प्रस्तावना

 द वॉर दैट मेड रॉ नामक पुस्तक, लेखक अनुषका नंदकुमार एवं संदीप साकेत द्वारा लिखी गई है, जिसमें आधुनिक भारत के खुफिया तंत्र के उद्भव, विशेष रूप से अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (आरएंडएडब्ल्यू) के गठन और उसके बाद के प्रमुख अभियानों का वर्णन है। पुस्तक में बताया गया है कि 1960 के दशक में भारत को किन विषद खुफिया असफलताओं का सामना करना पड़ा, जैसे-1962 में चीन-भारत युद्ध और 1964 में भारत-पाक युद्ध आदि, जिससे यह स्पष्ट था कि किसी भी देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए केवल सैन्य बल पर्याप्त नहीं है, उसके लिए सूचना एवं ख़ुफ़िया तंत्र का विकास भी अति आवश्यक है।

चूंकि, मैं इस पुस्तक की पृष्ठभूमि से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) द्वारा अनुवाद अध्ययन में स्नातकोत्तर कार्यक्रम के दौरान एक अनुवाद परियोजना की पुस्तक के रूप में परिचित हुआ, उसी समय मुझे इस पुस्तक की साहित्यिक समीक्षा करना उपयोगी तथा कामगर प्रतीत हुआ, जिसमें साहित्यिक दृष्टि से उस समय के भारतीय राजनैतिक-प्रशासनिक तंत्र, पुस्तक के नायक ‘काओ’ की भूमिका, आज के संदर्भ में खुफिया तंत्र की महत्ता और उसे किस प्रकार से सशक्त किया जा सकता है, आदि संबंधित घटकों पर विचार किया गया है।

पुस्तक में नायक के रूप में रामेश्वर नाथ काओ (आर.एन.काओ) भारतीय खुफ़िया तंत्र के एक ऐसे व्यक्तित्व का  नाम है, जिन्होंने भारत की बाह्य गुप्तचर संस्था आरएंडएडब्ल्यू (अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग) की स्थापना कर आधुनिक भारतीय सुरक्षा प्रणाली की नींव रखी। वे एक ऐसे अधिकारी थे जो कभी भी प्रकाश में नहीं आए पर जिनकी नीतियों और दृष्टि ने भारत की रक्षा नीति, कूटनीति और प्रशासनिक संरचना को गहराई से प्रभावित और सुदृढ किया।

साहित्यिक दृष्टि से काओ को छाया-नायक कहा जा सकता है, क्योंकि कहने के लिए उनकी उपस्थिति का अस्तित्व तो उस समय में घटित घटनाओं में सभी जगह था पर लोगों के लिए दृश्यमान नहीं था, कुछ ऐसी महत्वपूर्ण भूमिका में भारतीय खुफ़िया जगत में आर एन काओ का अस्तित्व विद्यमान हुआl उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो दृश्य में अनुपस्थित रहकर भी घटनाओं की दिशा तय करता था। खुफ़िया तंत्र की पुस्तकों में उनका चित्रण एक रहस्यमय, विवेकी और नैतिक अधिकारी के रूप में उभर कर सामने आया, जिसने सत्ता की सीमाओं के भीतर रहकर भी राष्ट्रहित को सर्वोच्च माना और रखा।

 

द वॉर दैट मेड रॉ का हिंदी अनुवाद और भाषा-शैली

पुस्तक की भाषा-शैली पर विचार करें तो, मूल पुस्तक अंग्रेजी में है और उसके अधिकतर परिचय-पृष्ठ अंग्रेजी के पाठकों को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। परंतु अध्ययन और समीक्षा के जरिए यह पता चलता है कि पुस्तक का हिंदी अनुवाद भी हुआ है, जो ऑनलाइन-ऑफलाइन विभिन्न प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। उदाहरण के लिए-अमेज़न, फ्लिप्कार्ट, विभिन्न वेबसाइट, ऑनलाइन रीडिंग प्लेटफार्म पर पुस्तक का संक्षिप्त और विवरणात्मक चित्रण देखने को मिलता है उनमें से एक है- “द वॉर दैट मेड रॉ -भारतीय गुप्तचरसंस्था की रोमांचक कहानी” (हिंदी भाषा में संस्करण)। इस तरह से हिंदी पाठकों के लिए यह पुस्तक सुलभता से प्राप्त है। पुस्तक का हिंदी अनुवाद यह दर्शाता है कि विषय-वस्तु सिर्फ अंग्रेजी-प्रवासी पाठकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हिंदी-भाषी पाठकों के लिए भी पुस्तक की विषय-वस्तु अलग-अलग माध्यमों से उपलब्ध कराई गई हैl चूंकि, भारतीय खुफिया तंत्र एक संवेदनशील प्रशासनिक तंत्र है इसलिए आम नागरिकों के लिए जनमानस की भाषा-हिंदी में पुस्तक का होना अति आवश्यक एवं श्रेयस्कर हैl

पुस्तक की पृष्ठभूमि की भाषा-शैली पर गौर करें तो, पुस्तक की शैली बहुत ही सुलभ, कहानी-सदृश और थ्रिलर जैसी चपलता लिए हुए प्रारंभ होती है, जो रॉ की आधारशिला से लेकर अलग-अलग घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसपर विभिन्न समीक्षकों द्वारा टिप्पणियां भी अपनी समीक्षाओं में की गई है- उदाहरण के तौर पर, ग्रुड्स रिव्यू लिखता है कि:

“इस किताब का वर्णन बहुत ही दिलचस्प है… आप इसे जल्दी ही पढ़कर ख़त्म कर देंगे क्योंकि यह आपको बांधे रखती है।” (गुड रीड्स) [“The book is a gripping description … You’d finish this in no time as it keeps you gripped.” (Goodreads)]

उपरोक्त से अनुमान लगाया जा सकता है कि लेखक-युगल ने विशुद्ध जासूसी-प्रशासनिक घटनाओं को आम भाषा में प्रस्तुत करने के हर संभव प्रयास किए हैं। पुस्तक, साहित्यिक दृष्टि से एक सकारात्मक बिंदु पर आधारित है और क्योंकि यह तकनीकी और गुप्तचर-परिस्थितियों को पाठक के लिए अधिक-से-अधिक समझने योग्य बनाती है, पुस्तक का महत्त्व हिंदी पाठकों के लिए और अधिक बढ़ जाता हैl पुस्तक आम आदमी के लिए भारतीय खुफ़िया व्यवस्था, कार्यप्रणाली एवं कारगुजारी से लोगों को परिचय कराती है जिसमें राजनैतिक, प्रशासनिक अड़चने किस प्रकार से किसी भी आधिकारिक गतिविधियों को अंजाम और एक नया आयाम देती हैं, प्रस्तुत किया गया हैl

आलोचनात्मक दृष्टि से पुस्तक का गहन अध्ययन करने पर पता चलता है कि जो पुस्तक में विचारों की गंभीरता प्रदर्शित की गई है प्रदर्शित तथ्यों से अपेक्षाकृत कम गंभीर हैं—जिससे पाठकों को जो किसी पुस्तक में काल्पनिक कथासार बांधकर रखते हैं उसका अभाव इस पुस्तक में दिखाई पड़ता हैl कुछ विभिन्न आलोचकों की विषय-वस्तु संबंधित टिप्पणियां निम्नानुसार है:

“हालांकि पुस्तक में कई लोगों का उल्लेख है… एक जासूस मास्टर विशेष उल्लेखनीय है… जिसे गद्य कुशलता से आन्तरिक तथा बाह्य रूप से बुना गया है… लेकिन उन्होंने प्राथमिक शोध जैसे अनावश्यक कार्यों में कोई समय बर्बाद नहीं किया है…” (गुड रीड्स) [“Although the book mentions many people … one spymaster deserves special mention … The prose masterfully weaves in and out … but they have wasted no time in superfluous tasks such as primary research …” (Goodreads)]

पुस्तक आर एन काओ के जीवन तथा व्यवसाय को सरल शब्दों में बांधती हुई उल्लेख करती है कि “जासूस का जीवन जानने योग्य बातों को जानने के लिए है, न की जासूस को लोग जाने या पहचाने”: [“The life of a spy is to know and not to be known”]

उपर्युक्त टिप्पणियों से पुस्तक की साहित्यिक गुणवत्ता में भाषा की सहजता की थाह पता चलती है, वहीं शोध, अनुसंधान-पारदर्शिता अथवा विषय-वस्तु की गहराई की दृष्टि से कतिपय आलोचनाएँ भी सामने आती हैं। इस प्रकार हिंदी अनुवाद की दृष्टि से पुस्तक का यह संस्करण एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, जो भाषा-सुलभता, सरलता, तथ्यात्मक बिन्दुओं, वास्तविक जीवन अनुभवों और विषय-प्रसंग के दृष्टिकोण से एक उत्कृष्ट कृति है— अपितु साहित्यिक आलोचना में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अनुवाद-संस्करण को मूल की शोध-गहराई का पूरी तरह अनुभव प्राप्त नहीं होता है क्योंकि अनुवाद की एक सीमा है जो निकटतम समतुल्य भाषांतरण होने पर भी मूल की छाप को अमिट रखता है (सरल शब्दों में पुस्तक की अनुवाद-विषयक जानकारी सीमित है जिसमें भाषांतरण प्रक्रिया के दौरान अनुवादक के लिए साहित्यिक स्वतंत्रता का दायरा सीमित है)

इस पुस्तक के पाठन से कई पाठकों को नीरसता का भान भी हो सकता है, मुख्यतः उन पाठकों के लिए जिनकी रूचि विशेषकर कहानियों, कथा-सार अथवा लयात्मक पद्य में हैl पुस्तक, स्वतंत्र भारत का अरुणोदय होने पर भारतीय प्रशासनिक समाज में खुफ़िया व्यवस्था की नींव रखने  का आधिकारिक दस्तावेज़ है, जो साहित्यिक सजावट से भले ही स्वादविहीन प्रतीत हो सकती है, परंतु यह पुस्तक भारत-जैसी एक बड़ी अर्थव्यवस्था में सामाजिक सुरक्षा सहित देश की सुरक्षा को प्राथमिकता प्रदान करने का साक्ष्य साबित हुई हैl इसकी झलक पुस्तक के नायक आर.एन.काओ के व्यक्तिव्य तथा उसके कार्य निर्वहन के तौर-तरीकों से साफ़ परिलक्षित होती है, जिसका चित्रात्मक वर्णन इस पुस्तक में अनुष्का  नंदकुमार तथा संदीप साकेत द्वारा कर्मठता से किया गया हैl पुस्तक छंद-दार मुहावरे-युक्त भाषा से परे है और जहां ऐसा कोई वर्णन आता है उसे बहुत ही सरल रूप में लेखक द्वारा प्रस्तुत किया गया हैl

भारतीय खुफ़िया-जासूसी जगत एवं पुस्तक का स्थान

इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान यह है कि पुस्तक ने भारतीय जासूसी व खुफिया जगत— जिसे सामान्यतः गुप्तचर-सेवा, खुफिया एजेंसियों, गुप्त अभियानों और कार्यनीतिक सूचना-संग्रह का क्षेत्र कहा जाता है— को व्यापक रूप से पाठकों के समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। इसकी भाषा शैली एक घटना को दुसरी घटना से बिना किसी साहित्यिक फेर-बदल अथवा घुमाऊ दार वाक्यों तथा शब्द-लच्छों के सहज रूप से जोड़ती हैl भारतीय जासूसी जगत पर पहले भी बहुतायत लेख लिखे गए हैं, परंतु अक्सर वे तकनीकी, संक्षिप्त अथवा अंग्रेज़ी-माध्यम में ही सिमट कर रह गए। इस पुस्तक ने विषयक-क्षेत्र को सर्वसाधारण हिंदी/अंग्रेजी पाठकों के दृष्टिकोण से जोड़ने के सफल प्रयास किए हैं।

पुस्तक में विशेष रूप से उस युग-परिस्थिति का चित्रण है जिसमें भारत को जासूसी-विवाद, सूचना-अव्यवस्था तथा कुशल खुफिया तंत्र की कमी का सामना करना पड़ा। सन 1962 की हार (चीन के विरुद्ध) और सन 1965 की युद्ध-स्थिति (पाकिस्तान के विरुद्ध) ने यह दिखाया कि सूचना-अंतर के कारण भारत को भारी मूल्य चुकाना पड़ा। ऐसे खतरों के युग में, यह पुस्तक इस मौलिक विचार का दस्तावेज साबित होती है जिससे पता चलता है कि कैसे भारत ने खुफिया तंत्र की पुनर्रचना की।

साहित्यिक समीक्षा की दृष्टि से यह पुस्तक इसलिए भी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जासूसी जगत अनेक मायनों में अस्पष्ट, रहस्यमय और रोमांच से भरा-संवेदनशील क्षेत्र है। अतः इस प्रकार से  इस पुस्तक को किसी अन्य भाषा में समझना आम पाठकों के लिए बहुत कठिन है। लेकिन इस पुस्तक ने जासूसी अभियानों, गुप्तचर दस्तावेज़ों, एजेंसी की संकल्पनाओं और कार्यनीतिक निर्णयों को कहानी-आधारित तरीके से प्रस्तुत कर इसे पाठन-आकर्षण के योग्य बनाया है। यह पुस्तक खुफ़िया साहित्य और इतिहास, गुप्तचर-विज्ञान और सार्वजनिक सूचना के बीच एक पुल का काम करती है।

उस समय का भारतीय राजनैतिक-प्रशासनिक तंत्र और काओकी भूमिका

पुस्तक में विशेष रूप से केंद्रित विषय हैं- रामेश्वर नाथ काओ और “काओ बॉयज” के नाम से विख्यात उनकी टीम, जिन्होंने आरएंडएडब्ल्यू के गठन और उसके बाद की गुप्तचर अभियानों का नेतृत्व किया। राजनैतिक-प्रशासनिक तंत्र के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उस समय भारत का राजनीतिक माहौल अपेक्षाकृत अधिक चुनौतीपूर्ण था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में देश में सुरक्षा-हित, पड़ोसी देश की समस्या, असमय सूचना-संकलन तथा बाह्य खतरों की गंभीरता बढ़ रही थी। प्रशासनिक दृष्टि से भारत का खुफिया तंत्र मुख्यतः बाह्य खतरों की समुचित जानकारी जुटाने में सक्षम नहीं हो पाया था। ऐसे माहौल में काओ को 1968 में आरएंडएडब्ल्यू का पहला प्रमुख बनने का अवसर प्राप्त हुआ था।

काओ का महत्व इस पुस्तक में सजीव चित्रित हुआ है: उन्होंने संरचना बनाई, खुफिया-नेटवर्क तैयार किया, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध (1971) में एजेंसी की महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित की और गुप्तचर-जगत में भारत की छवि को सुदृढ किया। उनके द्वारा तैयार ‘काओ बॉयज’ की टीम ने भारत-पाक में, पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की मुक्ति में तथा संचालन-योजनाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। इस प्रकार उनकी भूमिका प्रशासनिक अधिकारी, नियोजनकर्ता, कार्यनीतिक बुद्धि और गुप्तचर-संचालक के रूप में अहम थी। एक अधिकारी के रूप में काओ का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उन्होंने बाह्य खुफिया कार्य के लिए एक समर्पित संस्थान बनाया और उसे अमली धरातल पर लागू किया।

साहित्यिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि काओ-कहानी में नायक-रूप में ही नहीं बल्कि ‘शैडो’-ऑपरेटर के रूप में दिखाई पड़ते हैं — अतः यह पुस्तक एक रोमांच-उत्साही गुप्तचर की कहानी ही नहीं बल्कि तंत्र-निर्माण की कहानी भी है। इस दृष्टिकोण से यह पुस्तक साहित्य जगह में और विशेषत: भारतीय खुफ़िया जगत के साहित्य में एक गहरी छाप छोड़ती है जिसके खुफिया इतिहास से पाठकों को सिर्फ रोमांच ही नहीं, बल्कि कार्यनीति-संकल्पना, संगठन-निर्माण और राजनैतिक-प्रशासनिक समर्थन संबंधित जानकारी भी प्राप्त होती है।

पुस्तक का साहित्यिक महत्त्व

इस पुस्तक का साहित्यिक महत्त्व कई स्तर पर निहित है:

  1. इतिहास-और-जासूसी का संगम: यह पुस्तक स्वतंत्र भारत के बाद खुफिया प्रणाली के विकास की कहानियों को जासूसी-थ्रिलर के रूप में प्रस्तुत करती है। इस तरह साहित्य को न सिर्फ नाटकीय बल्कि विश्लेषणात्मक आयाम प्राप्त होता है।
  2. रॉ और घटनाक्रम का मिलन: पुस्तक में घटनाओं का वर्णन अत्यंत सहज है, मगर साथ ही वहाँ विशेषज्ञता-साधित खुफिया-परिस्थिति-विवरण भी मौजूद हैं— जैसे 1971 के युद्ध-परिदृश्यों में आरएंडएडब्ल्यू  की भूमिका। इसलिए यह सिर्फ उपन्यास-स्तर का थ्रिलर नहीं, बल्कि शोध-संभावनाओं वाला गैर-कथात्मक विषय-वस्तु वाली पुस्तक भी है।
  3. व्यक्ति-केंद्रित लेकिन तंत्र-प्रभावित दृष्टि: पुस्तक में जैसे पुस्तक के नायक काओ का चरित्र उभरा है, वह किसी भी व्यक्तिगत नायक की छवि से परे है और अकथनीय है— यहां काओ एक प्रणाली-निर्माता के रूप में उभर के सामने आए हैं। पुस्तक साहित्य में एक अलग तरह की कथा प्रणाली को प्रस्तुत करती है, जहाँ व्यक्ति का संघर्ष तंत्र-निर्माण-प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
  4. सार्वजनिक जागरण का माध्यम: खुफिया-संस्था जैसे क्षेत्र, आम पाठक के लिए पर्दे के पीछे के रहस्य की तरह होता है। यह पुस्तक इस पर्दे को एक सीमित रूप में हटाती है, जिससे पाठक को उस तंत्र की चुनौतियाँ, सीमाएँ और संभावनाएँ समझ में आती हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक साहित्य-सामाजिक जागरुकता का माध्यम बन जाती है।
  5. मूल संस्थापन की नींव-कथा: जैसा कि शीर्षक में बताया गया है— “द वॉर दैट मेड रॉ आरएंडएडब्ल्यू” — यह पुस्तक बताती है कि कैसे एक युद्ध (और उससे पहले की सूचना विफलताएँ) ने भारत में बाह्य खुफिया-संस्था की नींव रखी। इस दृष्टि से यह खुफिया-विज्ञान साहित्य में एक प्रकार की उत्पत्ति-कथा का काम करती है।

वर्तमान भारतीय परिवेश में खुफिया तंत्र की महत्ता

आज के भारत में, खुफिया तंत्र की महत्ता पहले से कहीं और अधिक बढ़ गई है। वैश्विक भू-राजनीति, साइबर युद्ध, आतंकवाद, सीमा-विवाद, डिजिटल जासूसी, उपग्रह-सूचना, सोशल मीडिया की भूमिका आदि ने खुफिया-सेवा को नयी चुनौतियाँ और अवसर प्रदान किए हैं। इस संदर्भ में पुस्तक का संदेश आज भी प्रासंगिक है— जैसे काओ-युग में सूचना-संप्रेषण व बुद्धि-संग्रह की कमी युद्ध हार की वजह बनी थी, आज भी सूचना-अंतर किसी भी राज्य-सुरक्षा अथवा धोखे का कारण बन सकती है।

यदि हम इस पुस्तक के तथ्यों पर विचार करें — उदाहरण-स्वरूप, सूचना-संगठन के अभाव से भारत को 1962 में कठोर मूल्य चुकाना पड़ा। इस प्रकार आज-कल भी, जहाँ सीमाएँ बदल गई हैं (जैसे साइबर स्पेस, उपग्रह-इमेजरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) खुफिया तंत्र को सशक्त रखना अनिवार्य है। इस प्रकार से वर्तमान में इस पुस्तक की खुफिया-तंत्र की महत्ता निम्नलिखित रूप से देखी जा सकती है:

  • कार्यनीतिक पूर्वसूचना: सीमाओं पर तनाव, पड़ोसी देश की कूटनीति, आतंकवादी नेटवर्क— इन सभी में खुफिया जानकारी निर्णायक होती है।
  • तकनीकी निगरानी-शक्ति: डिजिटल ट्रैफिक, साइबर हमले, खुफिया उपग्रह-डेटा आदि में खुफिया-संस्थान की विशेषज्ञता बढ़ी है।
  • प्रवर्तन-समन्वय: आंतरिक एवं बाह्य खुफिया एजेंसियों, पुलिस, रक्षा मंत्रालय आदि के बीच समन्वय खुफिया-सफलता की कुंजी है।
  • राजनीतिक-सुरक्षा संवाद: खुफिया जानकारी राजनैतिक निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करती है— जब-जब खुफिया तंत्र सक्षम होता है, तब शासन-प्रशासन को समय पर सूचना मिलती है।
  • डिजिटल-विश्व में सुरक्षा: वैश्विक सूचना-प्रवाह में खुफिया-रूप से सक्रिय रहना, देश-हित में डिजिटल खुफिया-कार्यनीति अपनाना आवश्यक है।

अतः इस पुस्तक से यह स्पष्ट होता है कि खुफिया-ऐजेंसी का निर्माण और सुदृढ़ीकरण सिर्फ युद्ध-संधि का विषय ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की मूलधारा भी है।

खुफिया तंत्र को और कैसे मजबूत किया जा सकता है

इस पुस्तक के अंतर्गत सामने आए तत्त्वों को ध्यान में रखकर, वर्तमान भारतीय खुफिया-तंत्र को मजबूत करने के लिए कुछ निम्नानुसार सुझाव पुस्तक को पढ़ने के बाद देखे जा सकते हैं:

  1. सूचना-संग्रह और विश्लेषण क्षमता बढ़ाना– काओ-युग में सूचना-विफलताओं ने भारत को कमजोर किया था। आज भी यदि खुफिया-सूचना समय पर नहीं पहुँचे, तो खतरों का अनुमान लगा पाना असंभव होगा। इसलिए एजेंसियों में डेटा-माइनिंग, पैटर्न-एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढ़ना चाहिए। विदेशी भाषा-हस्ताक्षर, नेटवर्क-इंटेलिजेंस, ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (ओएसआईएनटी) आदि को विस्तार प्रदान करना आवश्यक है।
  2. तंत्र-समन्वय और एजेंसी-संघटनात्मक सुधार– आरएंडएडब्ल्यू, आईबी, रक्षा खुफिया और आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय इंजन बनाना होगा। पुस्तक में यह सुझाव है कि काओ-युग में उन्होंने ‘काओ बॉयज’ टीम बनाकर समर्पित नेटवर्क तैयार किया था। हम आज भी उस मॉडल से सीख सकते हैं और उसे प्रयोग में ला सकते हैं। राजनैतिक-प्रशासनिक तंत्र में खुफिया-सुझावों के प्रत्यक्ष उपयोग को सुनिश्चित करना होगा जहां खुफिया जानकारी को सहजता से नीति-निर्माण तथा प्रशासनिक क्रियान्वयन में बदला जा सकता है।
  3. तकनीकी उन्नयन एवं प्रशिक्षण– खुफिया-नायकों को ही नहीं बल्कि तकनीकी संगठनों को सशक्त करना होगा: साइबर इंटेलिजेंस, सिग्नल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट इमेजरी, डेटा एनालिटिक्स इत्यादि संगठित एवं सशक्त होने चाहिए। एजेंसियों में प्रशिक्षण-प्रसार बढ़ाना—नए खुफिया-ओपरेशन मॉडल, इनोवेशन-कल्चर, क्षेत्रीय भाषा-ज्ञान, सांस्कृतिक-संदर्भ अध्ययन आदि का विस्तार होना चाहिए। काओ-युग में उन्होंने स्थानीय स्रोतों, सांस्कृतिक समझ और भाषाई संसाधनों का उपयोग किया था— आज भी यह मॉडल महत्वपूर्ण है तथा आवश्यक रूप से वांछित परिवर्तनों सहित इसका उपयोग वर्तमान में किया जा सकता है।

  1. पारदर्शिता-विश्वास-अनुभव साझा करना– खुफिया-संस्था आम जनता से खुलकर नहीं जुड़ती, क्योंकि गोपनीयता जरूरी है। फिर भी कुछ हद तक एजेंसियों द्वारा निष्कर्ष-रिपोर्टिंग अथवा सार्वजनिक संवाद बढ़ा सकते हैं जिससे जन-विश्वास और समर्थन बढ़े।
    पुस्तक प्रेरणा देती है कि शिक्षा-सुधार में खुफिया-इतिहास एवं देश-सुरक्षा विषयों को पाठ्य-क्रम में स्थान देना चाहिए, ताकि नागरिक सुरक्षा-साक्षर हों।

  1. भविष्य-चिंतन एवं लचीलापन– आज खतरें पूर्वी पाकिस्तान-स्तर के नहीं रह गए हैं— साइबर हमले, सूचना-कूट, विदेशी प्रभाव-संचार, ड्रोन-शिकार आदि नये आयाम दिनों-दिन जुड़ रहे हैं। एजेंसियों को भविष्य-मुखी दृष्टि अपनाना होगी। पुस्तक बताती है कि खुफिया-तंत्र की निरंतर समीक्षा, असफलताओं से सीख और नवाचार कार्यनीतियों को अपनाना ही उपयुक्त और लाभप्रद होगा— जैसा कि इस पुस्तक में बताया गया है कि 1960 के दशक की विफलताओं ने राष्ट्रीय खुफिया पुनर्रचना का कारण बनी थीं।

अगर पुस्तक के इन बातों से सीख कर वर्मान में  उपरोक्त सुझावों को लागू किया जाए, तो भारतीय खुफिया-तंत्र न सिर्फ वर्तमान चुनौतियों का सामना करने योग्य बनेगा बल्कि भविष्य में उत्पन्न होने वाले खतरों के प्रति सजग और सक्षम भी रहेगा।

पुस्तक भारतीय खुफिया विभाग की नीव क्यों रखती है

पुस्तक भारतीय खुफिया विभाग की ‘नीव-कथा’ का निर्माण करती है यह कहां तक चरितार्थ है-कारण निम्नानुसार हैं:

  • पुस्तक स्पष्ट करती है कि कैसे भारत ने 1960 के दशक की खुफिया-विफलताओं (1962, 1964) को अनुभव किया और फिर एक समर्पित बाह्य-खुफिया एजेंसी (आरएंडएडब्ल्यू) का गठन किया। इस रूप में यह पुस्तक एक प्रस्थान-बिंदु है, जो भारतीय आसूचना और खुफ़िया विभाग के लिए आगे का रोडमैप तैयार करती है।
  • पुस्तक काओ-युग के माध्यम से उस तंत्र-निर्माण की कहानी को प्रस्तुत करती है जहां व्यक्ति-नेता (काओ) का दृष्टिकोण, टीम-संरचना, ऑपरेटिंग-मॉडल, राजनैतिक-प्रशासनिक समर्थन का समन्वय सामने आता है। यह एक ‘नीव-स्तंभ’ की तरह काम करता है — जो भविष्य के खुफिया-कार्यक्रमों के लिए बुनियाद तैयार करता है।
  • पुस्तक में यह भाव है कि खुफिया सफलता सिर्फ युद्धभूमि पर नहीं बल्कि सूचना-भूमि में तय होती है। इस विचार-धारा ने भारतीय खुफिया-विचार को पूर्व से आधुनिक स्तर पर ले जाने में मदद की।
  • इसके साहित्यिक प्रस्तुतीकरण ने खुफिया विषय को सामान्य पाठक-दृष्टि में पहुँचाया — इसे सिर्फ विशेषज्ञों, रणनीतिकारों तक सीमित नहीं रखा गया। इस प्रकार खुफिया-विषय को सार्वजनिक जागरुकता-स्तर पर लाना इस पुस्तक का योगदान है, और इस तरह यह खुफिया विभाग की सामाजिक स्वीकृति के लिए भी नीव रखता है।

इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक सिर्फ एक कहानी ही नहीं बल्कि भारतीय खुफिया-संस्था के मूल संरचनात्मक विकास का दस्तावेज भी है— इसलिए इसे खुफिया विभाग की नीव रखने वाला साहित्य-उपादान माना जा सकता है।

निष्कर्ष

संक्षिप्त रूप से ‘द वॉर दैट मेड रॉ’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जो भारतीय खुफिया-विकास, राजनैतिक-प्रशासनिक तंत्र, खुफिया-अभियानों एवं कार्यनीति-निर्माण की कहानी को सहज शैली में प्रस्तुत करती है। हिंदी अनुवाद के माध्यम से यह विषय हिंदी-भाषी पाठकों के लिए भी उपलब्ध है। साहित्यिक दृष्टि से यह पुस्तक सरल, पठनीय, रोचक है — हालाँकि गहराई-संधान की दृष्टि से कुछ सीमाएँ इसके पाठकों ने प्रस्तुत की हैं।

भारतीय जासूसी जगत के संदर्भ में इस पुस्तक का महत्व इसलिए है क्योंकि यह उस परदे के पीछे के काम को उजागर करती है, जिसे सामान्यत: सार्वजनिक मिथक-कहानियों में कम जगह मिलती है। राजनैतिक-प्रशासनिक सिस्टम में काओ-युग की भूमिका और उनकी टीम-“काओ बॉयज” का चित्रण पेश करता है कि कैसे एक अधिकारी ने कार्यनीति, टीम-निर्माण और निर्णय-समर्थन के माध्यम से खुफिया-संस्था को आकार दिया और वर्तमान खुफ़िया विभाग की नींव रखीl

पुस्तक आज के बदलते-परिस्थितियों में, खुफिया-तंत्र की महत्ता पहले से कहीं और अधिक है तथा इसे मजबूत करने के लिए सूचना-संग्रह, समन्वय, तकनीकी उन्नयन, सार्वजनिक-विश्वास, भविष्य-चिंतन जैसी दिशा-निर्देश बेहद महत्वपूर्ण है-विषयों को वर्णित करती है। इस पुस्तक ने इस दिशा में एक विचार-उत्प्रेरक कार्य किया है। अंततः यह पुस्तक भारतीय खुफिया विभाग के जन्म-काल, उसकी चुनौतियों, उसके विकास और उसके आगे के पथ का एक सुस्पष्ट दस्तावेज है — इसलिए इसे भारतीय खुफिया-विभाग की नीव रखने वाला साहित्य-उपकरण माना जाना चाहिए।

 

अमन शर्मा
अनुवाद अधिकारी
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय,
राजभाषा प्रभाग, प्रथम तल,
कर्त्तव्य भवन-03 जनपथ नई दिल्ली