
शोध-सारांश
गाँधीजी राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के विवेकशील राजनेता थे| उन्होंने राजनैतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु सामाजिक मुद्दों पर एकजुट होने का मार्ग सुझाया क्योंकि वे जानते थे कि भारत के वैविध्य को केंद्रीकृत कर सहिष्णुता और सद्भाव की माला में गूंथा जाए तो अनेक मतों में बिखरे हुए भारतीय जनमानस को एक किया जा सकता है| इस महानतम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु गाँधीजी ने गाँवों और शहरों में रचनात्मक कार्यों को आरंभ कर स्वतंत्रता की मूल धारा से जोड़ने का प्रयास किया| रचनात्मक कार्यों के अंतर्गत खादी का प्रचार, स्वावलंबी ग्राम, सांप्रदायिक सद्भाव, महिला सशक्तिकरण, आर्थिक समानता और अस्पृश्यता निवारण जैसे कार्यक्रम चलाए गए| विशेष रूप से यह रचनात्मक कार्यक्रम ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में चलाया गया जहाँ धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मतभेद का दृढ़ता के साथ अनुसरण होता रहा| महात्मा गाँधी की तत्कालीन राजनीति से लेकर वर्तमान समय में प्रासंगिकता इसीलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उन्होंने जन-जन को एकजुट किया जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय संघर्ष में भारतीयों को सफलता प्राप्त हुई|
महात्मा गाँधी वैचारिक धरातल पर आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं क्योंकि गाँधीजी ने सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि आधारों पर विभाजित हुए भारतीय भूखंड को राष्ट्र बनाने का राजनैतिक संकल्प पूरा किया| इस राष्ट्र निर्माण में गाँधीजी की कुछ वैचारिक मान्यताएँ रही जिसने जनमानस को एक ही विचारभूमि लाकर खड़ा किया ताकि उनमें निहित मतभेदों को मिटाया जा सकें और जिस राजनैतिक क्रांति के लिए एकता का लक्ष्य रखा गया था उसे प्राप्त किया जा सके| महात्मा गाँधी अपनी मूल प्रवृत्ति में समाज-सुधारक थे और उनका राजनैतिक व्यक्तित्व उनके समाज-सुधारक स्वरूप का ही परिणाम था अर्थात गाँधीजी के राजनैतिक संकल्पों की पूर्ति में सामाजिक उन्नति प्रथम सोपान थी| गाँधीजी के विचारों को उनके विभिन्न ग्रन्थों, लेखों और पत्रों के माध्यम से समझा जा सकता है जहाँ उन्होंने समाज की हर छोटी समस्या से लेकर देश के गंभीर मुद्दों को रेखांकित किया है| स्त्री शिक्षा, आत्मनिर्भर ग्राम, अस्पृश्यता, भाषाई मतैक्य, चरित्रबल और अहिंसा को लेकर अपने मत दिए और बड़े आश्चर्य की बात है कि 20वीं सदी में प्रदत्त गाँधी के विचारों ने वर्तमान में भी प्रगतिशीलता और लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया है|
गाँधीजी ने ‘आत्मनिर्भर ग्राम’ की संकल्पना का प्रसार किया| उनके अनुसार ग्राम की संरचना ऐसी हो जिसमें पूरा ग्रामीण समुदाय अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति ग्राम परिधि में ही कर सके| अतः विवशतावश ग्रामवासियों को अपने मूल निवास से पलायन नहीं करना पड़ेगा| हरिप्रसाद व्यास जी के अनुसार “ग्राम-स्वराज गाँधीजी की आजीवन शोध का परिणाम है, जो भारत के लाखों भूखों मरनेवाले लोगों के साथ एकरूप हो गए थे| उन्होंने भारत की सारी बुराइयों के रामबाण उपाय के रूप में ग्राम स्वराज्य की योजना हमारे सामने रखी|”1 हरिजन सेवक पत्रिका में गाँधीजी ने आधारभूत संसाधनों की अभाव से पीड़ित मध्यप्रांत के गाँव सांवली का वर्णन किया है जो दर्शता है कि अपने परिवेश को छोड़कर क्यों कोई व्यक्ति शहरी जीवनशैली की ओर अग्रसर होता है| “सांवली पहुँचने पर यह बात और मालूम हुई, कि जो ३०० स्त्री-पुरुष वहाँ एकत्र हुए थे उनके लिए दूध तो ३४ मील दूर चान्दा से मँगाना पड़ता था और ताजा शाक-सब्जियाँ १२० मील दूर नागपुर से आती थीं| सांवली तो ऐसे गाँवों का एक नमूना है| जिन कठिनाइयों का ऊपर जिक्र किया वे तो यहाँ के अधिकांश गाँवों में मौजूद हैं|x x x x x x किसी भी गाँव की इतनी बिसात तो होनी ही चाहिए कि ३०० स्त्री-पुरुष उसमें सुविधापूर्वक टिक सकें, उन्हें ताजा खुली हवा, हरी-भरी जगह, स्वस्थ गायों का बढ़िया दूध और साथ-साथ ताजा सब्जियाँ और फल भी मिल सकें| इनमें से अनेक चीजें अगर शहरों से खरीदकर वहाँ मंगानी पड़ें तो समझना चाहिए कि मूल में ही कोई बड़ी खराबी है|”2 सांवली गाँव जैसी दरिद्रता की स्थिति में लोगों के समक्ष अपना भरण-पोषण करने की तुलना में राष्ट्रीय मुद्दे दोयम दर्जे के होंगे अतः आवश्यकता ग्रामीण वातावरण को सशक्त करने की है| ‘ग्राम स्वराज्य’ से आशय है ऐसी ग्रामीण अर्थव्यवस्था जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए| यह संरचना शोषण मुक्त और विकेन्द्रीकृत होगी| आधारभूत संसाधनों के अभाव में जब व्यक्ति पलायन करेगा तो यह केवल व्यक्ति का नहीं वरन् संस्कृति का पलायन भी होगा, जिससे मूल स्थान से प्रवास करने वाले स्थान पर संस्कृतियों में टकराव की स्थिति उत्पन्न होगी और आयातित संस्कृति अपने जड़ों से कटेगी तथा स्थानांतरित लोगों के पास उत्साह और अभिप्रेरणा का स्रोत नहीं होगा जैसा तिलक के धार्मिक-सांस्कृतिक प्रयासों में दिखता है, जिसका उपयोग उन्होंने राजनैतिक भूमि पर करते हुए गणेश उत्सव और शिवाजी महोत्सव द्वारा राष्ट्रवाद की भावना को सुदृढ़ किया| इसके साथ ही आबादी असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होगी और मूल स्थान से स्थानांतरित लोगों को शहरों की यंत्रप्रधान जीवनशैली, गरीबी और भुखमरी आदि का दंश भी झेलना पड़ेगा| स्थानांतरित लोगों को न केवल निम्नस्तरीय शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान होगी बल्कि एक श्रमिक के तौर पर उन्हें कम मेहनताना भी दिया जाएगा क्योंकि स्थानांतरित श्रमिक कार्य करने हेतु मजबूर होंगे| गाँधीजी के अनुसार “ग्राम स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी महत्त्व की ज़रूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा; और फिर भी बहुतेरी दूसरी ज़रूरतों के लिए – जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा – वह परस्पर सहयोग से काम लेगा| इस तरह हर एक गाँव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी ज़रूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले| उसके पास इतनी फाजिल ज़मीन होनी चाहिए, जिसमें ढोर (पालतू पशु) चर सकें और गाँव के बड़ों व बच्चों के लिए मनबहलाव के साधनों और खेलकूद के मैदान बगैरा का बंदोबस्त हो सके| इसके बाद भी ज़मीन बची तो उसमें वह ऐसी उपयोगी फसलें बोयेगा, जिन्हें बेचकर वह आर्थिक लाभ उठा सके|”3 इस प्रकार गाँधीजी ने आत्मनिर्भर ग्राम और आर्थिक उन्नति द्वारा पूरे ग्राम समुदाय को एकता का मंत्र सुझाया| गाँधी इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे कि जब यह ग्रामीण समुदाय अपनी नैसर्गिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होगा केवल उसी स्थिति में राष्ट्रीय विषयों पर एकमत होकर स्वाधीनता संग्राम में मजबूती से प्रतिभाग करेगा|
देश की आर्थिक स्थिति को उन्नत बनाने में मजबूत शिक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान होता है| परंतु यह शिक्षा यदि अपनी मातृभाषा में हो तो विद्यार्थी के सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है जिससे शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ेगी| भारत सरकार की ‘नई शिक्षा नीति 2020’ के अनुसार “यह सर्वविदित है कि छोटे बच्चे अपनी घर की भाषा या मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक तेज़ी से सीखते हैं और समझ लेते हैं| घर की भाषा आमतौर पर मातृभाषा या स्थानीय समुदायों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है| जहाँ तक संभव हो, शिक्षा का माध्यम कम से कम ग्रेड 5 तक, और बेहतर होगा कि ग्रेड 8 और उससे आगे तक भी, घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए|”4 x x x x x x x x दुनिया भर के कई विकसित देशों में यह देखने को मिलता है कि अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं में शिक्षित होना कोई बाधा नहीं है, बल्कि वास्तव में शैक्षिक, सामाजिक और तकनीकी प्रगति के लिए इसका बहुत बड़ा लाभ ही होता है|”5 गाँधीजी भी शिक्षा में किसी भी विदेशी भाषा को अस्वीकार करते थे| उनके अनुसार अंग्रेजी जैसे विदेशी भाषा में ज्ञान प्राप्त करनेवाले न तो देश की जड़ों से जुड़ पाते हैं और न ही प्राथमिक स्तर का सामान्य ज्ञान अर्जित कर पाते हैं| अतः जो बौद्धिक और तकनीकि विकास देश के लिए अनिवार्य होता है वह कमजोर पड़ जाता है| “अंग्रेजी को इस तरह अत्यधिक महत्त्व देने के कारण शिक्षित लोगों पर इतना अधिक भार पड़ गया है कि प्रत्यक्ष जीवन के लिए उनकी मानसिक शक्तियाँ पंगु हो गई है और वे अपने ही देश में विदेशियों की भाँति बेगाने बन गये हैं| प्राथमिक शिक्षा पर आज जो खर्च हो रहा है, वह बिलकुल निरर्थक है, क्योंकि जो कुछ भी सिखाया जाता है उसे पढ़ने-वाले बहुत जल्दी भूल जाते है और शहरों तथा गाँवों की दृष्टि से उसका दो कौड़ी का भी मूल्य नहीं है|”6 गाँधीजी ने मातृभाषा में शिक्षा का इसी कारण समर्थन किया क्योंकि यह शिक्षा पद्धति कठिन अवधारणाओं को आसानी से सीखने में मदतगार बन सकी और जो लोग अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर पाश्चात्य मानसिकता के गुलाम बन, ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय शासन के पक्षधर थे उन्हें यह एहसास करा सके कि अंग्रेजी सरकार सुशासन की नहीं वरन् शोषणकारी शासन की हिमायती है| ब्रिटिश सरकार ने मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी स्वयं को बेहतर सिद्ध करने के प्रयास के क्रम में न केवल अंग्रेजी भाषा में शिक्षा को सर्वोपरि सिद्ध किया बल्कि भारतीय भाषाओं को निम्न कोटि का भी माना था “हमें ऐसे लोगों को शिक्षित करना है जिन्हें वर्तमान में अपनी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षित नहीं किया जा सकता| हमें उन्हें कोई विदेशी भाषा सिखानी होगी| मुझे अपनी भाषा (अंग्रेजी) के दावों को दोहराने की आवश्यकता नहीं है| यह पश्चिमी भाषाओं में भी सर्वोपरि है|…….भारत में, अंग्रेज़ी शासक वर्ग द्वारा बोली जाने वाली भाषा है| यह सरकार में उच्च वर्ग के मूल निवासियों द्वारा बोली जाती है|”7 इस प्रकार भारतीयों को मातृभाषा के आधार पर आभिजात्य और निम्न कोटी में बाटने वाली ‘फुट डालो, राज करो’ की नीति के विरुद्ध महात्मा गांधी की मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने की अपील उनकी दूरदर्शिता और भारतीयों को एकजुट करने का प्रयास भी थी| ब्रिटिश सरकार अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ऐसे वर्ग का निर्माण करना चाहती थी जो देखने में तो भारतीय नस्ल का हो किंतु विचारों में पश्चिम सभ्यता और शोषणकारी व्यवस्था का अनुयायी| “हमें वर्तमान में एक ऐसा वर्ग बनाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए जो हमारे और उन लाखों लोगों के बीच दुभाषिये (मध्यस्थ) बन सकें जिन पर हम शासन करते हैं, -एक ऐसा वर्ग जो रक्त और रंग (रूप-रंग) से भारतीय हो, लेकिन रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज़ी हो।”8
महात्मा गाँधी ने व्यक्ति के चरित्र को अत्यंत महत्वपूर्ण माना क्योंकि चरित्र की शक्ति हर कठिनाई का अडिगता से सामना करने हेतु बल प्रदान करती है| चरित्रवान होने से आशय है ‘सभी प्रकारों के भोगों के प्रति अनासक्त होकर जन कल्याण में अपना योगदान देना’ और इसके लिए उत्तम चरित्र की आवश्यकता होती है| चरित्र उसका ही दृढ़ होगा जो सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, अस्तेय, अपरिग्रह के मार्ग का भलीभाँति अनुसरण करेगा क्योंकि यही व्यक्ति निर्भीक होकर सत्य और न्याय के मार्ग का अनुसरण करनेवाला होगा| जब विचारों में सकारात्मकता होगी तो उसका व्यवहार में आना स्वाभाविक होगा| संयमित जीवन जीना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि जो लोग जीवन में चरित्र को महत्व नहीं देते, वे विकारों के घेरे में रहकर स्वयं का और समाज का नुकसान करते हैं| प्रत्येक व्यक्ति समाज और राष्ट्र की उन्नति में सहयोग दे सके इसके लिए उसका इंद्रियों पर नियंत्रण होना अनिवार्य है| समाज सेवा के अंतर्गत जनता की सेवा, स्वच्छता कार्यक्रम, अस्पृश्यता निवारण और स्त्री शिक्षा इत्यादि विषयों का समावेश होता है और यह तब ही संभव है जब व्यक्ति अपने विकारों और भोगों से ऊपर उठकर सोचे|गाँधीजी कहते थे “अच्छी तरह हरिजन सेवा करने के लिए, यही नहीं बल्कि गरीब, अनाथ, असहायों की सब तरह की सेवा के लिए, यह जरूरी है कि लोक-सेवक का अपना चरित्र शुद्ध और पवित्र हो। चरित्रबल अगर न हो, तो ऊँची-से-ऊँची बौद्धिक और व्यवस्था-सम्बन्धी योग्यता की भी कोई कीमत नहीं| यह तो उलटे अड़चन भी बन सकती है, जबकि शुद्ध चरित्र के साथ-साथ ऐसी सेवा का प्रेम भी हो तो उससे आवश्यक बौद्धिक और व्यवस्था-सम्बन्धी योग्यता भी निश्चय ही बढ़ जायगी या पैदा हो जायगी|xxxxxx सेवा के लिए शुद्ध और निष्कलंक चरित्र का होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है| हरिजन-सेवा अथवा खादी या ग्रामोद्योग के काम में लगे हुए कार्यकर्ताओं के लिए तो उन बिलकुल सीधे-सादे, निर्दोष और अज्ञानी स्त्री-पुरुषों के संपर्क में आना बहुत जरूरी है, जो बौद्धिक दृष्टि से संभवत बालक के समान होंगे| अगर उनमें चरित्रबल न होगा तो अंत में जाकर जरूर उनका पतन होगा और उसके फलस्वरूप जिस उद्देश्य के लिए वे काम कर रहे हैं उसे उस कार्यक्षेत्र में और भी धक्का लगेगा|”9 चरित्रवान लोग गरीबों और शोषितों के प्रति संवेदनशील होंगे, अहिंसा के मार्ग द्वारा जनता के अधिकारों की मांग करेंगे तथा हर प्रकार के भ्रष्ट और अनैतिक अव्यवस्था का मुखरता से विरोध करते हुए लोगों को राष्ट्रीयता की विचारभूमि पर जोड़ सकेंगे| गाँधी के विचारों ने अनेकों स्वैच्छिक लोकसेवकों को दृढ़ चरित्रबल की शिक्षा देते हुए राष्ट्र सेवा करने हेतु अभिप्रेरित किया जिन्होंने सामाजिक कुरीतियों और राष्ट्रीय अत्याचार के विरुद्ध जन सैलाब खड़ा किया|
महात्मा गाँधीजी ने भाषाई स्तर पर राष्ट्रीय एकता स्थापित करने हेतु ‘हिंदुस्तानी’ भाषा का समर्थन किया| हिंदुस्तानी भाषा से आशय है, हिंदी और उर्दू का मिश्रण| इस भाषा का प्रचार दक्षिण भारत में करने हेतु गाँधीजी के नेतृत्व में ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ का गठन भी हुआ| गाँधीजी ने बंगाल और दक्षिण प्रांत के लोगों को हिंदुस्तानी सीखने की अपील भी की क्योंकि गाँधीजी के अनुसार हिंदुस्तानी सीख लेना तुलनात्मक रूप से आसान था और इस भाषा को बोलने एवं समझने वालों की बड़ी संख्या है जिसका सदुपयोग राष्ट्रीय आंदोलन में आसानी से संवाद स्थापित कर रचनात्मक कार्यों और आंदोलनों को तीव्रता देने में किया जा सकता है|हालाँकि इसका उद्देश्य किसी भी प्रांतीय भाषा को कम आँकना नहीं है क्योंकि मातृभाषा अपने परिवेश और संस्कृति से परिचित कराती है| “जिस भाषा को जनता के ज्यादा-से-ज्यादा लोग समझते हैं, हमारी सबसे बड़ी सभा उस भाषा में अपना काम ना चलाएँ तो सचमुच ही वह जनता के लिए सबक सीखने की चीज न बन सकेगी| मैं द्रविड़ भाइयों की कठिनाई को समझता हूँ; लेकिन मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम और उद्यम के सामने कोई चीज कठिन नहीं है|”10
निष्कर्षतः यह समझ सकते हैं कि गाँधी जी की संपूर्ण वैचारिक प्रतिबद्धताएँ भारत को राष्ट्र के स्तर पर एकता के सूत्र में पिरोना चाहती थी| उनके विचारों की सफलता इस अर्थ में देखी जा सकती है कि देश की आजादी में विभिन्न धर्मों, भाषाओं, प्रांतों और विचारों ने एकसाथ प्रतिभाग किया| गाँधीजी के संकल्पना की मूल चेतना यही थी कि क्षेत्रीय स्तर के सभी समस्याओं का व्यावहारिक निराकरण हो ताकि राष्ट्रीय स्तर पर भारत का विखंडन करनेवाली साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जन समुदाय को तैयार किया जा सके|
संदर्भ ग्रंथ :
- 1. व्यास, हरिप्रसाद, ग्राम स्वराज्य, नवजीवन मुद्रणालय, अहमदाबाद, 1963, पृ. 16
- महात्मागाँधी, हरिजन सेवक , 7 मार्च 1936, पृ.20 ://www.gandhiheritageportal.org/datalink/files/ghp_journals/journal_image_1/harijan_sevak_hi_vol4_img17.jpg 26/10/25
- महात्मा गाँधी, हरिजन सेवक , 2 अगस्त 1942, पृ. 243
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, 4.11, पृ.19
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, 4.15, पृ.20
- महात्मा गाँधी, हरिजन सेवक , 2 अक्टूबर 1937, पृ.33
- मैकाले मिनट ऑन एजुकेशन, 2 फ़रवरी, 1835, पृ.3
- मैकाले मिनट ऑन एजुकेशन, 2 फ़रवरी, 1835, पृ.8
- महात्मा गाँधी, हरिजन सेवक , 7 नवंबर 1936, पृ.300
- महात्मा गाँधी, यंग इंडिया, 2 फरवरी 1921, पृ.33
अनुराग तिवारी प्रेमचंद
महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय
बड़ौदा





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