राष्ट्रपिता ,बापू ,सत्यवादी ,अहिंसावादी , सत्याग्रही, स्वतंत्रता संग्राम के नायक ,भारतीय जनता का नेतृत्व करने वाले मोहनदास गांधी पिता कर्मचंद व माँ पुतलीबाई की सबसे छोटी संतान थे ।राजकोट के दीवान की संतान होने का लाभ मोहनदास ले सकते थे लेकिन भारतीय जनता की असहाय , जीर्ण शीर्ण अवस्था को देख अपने तन के सूट -बूट को त्याग कर अर्ध नग्न रहने का फैसला करने वाले गांधी ने अपने जीवन को उदाहरण बना कर प्रस्तुत किया और स्पष्ट कहा – “ मेरा जीवन ही मेरा संदेश है ।”
ईमानदारी ,समय की पाबंदी और उद्देश्य परक दृष्टिकोण वे कुछ विशेष गुण थे जो बचपन से ही गांधी जी के व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुके थे और जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को विलक्षण बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई ।
प्रत्येक भाषा के साहित्य में अंतर्निहित मूल्य ,आस्था ,विश्वास संस्कार गांधी जी के सिद्धांतों का मूल रहे ।सत्य ,अहिंसा , ब्रह्मचर्य ,अस्वाद,अस्तेय ,अपरिग्रह ,अभय ,
कायिक श्रम ,सर्वधर्म समभाव,नम्रता आदि गुण मोहनदास को महात्मा गांधी बनाते हैं ।गांधी जी ने व्यक्ति को समाज की छोटी मगर महत्वपूर्ण इकाई माना है ।व्यक्ति का आचरण और जीवन सिद्धांत उदात्त ,अटल और शुद्ध होंगे तभी समुदाय ,समाज ,राष्ट्र ,विश्व व सम्पूर्ण सृष्टि का मंगल होगा ।गांधी जी स्वतंत्रता सेनानी , पत्रकार ,दूरदर्शी विचारक होने के साथ साथ ईमानदार लेखक भी थे । उन्होंने “हिन्द स्वराज “,”दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह “, “गीता माता “ जैसी कई पुस्तकें और अनगिनत लेख लिखे । “यंग इंडिया “, “हरिजन “, “ इंडियन ओपिनियन “ जैसी पत्रिकाओं व अख़बारों का संपादन भी किया ।उनके द्वारा लिखित आत्मकथा “सत्य के प्रयोग “ एक महत्वपूर्ण कृति है जो सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनुभवों और प्रयोगों का वर्णन करती है । गांधी जी का सम्पूर्ण जीवन सत्य के प्रयोगों से ओत प्रोत रहा है । आत्मकथा की प्रस्तावना में गांधी जी ने लिखा है – “ ….राजनीति के क्षेत्र में हुए मेरे प्रयोगों को तो अब हिंदुस्तान मानता है ;यही नहीं बल्कि थोड़ी बहुत मात्र में सभ्य कही जाने वाली दुनिया भी उन्हें जानती है । मेरे मन में इसकी क़ीमत कम से कम है । और इसलिए इन प्रयोगों के द्वारा मुझे “महात्मा “ का जो पद मिला है , उसकी क़ीमत भी कम ही है । कई बार तो इस विशेषण ने मुझे बहुत अधिक दुख भी दिया है । मुझे ऐसा एक भी क्षण याद नहीं है , जब इस विशेषण के कारण मैं फूल गया होऊँ लेकिन अपने आध्यात्मिक प्रयोगों का , जिन्हें मैं ही जान सकता हूँ और जिनके कारण राजनीति के क्षेत्र में मेरी शक्ति भी जन्मी है , वर्णन करना मुझे अवश्य ही अच्छा लगेगा । अगर ये प्रयोग सचमुच आध्यात्मिक हैं इनमें गर्व करने की गुंजाइश ही नहीं ।इनसे तो केवल नम्रता की ही वृद्धि होगी । ज्यों -ज्यों मैं विचार करता जाता हूँ , भूतकाल के अपने जीवन पर दृष्टि डालता जाता हूँ , त्यों -त्यों अपनी अल्पता मैं स्पष्ट ही देख सकता हूँ ।मुझे जो करना है , तीस वर्षों से मैं जिसकी अटूट भाव से रट लगाए हुए हूँ , वह तो आत्मदर्शन है ,ईश्वर का साक्षात्कार है , मोक्ष है । मेरे सारे काम इसी दृष्टि से होते हैं । मेरा सब लेखन भी इसी दृष्टि से होता है ; और राजनीति के क्षेत्र में मेरा पड़ना भी इसी दृष्टि के अधीन है ।” आत्म साक्षात्कार के लिए जिज्ञासु जीवात्मा का अध्यात्म और दर्शन से जैसा नाता होता है वही गांधी जी का था अन्य सभी भौतिक उपलब्धियाँ उनके लिए गौण थी ।
सत्य के प्रति जैसा अटूट आग्रह गांधी जी के जीवन ,व्यवहार व साहित्य में दिखाई देता है वह उनके व्यक्तित्व को अद्वितीय बनाता है । वे स्वयं को सत्य -शोधक कहते थे । “नवजीवन “ में 1924 में गांधी जी ने लिखा है -“ मैं तो एक सत्य शोधक हूँ ।अपने देश की मैं जो सेवा कर रहा हूँ वह तो मेरी साधना का एक अंग है जिसके द्वारा मैं इस पाँच भौतिक शरीर में आत्मा की मुक्ति की कामना करता हूँ ।”
यों तो गांधी जी जैसा व्यक्तित्व सदियों में जन्म लेता है बल्कि अल्बर्ट आइंस्टाइन के शब्दों में कहा जाए तो – “ आने वाली पीढ़ियाँ इस बात पर शायद ही यकीन करेंगी कि हाड़ – मांस का बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति किसी समय इस पृथ्वी पर था ।” मानवता के लिए मर मिटने का जज्बा और सर्व कल्याण की भावना उनके देश प्रेम को सार्वकालिक और यथार्थवादी बनाती है । विलक्षण गुणों के कारण ही आइंस्टाइन की कहीं बात सही सिद्ध हो रही है और पूरा एक वर्ग महात्मा गांधी की अदभुतता को नज़रअंदाज़ करके उन्हें अति साधारण मनुष्य साबित कर देने की मुहिम चलाना चाहता है । अपनी किशोरावस्था में “सत्यवादी हरिश्चंद्र “ नाटक से पूरी तरह प्रभावित महात्मा गांधी ने अपने जीवन की गाँठ में कस कर सत्य को ऐसा बाँधा कि सत्य उनकी पहचान बन गया । मृत्युपर्यंत उन्होंने अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया । व्यक्तिगत रूप से जो दो बातें मुझे महात्मा गांधी के बारे में बार – बार सोचने को विवश भी करती हैं और मस्तक को नत भी करती हैं वे हैं अपने बीमार पिता के प्रति उनका समर्पित सेवा भाव और दूसरा अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का साहस । मनुष्य महान इसलिए नहीं बनता कि वह कोई करिश्माई गुण लेकर अवतरित होता है या गुणों का अकूत खजाना होता है , कोई भी साधारण मनुष्य महान तब होता है जब वह साधारण से असाधारण हो जाने की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है , अपनी खामियों को बिना दुराव छिपाव के बताता है , उन पर चर्चा करने का साहस करता है और उन खामियों में निरंतर सुधार करने जितना श्रम , कर्मठता , समर्पण और भावना रखता है । साधारण से असाधारण हो जाना और असाधारण से पुन: साधारण ,सरल ,सहज ,विनम्र हो जाना ही वह वृत्त है जो जब पूरा होता है तो मोहनदास के महात्मा बनने की प्रक्रिया पूरी होती है ।
घुँघरू परमार के शब्दों में –
कोई इतना सरल कि
एक ही रेखा में खिंच जाए
उनका चित्र
कोई इतना सहज कि
कृषकाय बालक भी एक लाठी
ऐनक घुटनों तक की धोती में
ओढ़ ले उनका व्यक्तित्व
…..
इसी देश में मजबूरी का नाम गांधी हो गया
जबकि आज भी हमारे लिए मजबूती का नाम गांधी है …..

गांधी जी को केंद्रित कर निकले गए सहचर ई पत्रिका के इस चौंतीसवां अंक में आपको गांधी जी पर भिन्न -भिन्न विचार पढ़ने को मिलेंगे ।हो सकता है हम सबके विचारों से सहमत ना भी हों लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि गांधी जी हमारे देश में जन्मे वह महापुरुष हैं जिनके सिद्धांतों और व्यक्तित्व का लोहा पूरा विश्व आज भी मानता है । समय कितना भी बदल जाए तकनीक कितनी भी उन्नत हो जाए और सभ्यता कितनी भी पुरानी हो जाए न तो महात्मा गांधी कभी अप्रासंगिक हो सकते हैं न उनका दर्शन और सिद्धांत ।
सहचर हिंदी संगठन के अध्यक्ष व सहचर ई पत्रिका के संपादक आदरणीय डॉ आलोक रंजन पांडेय जी का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद कि इस अंक के संपादन का दायित्व मुझे सौंपा ।
सुधि पाठकों को नव वर्ष की
अग्रिम बधाई व
मंगलकामनाओं के साथ

संपादक 
डॉ. आलोक रंजन पांडेय
अतिथि संपादक
प्रो बबीता काजल
आचार्य एवं विभागाध्यक्ष
चौधरी बल्लूराम गोदारा राजकीय कन्या महाविद्यालय ,श्रीगंगानगर