श्रीलाल शुक्ल हिंदी के एक प्रमुख व्यंग्य साहित्यकार हैं। ‘सूनी घाटी का सूरज’, ‘रागदरबारी’, ‘अज्ञातवास’, ‘सीमाएँ टूटती हैं’, ‘आदमी का ज़हर’, ‘मकान’, ‘पहला पडाव’, ‘बिस्रामपुर का संत’, ‘राग-विराग’ आदि उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। ‘अंगद का पाँव’, ‘यहाँ से वहाँ तक’, ‘उमराव नगर में कुछ दिन’, ‘कुंती देवी का झोला’, ‘अगली शताब्दी का शहर’, मम्मी जी का गधा’ आदि चर्चित व्यंग्य संग्रह हैं। ‘एक चोर की डायरी’, ‘एक लुढ़कता हुआ पत्थर’, ‘यह घर मेरा नही’, ‘दिन ढलते’ आदि श्रीलाल जी के कहानी संग्रह हैं। उनके सबसे प्रमुख उपन्यास ‘राग दरबारी’ और ‘बिस्रामपुर का संत’ हैं। ‘राग दरबारी’ सन् 1968 में प्रकाशित हुआ। यह हिंदी का प्रथम व्यंग्य उपन्यास है। इसके लिए उन्हें सन् 1970 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उनके इस उपन्यास पर धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। सन् 1999 में श्रीलाल शुक्ल के ‘बिस्रामपुर का संत’ उपन्यास के लिए व्यास सम्मान मिला। उनके साहित्यिक सेवा को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने उन्हें सन् 2005 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। सन् 2009 में श्रीलाल शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला।

         गाँधीजी भारत के राष्ट्र पिता हैं। वे सत्य का अन्वेषक थे। गाँधीवाद में अहिंसा सत्य का प्राण है। गाँधीजी सांप्रदायिक एकता,  अस्पृश्यता निवारण,  खादी-प्रचार, मद्य निषेध,  नारी की उन्नति, राष्ट्रभाषा प्रेम, मातृभाषा प्रेम,  सफाई की शिक्षा, बुनियादी तालीम, ग्रामोद्धार, आर्थिक समानता, कृषक, विद्यार्थी और श्रमिक संगठन, सेवा भावना, एकता आदि पर बल देते थे।

         ‘राग दरबारी’ में स्वतंत्रता के बाद की भारत की राजनीतिक, सामाजिक परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण हम देख सकते हैं।  यह पैंतीस अध्यायों में बंटा तीन सौ तिरासी  पृष्ठों का बड़ा उपन्यास है। इसका मुख्य स्थान लखनऊ के निकट का शिवपालगंज है, जो न गाँव है और न कस्बा। उसकी पहचान इन दोनों के बीच का है। शिवपालगंज स्वातंत्रयोतर गाँव की पतनोन्मुख अवस्था का यथार्थ चित्रण हम समझ सकते हैं। देखिए – शहर का किनारा। उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था। वहीं एक ट्रक खड़ा था। उसे देखते ही यकीन हो जाता था, इसका जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार करने केलिए हुआ है।1

           ‘राग दरबारी’ का मुख्य पात्र रंगनाथ ने अपने व्यस्त जीवन से छुटकारा पाने के लिए मामा वैद्यजी के गाँव शिवपालगंज में  जाने के लिए निश्चय किया।  वह रेलवे स्टेशन से निकल कर बाहर आया। एक ट्रक को खड़ा देख ड्राइवर से शिवपालगंज जाने के लिए पूछने लगा। रंगनाथ के पहनावे को देखकर ड्राइवर उसे बिठा लेता है। हर सौ गज की दूरी पर ट्रक का गियर न्यूट्रल में आ जाता है और ट्रक की गति धीमी हो जाती है। रंगनाथ कहता है- ड्राइवर साहब तुम्हारा गियर तो बिल्कुल अपने देश की हुकूमत जैसा है।2 यहाँ श्रीलाल शुक्ल ने

स्वातंत्रयोत्तर भारत की पतनोनमुख राजनीतिक व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है। आगे की यात्रा में रंगनाथ ने शिवपालगंज गांव का यथार्थ चित्रण हमारे सामने रख लिया है। थोड़ी देर में ही धुँधलके में सड़क की पटरी पर दोनों ओर कुछ गठरियाँ – सी रखी हुई नज़र आयी। ये औरतें थीं, जो कतार बाँधकर बैठी हुई थीं। वे इत्मीनान से बातचीत करती हुई वायु-सेवन कर रही थीं  और लगे हाथ मल-मूत्र का विसर्जन भी। सड़क के नीचे धूरे पटे पड़े थे और उनकी बदबू के बोझ से शाम की हवा किसी गर्भवती की तरह अलसायी हुई-सी चल रही थी। कुछ दूरी पर कुत्तों के भूँकने की आवाजें हुईं। आँखों के आगे धुएँ के जाले उड़ते हुए नज़र आये। इससे इनकार नहीं हो सकता था कि वे किसी गाँव के पास आ गये थे। यही शिवपालगंज था।3

         शिवपालगंज आने पर रंगनाथ उतर पड़ा। वहाँ का थाना और छंगामल इंटरमीडिएट विद्यालय की स्थिति भी शोचनीय है। थाना की अवस्था देखिए – आरामकुर्सी ही नहीं, सभी कुछ मध्यकालीन था। तख्त, उसके ऊपर पड़ा दरी का चीथड़ा, कलमदान, सूखी हुई स्याही की दवातें, मुड़े हुए कोनोंवाले मटमैले रजिस्टर – सभी कुछ कई शताब्दी पुराने दिख रहे थे।

           यहाँ बैठकर अगर कोई चारों ओर निगाह दौड़ाता तो उसे मालूम होता, वह इतिहास के किसी कोने में खड़ा है। अभी इस थाने के लिए फाउण्टेनपेन नहीं बना था, उस दिशा में कुल इतनी तरक्की हुई थी कि कलम सरकण्डे का नहीं था। यहाँ के लिए अभी टेलीफोन की ईज़ाद नहीं हुई थी। हथियारों में कुछ प्राचीन राइफलें थीं जो, लगता था, गदर के दिनों में इस्तेमाल हुई होंगी। वैसे, सिपाहियों के साधारण प्रयोग के लिए बाँस की लाठी थी, जिसके बारे में एक कवि ने बताया है कि वह नदी-नाले पार करने में और झपटकर कुत्ते को मारने में उपयोगी साबित होती है। यहाँ के लिए अभी जीप का अस्तित्व नहीं था। उसका काम करने के लिए

दो-तीन चौकीदारों के प्यार की छाँव में पलनेवाली घोड़ा नाम की एक सवारी थी, जो शेरशाह के ज़माने में भी हुआ करती थी।

          थाने के अन्दर आते ही आदमी को लगता था कि उसे किसी ने उठाकर कई सौ साल पहले फेंक दिया है। अगर उसने अमरीकी जासूसी उपन्यास पढ़ हों, तो वह बिलबिलाकर देखना चाहता कि उँगलियों का निशान देखनेवाले शीशे, कैमरे, वायरलेस लगी हुई गाड़ियाँ ये सब कहाँ हैं?4 मोतीराम छंगामल विद्यालय के साइंस अध्यापक थे। उनमें तथा विद्यार्थियों में बहस होना एक साधारण घटना थी। उनको एक पुरानी चक्की थी। पढ़ाई के बीच-बीच में वे चक्की का आवाज़ सुनकर कक्षा छोड़कर चले जाते थे। खन्ना मास्टर इतिहास के अध्यापक थे। वे वैद्यजी का विरोधी थे। उनको कॉलेज से निकालना वैद्यजी का उद्देश्य है। प्रिंसिपल भी एक चालाक व्यक्ति थे। किसी प्रकार वैद्यजी की प्रीति प्राप्त करना उनका एकमात्र लक्ष्य था। छात्रों का समूह भी विद्यालय में पढ़ने के बजाय खेलकूद, फिल्मी पुरसकें पढ़ना,  मारपीट करने में अधिक ध्यान देते थे। वहाँ से शिक्षा मिलने के स्थान पर सरकारी योजनाओं द्वारा प्रदत्त अनुदान प्राप्त करना छात्रों का मुख्य उद्देश्य था।

         लंगड़ का वास्तविक नाम लंगड़ प्रसाद था। घुटने के नीचे टांग कट जाने और लकड़ी के सहारे चलने के कारण उसका नाम लंगड़ रह गया। लंगड़ के चरित्र को लेखक ने अपनी गाँधीवादी विचारधारा व्यक्त करने में किया है। वे शिवपालगंज से पाँच कोस दूर रहता है और कबीर एवं दादू के भजन गाता रहता है। लंगड़ एक भक्त है। उसके व्यक्तित्व के बारे में लेखक की राय है कि – “माथे पर कबीर पंथी तिलक, गले में तुलसी की माला, आँधी-पानी झेला हुआ दढ़ियल चेहरा, दुबली-पतली देह, मिर्जई पहने, चेहरे पर पुराने ज़माने के उन ईसाई संतों का भाव तथा हिन्दी भक्त कवियों के पद गुन गुनानेवाला यह व्यक्ति मूर्खता की सीमा तक सीधा था, गऊ होते हुए भी गधा था, ईमानदार होते हुए बेवकूफों का सिरताज बना रहा।5  लंगड़ की पत्नी मर चुकी थी।

         लंगड़ को तहसील से एक नकल लेना है। उसके लिए वह आजीवन भर रिश्वत देना नहीं चाहता। वह धर्म, सच्चाई और सिद्धांत की लड़ाई लड़ता रहता है। इसके बिना लंगड़ को नकल लेने   केलिए कोई अफसर तैयार नहीं है। यहाँ श्रीलाल शुक्ल ने लंगड़ को एक   आदर्श व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। वह किसी से रिश्वत नहीं लेता और किसी को रिश्वत नहीं देता है। इसलिए उसको नकद नहीं मिलता है।

        रंगनाथ का मामा वैद्यजी शिवपालगंज की एक सर्वमान्य व्यक्ति है। वे गाँव सभा, सहकारी संघ तथा कॉलेज तीनों का बोझ एकसाथ ढोते रहे। उन्हें अपनी जागीर मान कर बड़ी निष्ठा से उन पर अपना अधिकार स्थापित करते रहे। वे वहाँ के छंगामल इंटरमीडिएट कॉलेज के मैनेजर, पंचायत के प्रमुख और कोओपरेटिव यूनियन के मैनेजिंग डायरेक्टर भी थे। सनीचर वैद्यजी का सेवक है। वह अशिक्षित, गँवार और कायर है। वैद्यजी के बैठक में भाँग तैयार करना उनका काम था। गलत ढंग से वैद्यजी उसको पंचायत का प्रमुख बनाया। वैद्यजी ने एक दिन को-ऑपरेटिव यूनियन का मैनेजिंग डायरेक्टर पद से त्यागपत्र दिया। सभी सदस्यों ने एक मत से उनके पुत्र बद्री पहलवान को नए मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में चुन लिया।

         वैद्यजी को बद्री पहलवान और गयादीन की बेटी बेला के विवाह के लिए सहमत होना पड़ा। वे गयादीन के घर में जाकर जाति-पांति की चर्चा के बाद अंतर्जातीय विवाह के बारे में पूछते हैं। वैद्यजी कहते हैं कि –मैं इतना पुरातनवादी नहीं हूँ। गाँधीजी अन्तर्जातीय विवाहों के पक्ष में थे। मैं भी हूँ। बद्री और बेला का विवाह सही प्रकार से आदर्श माना जायेगा।……….. मैं यह नहीं मानता। जाति – पांति के कारण ही हमारे देश की यह दुर्दशा हुई है। इसलिए मैं अपने पुत्रों का अन्तर्जातीय विवाह करना चाहता हूँ। किसी-न-किसी को इस दिशा में भी आगे आना ही पड़ेगा।6 यहाँ वैद्यजी बुद्धिपूर्वक गाँधीजी का सहारा लेकर अंतर्जातीय विवाह का समर्थन करते हैं।

         शिवपालगंज के किनारे एक छोटा सा कीचड भरा बदबूदार तालाब था। वहाँ की बस अड्डे की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। देखिए – गन्दगी-प्रसार-योजना को बढ़ानेवाले कुछ प्राकृतिक साधन वहाँ पहले ही मौजूद थे। अड्डे के पीछे एक समुद्र था, यानी कम-से-कम एक झील थी, जो बरसात में समुद्र-सी दिखती थी। गन्दगी की सप्लाई का वह एक नैसर्गिक साधन था।

शाम-सवेरे वह जनता को खुली हवा देता था और खुली हवा के शौचालय की हैसियत से भी इस्तेमाल होता था………..इस मौके से फायदा उठाने के लिए शिवपालगंज के सभी पालतू सुअर सवेरे-सवेरे उधर ही पहुँच जाते थे। वे आदमियों द्वारा पैदा की हुई गंदगी को आत्मसात करते उसे इधर-उधर छितराते और वहाँ की हवा को बदबू से बोझिल बनाने की कोशिश करते।……………..  बस के अड्डे पर बैठे हुए मुसाफिर नाक पर कपड़ा लपेटकर कभी जैन धर्म स्वीकार करने को तैयार दिखते, कभी सुअरों की गुरगुराहट सुनते हुए वराह-अवतार की कल्पना में खो जाते।8 यहाँ श्रीलाल शुक्ल  स्वातंत्रयोतर भारत के ग्रामों की दयनीय स्थिति हमें दिखाते हैं। ग्रामों का सुधार उनका मुख्य उद्देश्य है। गाँधीजी की राय में ग्रामों की उन्नति से देश की आर्थिक प्रगति संभव है।

          खन्ना मास्टर छंगामल कॉलेज में वैस प्रिंसिपल का पद चाहता है। किसी प्रकार उनको लेक्चरर के पद से निकालना वैद्यजी का उद्देश्य है। उपन्यास के अंत में खन्ना ने लेक्चरर पद से इस्तीफा दे दिया था। सुरेश पटेल की राय में खन्ना की वीरता तब हमारे सामने आती है, जब वैद्यजी का उग्र रूप देख तथा कड़कती भाषा सुन चुपचाप त्यागपत्र दे देता है। धमकियों से त्रस्त होकर वह अब लड़ना नहीं चाहता, त्यागपत्र देना ही उचित समझता है। इस प्रकार खन्ना मास्टर अंत में व्यवस्था से हार जाते हैं और अपने आपसे समझौता कर लेते हैं।8

         गाँधीजी कृषकों की उन्नति पर विशेष बल देते थे। डॉ. अरुण चतुर्वेदी की राय में – ‘गाँधी जी का विचार था कि भारत की अस्सी प्रतिशत जनता ग्रामों में निवास करती है और उनका पेशा कृषि करना है। अत: उनका नैतिक और मानसिक सुधार अत्यंत आवश्यक है।9 कृषक भारत का आधार है। ज़मींदारी उन्मूलन से कृषकों की उन्नति संभव है। श्रीलाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी’ में आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन का प्रतिपादन किया है। देखिए – गाँव के बाहर एक लंबा-चौड़ा मैदान था, जो धीरे-धीरे ऊसर बनता जा रहा था। अब उसमें घास तक न उगती थी। उसे देखते ही लगता था कि आचार्य विनोबा भावे को दान के रूप में देने के लिए यह आदर्श जमीन है और यही हुआ भी था। दो साल पहले इस मैदान को भूदान-आन्दोलन में दे दिया गया था। वहाँ से दान-रूप में गाँव-सभा को वापस मिला। फिर गाँव-सभा ने इसे दान-रूप में प्रधान को दे दिया। प्रधान ने दान के रूप में इसे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को दिया और उसके बचे-कुचे हिस्से को क्रय-विक्रय के सिद्धान्त पर कुछ गरीबों और भूमिहीनों को दिया। बाद में पता चला कि जो हिस्सा इस तरह गरीबों और भूमि-हीनों को मिला था, वह मैदान में शामिल न था बल्कि किसी की ज़मीन में पड़ता था। अतः उसे लेकर मुकदमेबाजी भी हुई, जो अब भी हो रही थी और आशा थी कि अभी होती रहेगी।10 श्रीलाल शुक्ल ने व्यक्त किया है कि अस्सी प्रतिशत कृषकों का आर्थिक, शैक्षिक, राष्ट्रीय और बौद्धिक विकास का कार्यक्रम स्वीकृत होना चाहिए।

           ग्रामों का विकास, कृषकों की उन्नति, पूंजीवाद का अंत, आर्थिक उन्नति, भ्र्ष्टाचार का विरोध, अंधविश्वासों का उन्मूलन आदि ‘राग दरबारी’ में हम देख सकते हैं। इस प्रकार श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ उपन्यास गाँधीजी के आदर्शो को व्यक्त करने में सफल निकला है।

 

संदर्भ संकेत

  1. राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 7
  2. राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 8
  3. राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 13

4.राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 14-15

  1. राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या  : 38
  2. राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 339
  3. राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 354
  4. सुरेशपटेल, श्रीलाल शुक्ल : एक अध्ययन, पृष्ठ संख्या : 102
  5. गाँधीविचारधारा और हिन्दी उपन्यास, डॉ. अरुण चतुर्वेदी, पृष्ठ संख्या : 327
  6.  राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल, पृष्ठ संख्या : 102

 

         डॉ. रंजी कोशी
        सहायक प्राध्यापक
       हिन्दी विभाग
       कैथोलिकेट कॉलेज
       पत्तनंतिट्टा