शोध सार– राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का व्यक्तित्व इतना विराट एवं प्रभावशाली था कि भारतीय राजनीति से लेकर लगभग भारत की प्रत्येक भाषा के साहित्य में हमें उनके विचारों की झलक प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे जाती है। हिंदी साहित्य के मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध जैनेंद्र कुमार जन्म से तो जैन परिवार में उत्पन्न होने के कारण जैन दर्शन से प्रभावित थे परंतु उनके व्यवहार व व्यक्तित्व पर गांधीवादी चिंतन का प्रभाव व्यापक रूप से परिलक्षित होता है, साथ ही उनकी रचनाओं में भी गांधी चिंतन के पुट देखे जा सकते हैं। जैनेंद्र कुमार ने अपने जीवन काल में 12 उपन्यासों की रचना की। 1935 ई. में प्रकाशित सुनीता उपन्यास में हमें गांधी चिंतन का प्रभाव दिखाई देता है। इस उपन्यास में दिखाया गया है कि किस प्रकार एक स्त्री के त्याग समर्पण के द्वारा मानसिक कुंठा से ग्रस्त एक व्यक्ति जिसका नाम हरिप्रसन्न है उसके जीवन में परिवर्तन आता है साथ ही इस उपन्यास में सत्य, कर्तव्यपरायणता, विश्वास,त्याग,हृदय परिवर्तन जैसे मानवीय मूल्यों का भी चित्रण किया गया है जो गांधी चिंतन के आधार हैं।

बीज शब्द- गांधी चिंतन, मनोविज्ञान, सत्य, अहिंसा, मानवीय मूल्य

मूल आलेख- जैनेंद्र कुमार मनोवैज्ञानिक लेखक के साथ-साथ दार्शनिक और आंदोलनकारी भी थे। जैनेंद्र कुमार जी सहज, संवेदनशील तथा गंभीर व्यक्तित्व के के धनी माने जाते थे। मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध जैनेंद्र कुमार की रचनाओं में हमें गांधी चिंतन के तत्वों का समावेशन दिखाई देता है। भले ही उपन्यास सम्राट प्रेमचंद और सियारामशरण गुप्त की तरह उनकी रचनाओं में गांधी चिंतन की अभिव्यक्ति विस्तृत फलक के रूप में परिलक्षित न हो परंतु सीमित रूप में भी वह  अत्यंत प्रभावशाली जान पड़ती है। जैनेंद्र कुमार ने अपने जीवन काल में 12 उपन्यासों की रचना की, उनका पहला उपन्यास 1929 में परख नाम से आता है तथा दूसरा उपन्यास 1935 ईस्वी में सुनीता नाम से प्रकाशित होता है, यह एक व्यक्तिवादी मनोवैज्ञानिक नारी प्रधान उपन्यास है। इस उपन्यास की  नायिका का नाम  सुनीता है जो आदर्श गुणों से युक्त एक सशक्त नारी है।

सुनीता के चरित्र को केंद्र बिंदु बनाकर ही उपन्यास की कथावस्तु आगे बढ़ती है, सुनीता एक पतिपरायण स्त्री है। वह अपने सारे कर्तव्यों का निर्वहन निष्ठापूर्वक करती है, साथ ही वह अपने पति श्रीकांत के मित्र हरिप्रसन्न के मन की गांठ को दूर करने के लिए हरिप्रसन्न के साथ वीरान जंगल में जाती है तथा हरिप्रसन्न की यौन कुंठा को दूर करने के लिए निर्वस्त्र होकर आत्मसमर्पण द्वारा  हरिप्रसन्न के मन की  गांठ को दूर करती है। हरिप्रसन्न के मन  की गांठ को खोलने के लिए श्रीकांत सुनीता का ऋणी हो जाता है,सुनीता ने यह कार्य समाज के उपकार के लिए किया है। सुनीता एक आदर्श स्त्री है वह अपने त्याग, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा के लिये अपने स्व का त्याग कर देती है।जैनेंद्र कुमार ने उपन्यास की नायिका सुनीता के माध्यम से मानवीय मूल्यों का चित्रण किया है जिन मूल्यों पर वे पूर्ण आस्था रखते थे। गांधी चिंतन के प्रमुख तत्त्व अहिंसा के सिद्धांत का भी प्रतिपादन इस उपन्यास में हुआ है, साथ ही लेखक ने संघर्ष की प्रेरणा का संदेश दिया है। सुनीता अपने जीवनकाल में संघर्षों का सामना करते हुए एक सशक्त स्त्री की छवि गढ़ती है, वह अपने जीवन काल में अनेकों संघर्षों का सामना बड़ी मजबूती से करते हुए हमें दिखाई देती है।

महात्मा गांधी जी बुद्धि की अपेक्षा श्रद्धा को अधिक महत्व देते थे। जैनेंद्र कुमार का विचार भी इस संबंध में कुछ इसी प्रकार का था जिस पर विचार करते हुए अपने लेख ‘हिंदी उपन्यास और गांधीवाद’ में डॉक्टर चंद्रकांत बंदिवडेकर लिखते हैं “जैनेंद्र बुद्धि से दुश्मनी करते हुए दिखलाई देते हैं और उनके प्रमुख पात्र भी समस्याओं के समाधान के लिए बुद्धि पर निर्भर रहने की अपेक्षा हृदय और श्रद्धा में विश्वास करते जान पड़ते हैं गांधी जी बुद्धि से अधिक श्रद्धा में आस्था रखते थे।”¹

सुनीता में चित्रित मुख्य समस्या एक शादीशुदा स्त्री का परपुरुष से प्रेम और मानसिक ग्रंथि से ग्रसित व्यक्ति का व्यक्तित्व है। इन समस्याओं का समाधान जैनेंद्र कुमार ने गांधीवादी चिंतन से खोजने का प्रयास किया है। सुनीता उपन्यास की नायिका सुनीता अपने प्रेम को छोड़कर कर्तव्य के रास्ते पर अग्रसर दिखाई गई है, वह अपने प्रेमी हरिप्रसन्न को छोड़ अपने पति श्रीकांत के पास लौट आती है। जैनेंद्र के उपन्यासों में गांधी चिंतन के तत्व जैसे सत्य, अहिंसा, मानवतावाद, लोक कल्याण और सद्भावना आदि की अभिव्यक्ति हम देख सकते हैं। सुनीता उपन्यास में जैनेन्द्र ने गांधी चिंतन के तत्व अहिंसा, प्रेम, विश्वास, भाईचारा, त्याग को श्रीकांत के माध्यम से प्रस्तुत किया है। श्रीकांत गांधी चिंतन के इन तत्वों की प्रतिमूर्ति के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होता है। वह अपनी पत्नी सुनीता पर अटूट विश्वास करता है साथ ही अपने मित्र हरिप्रसन्न के मन की गांठ खोलने के लिए सुनीता को प्रेरित भी करता है। इस उपन्यास में हम देखते हैं कि जिस प्रकार महात्मा गांधी जी शारीरिक श्रम को महत्व देते थे हरिप्रसन्न का जीवन भी कुछ इस प्रकार का है, वह मानसिक श्रम की अपेक्षा शारीरिक श्रम को अधिक महत्वपूर्ण समझता है। उसका मानना है कि शारीरिक श्रम द्वारा ही जीव को उपार्जन करना चाहिए।शारीरिक श्रम के साथ ही साथ महात्मा गांधी जी की हृदय परिवर्तन की अवधारणा पर अटूट श्रद्धा थी अगर हम जैनेंद्र कुमार के उपन्यासों पर दृष्टि डालते हैं तो हमें गांधी चिंतन का यह प्रमुख तत्व ‘हृदय परिवर्तन’ उसमें समाहित दिखाई देता है। जैनेंद्र कुमार के इस उपन्यास में भी हमें हृदय परिवर्तन की झलक दिखलाई पड़ती है। नंददुलारे वाजपेई जी कहते हैं कि “ये पात्र अपनी पत्नियों को प्रत्येक दशा में छूट देते हैं और इस प्रणाली के द्वारा इनके हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा करते हैं। गांधी जी के हृदय परिवर्तन का आदर्श राजनीतिक स्तर पर प्रतिष्ठित किया था। पारिवारिक व्यवहारों में गांधी जी के हृदय- परिवर्तन जैसी वस्तु को स्वीकार करते थे। कदाचित जैनेंद्र ने यह तथ्य गांधी दर्शन से ही ग्रहण किया है।”²

सत्य और अहिंसा यह दो तत्त्व गांधी चिंतन की आधारशिला है जैनेंद्र कुमार की आस्था इन दोनों तत्वों पर समान रूप से रही है और इसकी अभिव्यक्ति उन्होंने अपने उपन्यासों में भी की हैं। जैनेंद्र कुमार जी प्रेम और अनुकंपा को भी अहिंसा के अंग के रूप में देखते थे वह लिखते हैं “समस्त चराचर जगत के प्रति प्रेम, अनुकंपा यानि अहिंसा।”³ अहिंसा ही सभी धर्म का मूल तत्त्व है। अहिंसा स्वयं में अत्यंत शक्तिशाली है जैनेंद्र का मानना था कि सभी बलों में अहिंसा का बल सबसे ज्यादा होता है। उन्होंने लिखा है “अहिंसा का बल बेशक, किसी भी दूसरे लौकिक बल के प्रयोग को स्वेच्छापूर्वक त्यागे बिना संभव नहीं हो सकता। वह अहम बल नहीं है इसलिए बुद्धि- बल से भी यह भिन्न है। दुनिया में जिन बलों को हम जानते हैं, उनसे वह निराले प्रकार का है  उस बल में बलवान आदमी जितना ही अपने को विनम्र मानता है, वह उतना ही सेवक बनता है। क्योंकि वह अहम  का नहीं है, इसलिए वह हरि का है। अर्थात सच्चा अहिंसक पुरुष अपने को प्रार्थनापूर्वक शून्यवान मानता है।”⁴

जैनेंद्र कुमार जी विश्वबंधुत्व के लिए अहिंसा को अनिवार्य मानते हैं उनका मानना है कि वसुधैव कुटुंबकम की भावना के लिए व्यक्ति का अहिंसक होना परम आवश्यक है, उनका मानना था कि हिंसा के रास्ते पर चलने पर हम कभी भी विश्व बंधुत्व की अवधारणा को साकार रूप नहीं दे सकते है। “हिंसा का रास्ता बंधुत्व तक नहीं पहुंचा सका, नहीं पहुंचाएगा। ×…………..× पर अहिंसा के बल से ही एकता बढ़ सकती है और विश्व बंधुत्व आ सकता है। क्योंकि वही बल है जिसमें अहंकार का पोषण नहीं होता, बल्कि विसर्जन होता है।”⁵ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का प्रयोग किया और इन्हीं दोनों तत्वों को जैनेंद्र कुमार ने अपने चिंतन का आधार बनाया सत्य के बारे में जैनेंद्र कुमार लिखते हैं कि“ सत् का भाव सत्य के कारण है, उसके लिए है। इस दृष्टि से असत्य की कुछ हस्ती ही नहीं। वह निरी मानव कल्पना है। असत् यानी जो नहीं है जो नहीं है उसके लिए यह ‘असत्’ शब्द ही अधिक है। इसलिए असत्य शब्द में निरा मनुष्य का आग्रह ही है उसमें चरितार्थ कुछ नहीं है।”⁶

एक सच्चा व्यक्ति ही ईश्वर की अनुकंपा का अधिकारी है,महात्मा गांधी जी की ईश्वर पर अटूट आस्था थी वह एक धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, उनको ये धार्मिक संस्कार अपनी माता से प्राप्त हुए थे, सुनीता उपन्यास में सुनीता भी ईश्वर के अस्तित्व पर आस्था रखने वाली एक धार्मिक प्रवृत्ति की स्त्री है, सुनीता हरिप्रसन्न से कहती है कि “मैं ठीक कहती हूं, हरिप्रसन्न प्रार्थना से शक्ति आती है। अपनी अबलता स्वीकार कर न भागना अच्छा है, कि अपने सफलता के दम में पीठ दिखाकर भाग खड़े होना अच्छा है? जिस निर्बलता ने राम का बल पकड़ा है, उसका बल फिर क्यों हारे?… परमात्मा पर विश्वास रखो वह भय से हमें तारेंगे।”⁷

किसी भी समाज के विकास के लिए जरूरी है कि उस समाज के लोग शिक्षित हो, भारत में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की शिक्षा पर ज्यादा जोर नहीं दिया जाता था जिस कारण स्त्री अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं थी और उन्हे अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। महात्मा गांधी जी ने समाज में स्त्रियों की दशा को देखकर उसमें सुधार करने का एकमात्र उपाय स्त्रियों का शिक्षित होना समझा और उन्होंने स्त्रियों को शिक्षित बनाने के लिए अनेक प्रयत्न किए। महात्मा गांधी  स्त्री शिक्षा के पुरजोर समर्थक थे इस उपन्यास में दिखाया गया है किस प्रकार सुनीता उच्च शिक्षा प्राप्त स्त्री है और उसकी बहन सत्या भी कॉलेज जाती है जो गणित विषय से एम.ए. कर रही है।

साथ ही साथ जिस प्रकार गांधी जी मानते थे कि संगीत व्यक्ति के लिए अच्छा है वैसे ही इस उपन्यास में न केवल स्त्री शिक्षा की बात की गई है बल्कि इस उपन्यास की स्त्री का संगीत में निपुण होना भी दिखाया गया है। सुनीता वाद्य यंत्र बजाती है साथ ही उसकी बहन सत्या भी अपने कॉलेज में सबसे अच्छा वायलिन बजाती है। महात्मा गांधी जी के नजरों में स्त्री उच्च पद की अधिकारी है, इस उपन्यास में दिखाया गया है कि जब श्रीकांत के कहने पर हरि प्रसन्न उसके घर नहीं जाना चाहता है तब श्रीकांत हरि प्रसन्न से कहता है“मुझसे ज्यादा अपनी भाभी का अनुरोध समझो। मैं तुमसे कहता हूं वह माननीय है। और तुम भारतीय संस्कृति को जानते हो, स्त्री पूज्या है, तुम उस संस्कृति के उदाहरण होकर उनकी बात की रक्षा से विमुख होगे। मुझे टालो, पर अपनी भाभी का आग्रह तो रखो”⁸ एक बार हरि प्रसन्न श्रीकांत से कहता है “पत्नी दासी नहीं है।”⁹ इस प्रकार हम देखते हैं कि गांधी चिंतन में जिस प्रकार स्त्रियों को समाज में समानता की अधिकारी माना गया है, उसी प्रकार इस उपन्यास में भी स्त्रियों की मजबूत छवि दिखाई देती है। महात्मा गांधी जी के  चिंतन के सिद्धांत में अपरिग्रह और ट्रस्टशिप की भावना को बहुत महत्व दिया गया है सुनीता उपन्यास में भी हमें हरिप्रसन्न में ट्रस्टशिप और अपरिग्रह की एक झलक दिखाई दे जाती है।हरिप्रसन्न श्रीकांत से कहता है “पैसे वाला क्यों बना जाए, आप पैसे वाला होना दस और को उससे वंचित रखना है, और यदि कोई पैसे वाला बनता है, तो मेरा ख्याल है, इस कारण उसे बल्कि निम्न समझना चाहिए।.. जिनको निम्न कहा जाता है उनसे अपने को तोड़कर मैं भद्र बनूं यह मुझे स्वीकार नहीं।”¹⁰

हरि प्रसन्न की ऐसी धारणा है कि जो रुपया उसके पास है वह उसका नहीं है बल्कि समाज के कार्य के लिए है। हरिप्रसन्न सत्याग्रही है वह आंदोलन के द्वारा भारत को आजादी दिलाना चाहता है, उसके अंदर अपरिग्रह की भावना है। जब वह श्रीकांत के घर में रहने के लिए आता है तब उसका सामान देखकर श्रीकांत कहता है बस इतना थोड़ा सा सामान उस पर हरिप्रसन्न कहता है “मेरा सामान तुम बहुत गौर से क्या देखते हो? हां, वह इतना ही है। सामान थोड़ा अच्छा होता है पिछले दिनों तो मैं परिग्रह को और भी काफी कम कर दे सका हूं।”¹¹ अपने जरूरी सामान में हरी प्रसन्न के पास एक रिवाल्वर भी थी। श्रीकांत जब काम के सिलसिले में लाहौर जाता है तो वहां से हरिप्रसन्न के लिए एक पत्र लिखता है “रिवाल्वर को दूर हटाओ उसमें रोगी को दूर किया जा सकता है, पर रोग तब भी दूर नहीं होता। व्यक्तित्व रोग का शिकार है। रोग समाज के शरीर में व्यापा है, संस्थाबद्ध है। रिवाल्वर क्या अधीरता का परिणाम नहीं है।¹² हम देखते हैं की हरिप्रसन्न देश को स्वतंत्र करने के लिए प्रयासरत है, जहां उसके व्यक्तित्व में  गांधी चिंतन के तत्त्व दिखाई देते हैं वहीं उसमें गांधी विचारधारा से भिन्न कुछ तत्त्व विद्यमान है वह अपने पास शस्त्र रखता है जबकि गांधी जी का मानना था कि हमें अहिंसक रहकर आंदोलन करना चाहिए साथ ही हमें हथियारों का नहीं बल्कि आत्मबल का सहारा लेना चाहिए। भले ही हरि प्रसन्न पूरी तरह से गांधी चिंतन के तत्वों को अपने व्यक्तित्व में न उतार पाया हो पर गांधी चिंतन के बहुत सारे तत्त्व उसके व्यक्तित्व में परिलक्षित होते हैं।

जिस प्रकार महात्मा गांधी जी के चिंतन में पूरे विश्व को अपना समझने का भाव है इसी प्रकार इस उपन्यास में भी दिखाया गया है कि हरिप्रसन्न जो भारत की आजादी के लिए क्रांति करने वाले दल का अग्रदूत है वह पूरे विश्व को एकता के सूत्र में बंधा देखना चाहता है “जिसने मनुष्य को बांटा है वह मेरे लिए नहीं होगा। धर्म और पाप ने मनुष्य को मनुष्तत्व  से अलग किया। सभ्यता ने, समाज ने, कानून ने, अमीर -गरीब, शासक- शासित, कुलीन और अछूत की सृष्टि की। यह सब मेरे लिए न होगा। उन सब में जो सत्य है मात्र वही मेरे लिए होगा। मैं किसी वर्ग का नहीं हूं। हूं तो निम्न वर्ग का हूं श्रमी-वर्ग का हूं। मेरा परस्पर व्यवहार किसी समाज और संप्रदाय की परिधि में न घिरा होगा।”¹³ श्रीकांत भी सभी मनुष्य को समान समझना है वह सुनीता से कहता है कि हमें कोई अधिकार नहीं है कि हम किसी व्यक्ति को नौकर बनाएं।

साथ ही हम देखते हैं कि इस उपन्यास में सिनेमा को लेकर हरि प्रसन्न और श्रीकांत के विचार महात्मा गांधी जी के विचार  के समान ही हैं। महात्मा गांधी जी सिनेमा को पसंद नहीं करते थे इस उपन्यास में में भी एक दो जगह ऐसी ही भावना व्यक्त की गई है। हरिप्रसन्न सुनीता से कहता है “मुझे सिनेमा में शौक नहीं है भाभी। सिनेमा में मुल्क की बर्बादी है। सिनेमा से हम इंद्रीसेवी बनते हैं, सिनेमा से हमारा आदर्श फीका होता है, सिनेमा ने प्रेम को शरीर की वस्तु बना दिया है।”¹⁴ श्रीकांत भी सिनेमा को अच्छा नहीं मानता है वह भी कहता है कि सिनेमा में दोष है।

निष्कर्ष गांधी चिंतन की विचारधारा बहुत ही व्यापक है इसकी अभिव्यक्ति व्यापक और सीमित रूप से हिंदी साहित्य में बराबर होती आई है। जैनेंद्र कुमार के उपन्यास सुनीता में हम देख सकते हैं कि भले ही गांधी चिंतन का व्यापक रूप से प्रभाव न दिखाई पड़े परन्तु व्यापक रूप से देखने पर हम पाते हैं कि गांधी चिंतन के बहुत सारे तत्व प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से इस उपन्यास में समाहित हैं जैसे कि सामानता, हृदय परिवर्तन, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, त्याग जैसे तत्वों की अभिव्यक्ति हम इस उपन्यास में देख सकते हैं। सुनीता उपन्यास में मानवीय मूल्य की अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्ति हुई है सुनीता एक नारी प्रधान उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से जैनेंद्र कुमार ने न केवल मनोवैज्ञानिक समस्या को उठाया है बल्कि मानवीय मूल्य के द्वारा उन समस्याओं के समाधान का भी प्रयास किया है।

संदर्भ:-

  • डॉ. चंद्रकांत बंदिवडेकर, हिंदी उपन्यास और गांधीवाद
  • नंददुलारे बाजपेई, नया साहित्य: नए प्रश्न, पृष्ठ स.-198
  • निर्मला जैन,जैनेंद्र रचनावली: खंड- 9, साहित्य का श्रेय और प्रेय, पृष्ठ स.- 233
  • निर्मला जैन, जैनेंद्र रचनावली खंड 8, पूर्वोदय, पृष्ठ स.- 450
  • वही पृष्ठ 451
  • निर्मला जैन, जैनेंद्र रचनावली : खंड 9, साहित्य का श्रेय और प्रेय, पृष्ठ स.- 265
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 122
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 14
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 36
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 23
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 73
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 131, 132
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 25
  • जैनेंद्र कुमार, सुनीता, पृष्ठ स.- 163
शिखा सिंह
शोधार्थी
हिन्दी विभाग
दयानन्द गर्ल्स पी. जी. कॉलेज, कानपुर
संबद्ध छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर