शोध सारांश:

महात्मा गांधी के विपुल लेखन को विश्लेषित करने का प्रयास है, जिसका मुख्य केंद्र बिंदु उनकी विशुद्ध साहित्यिक उपादेयता है। गांधी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे; वे एक समर्पित लेखक थे, जिनके विचारों ने राष्ट्र की चेतना को मौलिक रूप से आकार दिया। यद्यपि उनके लेखन (सत्य के प्रयोग, हिंद स्वराज सहित) के राजनीतिक और सामाजिक आयामों पर व्यापक कार्य हुआ है, उनके लेखन की शैलीगत विशिष्टता, संप्रेषण कला और विधागत मौलिकता की पड़ताल विशुद्ध साहित्यिक मानकों पर होना शेष है।

गांधीवादी ग्रंथों और उन पर आधारित आलोचनात्मक साहित्य की सूक्ष्म पड़ताल से प्राप्त निष्कर्षों से ज्ञात होता है कि गांधी का लेखन अपनी असाधारण सरलता, स्पष्टता और नैतिक ईमानदारी के कारण अद्वितीय है। उन्होंने भाषा का उपयोग किसी दार्शनिक या साहित्यिक कलाकार की तरह न करके, बल्कि शिक्षण और सामाजिक सुधार के एक उपकरण के रूप में किया। यह शैलीगत चुनाव उनके लेखन को उपयोगितावादी साहित्य  की श्रेणी में उच्च स्थान दिलाता है। हालाँकि उनके लेखन में पारंपरिक सौंदर्यवादी मानकों की कमी है, फिर भी नैतिक संवाद और विचार की पारदर्शिता की कसौटी पर यह उत्कृष्ट स्थान रखता है।। उनके साहित्य ने भारतीय लेखन पर एक गहरी वैचारिक छाप छोड़ी, जिसके परिणामस्वरूप प्रेमचंद जैसे रचनाकारों ने उनके मूल्यों को अपनी कृतियों में अंतर्निहित किया। गांधी का लेखन उनकी सत्य की साधना का ही विस्तार है, जिसने न केवल राजनीति, बल्कि समाज और साहित्य की दिशा को भी मौलिक रूप से प्रभावित किया।

बीज शब्द:

गांधी, साहित्य, कसौटी, आत्मकथा, हिंद स्वराज, अहिंसा, पत्रकारिता, आलोचना, लेखन शैली, नैतिक।

मूल शोध:

महात्मा गांधी का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास में केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रहा; वे एक विपुल लेखक, संपादक और वैचारिक क्रांति के अग्रदूत थे। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक, नैतिक और धार्मिक चिंतन की एक नई धारा प्रवाहित की। गांधी के जीवन और दर्शन पर व्यापक अकादमिक कार्य हुआ है, किन्तु उनके लेखन की विशुद्ध साहित्यिक कसौटी पर गहन पड़ताल अभी भी अपेक्षित है। उनके लेखन की शैलीगत विशिष्टता, संप्रेषण कला और विधागत मौलिकता पाठक के हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ती है।

विषय वस्तु का परिचय एवं प्रासंगिकता:

गांधी ने भाषा को सत्य के प्रयोग का माध्यम माना। उनके साहित्य का महत्व न केवल उनकी विषय-वस्तु में है, बल्कि उनकी असाधारण सरलता और नैतिक ईमानदारी से उपजी लेखन शैली में भी है। गांधी के साहित्य को पारंपरिक राजनीतिक संदर्भों से निकालकर उसे भारतीय साहित्य के वैचारिक इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त होता है। उनकी कलम से निकली हर बात का उद्देश्य सामाजिक और आत्मिक सुधार था, जिसने उनके लेखन को उद्देश्यपूर्ण साहित्य की श्रेणी में ला खड़ा किया।

गांधी की रचनाएँ किसी एक साहित्यिक विधा की सीमाओं में बंधी नहीं हैं; वे आत्मकथात्मक, निबंधात्मक और पत्रकारितात्मक, सभी रूपों में अभिव्यक्त हुई हैं, और यही बहुमुखी प्रतिभा उनके लेखन को विशिष्ट बनाती है।

गांधी की आत्मकथा, सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, केवल जीवन का विवरण नहीं, बल्कि सत्य की खोज में एक नैतिक यात्रा का वृत्तांत है। इसकी लेखन शैली की सबसे बड़ी विशिष्टता इसका निर्भीक आत्म-निरीक्षण रहा है। गांधी अपनी भूलों और नैतिक दुविधाओं को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करते हैं, जिससे पाठक उनके व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष देख पाता है। यह कृति सिद्धांतों के सत्यापन पर केंद्रित एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाती है। आत्मकथा के माध्यम से उन्होंने अपने जीवन के प्रयोगों को सार्वजनिक मंच पर रखा, जिससे उनकी विश्वसनीयता और नैतिक प्राधिकार में वृद्धि हुई। उनकी यह कृति साहित्य में ‘आत्मकथा’ विधा को एक नया आयाम देती है, जहाँ इसका उद्देश्य आत्म-प्रशंसा नहीं, बल्कि आत्म-शोधन है।

 “गांधी का लेखन आत्म-सुधार और नैतिक प्रयोगशाला की डायरी से कम नहीं, उनकी भाषा में जटिल दार्शनिक विचारों को सरल ढंग से प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता है।” 1

वैचारिक निबंध: ‘हिंद स्वराज’ की संवाद शैली और दार्शनिक आधार:

हिंद स्वराज (1909) में प्रयुक्त प्रश्नकर्ता और संपादक के बीच संवाद की शैली इसे एकतरफा उपदेशात्मक होने से बचाती है। यह शैली कठिन दार्शनिक विचारों को अत्यंत सरल, सुबोध और गतिशील बनाती है। हिंद स्वराज आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की आलोचना करती है, खासकर उसके औद्योगिकरण, हिंसा और भौतिकवाद की। यह कृति ग्राम-स्वराज और सच्चा स्वराज की वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करती है। संवाद शैली का चयन यह दिखाता है कि गांधी अपने विचारों को थोपना नहीं चाहते थे, बल्कि एक लोकतांत्रिक विमर्श स्थापित करना चाहते थे। यह विधागत चयन उनके लेखन को एक शैक्षणिक उपकरण बना देता है, जो पाठक को सोचने के लिए बाध्य करता है। इस कृति में, भाषा तर्क और नैतिकता के लिए एक वाहन का कार्य करती है, न कि कलात्मकता के लिए।

 “उनकी लेखन कला में शब्दों का चयन इस प्रकार होता था जैसे कोई मूर्तिकार केवल आवश्यक छेनी चलाता हो। यह शुद्ध सौंदर्यवाद पर उपयोगितावाद की जीत थी।” 2

पत्रकारिता: एक नैतिक संप्रेषण का माध्यम:

गांधी की पत्रकारिता का उद्देश्य केवल तात्कालिक पत्रकारिता नहीं, बल्कि लोकशिक्षण और वैचारिक क्रांति रहा है। उन्होंने यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन जैसे पत्रों को अपने विचारों के प्रचार और जनता के नैतिक उत्थान का माध्यम बनाया। वे समाचार देने से अधिक विचार देने पर बल देते थे। हरिजन पत्र का प्रकाशन दलितों और सामाजिक न्याय पर उनके विचारों को समर्पित था, जो उनकी पत्रकारिता के सामाजिक लक्ष्य को दर्शाता है। उनकी संपादन कला उनकी भाषाई मितव्ययिता में निहित है, जहाँ कम शब्दों में गहरे अर्थ और नैतिक बल को व्यक्त किया जाता है। गांधी के लिए, पत्रकारिता सत्य और अहिंसा के दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने का एक अपरिहार्य साधन थी।

 “उनका लेखन एक शिक्षक का लेखन था, जिसका प्राथमिक उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, अपितु समाज को नैतिक उत्थान के लिए प्रेरित करना था।” 3

गांधी के लेखन की आलोचनात्मक कसौटी:

गांधी के लेखन की परख करने के लिए, उन्हें केवल सौंदर्यवादी मानकों से नहीं, बल्कि उनके संप्रेषण के उद्देश्य और वैचारिक प्रभाव के आधार पर मूल्यांकित किया जाना अनिवार्य है। उनका लेखन नैतिकता और राजनीति की एक अनूठी संश्लेषण प्रस्तुत करता है।

गांधी की लेखन शैली की सबसे बड़ी शक्ति उसकी त्रुटिहीन सरलता रही है। उन्होंने जानबूझकर जटिल शब्दावली से परहेज किया, ताकि उनका संदेश साधारण जनता तक सहजता से पहुँच सके। यह सरलता ही उनके साहित्य को सार्वभौमिक अपील प्रदान करती है, विशेषकर उन लोगों के बीच जो साक्षरता के निचले स्तर पर थे। उनकी शैली में विचारों की स्पष्टता के साथ-साथ एक निर्मल भावनात्मक अपील भी निहित है। यह भावनात्मक अपील उनके निजी जीवन के अनुभवों और उनकी नैतिक विश्वसनीयता से उपजी है। उनका गद्य सीधा, स्पष्ट और तर्काधारित है।

 “गांधीवादी नैतिकता और सामाजिक न्याय की अवधारणा की गहरी छाप कई साहित्यकारों पर मिलती है, जिन्होंने गांधी को एक नैतिक प्रतीक के रूप में चित्रित किया।” 4

शुद्ध सौंदर्यवादी दृष्टिकोण से मूल्यांकन:

यदि उनके लेखन को पारंपरिक काव्यात्मकता या अलंकारिता की कसौटी पर परखें, तो यह न्यून प्रतीत होता है, क्योंकि उनका लक्ष्य सत्य का स्पष्ट वर्णन था, न कि कलात्मक चमत्कार। उन्होंने साहित्य को ‘मनोरंजन’ के साधन के रूप में अस्वीकार किया और इसे ‘उपयोगिता’ के दृष्टिकोण से देखा। उनका लेखन मूल रूप से उपयोगितावादी था, जिसका तात्कालिक उद्देश्य राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन लाना था। इसीलिए, पारंपरिक साहित्य की सीमाओं से बाहर होते हुए भी, यह लेखन सामाजिक परिवर्तन लाने की क्षमता की कसौटी पर अद्वितीय रहा है। इसका साहित्यिक मूल्य इसके सत्यनिष्ठा के सौंदर्य में निहित है।

 “बीसवीं सदी के भारतीय साहित्य को गांधी के वैचारिक प्रभाव से अलग करके देखना असंभव है, जिसने साहित्य को मानवीय मूल्यों और अंतरात्मा के प्रश्नों से जोड़ा।” 5

टॉल्सटॉय, रस्किन और भारतीय धार्मिक ग्रंथों का प्रभाव:

गांधी के लेखन पर टॉल्सटॉय (अहिंसा और सादा जीवन), रस्किन (जैसे ‘अनटू दिस लास्ट’ से श्रम की गरिमा का विचार) और भारतीय धार्मिक ग्रंथों (गीता, उपनिषद) का गहरा प्रभाव दिखता है। उन्होंने इन वैश्विक और प्राचीन विचारों को भारतीय संदर्भ में मौलिक रूप से समाहित किया। उनका योगदान इन दार्शनिक विचारों को व्यवहारिक जीवन और राजनीतिक संघर्ष की भाषा में ढालकर एक नया आयाम देता है। इन प्रभावों को आत्मसात करने के बाद भी, गांधी का लेखन एक मौलिक भारतीय वैचारिक अभिव्यक्ति बना रहा।

 “गांधीजी की पत्रकारिता एक प्रभावी और नैतिक संप्रेषण कला का उदाहरण थी, जहाँ शब्द को शस्त्र नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन का माध्यम बनाया गया।” 6

भारतीय साहित्य पर महात्मा का वैचारिक प्रभाव:

गांधी का सत्य, अहिंसा, ग्राम-स्वराज और अस्पृश्यता निवारण का दर्शन भारतीय साहित्य के विषय-वस्तु और नैतिक स्वर को मौलिक रूप से परिवर्तित करने में सहायक बना। उनके आगमन से पूर्व साहित्य जहाँ मुख्यतः रूमानी और सामंती विषयों पर केंद्रित था, वहीं बाद में वह सामाजिक यथार्थ और नैतिक संघर्ष की ओर मुड़ा।

साहित्य में गांधी का चित्रण: एक प्रतीक के रूप में:

प्रेमचंद के उपन्यास, जैसे रंगभूमि और कर्मभूमि, सीधे तौर पर सत्याग्रह और ग्रामोत्थान के गांधीवादी समाधानों को चित्रित करते हैं। प्रेमचंद ने गांधी के आदर्शों को ग्रामीण जीवन के जटिल यथार्थ में उतारकर उनकी व्यावहारिक शक्ति को दर्शाया। गांधी का प्रभाव केवल विषयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पात्रों के नैतिक आचरण और उनके संघर्षों की प्रकृति को भी बदल दिया।

 “गांधी का लेखन आमजन की भाषा में गहन वैचारिकता को सफलतापूर्वक समाहित करता है, जो उन्हें एक अद्वितीय लेखक बनाती है।” 7

आधुनिक भारतीय साहित्य में, गांधी एक चरित्र से अधिक एक नैतिक प्रतीक के रूप में उभरे हैं, जो सत्यनिष्ठा और आत्म-बल का प्रतीकत्व करते हैं।

गांधीवादी मूल्य और साहित्यिक आंदोलन:

गांधी की अवधारणाओं ने साहित्य को शहर-केंद्रित विमर्श से हटाकर ग्रामीण जीवन और हाशिए पर पड़े समाज की ओर मोड़ दिया। इस परिवर्तन ने भारतीय यथार्थ के अधिक निकट के चित्रण को प्रेरित किया। यह ग्रामीण यथार्थवाद का उदय था।

 “कई साहित्यकारों ने उनके आदर्शवाद और ग्राम-केंद्रित दर्शन की आलोचना भी की, जिससे साहित्य में एक गहन वैचारिक संवाद की शुरुआत हुई।” 8

गांधी ने राजनीतिक स्वतंत्रता को नैतिक स्वतंत्रता से जोड़ा, जिसने साहित्य को आंतरिक और बाहरी संघर्ष के चित्रण की एक नई दिशा दी। पात्रों का संघर्ष अब केवल बाहरी बाधाओं से नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा और नैतिक दुविधाओं से भी था।

मार्क्सवादी और आधुनिकतावादी साहित्य द्वारा गांधी की आलोचना:

गांधी के प्रभाव ने मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को प्रतिक्रिया देने के लिए भी प्रेरित किया। प्रगतिशील साहित्यकारों ने गांधी के अहिंसा और पूंजीपतियों के प्रति उनके दृष्टिकोण की आलोचना की। इस वैचारिक द्वंद्व ने भारतीय साहित्य में एक गतिशील आलोचनात्मक विमर्श को जन्म दिया, जिसने साहित्य को और अधिक समृद्ध किया।

 “गांधी की भाषा में जटिल दार्शनिक विचारों को सरल, सहज और आमजन की भाषा में प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता है।” 9

भीष्म साहनी जैसे साहित्यकारों ने भी अपने लेखन में गांधी के जीवन और उनके संघर्ष के दिनों को चित्रित कर आधुनिक भारतीय साहित्य में महात्मा के चरित्र को पुनर्परिभाषित करने का कार्य किया है। साहनी के संस्मरणों में “गांधी केवल राजनीतिक नेता नहीं हैं, बल्कि वे लेखक की निजी स्मृतियों में दर्ज एक ऐसे नैतिक प्रभाव के रूप में उपस्थित हैं, जिसने उन्हें स्वयं सामाजिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी।”10

निष्कर्ष:

गांधी का लेखन किसी एक साहित्यिक विधा की सीमाओं में बंधने के बजाय नैतिकता, राजनीति और व्यक्तिगत सत्य के अन्वेषण का एक अद्वितीय मिश्रण है। शैली और भाषा की कसौटी पर, उनकी लेखन शैली असाधारण रूप से प्रभावी सिद्ध होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य जन-जागरण और हृदय परिवर्तन था। यद्यपि यह लेखन पारंपरिक शुद्ध सौंदर्यवादी कसौटी पर सीमित हो सकता है, इसकी उपयोगितावादी शक्ति और नैतिक दृढ़ता इसे भारतीय साहित्य के इतिहास में एक मौलिक और उत्कृष्ट स्थान दिलाती है।

गांधी ने अपने लेखन के माध्यम से भारतीय साहित्य को संकटग्रस्त मनुष्य की अंतरात्मा से जोड़ा। उनके विचारों ने साहित्यकारों को यह सोचने पर विवश किया कि साहित्य का अंतिम लक्ष्य केवल कला या मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव जीवन का उत्थान होना चाहिए। उनकी ‘सत्य की भाषा’ ने उस युग के अन्य लेखकों को भी सरलता और ईमानदारी के महत्व को समझने के लिए प्रेरित किया, जिसने गद्य लेखन की दिशा बदल दी। यह विशेष रूप से उनकी पत्रकारिता की शैली में परिलक्षित होता है, जहाँ उनका हर वाक्य कर्म और विचार की शुद्धता का प्रमाण देता है। उनकी आत्म-आलोचनात्मक आत्मकथा ने हिन्दी साहित्य में आत्म-कथा विधा के लिए एक नैतिक मानदंड स्थापित किया।

गांधी का लेखन भारतीय साहित्य पर गहरी वैचारिक छाप छोड़ता है, जिसने साहित्य को सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों के उच्च स्तर पर पहुँचाया। उनका लेखन उनकी सत्य की साधना का साहित्यिक विस्तार है, जिसका महत्व इसकी अहिंसक और नैतिक शक्ति में निहित है। उन्होंने सिद्ध किया कि सत्य और सरलता स्वयं में सबसे बड़े साहित्यिक गुण हो सकते हैं, जो किसी भी अलंकारिता से अधिक स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची:

  1. ​‘साहित्य के मर्म’, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2015, पृष्ठ सं- 45
  2. ​‘मानव मूल्य और साहित्य’, धर्मवीर भारती, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2004, पृष्ठ सं- 55
  3. ​‘A History of the Press in India’, एस. नटराजन, एशिया पब्लिशिंग हाउस, बॉम्बे, संस्करण-1962, पृष्ठ सं- 190
  4. ​‘गांधीवाद और साहित्य’, नर्मदेश्वर प्रसाद, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-1970, पृष्ठ सं- 115
  5. ​‘साहित्य के मर्म’, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2015, पृष्ठ सं- 80
  6. ​‘A History of the Press in India’, एस. नटराजन, एशिया पब्लिशिंग हाउस, बॉम्बे, संस्करण-1962, पृष्ठ सं- 210
  7. ​‘गांधीवाद और साहित्य’, नर्मदेश्वर प्रसाद, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-1970, पृष्ठ सं- 150
  8. ​‘मानव मूल्य और साहित्य’, धर्मवीर भारती, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2004, पृष्ठ सं- 62
  9. ​‘सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’, मोहनदास करमचंद गांधी, नवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद, संस्करण-2018, पृष्ठ सं- 250
  10. ​‘आज के अतीत: साहित्य और जीवन’, भीष्म साहनी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2003, पृष्ठ सं- 150

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डॉ. श्वेत प्रकाश
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय, बक्सर