
सारांश
यह शोध-आलेख कन्नड गद्य साहित्य में महात्मा गांधी के विचारों की साहित्यिक अभिव्यक्ति और वैचारिक प्रभाव का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। गांधी-विचार—जैसे सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ग्रामस्वराज, श्रम की प्रतिष्ठा और सामाजिक समानता—कन्नड उपन्यास, निबंध तथा आत्मकथात्मक गद्य में विविध रूपों में अभिव्यक्त हुए हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ से लेकर उत्तर-स्वतंत्रता काल तक, कन्नड गद्यकारों ने गांधी को नैतिक आदर्श, सामाजिक आलोचक और मानवीय मूल्यों के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। यह आलेख डी. वी. गुंडप्पा, के. शिवराम कारंत और ए. एन. कृष्णराव (आना. क्रि.) जैसे प्रमुख लेखकों की कृतियों के आलोक में गांधी-विचार की वैचारिक प्रासंगिकता, सामाजिक हस्तक्षेप और आलोचनात्मक पुनर्पाठ का अध्ययन करता है।
मुख्य शब्द (Keywords): कन्नड गद्य साहित्य; गांधी-विचार; सत्य-अहिंसा; ग्रामस्वराज; सामाजिक सुधार; स्वदेशी; नैतिक चेतना
- भूमिका
बीसवीं शताब्दी का भारतीय साहित्य स्वतंत्रता आंदोलन, औपनिवेशिक दमन और सामाजिक पुनर्रचना की आकांक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस ऐतिहासिक संदर्भ में महात्मा गांधी का व्यक्तित्व और विचार साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का केन्द्रीय स्रोत बना। कन्नड साहित्य, विशेषतः गद्य विधाओं में, गांधी-विचार ने राजनीतिक चेतना के साथ-साथ सामाजिक और नैतिक विमर्श को भी दिशा दी। कन्नड गद्यकारों ने गांधी को केवल राष्ट्रीय नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नैतिक आदर्श के रूप में देखा, जिसकी प्रासंगिकता व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों स्तरों पर है।
यह आलेख इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कन्नड गद्य साहित्य में गांधी-विचार का स्वरूप स्थिर नहीं, बल्कि समय और सामाजिक संदर्भ के अनुसार विकसित और पुनर्परिभाषित होता रहा है।
- गांधी-विचार का सैद्धांतिक आधार
गांधी-विचार का सैद्धांतिक आधार भारतीय दार्शनिक परंपरा, विशेषतः उपनिषद, जैन-बौद्ध अहिंसा-दर्शन तथा आधुनिक नैतिक मानवता वाद से निर्मित हुआ है। गांधी के लिए विचार और कर्म का द्वैत नहीं, बल्कि उनका अभिन्न संबंध है। इसीलिए गांधी-विचार केवल राजनीतिक रणनीति न होकर एक समग्र जीवन-दर्शन के रूप में विकसित होता है।
2.1 सत्य (सत्याग्रह):गांधी के दर्शन में ‘सत्य’ सर्वोच्च नैतिक मूल्य है। सत्य को वे केवल तथ्यात्मक यथार्थ नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक सत्य मानते हैं। सत्याग्रह इसी सत्य की सक्रिय साधना है, जिसमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष हिंसा के बिना किया जाता है। गांधी लिखते हैं—
“Truth is not merely what we think to be true; it is that which can be lived and suffered for.” (Gandhi, The Story of My Experiments with Truth, p. 14)
कन्नड गद्य साहित्य में यह सत्याग्रही दृष्टि उन पात्रों में प्रकट होती है, जो सामाजिक अन्याय के सामने नैतिक दृढ़ता बनाए रखते हैं।
2.2 अहिंसा:अहिंसा गांधी-विचार की केन्द्रीय अवधारणा है। यह कायरता नहीं, बल्कि नैतिक साहस का उच्चतम रूप है। अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा का अभाव नहीं, बल्कि विचार, वाणी और कर्म—तीनों स्तरों पर करुणा और संयम है। कन्नड गद्यकारों ने अहिंसा को सामाजिक संघर्ष की नैतिक शक्ति के रूप में चित्रित किया है।
2.3 स्वदेशी और आत्मनिर्भरता:स्वदेशी गांधी के आर्थिक दर्शन का मूल तत्व है। इसका आशय केवल देशी वस्तुओं के उपयोग से नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों, श्रम और कौशल के सम्मान से है। कन्नड ग्रामीण-आधारित गद्य में स्वदेशी का यह स्वरूप आत्मनिर्भर समाज की कल्पना के रूप में उभरता है।
2.4 ग्रामस्वराज:ग्रामस्वराज गांधी के सामाजिक दर्शन का आदर्श रूप है। इसमें विकेंद्रीकृत सत्ता, आत्मनिर्भर ग्राम-समुदाय और नैतिक नेतृत्व की परिकल्पना निहित है। कन्नड गद्य साहित्य में ग्रामस्वराज का विचार ग्रामीण जीवन की समस्याओं और संभावनाओं के यथार्थ चित्रण के माध्यम से व्यक्त हुआ है।
2.5 ट्रस्टीशिप और सामाजिक समानता:गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत संपत्ति और सत्ता के नैतिक उपयोग पर बल देता है। इसके अनुसार संपन्न वर्ग समाज का ‘ट्रस्टी’ है, स्वामी नहीं। कन्नड गद्य में यह विचार वर्ग-विभाजन और आर्थिक शोषण की आलोचना के रूप में परिलक्षित होता है।
- के. शिवराम कारंत
(i) चोमना दूडी (ಚೋಮನ ದುಡಿ )
- विषय: श्रम, शोषण और मानवीय गरिमा स्थापित करना।
- ट्रस्टीशिप का संकेत:भूमिधर और श्रमिक के संबंध में नैतिक उत्तरदायित्व का प्रश्न। संपत्ति को निजी भोग नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में देखने की गांधीवादी दृष्टि चोमन दूदि में हम देखा सकते हैं।
- सामाजिक समानता:श्रमिक वर्ग की मानवीय प्रतिष्ठा और आर्थिक अन्याय की तीखी आलोचना इस उपन्यास में मिलता है।लेखक का संकेत है कि श्रम को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मानवीय मूल्य के रूप में स्थापित करना—यह गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत का साहित्यिक रूपांतरण है।
(ii) मूकज्जीया कनसु (ಮೂಕಜ್ಜಿಯ ಕನಸು)
- विषय: परंपरा, नैतिकता और सामुदायिक जीवन को दर्शाता है ।
- ट्रस्टीशिप:ज्ञान, संपत्ति और अनुभव को समाज की साझा पूँजी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।जाति, वर्ग और लिंग-भेद से ऊपर मानवीय संबंधों की स्थापना इस उपन्यास में हम देख सकते हैं ।
- ए. एन. कृष्णराव (आना. क्रि.)
सामाजिक उपन्यास/ ಸಾಮಾಜಿಕ ಚಿಂತನೆ
- विषय: जाति-व्यवस्था, आर्थिक विषमता, शोषण
- ट्रस्टीशिप:पूँजी और सत्ता के नैतिक उपयोग की अपेक्षा—संपन्न वर्ग को ‘सेवक’ के रूप में देखने की गांधीवादी दृष्टि।
- सामाजिक समानता:अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव का प्रत्यक्ष विरोध।संपत्ति अधिकार नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व है—यह भाव गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत का मूल है।
- डी. वी. गुंडप्पा (D. V. Gundappa)
निबंध-साहित्य
- विषय: नैतिकता, कर्तव्य-बोध
- ट्रस्टीशिप:व्यक्ति को समाज के प्रति उत्तरदायी नैतिक इकाई के रूप में देखना।
- समानता:नैतिक दृष्टि से सभी मनुष्यों की समान गरिमा पर बल दिया है।गुंडप्पा का ट्रस्टीशिप आर्थिक कम, नैतिक अधिक है—जो गांधी के नैतिक मानवतावाद से जुड़ता है।
- बसवराज कट्टीमनी
जन्म भूमि (ಜನ್ಮಭೂಮಿ)
- विषय: स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक चेतना को दर्शाने की कोशिश इस में हुआ है ।
- ट्रस्टीशिप:राष्ट्र और समाज के प्रति त्याग और दायित्व बोध ।शोषित और वंचित वर्ग के अधिकारों पर केंद्रित दृष्टि ढाला गया है।
- कुवेंपु (गद्य रचनाएँ)
निबंध ( ವಿಚಾರ ಮಂಜರಿ)
- विषय: विश्व-मानव (Vishva-Manava) की अवधारणा
- ट्रस्टीशिप:मानव को सम्पूर्ण सृष्टि का नैतिक संरक्षक मानना।जाति, धर्म, राष्ट्र से परे मानवीय समानता को दर्शाया गया है।
- कन्नड गद्य साहित्य में गांधी-विचार का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
कन्नड गद्य में गांधी-विचार का प्रवेश मुख्यतः स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में हुआ। असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और हरिजन आंदोलन का प्रभाव तत्कालीन कन्नड लेखन पर पड़ा। पत्रिकाओं, निबंधों और सामाजिक लेखों के माध्यम से गांधीवादी विचार जनमानस तक पहुँचे।
स्वतंत्रता के पश्चात् भी कन्नड गद्यकारों ने गांधी-विचार को सामाजिक पुनर्निर्माण के संदर्भ में पुनः व्याख्यायित किया। अब प्रश्न केवल औपनिवेशिक सत्ता का विरोध नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत में नैतिक पतन, वर्ग-विभाजन और ग्रामीण संकट का समाधान था।
3.1 स्वतंत्रता आंदोलन-पूर्व पृष्ठभूमि
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में कन्नड गद्य साहित्य पर राष्ट्रीय चेतना का प्रभाव बढ़ने लगा था। उस समय तक सामाजिक सुधार, जाति-उन्मूलन और शिक्षा जैसे विषय प्रमुख थे। गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के साथ ही सत्य, अहिंसा और स्वदेशी जैसे विचार कन्नड पत्रिकाओं, निबंधों और सामाजिक लेखों के माध्यम से प्रसारित होने लगे।
3.2 स्वतंत्रता आंदोलन काल (1920–1947)
यह काल कन्नड गद्य साहित्य में गांधी-विचार की सशक्त उपस्थिति का दौर माना जाता है। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह ने कन्नड लेखकों को नैतिक प्रतिरोध की नई भाषा प्रदान की। इस समय के गद्य लेखन में गांधी एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व से अधिक, जन-आदर्श और नैतिक नेतृत्व के प्रतीक बनकर उभरते हैं।
कन्नड निबंधों और सामाजिक लेखों में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी के प्रयोग और ग्रामोत्थान जैसे विषय व्यापक रूप से दिखाई देते हैं। लेखक यह मानने लगे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब सामाजिक और नैतिक स्वतंत्रता भी प्राप्त हो।
3.3 उत्तर-स्वतंत्रता काल और पुनर्पाठ
1947 के बाद कन्नड गद्य साहित्य में गांधी-विचार का स्वर आलोचनात्मक और पुनर्व्याख्यात्मक हो गया। अब प्रश्न यह था कि स्वतंत्र भारत में गांधी के आदर्श किस सीमा तक व्यवहारिक हैं। औद्योगीकरण, शहरीकरण और वर्ग-संघर्ष के संदर्भ में गांधीवादी ग्रामस्वराज, अहिंसा और ट्रस्टीशिप की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाए गए।
इस चरण में के. शिवराम कारंत, आना. क्रि. और अन्य यथार्थवादी लेखकों ने गांधी-विचार को सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर परखा। कहीं यह विचार नैतिक आदर्श के रूप में स्वीकार किया गया, तो कहीं इसकी सीमाओं को रेखांकित किया गया।
3.4 समकालीन संदर्भ
समकालीन कन्नड गद्य में गांधी-विचार पूर्णतः अनुपस्थित नहीं है, बल्कि नए संदर्भों में पुनः उभरता है—जैसे सामाजिक न्याय, पर्यावरण चेतना और वैकल्पिक विकास। इस प्रकार गांधी-विचार ऐतिहासिक स्मृति से आगे बढ़कर जीवंत वैचारिक परंपरा के रूप में कन्नड गद्य साहित्य में बना रहता है।
- प्रमुख कन्नड गद्यकार और गांधी-विचार: कन्नड गद्य साहित्य में गांधी-विचार का स्वरूप विभिन्न लेखकों के यहाँ अलग-अलग रूपों में विकसित हुआ है। किसी के यहाँ यह नैतिक आदर्श के रूप में, किसी के यहाँ सामाजिक यथार्थ के आलोचनात्मक उपकरण के रूप में, तो किसी के यहाँ मानवीय समानता और करुणा के दर्शन के रूप में प्रकट होता है। प्रमुख कन्नड गद्यकारों के संदर्भ में गांधी-विचार का विवेचन निम्नवत् किया जा सकता है—
4.1 डी. वी. गुंडप्पा (D. V. Gundappa)
डी. वी. गुंडप्पा के निबंधात्मक गद्य में गांधी-विचार का नैतिक और दार्शनिक स्वरूप स्पष्ट है। उनकी कृति मंकुतिम्मन काग्ग यद्यपि काव्यात्मक है, परंतु उनके गद्य निबंधों में आत्मसंयम, कर्तव्य और नैतिक विवेक की गांधीवादी चेतना दिखाई देती है। गुंडप्पा मानते हैं कि नैतिकता के बिना राजनीति और समाज दोनों दिशाहीन हो जाते हैं। उनके एक निबंध में वे लिखते हैं—“ಮಾನವನ ಜೀವನದಲ್ಲಿ ನೀತಿ ಇಲ್ಲದಿದ್ದರೆ, ಜ್ಞಾನವೂ ಶಕ್ತಿಯೂ ವ್ಯರ್ಥವಾಗುತ್ತದೆ।” (गुंडप्पा, ಚಿಂತನೆಗಳು, पृ. 42)यह कथन गांधी के उस विचार से साम्य रखता है जिसमें वे कहते हैं कि नैतिक साधनों के बिना कोई भी लक्ष्य सार्थक नहीं हो सकता।
4.2 के. शिवराम कारंत: के. शिवराम कारंत के उपन्यासों में गांधी-विचार सामाजिक यथार्थ के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। चोमन दूडी (ಚೋಮನ ದುಡಿ) में श्रमिक जीवन और शोषण के यथार्थ चित्रण के साथ श्रम की गरिमा को रेखांकित किया गया है। उपन्यास का कथावाचक स्पष्ट करता है—“ಕೆಲಸ ಮಾನವನ ಗೌರವ; ಅದನ್ನು ಕಳೆದುಕೊಂಡರೆ ಜೀವನವೇ ಶೂನ್ಯ।” (ಕಾರಂತ, ಚೋಮನ ದುಡಿ, पृ. 67)यह श्रम-प्रतिष्ठा गांधी के ‘श्रम ही पूजा है’ सिद्धांत की साहित्यिक अभिव्यक्ति है। इसी प्रकार “ಮೂಕಜ್ಜಿಯ ಕನಸು” में परंपरा, नैतिकता और सामूहिक चेतना के माध्यम से गांधीवादी ग्रामस्वराज की कल्पना उभरती है।
4.3 ए. एन. कृष्णराव (आना. कृ.)
आना. कृ. के सामाजिक उपन्यासों और निबंधों में गांधी-विचार संघर्षशील नैतिकता के रूप में उभरता है। जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता पर प्रहार करते हुए वे लिखते हैं—“ಅಹಿಂಸೆ ದುರ್ಬಲರ ಆಶ್ರಯವಲ್ಲ; ಅದು ಅಂತರಂಗದ ಅಪಾರ ಶಕ್ತಿಯ ಫಲ।” (ಆನಾ. ಕ್ರಿ., ಸಾಮಾಜಿಕ ಚಿಂತನೆ, पृ. 118)यह उद्धरण गांधी की उस धारणा की पुष्टि करता है जिसमें अहिंसा को कायरता नहीं, बल्कि साहस का सर्वोच्च रूप माना गया है।
- कन्नड उपन्यासों में गांधी-विचार:
कन्नड उपन्यासों में गांधी-विचार मुख्यतः ग्रामीण जीवन, किसान समस्या और नैतिक द्वंद्व के रूप में व्यक्त हुआ है। उपन्यासों के पात्र आत्मसंघर्ष के माध्यम से सत्य और अहिंसा का मार्ग चुनते हैं। कन्नड उपन्यासों में गांधी-विचार सामाजिक यथार्थ, नैतिक संघर्ष और मानवीय मूल्यों के विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। उपन्यासकारों ने गांधी को प्रत्यक्ष पात्र के रूप में कम, किंतु उनके विचारों को कथानक, चरित्र-निर्माण और सामाजिक संरचना के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से रूपायित किया है।
5.1 चोमन दूडी (ಚೋಮನ ದುಡಿ )– के. शिवराम कारंत
यह उपन्यास कन्नड साहित्य में श्रम और मानवीय गरिमा का प्रतिनिधि ग्रंथ माना जाता है। ‘चोमना’ का श्रम-संघर्ष गांधी के ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ और ट्रस्टीशिप सिद्धांत से जुड़ता है। भूमि और पूँजी के असमान वितरण के बावजूद उपन्यास नैतिक उत्तरदायित्व की मांग करता है।
गांधीवादी तत्व: श्रम की गरिमा, आर्थिक न्याय, अहिंसक प्रतिरोध।
5.2 मूकज्जी सपना (ಮೂಕಜ್ಜಿಯ ಕನಸು )– के. शिवराम कारंत
इस उपन्यास में परंपरा और आधुनिकता का द्वंद्व गांधीवादी नैतिक दृष्टि से प्रस्तुत हुआ है। मूकज्जी का चरित्र सामुदायिक चेतना और नैतिक विवेक का प्रतीक है, जो गांधी के ग्रामस्वराज और सामाजिक समानता के विचार से मेल खाता है।
गांधीवादी तत्व: ग्रामस्वराज, नैतिक नेतृत्व, सामाजिक समरसता।
5.3जन्म भूमि (ಜನ್ಮಭೂಮಿ) – बसवराज कट्टीमनी
स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास राष्ट्र-सेवा, त्याग और सामाजिक उत्तरदायित्व की गांधीवादी भावना को व्यक्त करता है। पात्र व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए समर्पण का मार्ग चुनते हैं।
गांधीवादी तत्व: राष्ट्रवाद, त्याग, नैतिक राजनीति।
5.4 धर्म श्री (ಧರ್ಮಶ್ರೀ )– आना. कृ :इस उपन्यास में जाति-व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को केंद्र में रखा गया है। अहिंसा और नैतिक दृढ़ता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की संभावना को रेखांकित किया है । उदाहरणतः, ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले उपन्यासों में सामूहिक श्रम, सहकारिता और नैतिक नेतृत्व गांधीवादी आदर्शों से प्रेरित हैं।
- निबंध और आत्मकथात्मक गद्य में गांधी की छवि
कन्नड निबंध साहित्य में गांधी एक वैचारिक संदर्भ के रूप में उपस्थित हैं। आत्मकथाओं में गांधी से प्रेरित आत्मपरीक्षण, नैतिक प्रयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व का चित्रण मिलता है। कई लेखकों ने गांधी के आश्रम जीवन, सादगी और आत्मसंयम को व्यक्तिगत जीवन के आदर्श के रूप में स्वीकार किया।
- आलोचनात्मक पुनर्पाठ: सीमाएँ और प्रश्न
कुछ समकालीन कन्नड गद्यकारों ने गांधी-विचार की सीमाओं पर भी प्रश्न उठाए हैं। औद्योगिकीकरण, वर्ग-संघर्ष और आधुनिक राजनीतिक यथार्थ के संदर्भ में अहिंसा और ग्रामस्वराज की व्यवहारिकता पर पुनर्विचार किया गया है। यह आलोचनात्मक दृष्टि गांधी-विचार को नकारती नहीं, बल्कि उसे समकालीन संदर्भों में पुनर्स्थापित करती है।
- निष्कर्ष
कन्नड गद्य साहित्य में गांधी-विचार एक जीवंत और गतिशील वैचारिक परंपरा के रूप में उपस्थित है। इसने कन्नड गद्य को केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। सत्य, अहिंसा और मानवीय मूल्यों की यह परंपरा आज भी कन्नड साहित्य की वैचारिक पहचान का महत्वपूर्ण अंग है।
- संदर्भ-सूची
- Gandhi, M. K. Hind Swaraj. Ahmedabad: Navajivan Publishing House.
- Gandhi, M. K. The Story of My Experiments with Truth. Ahmedabad: Navajivan Publishing House.
- Gundappa, D. V. Chintanegalu (ಚಿಂತನೆಗಳು). Bengaluru: Kannada Sahitya Parishat.
- Karant, K. Shivaram. Chomana Dudi (ಚೋಮನ ದುಡಿ). Bengaluru: Sahitya Bhandara.
- Karant, K. Shivaram. Mookajjiya Kanasu (ಮೂಕಜ್ಜಿಯ ಕನಸು). Bengaluru: Sahitya Bhandara.
- Krishnarao, A. N. (Āna. Kri.). Samajika Chintane (ಸಾಮಾಜಿಕ ಚಿಂತನೆ). Bengaluru.
- Nagaraj, D. R. Gandhi and Modern Indian Literature. New Delhi: Oxford University Press






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