
प्रस्तावना
भारतीय साहित्य में चिंतन की परम्परा निरंतर मानवीय संवेदना और जीवन-मूल्यों से जुड़ी हुई है। रचनाकार और कवि अपने समय की नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक परिस्थितियों को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया करते है। आधुनिक हिंदी साहित्य में जहां एक ओर प्रयोगवाद, प्रगतिवाद और नई कविता जैसी धाराएं उभरती है वहीं, दूसरी ओर गांधीवादी विचारधारा ने भी साहित्य को गहन मानवीय दृष्टि और नैतिक दिशा प्रदान की ।
महात्मा गांधी जी का दर्शन केवल राजनीतिक नहीं था, वह एक व्यापक जीवन-दर्शन था जिसने अहिंसा, सत्य, करुणा, श्रम, आत्मसंयम, समानता और नारी सम्मान जैसे मूल्य केंद्र में थे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था जिन्होंने दर्शन ,धर्म, और मानव समाज को एक सूत्र में जोड़ने का काम किया है। उनके इन आदर्शों ने न केवल भारतीय समाज को प्रभावित किया, बल्कि हिन्दी साहित्य को भी नई संवेदना प्रदान की। गांधीवादी विचारधारा आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक आदर्शवाद पर जोर देती है।
वैसे ही नरेश मेहता आधुनिक हिन्दी खण्डकाव्य के केंद्रीय कवि है, जिन्होंने जीवन और समाज की जटिलताओं के बीच आत्मानुभूति और मानवीय चेतना की खोज की। उनका मानना था कि जिस प्रकार राजनीतिक या आर्थिक समता के बिना धर्म का ‘सोङहं’ भाव नीरा पाखंड है उसी प्रकार बिना धर्म और नैतिक मूल्यों के राजनीतिक या आर्थिक समानता निरी क्रूर ,पाशविक और अवसरवादिता है ।
नरेश मेहता के खण्डकाव्य – संशय की एक रात, शबरी, अरण्य, संशयात्मा आदि – केवल पौराणिक उपाख्यान का पुनर्पाठ नहीं है, बल्कि वे गांधीवादी मूल्यबोध और भारतीय जीवन- दर्शन का आधुनिक प्रतिरूप हैं।
नरेश मेहता ने मनुष्य के भीतर के द्वंद्व, करुणा, श्रद्धा ओर आत्मशुद्धि की यात्रा को इस प्रकार व्यक्त किया है कि वह गांधी जी के “सत्य के प्रयोग” जैसी जीवन पद्धति की यात्रा से जुड जाती है। कवि के पात्र अपने त्याग, कर्म और संवेदना के माध्यम से गांधीजी के आदर्श – अहिंसा, सत्य, समानता, नारी सम्मान, श्रम और आत्मसंयम का जीवंत रूप बन जाते हैं।
अतः प्रस्तुत शोधपत्र में नरेश मेहता के खण्डकाव्यों में निहित, गांधीवादी विचारधारा की अभिव्यक्ति का अध्ययन किया गया है। विशेष रूप से संशय की एक रात और शबरी जैसे खण्डकाव्यों के माध्यम से यह देखा जाएगा कि कवि ने गांधीवादी आदर्शों को किस प्रकार कला दृष्टि और जीवन-दर्शन में रूपांतरित किया है।
- गांधीवादी विचारधारा : स्वरूप और मूल तत्व
गांधीवादी विचारधारा भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक, नैतिक और मानवीय चेतना का सार है। यह केवल एक राजनैतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है। जिसमें प्रेम, करुणा, स्वावलंबन, अहिंसा, समानता और सत्य जैसे तत्व प्रमुख हैं। उनका मानना था कि समाज और व्यक्ति का उत्थान तभी संभव है, जब आचरण में विचार और नैतिकता में पवित्रता हो। गांधीवादी का आधार व्यक्ति के समाज–सुधार और आत्म–शोधन के संतुलन पर टीका है।
गांधीजी ने ईश्वर का पर्याय ‘सत्य’ को और मानवता का सर्वोच्च धर्म ‘अहिंसा’ को माना है। उनके अनुसार, व्यक्ति का वास्तविक धर्म दूसरों के कल्याण में निहित है। गांधीवादी दर्शन में साधन और वर्णभेद का विरोध, साध्य की शुद्धता, नारी सम्मान का समर्पण , और ग्रामीण जीवन की आत्मनिर्भरता जैसी अवधारणाएं केंद्रित है। यह विचारधारा किसी जाति, वर्ग या पंथ विशेष की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की है।
गांधीवादी विचारधारा का स्वरूप मानवता के समग्र विकास की दृष्टि से सार्वभौमिक और व्यापक है। नरेश मेहता जैसे कवियों ने इस विचारधारा को अपने खण्डकाव्यों में सहअस्तित्व, समानता और संवेदना जैसे भाव के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। उनके काव्यों में गांधीवादी मूल्यों का प्रभाव सहज रूप से दिखाई देता है, जो साहित्य को केवल सौंदर्य के साथ ही जीवन का मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।
- नरेश मेहता के खण्डकाव्यों में गांधीवादी विचारधारा का साम्य
- अहिंसा और करुणा का भाव
गांधीजी की तरह नरेश मेहता भी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे।
नरेश मेहता के खण्डकाव्य ‘संशय की एक रात’ और ‘शबरी’ में यह विचार गहराई से झलकता है।
‘शबरी’ में शबरी का समर्पण, प्रेम और निष्कपट भक्ति उसी अहिंसक करुणा और हृदय के प्रतीक रूप मैं है।
‘संशय की एक रात ’ में नरेश मेहता ने मानव मन में चल रहे द्वंद्व को शांत करने का जो भी प्रयत्न किया है वह गांधीजी के “मन – विजय” के विचार से उपयुक्त मेल खाता है।
“अहिंसा केवल बाह्य कर्म नहीं, वह आत्मा का शुद्ध संकल्प है।”
> सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही जीवन को सच्ची सफलता और शांति मिलती है।
नरेश मेहता के खण्डकाव्य पात्र भी यही दर्शाते है ।
- सत्य और आत्म-शोधन
नरेश मेहता के लिए सत्य की खोज केवल दार्शनिक विचार नहीं अपितु तार्किक और गहन प्रक्रिया है, जो किसी भी मनुष्य के सामूहिक और व्यक्तिगत संघर्ष का हिस्सा है। उनके मत के अनुसार सत्य तक पहुंचने का बड़ा मार्ग ‘विवेक’ या ‘प्रज्ञा’ है।
गांधीजी का सबसे प्रमुख सिद्धांत था – सत्य ही ईश्वर है।
नरेश मेहता के दोनों ही खण्डकाव्यों के पात्र जो सत्य की खोज में निरंतर प्रयत्नशील रहते है।
‘शबरी में भी सत्य का अनुसरण, भक्ति और हृदय की पवित्रता के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति का विचार प्रकट होता है।
‘संशय की एक रात ’ में नायक का सत्य की पहचान हेतु आत्म–संघर्ष और मानव–मन में उठने वाले सवालों को दर्शाती है जो गांधीजी के ‘सत्य के प्रयोग की तरह प्रतीत होता है।
- वर्ण व्यवस्था का विरोध और समानता का चयन
गांधीजी ने जाती–भेद का विरोध किया है और हरिजन सेवा को ही सर्वोच्च माना है ।उन्होंने कहा है – “ईश्वर का कोई धर्म नहीं”
नरेश मेहता ने ‘शबरी’ में इस विचारधारा को साहित्यिक रूप में मूर्त किया –
जहां शबरी जैसी भील कन्या को समर्पण और भक्ति के बल पर प्रभु भक्ति एवं उच्च आध्यात्मिक स्थान प्राप्त होता है, जिसे गांधीजी के “सभी मनुष्य ईश्वर के संतान है” वाले विचार का एक सजीव रूप प्रस्तुत होता है।
- आत्मसंयम ओर तप का भाव
गांधीजी का पूरा जीवन तपस्या और आत्मसंयम का प्रतीक था।
नरेश मेहता के पात्रों के भीतर भी साधना और मोक्ष का मार्ग दिखाया गया है।
‘संशय की एक रात’ में आत्मचिंतन और तपस्या की जो भावना दिखाई देती है,बवह गांधीजी के ‘सत्याग्रह–साधना की प्रतिध्वनि है, जो इस खण्डकाव्य को गांधीवादी विचारधारा से जोड़ती है ।
- नरेश मेहता की रचनात्मक दृष्टि और गांधीवाद
- ‘शबरी’ खण्डकाव्य में गांधीवादी दृष्टिकोण
नरेश मेहता का ‘शबरी’ खण्डकाव्य गांधीजी की उस मानवीय दृष्टि का काव्यात्मक रूप है, जिसमें लिंग, जाती और सामाजिक भेद भाव के पार मानवता सर्वोपरि है।
गांधीजी का कहना था – “ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग सेवा और प्रेम से होकर जाता है।”
शबरी का चरित्र इसी गांधीवादी भाव को जीता है – वह निस्वार्थ प्रेम, समानता और भक्ति की प्रतीक है।
पंक्ति उदाहरण:
“शबरी ने देखा राम में सत्य का स्वरूप,
भेद मिटे सब, मन हुआ दीप समान।”
भावार्थ :
इन पंक्तियों में शबरी की भक्ति में समानता और सत्य के गांधीवादी आदर्श झलकते हैं। वह किसी जातिगत हीनता का अनुभव नहीं करती; उनके लिए प्रभु राम मानव मात्र के कल्याण का प्रतीक हैं। यह वही दृष्टि है जो गांधीजी के ‘समानता’ और ‘सर्वधर्म समभाव’ के विचार से मेल खाती है।
(ख)‘ संशय की एक रात’ में गांधीवादी चेतना
नरेश मेहता के खण्डकाव्यों में श्रम,अहिंसा और सत्य को मानवीय मूल्यों के रूप में अभिव्यक्ति मिली है। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित कवि थे, जिन्होंने अहिंसा को अपने खण्डकाव्यों का प्रमुख विषय बनाया। राम के चरित्र के माध्यम से उन्होंने शांति और अहिंसा की ओर झुकाव को उजागर किया है। सत्य के प्रति उनकी दृष्टि बुद्धि और मानव–मन के अंतः द्वंद्व के प्रतीक रूप में प्रकट हुई है जबकि, श्रम को उन्होंने जीवन संघर्ष और मानवीय अस्तित्व की मुक्ति का माध्यम बनाया है।
‘संशय की एक रात’ में नरेश मेहता ने मनुष्य के नैतिक द्वंद्व और आत्म-संघर्ष की स्थिति को चित्रित किया है। यह गांधीवादी दृष्टि अहिंसा और सत्य की खोज के मार्ग के रूप में अभिव्यक्त होती है।
इस काव्य का नायक जीवन की जटिलताओं में उलझकर अंततः सत्य के आलोक में शांति प्राप्त करता है –
यह गांधीजी के “आत्मनिरीक्षण के माध्यम से मुक्ति ओर सत्य” के सिद्धांत का काव्यात्मक रूप है।
पंक्ति उदाहरण:
“जब भीतर का प्रकाश जागता है,
तब अंधकार स्वयं हर जाता है।”
भावार्थ:
यहां ‘भीतर का प्रकाश’ गांधीजी के सत्य और आत्मबोधन का प्रतीक है।
नरेश मेहता दिखाते है कि वास्तविक परिवर्तन बाहर नहीं,भीतर से शुरू होता है- यही गांधीवादी दृष्टि का मूल है।
इस प्रकार ‘शबरी’ और ‘संशय की एक रात’ दोनों में नरेश मेहता ने गांधीवादी विचारी को न केवल भावना के स्तर पर, बल्कि संवेदना और चरित्र के माध्यम से भी साकार किया है।
4.नरेश मेहता के खण्डकाव्यों में गांधीवादी मूल्य : एक विश्लेषण
नरेश मेहता के काव्य में गांधीवादी मूल्य केवल विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि चरित्र के आचरण में प्रकाशित होते है । ‘शबरी’ में प्रेम, भक्ति और समानता की भावना गांधीजी के “सर्वधर्म समभाव” के सिद्धांत को मूर्त करती है। शबरी की निष्कपट भक्ति, प्रेम और जाति विहीन दृष्टि गांधी के समाज-सुधारक चिंतन का जीवंत रूप है। वहीं ‘संशय की एक रात’ में सत्य की खोज और अंत: प्रकाश की अनुभूति, आत्मसंघर्ष, गांधीवादी आत्मशोधन और सत्याग्रह के प्रतीक हैं।
दोनों काव्यों में नरेश मेहता ने यह दिखाया कि सच्चा परिवर्तन बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर से आरंभ होता है – यही गांधीवादी विचारधारा की आत्मा है।
निष्कर्ष:
नरेश मेहता का काव्य-संसार गांधीवादी विचारधारा का संवेदनशील कलात्मक रूप है। उन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से अहिंसा, समानता, सत्य, प्रेम ओर मानवता के आदर्शों को काव्य रूप में साकार किया। ‘शबरी’ में सुध भक्ति और समानता की चेतना है, जबकि ‘संशय की एक रात’ में नैतिक संघर्ष और आत्मबोध की अभिव्यक्ति। दोनों रचनाएँ मिलकर गांधीवादी विचारधारा के उस मानवीय पक्ष को प्रस्तुत करती है, जो आज भी समाज में प्रेरणादायक और प्रासंगिक है।
संदर्भ ग्रंथ :
१: नरेश मेहता ,शबरी, लोकभारती प्रकाशन, २०१५
२: नरेश मेहता, संशय की एक रात,लोकभारती प्रकाशन,२०१८
३: मोहनदास करमचंद गांधी,सत्य के प्रयोग आत्मकथा, वाणी प्रकाशन,२०१५
४: मोहनदास करमचंद गांधी, सर्वोदय, प्रकाशन संस्थान,२०१९
५: मोहनदास करमचंद गांधी, TRUTH IS GOD, नमस्कार बुक,२०२२
पंड्या. किंजल. डी
हेमचंद्राचार्य उत्तर गुजरात विश्वविद्यालय
पाटण,गुजरात
शोधार्थिनी





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