
शोध सार : हिंदी भाषा और महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत दोनों भारतीय सभ्यता और संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रतीक माने जाते हैं। हिंदी भाषा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एकता और जनचेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जबकि महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत ने संघर्ष और विरोध को एक नयी दिशा दी। हिंदी भारत की एक प्रमुख भाषा है, जो संस्कृत से उत्पन्न हुई। इसका विकास प्राचीन काल से ही हुआ, लेकिन आधुनिक हिंदी का स्वरूप 19वीं सदी में स्पष्ट हुआ। हिंदी का उदय उस समय हुआ जब भारत पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद का प्रभाव था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हिंदी को एक ऐसी भाषा के रूप में देखा गया, जो पूरे देश को एकजुट कर सकती है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी भाषा ने स्वतंत्रता सेनानियों के विचारों और भावनाओं को जनमानस तक पहुँचाने का कार्य किया। यह भाषा सरल, सुलभ और सभी वर्गों के लिए समझने योग्य थी। महात्मा गांधी ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का समर्थन किया, क्योंकि वह इसे जन-जन की भाषा मानते थे। गांधी जी ने कहा था कि हिंदी भारत की आम जनता की भाषा है, और यह सभी को जोड़ने का कार्य कर सकती है।
बीज शब्द : हिन्दी भाषा, भारतीयता, राष्ट्रभाषा, हिंदी का विकास, स्वराज और अहिंसा के सिद्धांत आदि।
मूल आलेख : सरल शब्दों में, भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने विचारों, भावनाओं और जानकारी को शब्दों, ध्वनियों या संकेतों के माध्यम से एक-दूसरों तक पहुंचाते हैं। यह मानव संचार का सबसे प्रमुख तरीका है, जो हमें एक-दूसरे से जुड़ने और समझने में मदद करता है। डॉ. जोस आस्टिन हिंदी भाषा के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं- “हिन्दी न केवल भारत की राष्ट्रभाषा है बल्कि मॉरिशस, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम आदि देशों के भारतीय मूल के निवासियों की भी भाषा है। इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों के कारण हिन्दी का प्रचलन है। किंतु अमेरिका, ब्रिटेन, रूस जैसे देशों में भी गत कई वर्षों से हिन्दी के प्रति विशेष रुचि उत्पन्न हो गई है।”[1] हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने हिंदी साहित्य उद्भव और विकास हिंदी भाषा की चर्चा करते हुए कहते हैं – “हिंदी भारतवर्ष के एक बहुत विशाल प्रदेश की साहित्य-भाषा है। राजस्थान और पंजाब राज्य की पश्चिमी सीमा से लेकर बिहार के पूर्वी सीमांत तक तथा उत्तरप्रदेश के उत्तरी सीमांत से लेकर मध्यप्रदेश के मध्य तक के अनेक राज्यों की साहित्यिक भाषा को हम हिंदी कहते आए हैं।”[2]
महात्मा गांधी का जीवन और विचारधारा पूरी तरह से अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित थी। गांधी जी ने अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा से परहेज के रूप में नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, अहिंसा का अर्थ केवल हिंसा का विरोध करना नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति प्रेम, दया और करुणा का व्यवहार करना है। ई. एम. कोस्टर का गाँधी जी के बारे में मानना था कि “गांधी जी को संभवतः हमारी शताब्दी का महानतम व्यक्ति माना जायेगा। गांधीजी कर्म में डायोनिसस विनम्रता में सेंट फ्रांसिस और बुद्धिमानी में सुकरात थे। इन्हीं गुणों के बल पर गांधी जी ने दुनिया के सामने उजागर कर दिया कि अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए ताकत का सहारा लेने वाले राजनेताओं के तरीके कितने शुद्ध हैं ? इस प्रतियोगिता में राज्य की शक्तियों के भौतिक विरोध की तुलना में, आध्यात्मिक सत्यनिष्ठा विजयी होती है।”[3] गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत दो मुख्य तत्वों पर आधारित था – सत्य और अहिंसा। उनके अनुसार सत्य वह शक्ति है, जो अंततः न्याय की स्थापना करती है और अहिंसा वह माध्यम है जिसके द्वारा सत्य की शक्ति का उपयोग किया जाता है। गांधी जी के अनुसार, हिंसा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। हिंसा के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले घाव कभी भी पूरी तरह से भर नहीं सकते। इसके विपरीत अहिंसा का मार्ग व्यक्ति और समाज के विकास के लिए आवश्यक है। महात्मा गांधी का सत्य अनन्त एवं असीम की भांति अनिवर्चनीय था उनके अनुसार ”सत्य एक ऐसा विशाल वृक्ष है कि जितनी अधिक उसकी सेवा की जाऐ उसमें उतने ही अधिक फल उगते हुए दिखाई देते हैं। यह तो अनन्त है। ज्यों-ज्यों हम गहरे बैठते हैं त्यों-त्यों ही रत्न निकलते हैं। साथ ही सेवा के अवसर हाथ आते रहते हैं।”[4]
स्वमी विवेकानंद जी सत्य पर विचार प्रकट करते हुए उन विकारो को त्यागने, जो हमे निर्बल बनाते हैं और आगे बढ़ने से रोकते है उनको छोड़ने को कहते है। जीवन जितना सरल, सहज और सादगी से भरा होगा उतना ही सुंदर होगा। वे कहते हैं – “सत्य की कसौटी हाथ में लो…जो कुछ तुम्हें मन से, बुद्धि से, शरीर से निर्बल करे उसे विष के समान त्याग दो, उसमें जीवन नहीं है, वह मिथ्या है, सत्य हो ही नहीं सकता। सत्य शक्ति देता है। सत्य ही शुचि है, सत्य ही परम ज्ञान है… सत्य शक्तिकर होगा ही, कल्याणकर होगा ही, प्राणप्रद होगा ही… यह दैन्यकारक प्रमाद त्याग दो, शक्ति का वरण करो… कण-कण में ही तो सहज सत्य व्याप्त है-तुम्हारे अस्तित्व जैसा ही सहज है वह… उसे ग्रहण करो।”[5] शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो मनुष्य का उद्धार कर सकती है स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं – “हम उस धर्म के अन्वेषी हैं जो मनुष्य का उद्धार करे…हम सर्वत्र उस शिक्षा का प्रसार चाहते हैं जो मनुष्य को मुक्त करे। मनुष्य का हित करें, ऐसे ही शास्त्र हम चाहते हैं।”[6]
गांधी जी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसा को अपना मुख्य हथियार बनाया। उनका मानना था कि हिंसा केवल और अधिक हिंसा को जन्म देती है, जबकि अहिंसा व्यक्ति के भीतर और समाज के भीतर शांति और समरसता की भावना को जन्म देती है। गांधी जी ने सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संघर्ष किया, जिसमें उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध और असहयोग के मार्ग को अपनाया। सत्याग्रह के अतिरिक्त महात्मागांधी ने उपवास को भी अहिंसा दर्शन के सम्पादन के लिये अनिवार्य माना है। सत्याग्रह की भावनाओं के आधार पर महात्मा गांधी ने उपवास पद्धति को भी समान महत्व दिया है। महात्मा गांधी के अनुसार “उपवास एक हृदय मंथन का साधन है। हृदय में पूर्ण अहिंसा तथा पूर्ण सत्य हो तथा किसी के प्रति हृदय में द्वेष भावना न हो, तभी उपवास हृदय मंथन है अन्यथा व्यर्थ। महात्मा गांधी के अनुसार उपवास एक आत्मपरीक्षण है, तथा इसका स्वरूप आध्यात्मिक है जो निश्चित ही दूसरों को सकारात्मक रूप में सोचने के लिये बाध्य करता है।” [7] उनका सबसे प्रसिद्ध आंदोलन “दांडी मार्च” था, जहां उन्होंने नमक कानून का उल्लंघन करते हुए अहिंसात्मक ढंग से ब्रिटिश सरकार का विरोध किया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया और विश्वभर में अहिंसा के सिद्धांत की शक्ति को प्रमाणित किया। श्रीमन्नारायण ग्रामस्वराज की भूमिका में महात्मा गांधी जी के बारे में विचार प्रकट करते हुए कहते हैं – “सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें स्पष्ट रूप से यह समझ लेना चाहिए कि गांधीजी ऐसी सामाजिक और आर्थिक रचना के हिमायती नहीं थे, जो केवल भौतिक मूल्यों की बुनियाद पर खड़ी हो। वे सदा सरल और सादा जीवन तथा उच्च विचार के आदर्श का प्रतिपादन करते थेः उन्होंने केवल रहन-सहन के स्तर को अधिक ऊँचा उठाने के लिए ही काम नहीं किया, बल्कि समग्र जीवन के स्तर को अधिक ऊँचा उठाने के लिए कार्य किया। गांधीजी कहते हैं- “सच्चे अर्थ में सभ्यता जीवन की आवश्यकताओं को बढ़ाने में नहीं, परंतु जान-बूझकर और स्वेच्छा से उनकी मर्यादा बाँधने में है।”[8]
हिंदी भाषा और महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत में एक गहरी समानता दिखाई देती है। दोनों ने भारतीय समाज को जोड़ने और एकता का संदेश फैलाने का कार्य किया। जिस प्रकार गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत संघर्षों को बिना हिंसा के समाधान की ओर ले जाता है, उसी प्रकार हिंदी भाषा ने भी विभिन्न समुदायों और भाषाई विविधताओं के बीच पुल का कार्य किया। हिंदी के विकास में गाँधी जी का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा वे अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में स्वराज्य के लिए अंग्रेजी शिक्षा के बारे में लिखते हैं- “करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली है, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं नही सुझाना चाहता। लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं।”[9]
हिंदी भाषा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एकजुटता और समन्वय की भावना को प्रकट किया। यह भाषा उस समय की जनता के लिए एक सरल और समझने योग्य माध्यम बनी, जिसने स्वतंत्रता के विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। इसी प्रकार, गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत भी सभी वर्गों और समुदायों के लिए समान रूप से लागू होता था, क्योंकि यह हिंसा से परे एक शांति और सौहार्द्रपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में अग्रसर था। गांधी जी अपने देश के लिए अपनी ही भाषा में उन्नति करने पर जोर देते हुए कहते हैं- “आपको समझना चाहिए कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया हैं। अंग्रेजी शिक्षा में दंभ, राग, जुल्म वैगरा बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा हैं। अब अगर हम अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए कुछ करते हैं, तो उसका हम पर जो उसका कर्ज चढ़ा हुआ है, उसका कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं। हिंदी भाषा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एकजुटता और समन्वय की भावना को प्रकट किया। यह भाषा उस समय की जनता के लिए एक सरल और समझने योग्य माध्यम बनी, जिसने स्वतंत्रता के विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। इसी प्रकार, गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत भी सभी वर्गों और समुदायों के लिए समान रूप से लागू होता था, क्योंकि यह हिंसा से परे एक शांति और सौहार्दपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में अग्रसर था। यह बात बहुत साफ है कि जो लोग हिन्दी जाति का अस्तित्व अस्वीकार करते हैं और हिन्दी भाषा की एकता खंडित करना चाहते हैं वे कहीं न कहीं भारत की राष्ट्रीय एकता का भी विरोध करते हैं। कारण यह है कि इस राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का माध्यम हिन्दी है।”[10]
गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं था, बल्कि यह आज के आधुनिक समाज में भी प्रासंगिक है। वर्तमान समय में, जब समाज हिंसा, संघर्ष और असमानता की चुनौतियों का सामना कर रहा है, गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि कैसे हम शांति, सहिष्णुता और सामंजस्य के माध्यम से समाज में सुधार ला सकते हैं। गाँधी जी कहते है – “अगर सब प्राणी एक हैं, तो एक के पाप का प्रभाव दूसरे पर पड़ना लाजिमी है। इसलिए कोई न भी चाहे, हिंसा से नितांत अछूता नहीं रह सकता। समाज में रहने वाला मनुष्य समाज की हिंसा में अनचाहे शामिल हो जाता है। जब युद्ध दो राष्ट्रों के बीच हो, तो युद्ध को रोकना अहिंसा का धर्म हो जाता है। इस युद्ध में शामिल होना मेरे लिए धर्म है। इसमें सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। मुझे इसमें कोई दोष, कोई विरोधाभास नहीं दिखायी देता। अहिंसा का प्रश्न सूक्ष्म है, इसमें मतभेद हमेशा हो सकता है।”[11] एकता वह ताकत है जो हमे हर बाधाओं से बाहर निकलने का हौसला देती है, मनुष्य को हमेशा एक-दुसरे के सुख-दुःख में हमेशा तत्पर खड़ा चाहिए, तभी हम एक-दुसरे के विश्वास के पात्र बन सकते है। गाँधी जी कहते है – “हमारा एक समान उद्देश्य हो, एक समान लक्ष्य हो, और समान सुख-दुःख हों। और इस समान लक्ष्य की प्राप्ति के प्रयत्न में सहयोग करना, एक-दूसरे का दुःख बँटाना और परस्पर सहिष्णुता बरतना, इस एकता की भावना बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका है। जहाँ तक एक समान लक्ष्य की बात है, वह हमारे सामने है, हम चाहते हैं कि हमारा यह महान् देश महानतर और स्वशासित हो जाये। हमारे दुःख भी बहुत हैं, जिन्हें हम एक दूसरे के साथ बँटा सकते हैं।”[12] जीवन में चाहे कितनी भी बाधा आ जाए उससे कभी डर कर नही बैठना चाहिए, बल्कि उसका सामना निडरता पूर्वक सामना करना चाहिए। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो हमको अंधरे से प्रकाश की और लेकर जाता हैं। शिक्षा की महत्ता को बताते हुए गाँधी जी कहते है – “आपमें इतना बल आ जाये कि आजीविका के लिए आपको किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े, तब आपकी शिक्षा ठीक कहलायगी। जब मनमें यह विचार घर कर ले कि जब तक मेरे हाथ-पैर साबित हैं, तब तक आजीविका प्राप्त करने के लिए मुझे कहीं भी सिर नहीं झुकाना है, आपकी शिक्षा तभी ठीक कहलायेगी।”[13]
आज मनुष्य के पास सभी सुख सुविधाओ के होते हुए भी वह संतुष्ट नहीं है, बस दुसरो की होड़ में वह अपने को भूलता जा रहा है। महात्मा गाँधी भारत वासियों को संबोधित करते हुए कहते है – “यूरोप की ओर देखो। वहां कोई भी सुखी दिखाई नहीं देता, क्योंकि किसी को संतोष नहीं है। मजदूरों को मालिकों पर और मालिकों को मजदूरों पर विश्वास नहीं है। दोनों में एक तरह की शक्ति है लेकिन वह तो भैंसों में भी होती है; वे मरते दम तक लड़ते ही रहते हैं। हर तरह की गति, प्रगति नहीं होती, यूरोप की जनता आगे बढ़ती जाती है, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। उसके पास धन है, इसका यह मतलब नहीं की नीति और धर्म भी है। दुर्योधन के पास बहुत धन था, लेकिन वह विदुर और सुदामा की अपेक्षा गरीब था। विदुर और सुदामा की आज पूरा विश्व पूजा करता है। दुर्योधन का नाम हम उसके दुर्गुणों का त्याग करने की खातिर ही लेते हैं।”[14] हमें अपने आपको जाने की बहुत आवश्यकता है, जब तक हम अपने आप को ही नहीं जानेगे तब अपना क्या दुसरो का भी कल्याण नहीं कर सकते गाँधी जी कहते है कि – “मैं बार-बार कहता हूँ कि स्वराज्य तभी मिलेगा जब आप अपना धर्म पहचानेंगे। जयनाद करने से वह नहीं मिल सकता। मैं ये बातें क्यों कह रहा हूँ? मुझे धन-दौलत नहीं बाहिए, मान-सम्मान नहीं चाहिए, भारत का राज्य नहीं चाहिए; मुझे तो भारत की आजादी चाहिए।”[15]
समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक और पोषणीय असमानता की ओर इशारा करते हुए गाँधी जी बिहार जैसे गौरवशाली प्रदेश में व्याप्त गरीबी और भूखमरी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए लोगों को उनके उत्तरदायित्व का बोध कराते हुए कहते है – “बिहार में अधिकांश लोग सत्तू नामक निःसत्व खुराक साकार रहते हैं। जब भुनी हुई मक्की का यह आटा, पानी और लाल मिरचों के साथ गले से उतारते हुए मैंने लोगों को देखा तो मेरी आँखों से आग बरसने लगी। आप लोगों को वैसा खाना पड़े तो आप उस पर कितने दिन गुजार सकते हैं? रामचन्द्रजी की भूमि में – जनक राजा की पुष्यभूमि में लोगों को आज थी नहीं मिलता, दूध तक नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में आप निश्चिन्त होकर कैसे बैठ सकते हैं?”[16] शिक्षा का उद्देश्य हर व्यक्ति को स्वतंत्रता और संघर्ष के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए। भूखे रहकर भी आजादी पाने का साहस आवश्यक है। गाँधी जी अरब और मेसोपोटामिया के युवाओं के शस्त्रबल की तुलना भारतीय सत्य और आत्मबल से करते हैं और तुलसीदास के उपदेश का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि अन्यायपूर्ण सत्ता का त्याग करना हमारा धर्म है। यदि उसे पूर्ण रूप से छोड़ना संभव न हो, तो उससे दूर रहना चाहिए। आत्मनिर्भरता और सत्यनिष्ठा की प्रेरणा पर जोर देते हुए है – “हमें यदि ऐसी शिक्षा नहीं मिलती कि हमारा प्रत्येक मनुष्य मैक्स्विनी बन जाये, तो उस शिक्षा का कोई अर्थ नहीं है। यदि हमें आजादी से खाने को न मिले तो हम में भूखों मरकर आजाद होने की ताकत आनी चाहिए, मैं यह चाहता हूँ। अरब और मेसोपोटामिया के लड़कों को ऐसी तालीम प्राप्त है। वे अंग्रेजों से दो-दो हाथ करने का हौसला रखते हैं। वहाँ तो शास्त्र-बल मौजूद है, हमारे यहाँ वह नहीं है। परन्तु भारत की सत्यवृत्तिमें जबरदस्त आत्मिक शक्ति विद्यमान है, इसीलिए हम अत्याचार को हटा सकते हैं। असन्तों का त्याग करने का तुलसीदासजी का उपदेश है। में कहता हूँ कि यह हुकूमत राक्षसी है, इसलिए उसका त्याग हमारा धर्म है। त्याग करने का अर्थ हिजरत करना ही होता है। परन्तु में वैसा करने को नहीं कहता। देश छोड़कर हम कहाँ जायें? हिन्द महासागर अथवा बंगाल की खाड़ी में समा जाने के सिवा हम और कहाँ जा सकते हैं। परन्तु तुलसीदासजी ने कहा है कि असन्तोंका सर्वथा त्याग न कर सको, तो दूर अवश्य रहो।”[17] हिंदी भाषा भी आज आधुनिक समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह न केवल भारत में, बल्कि विश्वभर में फैले भारतीय समुदायों के बीच संचार और संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इंटरनेट और तकनीक के प्रसार के साथ हिंदी भाषा का प्रभाव और भी बढ़ गया है, जिससे यह एक वैश्विक भाषा बनने की ओर अग्रसर है। भारतेंदु जी कहते है हमे जो भी कार्य करना हो अपनी ही भाषा में करण चाहिए तभी देश उन्नति की और अग्रसर हो सकता है वे अपने दोहे के माध्यम से कहते है –
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।”[18]
निष्कर्ष : हिंदी भाषा और महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत दोनों ही भारतीय समाज और संस्कृति के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। हिंदी ने भारतीय समाज को एकजुट करने और जनचेतना को फैलाने का कार्य किया, जबकि गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत ने समाज को एक नई दिशा दी। दोनों ने मिलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज के युग में भी इन दोनों की प्रासंगिकता बनी हुई है। जिस प्रकार हिंदी भाषा ने भारत की विविधता में एकता का प्रतीक बनकर उभरने का कार्य किया, उसी प्रकार महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत भी हमें एक शांतिपूर्ण और समृद्ध समाज की दिशा में मार्गदर्शन देता है। इसीलिए, हमें इन दोनों की महत्ता को समझते हुए इनके सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और समाज में शांति, एकता और सहिष्णुता का प्रसार करना चाहिए।
संदर्भ :
- डॉ. आस्टिन जोस : हिंदी के विकास में विदेशी विद्वानो का योगदान, प्रकाशक: अनुराग प्रकाशन, प्रथम संस्करण: 1985, पृष्ठ संख्या -17
- हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य उभार और विकास, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, ग्यारहवीं आवर्ती : 2013, पृष्ठ संख्या -17
- सर्वपल्ली राधाकृष्णनः महात्मा गांधी, एसेज एंड रिफ्लेक्शन आन हिज लाइफ एंड वर्कः जार्ज एंड अनविन, लंदन (1949) पृ. 537
- डॉ. प्रभात भट्टाचार्य, पूर्वोक्त पृष्ठ 63-65
- रोमां रोला, विवेकानंद , अनुवाद : स. ही. वात्स्यायन अज्ञेय, रघुवीर सहाय, लोकभारती पेपरबैक्स, प्रथम पृष्ठ
- वही,प्रथम पृष्ठ
- यंग 05-11-1931, पृष्ठ 341
- महात्मा गांधी, ग्राम स्वराज्य, प्रभात प्रकाशन, संस्करण : 2019, पृष्ठ संख्या -9
- गांधी जी, हिंद स्वराज, पृष्ठ संख्या – 74
- गांधी, सम्पूर्ण गांधी वांग्मय, खंड-42, पृष्ठ संख्या-329
- मधुकर उपाध्याय, बापू 3 पहला प्रवासी, प्रथम संस्करण: 2020, प्रकाशक : सेतु प्रकाशन प्रा. लि., पृष्ठ संख्या-17
- गाँधी, सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खंड-17, पृष्ठ संख्या – 52
- गाँधी, सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खंड-1, भाषण : विद्यार्थियों की सभा, पृष्ठ संख्या – 27
- गांधी मोहनदास कर्मचंद, संपूर्ण गांधी वांग्मय-17, फरवरी जून 1920, प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार, पृष्ठ संख्या-20
- गाँधी, सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खंड-1, भाषण : विद्यार्थियों की सभा, पृष्ठ संख्या -29
- गाँधी, सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खंड-1, भाषण : विद्यार्थियों की सभा, पृष्ठ संख्या – 27
- वही, पृष्ठ संख्या – 27
- https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%9C_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE_%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%B9%E0%A5%88





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