हिंदी नाटक का प्रारंभ भारतेंदु युग से हुआ, जिसमें समाज के विभिन्न पक्षों एवं क्षेत्रों को साहित्य संवेदना का विषय बनाया गया। इस युग में समाज-सुधार आंदोलन, देश-प्रेम, राष्ट्र-भाषा के विकास पर विशेष बल दिया गया। साहित्यिक पृष्ठभूमि में जिस प्रकार सुधार और देश-प्रेम की लहर विद्यमान थी, उसी प्रकार की लहर राजनीतिक क्षेत्र में भी फैल रही थी। राजनीति में समाज-सुधार तथा अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए विभिन्न दल निर्मित हो चुके थे, जो अपनी-अपनी रणनीति बनाकर देश में राष्ट्र-प्रेम की ज्योति प्रज्ज्वलित कर रहे थे, ऐसी ही राजनीतिक पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी का पदार्पण हुआ। भारतीय राजनीति विभिन्न खेमों में विभाजित हो चली थी, उसे एक नेतृत्व की आवश्यकता थी, जो  उसे गांधीजी  के निर्देशन में प्राप्त हुआ। गांधी जी ने  भारत की राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की, इसी दिशा और उनके मूल्यों से प्रेरणा पाकर हिंदी नाटकों का भी सृजन हुआ।

       प्रसाद युग राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का युग रहा, जहाँ एक तरफ इसकी पृष्ठभूमि में प्रथम विश्वयुद्ध के बीज रहे, तो वहीं दूसरी तरफ देश की राजनीतिक असंतुलनता रही। प्रसाद युग में देश में चल रहा स्वतंत्रता-आंदोलन किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित न होकर राष्ट्रव्यापी रूप ले चुका था। इन सभी सुधारवादी और राष्ट्रव्यापी आंदोलनों ने साहित्य को भी प्रभावित किया। जब देश के  राजनीतिक आकाश में महात्मा गांधी नामक सूर्य का उदय हुआ, जिसके चलते भारतीय स्वतन्त्रता एवं  राजनीतिक आंदोलन को सबलता, सुदृढता प्राप्त हुई। उन्होंने देश के समक्ष राष्ट्र की स्वतंत्रता का लक्ष्य रखा, जिसमें सभी देशवासी एकजुट होकर शामिल हुए। गांधीजी के विचार और जीवन दर्शन ने प्रत्येक जन-मानस को प्रभावित किया। गाँधी जी के इन्हीं जीवन मूल्यों का प्रभाव प्रसाद युगीन हिंदी नाटकों में भी लक्षित होता है। प्रसाद और प्रसाद-युगीन नाटककार गांधी जी के जीवन मूल्यों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने नाटकों में उनके सैद्धांतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक आदि सभी पक्षों को नाटकों में स्थान दिया। प्रसाद युगीन नाटकों में हमें आदर्शवादी सांस्कृतिक भाव-धारा का चरम विकास मिलता है। भारतेन्दु युगीन नाटकों में नारी की स्थिति में सुधार, देशभक्ति, छुआछूत की समस्या जैसे विषयों पर समाज को जागृत किया, इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए प्रसाद युगीन नाटककारों ने व्यापक स्तर पर इन समस्याओं को उठाया, साथ ही गांधी जी के जीवन-दर्शन से जुड़कर इन विषयों को प्रस्तुत किया।

गांधीवाद का सैद्धांतिक पक्ष और प्रसाद युगीन हिंदी नाटक


सत्य: गांधीजी ने अपने सभी सिद्धांतों में सत्य को सर्वाधिक महत्व दिया है, उन्होंने सत्य को ब्रह्म स्वरूप माना है, सत्य उसी प्रकार समस्त जगत में व्याप्त है, जिस प्रकार ईश्वर इस संपूर्ण संसार में व्याप्त है। सत्य के महत्व को भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता में स्वीकार किया है, गांधीजी ने भी सत्य की महत्ता को स्वीकार करते हुए अपने सभी विचारों का आधार सत्य को ही बताया है। उन्होंने स्वयं लिखा है- “अहिंसा को मैं जितना पहचान सका हूँ, उसकी निस्बत मैं सत्य को अधिक पहचानता हूँ, ऐसा मेरा ख्याल है और यदि मैं सत्य को छोड़ दूँ तो अहिंसा की बड़ी उलझनें मैं कभी न सुलझा सकूँगा।(1) इससे स्पष्ट होता है कि उनके जीवन का आधार तत्व सत्य ही रहा है, सत्य ही उनका सर्वोच्च कर्म था।

 सत्य का महत्व गांधीजी के लिए सबसे महत्वपूर्ण था। सत्य के महत्व को प्रसाद युगीन नाटककारों ने भी प्रतिपादित किया है। सत्य के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए उसकी महत्ता से जनमानस को प्रभावित करने का प्रयास किया गया है। जयशंकर प्रसाद ने अपने अधिकतर नाटकों में सत्य को प्रस्तुत किया है। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ नाटक में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवादों के माध्यम से सत्य की झलक मिलती है, उस चेतन के अस्तित्व की सत्ता कहीं नहीं जाती। वही एक अद्वैत है। यह पूर्ण सत्य है कि जड़ के रूप में चेतन प्रकाशित होता है। अखिल विश्व एक संपूर्ण सत्य है। असत्य का भ्रम दूर करना होगा, मानवता की घोषणा करनी होगी। (2)

सत्य के मार्ग पर चलना आसान कार्य नहीं है, यह दोधारी तलवार के ऊपर चलने के समान होता है। लेकिन व्यक्ति जब सत्य की शक्ति को धारण कर लेता है तो वह आत्मबल से भर उठता है और उसी शक्ति से शत्रु का सामना करता है। प्रसाद के ‘विशाख’ नाटक में पात्र प्रेमानंद सत्य की इसी शक्ति और महिमा की बात करता है, वह कहता है- “सत्य को सामने रखो, आत्मबल पर भरोसा रखो, न्याय की माँग करो। (3) इसी प्रकार श्री बद्रीनाथ भट्ट के ‘वेनचरित’ नाटक में आत्रि नामक पात्र सत्य की महिमा को व्यक्त करता है,- “जहाँ राजा-प्रजा में अनबन होती है वहाँ गहरी उथल-पुथल होती है, नाश होता है और पुनर्जन्म होता है। इस उथल-पुथल में जीत उसी की होती है, जिसकी तरफ सत्य होता है। (4) इसी प्रकार उदय शंकर भट्ट ने ‘सगर विजय’, लक्ष्मी नारायण मिश्र ने ‘अशोक’, ‘सिंदूर की होली’, सेठ गोविंद दास ने ‘प्रकाश’ नाटक में सत्य के शक्ति-स्वरुप को चित्रित कर उसकी महत्ता को समाज के सम्मुख उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है।

अहिंसा– संसार के शांतिपूर्ण विकास के लिए अहिंसा की महती आवश्यकता है, क्योंकि हिंसा से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। हिंसा केवल समाज को पतन की ओर ले जाती है, अहिंसा ही समाज के स्वस्थ विकास के लिए परम आवश्यक है। अहिंसा को गांधी जी ने भारतीय संस्कृति से ग्रहण किया है, उन्होंने समाज के लिए इसकी प्रासंगिकता को सिद्ध किया है। प्रसाद के ‘चंद्रगुप्त’ नाटक में चाणक्य के माध्यम से अहिंसा के इसी महत्व को प्रतिपादित कराया है, जहां अकारण रक्तपात की नीति का विरोध करते हुए चाणक्य ने अपने शिष्यों के समक्ष अहिंसा तत्व का समर्थन किया।  चाणक्य के पिता को राजा नंद के द्वारा अपमानित कर देश से निकाला दे दिया गया, फिर भी चाणक्य हिंसा के पक्ष पर बने रहें,जिसके पास योग्य शास्त्रविद विषय है- वह भी शस्त्र व्यवसाय की वृत्ति के रूप में स्वीकारने को सहमत नहीं, अपितु सामान्य जन की तरह जीवन जीने की लालसा रखता हूँ- मैं शस्त्र व्यवसायी नहीं बनूंगा, मैं कृषक बनूंगा।(5)  उदय शंकर भट्ट के नाटक ‘दाहर अथवा सिंधपतन’ में बौद्ध सन्यासी  सागर अहिंसा और विश्व मैत्री का अर्थ समझाते हुए कहता है, “विश्व के प्रति दया दिखाना और दुष्टों की दुष्टता को दूर करना। हमारी अहिंसा का अर्थ केवल इतना ही है। हम मन, वाणी और कर्म से अहिंसा का उपदेश देते हैं, उसका अर्थ यही है।(6) हरि कृष्ण प्रेमी ने ‘स्वर्ण विहान’ नाटक में हिंसा पर अहिंसा की विजय दिखलाई है, नाटककार ने उत्तेजना और जोश भरे गीत से शांति और अहिंसा के महत्व को प्रतिपादित किया है। सेठ गोविंद दास के नाटक ‘हर्ष’ में, बद्रीनाथ भट्ट के ‘दुर्गावती’ नाटक में प्रेमचंद्र के ‘कर्बला’ आदि सभी नाटकों में अहिंसा का प्रतिपादन किया गया है। गांधी जी के जीवन-दर्शन के सैद्धांतिक पक्ष में सत्य और अहिंसा सबसे प्रमुख तत्व रहे हैं, इसके अतिरिक्त सर्वधर्म-समभाव, ईश्वर अस्तित्व, मानवतावाद आदि पक्षों को प्रसाद युगीन नाटकों में पर्याप्त स्थान दिया गया है।

गांधीवाद का सामाजिक पक्ष और प्रसाद युगीन नाटक

जिस प्रकार गांधीजी ने तत्कालीन सामाजिक समस्याओं को मुखरित कर उन्हें समाज से दूर करने का प्रयास किया। वैसे ही प्रसाद युगीन नाटककारों ने भी अपने नाटकों के माध्यम से उनके इन विचारों का साथ दिया। तत्कालीन समाज की सबसे बड़ी समस्या थी अस्पृश्यता, इस समस्या को समाज से दूर करने के लिए अनेक सुधार आंदोलन भी चलाए गए, जिसकी गूंज हमें प्रसाद युगीन नाटकों में भी सुनाई देती है। उदय शंकर भट्ट के नाटक ‘दाहर अथवा सिंधपतन’ में नायक दाहर जाति प्रथा के नाम पर लगाए जाने वाले अनावश्यक नियमों को हटाने एवं जातिगत भेदभाव को मिटाने की बात करता है, वह कहता है- “कर्म की श्रेष्ठता प्रत्येक व्यक्ति के अपने दैनिक व्यवहार पर निर्भर है। लोहान, जाट और गुर्जरों में वैसा ही क्षत्रियत्व है जैसा कि  वीरता का कार्य करने वाले क्षत्रियों में।”(7) स्वयं गांधीजी भी छुआछूत का  ज़बरदस्त विरोध किया है, अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अंग नहीं, बल्कि उसमें घुसी हुई सड़ांध है, वहम है, पाप है और उसका निवारण करना प्रत्येक हिंदू का धर्म है, उसका परम कर्तव्य है। यदि यह अस्पृश्यता समय रहते नष्ट न की गई तो हिंदू समाज और हिंदू धर्म का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।

      हिंदी नाटककारों ने भी गांधी के इन्हीं विचारों को बल प्रदान करते हुए समाज से इस समस्या को समूल समाप्त करने का प्रयास किया। ‘प्रेम की वेदी’ नाटक में प्रेमचंद ने छुआछूत की समस्या को प्रस्तुत किया है कि किस प्रकार जाति का नशा लोगों के दिमाग पर छाया हुआ है, जब उमा का पति योगराज जैनी से विवाह के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाता है तो जैनी का यह कथन जातिगत वैषम्य को प्रस्तुत करता है, “मैं तुम्हें समाज में अछूत नहीं बनाना चाहती।(8) घनानंद बहुगुणा ने ‘समाज’ नाटक में अस्पृश्यता और विधवा विवाह की समस्या को चित्रित किया है, इसी प्रकार सियारामशरण गुप्त का ‘पुण्य पर्व’, डॉ० दशरथ ओझा का ‘प्रियदर्शी सम्राट अशोक’, हरि कृष्ण प्रेमी का ‘रक्षाबंधन’, सेठ गोविंद दास का ‘कर्तव्य’ आदि सभी नाटकों में छुआछूत की समस्या को उजागर किया गया है।

 स्त्री उत्थान– भारत से पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी का शोषण सदियों से होता चला आ रहा था, उसे घर की चारदीवारी में कैद कर दिया गया था। यद्यपि आधुनिक काल में उसकी नारकीय स्थिति के सुधार के लिए अनेक स्त्री-परक आंदोलन चलाए गए। इस दिशा में राजा राममोहन राय ने स्त्री उत्थान हेतु विशेष कार्य किया। गांधीजी ने भी इसी बात को समझ कर स्त्री को अपने राजनीतिक आंदोलन में बराबर का भागीदार बनाया और उसे घर की चारदीवारी से निकाल कर पुरुष के साथ ला खड़ा किया। तदन्तर स्त्री राष्ट्रीय आंदोलन में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगी थी। स्त्री- उत्थान के अंतर्गत स्त्रियों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर विचार कर उन्हें दूर करने का प्रयास किया गया, इनमें प्रमुख थी, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, नारी-स्वातंत्र्य, अंतरजातीय-विवाह, अनमेल-विवाह, विधवा-समस्या, दहेज की समस्या आदि। प्रसाद युगीन नाटककार ने अपने नाटकों में नारी-स्वातंत्र्य को भी विशेष स्थान दिया, साथ ही स्त्री की स्वच्छ गौरवमयी छवि को स्थापित  करने का प्रयास किया, विशेषकर जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटकों में नारी को बड़े ही शक्ति-संपन्न और उदात्त रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने नारी को दिव्य गुणों की अधिष्ठात्री बनाया है। ‘अजातशत्रु’ नाटक में नारी स्वतंत्रता पर बल देते हुए कहा है, “यदि पुरुष इन कामों को कर सकता है तो स्त्रियाँ क्यों न करें? क्या उन्हें अंतःकरण नहीं है? क्या स्त्रियाँ अपना कुछ अस्तित्व नहीं रखती? क्या उनका जन्मसिद्ध कोई अधिकार नहीं है? क्या स्त्रियों का सब-कुछ पुरुषों की कृपा से मिली हुई भिक्षा मात्र है? मुझे इस तरह पदच्युत करने का किसी को क्या अधिकार था?………. क्या हम पुरुष के समान नहीं हो सकती? क्या चेष्टा करके हमारी स्वतन्त्रता नहीं पददलित की गई है।(9)

प्रसाद जी का ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक नवीन प्रश्नों को लेकर समाज के सम्मुख आता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में नवीनता की संवेदना भरना अपने आप में अद्भुत है। ध्रुवस्वामिनी का पति राम गुप्त युद्ध के डर से अपनी पत्नी को उपहार स्वरूप देना चाहता है, वह अपने मान-सम्मान और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा स्वयं करने की बात कहती है, ध्रुवस्वामिनी: (खड़ी होकर रोष से) निर्लज्ज! मद्यप! क्लीव !ओह  मेरा कोई रक्षक नहीं? (ठहरकर) नहीं, मैं अपनी रक्षा स्वयं करूंगी,  मैं उपहार में देने की वस्तु शीतलमणि नहीं हूँ। मुझमें रक्त-लालिमा है। मेरा हृदय ऊष्ण है और उसमें आत्मसम्मान की ज्योति है। उसकी रक्षा मैं ही करूंगी। (10)  अपनी स्वतन्त्रता और आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए वह पुरुष जाति  को ललकारती है- “ मैं केवल यही कहना चाहती हूँ कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु संपत्ति समझकर उन पर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है, यह मेरे साथ नहीं चल सकता। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा नारी का गौरव नहीं बचा सकते, तो मुझे बेच भी नहीं सकते हो।” (11)  इसी प्रकार के आत्म-सम्मान की बात उदय शंकर भट्ट के नाटक ‘विद्रोहिणी अंबा’, सेठ गोविंद दास के ‘कर्तव्य’, ‘हर्ष’ आदि नाटकों में नारी स्वाभिमान और स्वतंत्रता की बात की गई है। नारी स्वातंत्र्य के साथ-साथ प्रसाद युगीन नाटककारों ने अंतरजातीय विवाह, विधवा विवाह ,अनमेल विवाह जैसी समस्याओं को प्रस्तुत कर समाज में स्त्री के उत्थान का कार्य किया है।

गांधीवाद का आर्थिक पक्ष और प्रसाद युगीन हिंदी नाटक

अंग्रेजी शासन काल में भारत की आर्थिक व्यवस्था चरमरा उठी, अपने आर्थिक लाभ हेतु अंग्रेजी शासन ने भारत की कृषि को समूल नष्ट करने का प्रयास किया। कृषि के नुकसान होने पर किसानों की दशा दयनीय थी। किसानों के साथ-साथ बुनकरों और छोटे छोटे लघु उद्योगों को अंग्रेजों ने पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास किया। अंग्रेजों ने अपनी लाभ नीतियों के चलते सबसे ज्यादा नुकसान भारतीय कृषि को पहुंचाया। अंग्रेजों द्वारा जबरन भारत में अन्न के स्थान पर अफीम और नील की खेती कराई गई, जिससे देश में अन्न की कमी हो गई और उस पर विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं ने भी देश को हिला कर रख दिया। वस्तुतः प्राकृतिक आपदाओं, सरकार की नीतियों के कारण ही देश में गरीबी का जन्म हुआ। जिसका प्रसाद युगीन नाटककारों ने बड़ा ही विशद चित्रण किया है। प्रसाद के ‘स्कंदगुप्त’ नाटक में गरीबी की समस्या का चित्रण किया गया है, पर्णदत्त का कथन है- “सूखी रोटियाँ बचाकर रखनी पड़ती हैं, जिन्हें कुत्तों को देते संकोच होता था, उन्हीं कुत्सित अन्न का संचय? अक्षय निधि के समान उन पर पहरा देता हूँ।(12) प्रसाद ने ‘कामना’ नाटक में गरीबी की विकटता को प्रस्तुत किया है, संतोष करुणा से कहता है- “दरिद्रता कैसी विकट समस्या! देवी दरिद्रता सब पापों की जननी है और लाभ उसकी बड़ी संतान है।(13)  वस्तुतः प्रसाद जी ने अपने नाटकों में आर्थिक समस्याओं को बड़ी गहनता के साथ प्रस्तुत किया है, वह गरीबी ही है जो लालच और दुष्कर्मों को जन्म देती है।

 गांधी के आर्थिक विचार दर्शन के अंतर्गत ग्राम उद्योग को विशेष महत्व दिया है। भारत की आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए यह आवश्यक था कि भारत के उद्योग- धंधों को बढ़ावा दिया जाए, इसमें खादी प्रयोग को विशेष रूप से महत्व दिया गया। गांधीजी ने भारतीय जनता से यह अपील की, कि वे विदेशी वस्तुओं को छोड़कर स्वदेशी वस्तुओं को अपनाएँ, खादी-वस्त्र का अधिक से अधिक प्रयोग करें। सेठ गोविंद दास ने ‘प्रकाश’ नाटक में भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देते हुए लिखा है। नाटक का पात्र दामोदरदास एक अन्य पात्र धनपाल से कहता है, “अंग्रेज लोगों से आप आर्थिक कुंजी अपने हाथ में ले लीजिए, ये आपसे आप इस देश से चले जाएंगे। इंडियन –जॉइंट-स्टॉक कंपनियों से सारे देश में उद्योग धंधे फैला दीजिए, विलायती कंपनियों के हाथ से व्यापार छीन लीजिए, बस समाप्त, स्वराज्य मिल जाएगा।(14) अंग्रेजी सरकार ने जितनी भी आर्थिक नीतियाँ बनाई, वे सभी नीतियाँ जमींदारों और पूंजी-पतियों के पक्ष में थीं। जबकि गांधी जी ने खादी को बढ़ावा देने के लिए चरखा आंदोलन भी चलाया, जो भारत की आर्थिक नीति को सुधारने सकारात्मक कदम था।

गांधीवाद का राजनीतिक पक्ष और प्रसाद युगीन हिंदी नाटक-

गांधीजी ने अपनी विचार धारा के राजनीतिक पक्षों के अंतर्गत स्वाधीनता की भावना, देशप्रेम, राष्ट्रीय एवं सांप्रदायिक एकता, हृदय -परिवर्तन का सिद्धांत, रामराज्य का आदर्श आदि को शामिल किया है। इन सिद्धांतों या मूल्यों में हृदय-परिवर्तन का सिद्धांत और रामराज्य का आदर्श विशेष चर्चा में रहे। प्रसाद युगीन नाटकों में गांधी जी के राजनीतिक पक्ष को पर्याप्त स्थान दिया गया और अपने नाटकों में चित्रित किया गया। जयशंकर प्रसाद के नाटक देश-प्रेम की भावना से भरे हुए हैं, साथ ही उन्होंने गांधी जी के अन्य सिद्धांतों को भी अपने नाटकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। ‘राज्यश्री’ नाटक में ग्रहवर्मा का अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और उसकी देशभक्ति की भावना को प्रस्तुत किया गया है, “यह पुण्यभूमि महोदय का सिंहासन, सरल और अनुरक्त प्रजा, सुजला, शस्य श्यामला उर्वरा भूमि, स्वास्थ्य का वातावरण और सबसे सुंदर उत्तरापथ का कुसुम।” (15)  प्रसाद के ‘चंद्रगुप्त’ नाटक का यह गीत देशभक्ति का गीत बन जन-जन के द्वारा गाया गया- “अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा” (16)  प्रसाद युगीन नाटकों में अंग्रेजों के साथ संघर्ष, स्वाधीनता की भावना के साथ-साथ हृदय परिवर्तन का सिद्धांत और रामराज्य का आदर्श को भी चित्रित किया गया है। गांधी जी के सिद्धांत पक्ष में ह्रदय परिवर्तन का सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण है, प्रसाद युगीन सभी नाटककारों ने अपने नाटकों में ऐसे पात्रों का चित्रण किया जो पहले कुमार्ग पर चलते थे लेकिन गलत कार्य का बोध होते ही सही मार्ग का अनुसरण करने करते हैं। आत्मग्लानि और पश्चाताप से उसका हृदय परिवर्तित हो जाता है। ‘राजश्री’ नाटक में दस्यु राजश्री का अपहरण कर लेते हैं तब राजश्री के सतीत्व और सात्विक नारीत्व से तथा महात्मा दिवाकर मित्र के उपदेश से उन्हें ज्ञात होता है कि उन्होंने कितना घृणित कार्य किया है। नेपथ्य का ज्ञान उन्हें इस बात का बोध कराता है-

अब भी चेत ले तू नीच

दुख परितापित धरा को स्नेह जल से सींच

शीघ्र तृष्णा पाश से नर कंठ को जिन खींच

स्नान कर करुणा-सरोवर, धुले तेरा कीच। (17)  प्रसाद ने अधिकतर नाटकों में गांधी जी के हृदय परिवर्तन सिद्धांत का प्रयोग किया है, साथ ही हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘रक्षाबंधन’ नाटक में बहादुर शाह का हृदय-परिवर्तन दिखलाया है, युद्ध के दुष्परिणाम को देखकर वह स्वयं से कहता है, “मेरी मेवाड़ की फ़तह  मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार है। (18)  सेठ गोविंद दास के नाटक ‘हर्ष’ में, लक्ष्मीनारायण मिश्र के ‘अशोक’ नाटक में गांधी जी के सिद्धांत को चित्रित किया गया है, जिससे समाज प्रेरणा ग्रहण कर सकें और इस सिद्धांत को अपने जीवन में अनुसरण कर सकें। हृदय-परिवर्तन सिद्धांत के साथ गांधीजी ने राम राज्य का आदर्श भी प्रस्तुत किया है, एक ऐसे समाज की कल्पना की, जिसमें प्रजा को किसी भी प्रकार कष्ट ना हो। आधुनिक संदर्भ में गांधी जी ने एक ऐसे भारत की कल्पना की जो स्वतंत्र हो और विकास की ऊँचाइयों को छू सके, जहाँ प्रत्येक भारतवासी को उचित अवसर प्राप्त हो। प्रसाद युगीन नाटकों में गांधी के इस आदर्श को यथासंभव स्थान दिया गया है, प्रसाद के ‘विशाख’ तथा “चंद्रगुप्त’ उदय शंकर भट्ट के ‘सगर विजय’ आदि नाटकों में रामराज्य के आदर्श को प्रस्तुत किया गया है।

 सारांशतः प्रसाद युग में प्रसाद और अन्य नाटककारों ने गांधीजी के सैद्धांतिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सभी पक्षों का निरूपण किया है। सभी नाटककारों पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से गांधीजी का प्रभाव लक्षित होता है। सभी ने गांधीजी के विचार पक्ष को सम्यक अर्थों में प्रयुक्त कर नाटक के माध्यम से संप्रेषित करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। प्रसाद युगीन नाटकों में नारी-उत्थान, देश-प्रेम, ग्राम-उद्योग आदि को चित्रित कर जन-मानस को प्रेरणा देने का कार्य किया है। प्रसाद युगीन नाटक समय सापेक्ष नाटक हैं, इसमें महानायक गांधी जी के विचारों को स्वर देकर जहाँ उन्होंने अपनी कृति को अमर किया है, वही गांधी विषयक सिद्धांतों का प्रभाव देशवासियों के हृदय में स्थापित कर दिया है।

  • सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)- महात्मा गांधी, पृष्ठ- 506 -507
  • जनमेजय का नागयज्ञ- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 109
  • विशाख- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ -68
  • वेनचरित्र- बद्रीनाथ भट्ट, पृष्ठ- 133
  • चंद्रगुप्त- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 59
  • दाहर अथवा सिंधपतन- उदय शंकर भट्ट, पृष्ठ –
  • दाहर अथवा सिंधपतन- उदय शंकर भट्ट, पृष्ठ –45-46
  • प्रेम की वेदी- प्रेमचंद, पृष्ठ-46
  • अजातशत्रु- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ-117 -118
  • ध्रुवस्वामिनी- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 29
  • ध्रुवस्वामिनी- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 28
  • स्कंदगुप्त- जयशंकर प्रसाद ,पृष्ठ 131
  • कामना- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 56
  • प्रकाश- सेठ गोविंद दास, पृष्ठ 14
  • राजश्री- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 15
  • चन्द्रगुप्त- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 83
  • राजश्री- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ- 55
  • रक्षाबंधन- हरिकृष्ण प्रेमी, पृष्ठ- 107

 

   डॉ० गीता पांडेय
   सहायक प्रोफेसर, साहित्य अध्ययन पीठ
   डॉ.बी.आर.अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली