सारांश: महात्मा गांधी का दर्शन केवल एक राजनीतिक सोच ही नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक, नैतिक और मानवीय दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय जीवन के हर क्षेत्र पर गांधीजी के विचारों का प्रभाव पड़ा है। इससे हिंदी साहित्य भी अछूता नहीं रहा। गांधी जी के अहिंसावादी सिद्धांत जिसे हर किसी ने अपने जीवन में लक्षित किया। हिंदी साहित्यकारों ने भी गांधीजी के सिद्धांतों—सत्य, अहिंसा, स्वराज, स्वदेशी, और सेवा—को अपने साहित्य में आत्मसात किया हैं। बीसवीं सदी के आरंभ में जब भारत स्वतंत्रता आंदोलन की राह पर अग्रसर था, उस समय साहित्य ने गांधीजी के आदर्शों को समाज में प्रसारित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इस शोधपत्र में हिंदी साहित्य में गांधी दर्शन के प्रभाव की विवेचना करते हुए कुछ प्रमुख साहित्यकारों जैसे- प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी और सुभद्रा कुमारी चौहान के साहित्य में गांधीवादी चेतना की अभिव्यक्ति का विश्लेषण किया गया है कि किस तरह इन हिंदी साहित्यकारों ने अपने लेखन में गांधीवादी चिंतन को अपनाया और उसे समाज परिवर्तन के माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया।

बीजक शब्द: गांधी दर्शन, हिंदी साहित्य, सत्य, अहिंसा, स्वराज, स्वदेशी, समाज सुधार, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, स्वतंत्रता आंदोलन।

भूमिका

हिंदी साहित्य भारतीय समाज की आत्मा की छाया है। जब भारत स्वतंत्रता संग्राम के युग में प्रवेश कर रहा था, तब साहित्य ने मात्र मनोरंजन साधन न रहकर जनजागरण का उपकरण बनने की शुरुआत की। इस काल का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत महात्मा गांधी थे। गांधीजी ने भारतीय समाज को सत्य, अहिंसा और आत्मबल का मार्ग दिखाया। उनके विचारों ने राजनीति से लेकर साहित्य तक, हर क्षेत्र में नैतिकता की लौ जगाई। गांधीजी का विश्वास था कि साहित्य तभी जीवित रह सकता है जब वह समाज के दुखसुख में सहभागी बने।1 यही विचार हिंदी साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत बने। उन्होंने साहित्य को जनता की भाषा में, जनता के लिए रचने का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप, हिंदी साहित्य में गांधीवादी आदर्शों का ऐसा समावेश हुआ जिसने उसे नैतिक गहराई और सामुदायिक दिशा प्रदान की। प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे रचनाकारों ने अपने साहित्य में गांधी विचारों की गूंज को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।

गांधी दर्शन और हिंदी साहित्य का अंतर्संबंध

महात्मा गांधी के विचारों ने हिंदी साहित्य को एक नई दृष्टि और ऊँचाई दी है। गांधीजी के सत्य, अहिंसा, स्वदेशी और सर्वोदय जैसे आदर्शों ने लेखकों को समाज में बदलाव की दिशा दिखाई। अनेक रचनाकारों जैसे प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, नागार्जुन ने अपने साहित्य में गांधीवादी मूल्यों को अपनाकर मनुष्यता, सत्य, और न्याय को मानव केंद्रित किया। हिंदी साहित्य ने गांधी के आदर्शों को केवल विषय ही नहीं बल्कि जीवन की प्रेरणा के रूप में उजागर किया है। इस प्रकार, गांधी दर्शन और हिंदी साहित्य एक-दूसरे के पूरक बनकर समाज के लिए एक सही मार्ग तैयार करते हुए पाठकों में नैतिकता, करुणा एवं सामाजिक चेतना का संचार करते हैं। गांधी दर्शन के केंद्र में था – “सत्य ही ईश्वर है।”  यह विचार केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक आचरण की असली परख भी था। हिंदी साहित्य ने इस विचार को आत्मसात किया और अपने पात्रों तथा कथानकों के माध्यम से इसे अभिव्यक्त किया। इसके संबंध में मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में राष्ट्रीय चेतना और नैतिक मूल्य का संगम देखने को मिलता है। उनकी रचना भारत भारती (1912) में वे लिखते हैं  हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी।2 यह आत्म अवलोकन गांधीजी के आत्म-सुधार और आत्म-निर्माण के विचार का ही साहित्यिक रूप है।

साहित्य ने गांधीजी के ‘स्वदेशी’ और ‘सर्वोदय’ के आदर्शों को भी अपने रचनात्मक विमर्श का हिस्सा बनाया। लेखकों और कवियों ने आम जनता को आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन और चरखा जैसे प्रतीकों के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण का संदेश दिया। इस प्रकार हिंदी साहित्य गांधीजी के विचारों का प्रत्यक्ष माध्यम बना। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान साहित्य जनजागरण का साधन बना और गांधीवादी विचारधारा ने लेखकों को समाज परिवर्तन की प्रेरणा दी। गांधीजी स्वयं लेखन को सामाजिक सुधार का माध्यम मानते थे। उन्होंने ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसे पत्रों के माध्यम से जनता तक अपने विचार पहुँचाए। उनकी यह परंपरा हिंदी साहित्य में गद्य और पद्य दोनों रूपों में विकसित हुई।

प्रमुख साहित्यकारों पर गांधी विचारों का प्रभाव

समय दर समय विभिन्न साहित्यकारों पर गांधी विचारधाराओं का प्रभाव देखने को मिला है।

क. प्रेमचंद के साहित्य में गांधी दर्शन

प्रेमचंद के कथा-संसार में गांधीजी के विचारों की स्पष्ट छाया देखी जा सकती है। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में सत्य, अहिंसा, समानता और समाज-सुधार जैसे गांधीवादी आदर्शों को मनुष्यता की संवेदना के साथ पिरोया। ‘गोदान’ में किसान के संघर्ष, ‘निर्मला’ में नारी की पीड़ा और ‘कफन’ में गरीबों की विवशता – इन सब रचनाओं में प्रेमचंद ने सामाजिक अन्याय, भेदभाव और रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई है। उनके साहित्य में गांधीजी की तरह ही आम जन के जीवन, उनकी आशाओं-निराशाओं और संघर्षों को सहजता और सहज संवेदना के साथ शब्द मिले हैं। प्रेमचंद ने अपने पात्रों के माध्यम से जिस मानवीयता, करुणा और न्याय की वकालत की, वह गांधी दर्शन की आत्मा के ही तो स्वर हैं। स्वयं प्रेमचंद ने लिखा था- गांधीजी ने हमें सिखाया कि सच्चा स्वराज वही है जिसमें हर व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझे।3 उन्होंने अपने कथा-साहित्य के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों, जैसे अस्पृश्यता, स्त्री शिक्षा की कमी और गाँवों की बदहाल स्थिति, को सशक्त रूप से उजागर किया है। ‘सद्गति’ और ‘कफन’ जैसी रचनाएँ न सिर्फ सामाजिक अन्याय का विरोध करती हैं, बल्कि इंसानियत और नैतिकता की पुकार भी बन जाती हैं। इन कथाओं में गांधीजी की मानवता और सुधार भावना सहज रूप में झलकती है।

ख. महादेवी वर्मा और गांधीवादी स्त्री चेतना

महादेवी वर्मा की रचनाओं में गांधीजी के स्त्री-सम्मान और चेतना की स्पष्ट छवि मिलती है। उन्होंने महिलाओं की संवेदना, शक्ति और स्वतंत्रता को अपने शब्दों से जीवंत किया। महादेवी जी की लेखनी में नारी को न केवल सहनशील और करूणामयी बताया गया है, बल्कि उसने समाज के बंधनों को तोड़कर अपने अधिकार और आत्मसम्मान की आवाज़ भी उठाई है। गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर वे महिलाओं की शिक्षा, स्वावलंबन और सामाजिक जागृति को अत्यंत आवश्यक मानती थीं। उनके लेखों और कविताओं में नारी चेतना प्रेम, सत्य और करुणा के साथ गांधी के आदर्श रूप में प्रकट होती है और स्त्री को नए समाज का आधार बताती है। महादेवी वर्मा का लेखन गांधीजी के स्त्री-मुक्ति और आत्मबल के विचारों से ओतप्रोत है। गांधीजी का मानना था कि — स्त्री पुरुष की दासी नहीं, उसकी सहचरी है।4 

हादेवी वर्मा ने श्रृंखला की कड़ियाँ  जैसी अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री की मानसिक दासता को गहराई से उकेरा है। वे स्त्री को केवल करुणा और त्याग का प्रतीक मानकर सीमित नहीं करतीं, बल्कि उसमें आत्मनिर्भरता और नैतिक संबल की छवि देखती हैं। उनकी लेखनी में संवेदना के साथ-साथ वह चेतना भी प्रकट होती है, जो गांधी जी की अहिंसा और आत्मबल की भावना से गहराई से जुड़ी है। महादेवी जी का मानना है कि समाज की सच्ची उन्नति तभी संभव है जब स्त्री और पुरुष, दोनों, समान अधिकार और अवसर के साथ, कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ें।

ग. हजारीप्रसाद द्विवेदी की सांस्कृतिक दृष्टि और गांधी विचार

हजारीप्रसाद द्विवेदी भारतीय संस्कृति की गहराई और व्यापकता को समझने वाले अद्वितीय साहित्यकार थे। उनके विचार में संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं, बल्कि निरंतर बदलती और मानव-कल्याण की ओर बढ़ती चेतना है। गांधीजी के सत्य, अहिंसा, प्रेम, स्वदेशी और सामाजिक समरसता जैसे आदर्शों ने द्विवेदी जी की सांस्कृतिक दृष्टि को और प्रखर बनाया। वे मानते थे कि केवल बाहरी बदलाव काफी नहीं, बल्कि मानव हृदय के भीतर नैतिक जागरण और आत्मशुद्धि आवश्यक है।
द्विवेदी जी ने अपनी रचनाओं—जैसे ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’, ‘चारुचंद्र लेख’, ‘आलोचना’, ‘कबीर’ आदि में बार-बार इस बात को रेखांकित किया है कि किसी भी संस्कृति की जीवंतता उसकी मानवीयता, सहिष्णुता और सत्य की खोज में है। गांधीवादी विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय संस्कृति को सामाजिक सुधार, जातिगत समता, ग्रामीण पुनर्जागरण और सांप्रदायिक एकता की दिशा में देखना चाहा। उनके विचारों में गांधी जी के संदेशों की स्पष्ट झलक मिलती है। जैसे उनका मानना था कि मनुष्य जब तक अपने भीतर झाँकने और मूल्य तलाशने का साहस नहीं करता, तब तक सच्ची सांस्कृतिक चेतना विकसित नहीं हो सकती। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गांधीजी को भारतीय संस्कृति के नैतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना। उन्होंने लिखा- गांधीजी ने भारतीयता को नैतिकता की नई परिभाषा दी।5 हजारीप्रसाद द्विवेदी की रचनाओं, जैसे ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘आचार्य नंददुलारे वाजपेयी’, में गांधीजी की तरह ही नैतिकता, सेवा और संयम के मूल्य गहराई से उजागर होते हैं। उनके निबंधों में संस्कृति का रचनात्मक और मानवीय पक्ष सामने आता है, जिसमें गांधीजी के सर्वोदय की भावना सहज रूप से दिखाई देती है। द्विवेदी जी मानते हैं कि सच्ची भारतीयता वही है जिसमें मिलजुलकर चलने की भावना, आत्मचिंतन और मानवीयता को सर्वोच्च स्थान मिले; यही समन्वय और आत्मावलोकन उनकी साहित्य-शैली की पहचान है।

कविता और स्वराज चेतना

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल तलवार या राजनीति का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह हृदय और आत्मा का भी जागरण था। इस जागरण में गांधीजी के विचार जैसे सत्य, अहिंसा, आत्मबल और स्वदेशी ने हर वर्ग को प्रभावित किया। हिंदी कविताएं जो जनभावनाओं की प्रहरी रही है, ने गांधी के स्वराज-सपने को शब्दों में ढालकर पूरे देश में ऊर्जा और उत्साह का संचार किया।कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल पराधीनता का दर्द व्यक्त किया, बल्कि आज़ादी के लिए आवश्यक आत्मसम्मान, नैतिक साहस और सामाजिक एकता का भी संदेश दिया। गांधीजी की सोच ने कविता को केवल कल्पना या सौंदर्य तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे यथार्थ के धरातल पर लाकर समाज को बदलने का माध्यम बना दिया। कविता के पृष्ठों पर फैली स्वराज चेतना ने जनमानस में उम्मीद, इच्छाशक्ति और बदलाव का उजास भरा, यही भूमिका कविता और गांधी-दर्शन के इस सुंदर संगम की है।

क. मैथिलीशरण गुप्त

 गुप्त जी को राष्ट्रकवि कहा जाता है। उनकी कविता ‘भारत भारती’ गांधीजी के आदर्शों से प्रेरित है। उन्होंने लिखा-हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी।6  गुप्त जी की रचनाएँ आत्मचिंतन और राष्ट्र जागरण का संदेश देती हैं। उनकी कविताओं में स्वदेशी, नैतिकता और स्वराज का गांधीवादी भाव विद्यमान है। मैथिलीशरण गुप्त की जय भारत और साकेत में चरित्रों की नैतिकता और त्याग की भावना गांधीवादी समाज की प्रतिछाया है। गांधीजी ने कहा था, चरखा केवल सूत कातने का साधन नहीं, आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।7 चरखा हिंदी कविता में आत्मबल और मेहनत की इज्जत का प्रतीक बन गया है। कविताओं में देश और इंसान, दोनों की तरक्की गांधीजी के जीवन के आदर्शों से जुड़ी दिखती है।

ख. सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएँ अपने समय के सामाजिक और राष्ट्रीय परिवर्तन की सशक्त आवाज़ हैं। उनकी रचनाओं में गांधीजी के विचारों जैसे सत्य, अहिंसा और साहस की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की घटनाओं को बड़ी सरलता, भावुकता और जोश के साथ लिखा, जिससे जनमानस में जागृति आई। ‘झाँसी की रानी’ जैसी कविता में नारी शक्ति और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का स्वर मुखर है, जो गांधीजी की स्त्री–सशक्तिकरण और निर्भयता की प्रेरणा को दर्शाता है।
सुभद्रा जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से सत्याग्रह, आत्मबल, देशप्रेम और सामाजिक जागरण का संदेश दिया। उनका विश्वास था कि बिना हिंसा के भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। यही मर्म गांधीजी के अहिंसक आंदोलन का भी था। उनके शब्दों में आम बातों को सीधे शब्दों में सहजता से दिल तक पहुँचाने की कला थी, जिसके चलते गांधीजी के आदर्श जन–जन की भावना बन गए। उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों में राष्ट्रभक्ति, बलिदान और सुधार की भावना जगाती हैं और यह सब गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर ही संभव हुआ।

ग. जय शंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद की कविताएँ देश, मानवता और संस्कृति के लिए प्रेम से भरी हुई हैं। उन्होंने अपने शब्दों के माध्यम से सत्य, अहिंसा, आत्मबल और समाज की भलाई जैसी गांधीजी की सीख को खूबसूरती से कविता में उतारा है। प्रसाद जी की रचनाओं में हर व्यक्ति के भीतर जागृति लाने और समाज में मेल-जोल, भाईचारे और आशा का भाव जगाने की कोशिश है। उनकी कविताओं से हमें यह समझ मिलता है कि सच्चा सुख और स्वतंत्रता तभी है जब हम सब एक-दूसरे का साथ दें, मिलकर आगे बढ़ें और अपने भीतर सच्चाई व अच्छाई को जगाएँ जो गांधीजी का भी संदेश भी था। प्रसाद जी की भाषा सरल है, भाव गहरे हैं और उनकी कविताएँ आज भी लोगों को अच्छाई और सच्चाई के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती हैं। उनकी ‘कामायनी’ जैसी महाकाव्यात्मक कृति में मानव-जीवन की जिजीविषा, आस्था और संघर्ष का जो चित्रण मिलता है, उसमें गांधीजी के नैतिक आदर्श गहरे रूप में समाहित हैं और यही मूल्य काव्य के माध्यम से जन–जन तक पहुँचाती हैं।

गांधी दर्शन और समाज में नैतिक पुनर्जागरण

गांधीजी के दर्शन ने भारतीय समाज में नैतिकता को नए रूप में जीवित किया। उन्होंने सत्य, अहिंसा, संयम और सेवा को केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन का मूल मंत्र बना दिया। गांधीजी का विश्वास था कि समाज की सच्ची शक्ति उसकी नैतिकता और आत्मसंयम में है। उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि बाहरी बदलाव से ज़्यादा ज़रूरी है, अपने अंदर अच्छे विचारों और कर्मों का विकास करना। गांधीजी के प्रभाव से समाज में सत्य बोलने, दूसरों की भलाई करने, निष्कलंक जीवन जीने की प्रवृत्ति बढ़ी। उनकी प्रेरणा से लोगों में आत्म-नियंत्रण, करुणा और ईमानदारी की भावना आई। सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर चलकर उन्होंने दिखाया कि हिंसा और झूठ से समाज कभी भी मजबूत नहीं हो सकता। उनका योगदान यही है कि उन्होंने भारतीय समाज को नैतिक पुनर्जागरण का रास्ता दिखाया। गांधीजी की विचारधारा ने समाज में नैतिक मूल्यों को फिर से जगह दिलाई, जिससे सामाजिक सद्भावना और मानवता का विकास हुआ। उनकी सादगी, ईमानदारी और जीवंतता आज भी लोगों को अच्छे इंसान बनने की राह दिखाती है। प्रेमचंद के यथार्थवाद, महादेवी वर्मा की करुणा, और द्विवेदी के नैतिक चिंतन में भी यही मूल्य परिलक्षित होते हैं। साहित्य ने केवल समाज की समस्याओं को चित्रित नहीं किया, बल्कि उनके समाधान का नैतिक मार्ग भी सुझाया।

गांधी विचार और आधुनिक हिंदी साहित्य

गांधीजी के विचारों ने आधुनिक हिंदी साहित्य को नई दिशा और सोच दी। उनके सत्य, अहिंसा, सेवा और मानवता के आदर्श शब्दों की सीमाओं से आगे बढ़कर लेखकों और कवियों के मन में बसे। गांधीजी के लोकतांत्रिक मूल्य, सामाजिक समता, जातिगत समानता और स्त्री शिक्षा संबंधी दृष्टि ने हिंदी साहित्य को समाज के भले के लिए सजग और उत्तरदायी बनाया। अब रचनाएँ केवल कल्पना या मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि समाज सुधार, मानव कल्याण और नई चेतना का संदेस बन गईं।
उनकी विचारधारा ने साहित्य को आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद से जोड़ दिया। कथाएँ, निबंध और कविताएँ हर पाठक को यही सीख देती हैं कि असल बदलाव अपने भीतर से शुरू होता है। ठीक वही बात जो गांधीजी अपने जीवन से समझा गए। नैमिशराय, विष्णु प्रभाकर, रामधारी सिंह दिनकर और अज्ञेय जैसे लेखकों ने अपने लेखन में गांधीजी के आदर्शों को अपनाया है। दिनकर की ‘कुरुक्षेत्र’ कविता में अहिंसा और शांति की बात गांधीजी के विचारों से मिलती है। विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ में समाज में बराबरी और अच्छे व्यवहार की भावना दिखाई देती है, जो गांधीजी की सोच को मजबूत करती है। आज के हिंदी निबंध, कहानी और कविता में भी गांधीजी का असर साफ नजर आता है फिर चाहे वह समाज के मुद्दों की बात हो या पर्यावरण और अच्छे मूल्यों की सीख।
इस प्रकार, आधुनिक हिंदी साहित्य गांधी विचारों के आलोक में न केवल नया रास्ता खोजता है, बल्कि पूरे समाज को नैतिक और मानवीय दिशा देता है।

निष्कर्ष

गांधी दर्शन हिंदी साहित्य की आत्मा में समाहित है। साहित्यकारों ने गांधीजी के विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने का कार्य किया। गांधीजी ने कहा था- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।8 गांधीजी के विचारों ने हिंदी साहित्य को नई ऊर्जा और दिशा दी। उनके दर्शन ने न केवल साहित्य को गहराई और सोच का आधार दिया, बल्कि उसे आम लोगों की जिंदगी, समस्याओं और सपनों से जोड़ दिया। हिंदी के लेखकों ने गांधीजी की बातों को अपनाकर समाज में अच्छाई, बराबरी और करुणा का संदेश फैलाया। प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्यकारों की रचनाओं में गांधीजी के आदर्श साफ नजर आते हैं, जहाँ नैतिकता और मानवता को सबसे ऊपर रखा गया है। आज भी हिंदी साहित्य में गांधीजी की सीख समाज को बेहतर और न्यायपूर्ण बनाने का रास्ता दिखाती है। साहित्य का काम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में अच्छाई और बदलाव की लौ जगाना है और यह बात गांधी दर्शन की वजह से और भी गहरी हो गई है। सच तो यह है कि गांधीजी की सोच हिंदी साहित्य के लिए हमेशा प्रेरणा और प्रकाश का स्रोत बनी रहेगी।

संदर्भ सूची

  1. गांधी, मोहनदास करमचंद.हिंद स्वराज, नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद, 1921, पृ. 45।
  2. मैथिलीशरण गुप्त.भारत भारती, सरस्वती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1912, पृ. 24।
  3. हिन्द स्वराज, मोहनदास करमचंद गांधी, नवल किशोर प्रकाशन, वाराणसी, 1909,पृ. 45–102
  4. स्त्री समस्या, महादेवी वर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, 1942, पृष्ठ 54
  5. गांधी और हिंदी साहित्य, रामस्वरूप अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1985, पृ. 45
  6. मैथिलीशरण गुप्त, ‘भारत भारती’, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1912, पृ. 22
  7. महात्मा गांधी,द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, खंड 29,पृष्ठ10–12
  8. महात्मा गांधी,द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खंड 66, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, 1942, पृ. 220–221.

 

डॉ. निशा जैन
सहायक प्रोफेसर
क्राइस्ट अकादेमी इंस्टिट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीस