाद के विरोधी थे और आत्मनिर्भरता के समर्थक।

मिश्र जी ने बाहरी दिखावे की अपेक्षा आंतरिक शक्ति और सुंदरता पर बल दिया है। वे कहते हैं-

उसे ही मानो बहुत

जो कुछ तुम्हारे पास है मन- 

यह की भीतर है तुम्हारे पास चिंतामणि नगीना

यह कि भीतर है तुम्हारे पास झंकृत एक वीणा

यह नगीना और यह वीणा तुम्हें सब दे सकेंगे 

इन्हीं के बल पर कि तुमसे हो सकेगा ठीक जीना

और बाहर से मिलेगा जो कि सो आभास है मन।

(ग) श्रम और कर्मयोग

गांधीजी श्रम को पूजा मानते थे। श्रम गांधी जी के लिए जीवन का उल्लास था,तो श्रम विहीन जीवन निरर्थक! श्रम और कर्म के बल पर ही हम नए भारत का निर्माण कर सकते हैं, गांधी जी के सपने को पूरा कर सकते हैं।।भवानी प्रसाद मिश्र भी श्रम और कर्म के महत्व पर बल देते हैं। उनकी कविता ‘काम के आदमी’ में वे लिखते हैं—

 “जो काम के आदमी हैं,

वही असली आदमी हैं।”

श्रम के महत्व का प्रतिपादन करते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

श्रम से छूंछी हर एक चीज वह भले व्यक्ति हो या समाज,

मिट जाने वाली है निश्चय।

इसी तरह मिश्र जी कहते हैं-

कोरा श्रम,कोरा शब्द एक बंधन भर है

जो कर्म ज्ञान से बद्ध नहीं वह एक भार 

जो ज्ञान कर्म से सिंचा नहीं वह अपत बार

 उस अपत कंटीली डाली से फल की आशा

 जो राहता श्रम को दे न सके वह क्या भाषा?

यह विचार गांधीजी के ‘सर्वोदय’ और ‘सर्व श्रम समान’ की अवधारणा को साकार करता है।

मिश्र जी श्रमबद्ध सभ्यता के निर्माण का मार्गदर्शक गांधी जी के विचारों को मानते हैं । वे लिखते हैं-

भारत ने नींव सभ्यता की श्रमबद्ध शब्द पर बांधी है, पिछले वर्षों में देखा है हमने गांधी में वह स्वरूप।’

(घ) शिक्षा और नई तालीम का विचार

भवानी प्रसाद मिश्र गांधीजी की ‘नई तालीम’ के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि शिक्षा जीवन से जुड़ी होनी चाहिए, केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं। उन्होंने स्वयं शिक्षा को समाज-सुधार और नैतिकता का माध्यम माना।

उनकी रचनाओं में शिक्षा को आत्मनिर्भरता और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा गया है। यह दृष्टि गांधीजी की व्यावहारिक शिक्षा प्रणाली से मेल खाती है।

(ङ) मानवता और करुणा

गांधीजी की तरह भवानी प्रसाद मिश्र भी हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखते हैं। उनकी कविताएँ वर्ग, जाति, धर्म से परे मानवीय एकता का संदेश देती हैं। ‘नागरिक शास्त्र’ कविता में वे कहते हैं—

 “हम सब एक हैं,

भेद जो दिखता है,

वह हमारी आँखों का दोष है।”

भारत के किसान की दारूण स्थिति को देखकर, उनकी स्त्रियों को गोबर और कूड़े से सना हुआ देखकर मिश्र जी लिखते हैं –

सुबह की ठंडी हवा कपड़े नहीं है 

पांव रखते हैं कहीं पढ़ने कहीं है

पांव जिसमें गति नहीं कम्पन बहुत है

प्राण में जीवन नहीं तड़पन बहुत है 

धूल गोबर और कचरे में भरी-सी 

देवियां निकली वहां जीवित मरी सी।

यह गांधीजी के ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘सर्वजन हिताय’ के सिद्धांत की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

परायी पीर को अनुभूत करने वाले गांधी जी के इस भाव को चरितार्थ करने वाली मिश्र जी की निम्न पंक्तियां देखिए-

‘बसे वह प्यार की बस्ती

कि जिसमें हर किसी का दुख मेरा शूल हो जाये,

मुझे तिरसूल भी मारे कोई यदि तो दूर करने में उसे,

तो फूल हो जाये।’

भाषा और शैली में गांधीवादी सरलता-

भवानी प्रसाद मिश्र की भाषा अत्यंत सहज, बोलचाल की और लोकजीवन से जुड़ी हुई है। वे कृत्रिमता और आडंबर से दूर रहते हैं। यह गांधीवादी सादगी का ही प्रभाव है। उनकी कविताएँ बौद्धिक जटिलता से मुक्त हैं, परंतु विचारों में गहराई लिए हुए हैं।

वे कठिन शब्दों के स्थान पर जनभाषा का प्रयोग करते हैं ताकि हर वर्ग का व्यक्ति उनके विचारों को समझ सके। यह दृष्टि गांधीजी के ‘जन-भाषा में संवाद’ की परंपरा का ही विस्तार है। गांधी जी हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। विदेशी प्रभाव के कारण अंग्रेजी का वर्चस्व लगाकर बढ़ रहा था। इसके पक्ष में गांधी जी बिल्कुल नहीं थे। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में भी इस तरह का विचार झलकता है। वे लिखते हैं-

‘मेरे फूल बहुत बतियाना अंग्रेजी में बंद करो, 

यदि माली समझा नहीं निरर्थक मर जाओगे,

और वह समझ गया तो कलम तुम्हारी यह बांधेगा,

अगर वक्त के पहले भी तुम झर जाओगे।’

मिश्र जी भी अंग्रेजी के स्थान पर जन-भाषा के प्रयोग के ही पक्षधर हमेशा रहे।

 सामाजिक चेतना और नैतिक दृष्टि-

भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं में समाज के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है। वे अन्याय, हिंसा, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं। यह स्वर गांधीजी की सामाजिक और नैतिक चेतना से प्रेरित है।

उनकी कविता ‘हम तो केवल बात करेंगे’ में वे कहते हैं—

 “हम तो केवल बात करेंगे,

सच की, साफ की बात करेंगे।”

यहाँ कवि सत्य की रक्षा को मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं।

गांधीजी शांति और अहिंसा के प्रबल पक्षधर थे।

मिश्र जी का मानना है कि गांधी जी के अहिंसा और प्रेम के सिद्धांत पर चलकर ही शांति स्थापित हो सकती है, इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

वे लिखते हैं –

शांति अगर आई पृथ्वी पर बिना बात गांधी की माने,

 तो कितने दिन की होगी वह,कौन कहे,कोई क्या जाने।

गांधीवादी दर्शन का रचनात्मक प्रभाव-

भवानी प्रसाद मिश्र के साहित्य में गांधी दर्शन केवल वैचारिक रूप में नहीं, बल्कि रचनात्मकता के स्तर पर भी प्रकट होता है। उन्होंने कविता को ‘सेवा’ का माध्यम बनाया। गांधीजी के समान, उन्होंने साहित्य को जीवन और कर्म से जोड़ा।

उनकी रचनाओं में गांधीवादी आदर्श केवल उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य के रूप में प्रकट होते हैं — यही उनकी विशिष्टता है।

गांधी दर्शन और भवानी प्रसाद मिश्र की प्रासंगिकता-

आज के भौतिकवादी युग में जब उपभोक्तावाद, हिंसा, असमानता और नैतिक पतन बढ़ रहा है, तब भवानी प्रसाद मिश्र का साहित्य और गांधी दर्शन दोनों ही अत्यंत प्रासंगिक हैं।

उनकी कविताएँ आज भी मनुष्य को सादगी, प्रेम, सत्य और आत्मसंयम की ओर लौटने की प्रेरणा देती हैं। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि विकास का मार्ग केवल भौतिक उन्नति में नहीं, बल्कि नैतिकता और मानवता में है।

गांधी दर्शन त्यागमय, कर्तव्यमय भाव भूमि पर खड़ा है। देश-माता के व्यक्तित्व की छवि प्रस्तुत करते हुए मिश्र जी कहते हैं-

“ जन्म दिवस आया बाबू का तुमने एक तनिका-सा दीपक

मन में मंगल चिह्न मानकर जला दिया जो

तो बापू ने कहा जन्मभर साथ रही और मुझे न समझा 

मेरे घर में घी का दीपक

जब किसान को घी का दर्शन तक मुश्किल है 

यों आदर्शों के हिसाब से बापू थे हर बार सही न

लेकिन तुम भी कुछ गलत नहीं थी।”

निष्कर्ष-

भवानी प्रसाद मिश्र के साहित्य में गांधी दर्शन का समावेश अत्यंत स्वाभाविक और गहरा है। उन्होंने गांधीजी के आदर्शों को केवल स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उन्हें अपने जीवन और लेखन दोनों में जिया।

उनकी कविताएँ सत्य, अहिंसा, श्रम, सादगी, स्वदेशी और मानवता जैसे गांधीवादी मूल्यों की सजीव व्याख्या हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि साहित्य समाज को बदलने की शक्ति रखता है, बशर्ते वह सत्य और नैतिकता पर आधारित हो।

डॉ०संतोष तिवारी  लिखते हैं -”गांधी से ही कवि ने निष्कालुष शब्द, निष्कलुष छंद और गीतों का वर मांगा है, जो सत्यं, शिवम्, सुंदरम की प्रतिष्ठा कर सके। गुप्त जी के बाद मिश्र जी  को ही गांधी दर्शन का सबसे बड़ा कवि माना जाएगा।”

इस प्रकार भवानी प्रसाद मिश्र का काव्य न केवल साहित्यिक सौंदर्य का उदाहरण है, बल्कि गांधीवादी जीवन-दर्शन की एक सजीव व्याख्या भी है।

संदर्भ सूची

1.तिवारी, डॉ० संतोष कुमार, भवानी मिश्र की काव्य यात्रा, भारतीय ग्रंथ निकेतन नई दिल्ली।

  1. मिश्र, भवानी प्रसाद , काव्य-संग्रह: बुनी हुई रस्सी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
  1. गांधी, मोहनदास करमचंद ,सत्य के प्रयोग, नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद।
  1. मिश्र, भवानी प्रसाद,गीत फटे बैनरों के, भारतीय ज्ञानपीठ।
  1. श्रीवास्तव, हरिशंकर ,भवानी प्रसाद मिश्र: जीवन और काव्य दृष्टि, साहित्य अकादमी, दिल्ली।
  1. शर्मा, रामविलास, हिंदी साहित्य और गांधी विचारधारा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।
  1. तिवारी, नामवर सिंह — कविता के नए प्रयोग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।

आशा राठौर,

सहायक प्राध्यापक-हिन्दी,
श्री राघवेंद्र सिंह हजारी शासकीय महाविद्यालय हटा,
दमोह ( मध्य प्रदेश)