
सारांश
महात्मा गांधी केवल भारतीय राष्ट्रवाद के सबसे प्रभावशाली नेता नहीं थे, बल्कि वे साहित्य, भाषा और संस्कृति के भी सशक्त प्रवक्ता थे। उन्होंने हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय एकता के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा। गांधीजी का मानना था कि भारत को एक सूत्र में बाँधने और जनमानस तक जागरूकता पहुँचाने का सबसे प्रभावी माध्यम केवल हिन्दी हो सकती है। उनका दृष्टिकोण साहित्य, भाषा और समाज को जोड़कर राष्ट्र निर्माण में सहायक था।
गांधीजी के विचारों ने हिन्दी साहित्य को नई दिशा दी—ऐसी दिशा जिसमें साहित्य समाज सुधार का साधन बन सके। उनके लेखन, भाषण, पत्र और आत्मकथा केवल साहित्यिक योगदान नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक संदेश भी हैं। उन्होंने सरल, स्पष्ट और जनभावना के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया, जिससे उनके विचार आम जनता तक आसानी से पहुँच सके।
इस शोध-पत्र में गांधीजी के हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति योगदान, उनके विचारों का साहित्यिक परिप्रेक्ष्य, तथा उनके आदर्शों का समकालीन महत्व विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया गया है। गांधीजी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयास किए, समाज सुधार और नैतिक चेतना के लिए साहित्य का मार्गदर्शन किया। उनका दृष्टिकोण आज भी डिजिटल युग में प्रासंगिक है, जब हिन्दी और मातृभाषा की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं।
मुख्य शब्द: गांधी, हिन्दी, साहित्य, राष्ट्रभाषा, अहिंसा, समाज, स्वराज, नैतिकता।
प्रस्तावना
महात्मा गांधी (1869–1948) केवल स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता नहीं थे, बल्कि विचार और कर्म के आदर्श भी थे। उनका जीवन सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, और स्वराज के सिद्धांतों का सजीव उदाहरण था। गांधीजी ने राजनीतिक आंदोलन को समाज सुधार, शिक्षा और साहित्य से जोड़कर एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
हिन्दी भाषा और साहित्य पर उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने इसे केवल संवाद का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज के नैतिक और सांस्कृतिक विकास का आधार भी माना। गांधीजी ने स्पष्ट कहा कि “हिन्दी ही वह भाषा है जो भारत के जन–जन के हृदय को जोड़ सकती है।” उनके विचारों ने साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों को प्रेरित किया, और हिन्दी साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया।
गांधीजी के आदर्शों का प्रभाव केवल राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने साहित्य को समाज सुधार और नैतिक जागरण का माध्यम बनाया। उनके लेखन में स्पष्टता, सरलता, और जनभावना का समावेश था। यही कारण है कि उनका साहित्य और भाषा नीति आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं।
गांधी और हिन्दी भाषा
गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान ही हिन्दी के महत्व को समझा। वहां के भारतीय समुदाय से संवाद करने के लिए उन्होंने हिन्दी का प्रयोग आरंभ किया। इस अनुभव ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि एक साझा भाषा ही राष्ट्र को जोड़ सकती है। भारत लौटने के बाद उन्होंने हिन्दी को जनभाषा और राष्ट्रभाषा बनाने के लिए कई पहल की।
उन्होंने कहा कि भारत जैसे बहुभाषी देश में कोई सामान्य भाषा आवश्यक है, जो सबको जोड़ सके। अंग्रेज़ी विदेशी भाषा थी, जबकि हिन्दी भारतीय जनमानस की भाषा। गांधीजी ने स्पष्ट रूप से कहा— “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा होता है।”
गांधीजी ने हिन्दी प्रचार सभा (मद्रास) और दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना की। उनका यह प्रयास हिन्दी को दक्षिण भारत में लोकप्रिय बनाने में अत्यंत सफल रहा। इसके अलावा, उन्होंने बच्चों और युवाओं के लिए हिन्दी शिक्षा का प्रचार किया, जिससे मातृभाषा में ज्ञान का महत्व बढ़ा। उन्होंने सरल, जन-सुलभ भाषा के माध्यम से विचारों और नैतिकता का प्रसार किया।
गांधीजी ने हमेशा कहा कि हिन्दी को अंग्रेज़ी की नकल नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे अपने स्वाभाविक रूप में विकसित होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण था कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और नैतिकता का वाहक भी है।
गांधी और हिन्दी साहित्य का संबंध
गांधीजी का साहित्यिक दृष्टिकोण सृजनात्मक और समाजोपयोगी था। उनका मानना था कि “साहित्य समाज का दर्पण है, और सच्चा साहित्य वही है जो समाज को सुधारने का कार्य करे।” गांधीजी स्वयं उत्कृष्ट लेखक थे। उनके लेख, भाषण, पत्र और आत्मकथा हिन्दी साहित्य के प्रेरक स्रोत हैं।
उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ (The Story of My Experiments with Truth) में उनके जीवन, विचार और नैतिक दृष्टिकोण का संपूर्ण चित्र मिलता है। यह केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि नैतिक-दर्शन और जीवन के अनुभवों का संग्रह है।
1. कविता पर प्रभाव
गांधीजी के आदर्शों ने काव्य में जनजीवन, स्वदेश, स्वराज, और आत्मबल के भाव पैदा किए। कवियों ने गांधीवादी दृष्टिकोण को अपनी रचनाओं में उतारा। उदाहरण के रूप में:
मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘भारत–भारती’ में स्वदेश और स्वराज का जोश स्पष्ट है।
सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘झाँसी की रानी’ में स्वतंत्रता संग्राम की भावना गांधीवादी दृष्टिकोण से प्रेरित है।
जयशंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन, और सोहनलाल द्विवेदी ने भी अपने काव्य में सत्य, अहिंसा और सामाजिक चेतना के तत्वों को समाहित किया।
2. कहानी और उपन्यास पर प्रभाव
गांधीजी के विचारों ने हिन्दी कथा-साहित्य में नैतिकता, सामाजिक न्याय और परिवर्तन की चेतना को मजबूत किया।
प्रेमचंद का कथा-साहित्य गांधीजी के सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित रहा। ‘निर्मला’, ‘गोदान’, और ‘कफन’ जैसी कहानियों में सामाजिक विषमता, नैतिक मूल्य, और सत्य-अहिंसा का संदेश मिलता है।
प्रेमचंद ने गांधीजी की नीतियों को जन-साहित्य का रूप दिया और स्पष्ट लिखा— “साहित्य समाज का मार्गदर्शक होना चाहिए।”
3. निबंध और पत्रकारिता पर प्रभाव
गांधीजी स्वयं कुशल पत्रकार थे। उन्होंने ‘हरिजन’, ‘नवजीवन’, और ‘यंग इंडिया’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से जन-जागरण किया। उनके लेखन ने हिन्दी पत्रकारिता को नैतिक और सामाजिक दिशा दी।
गांधीजी का मूल उद्देश्य पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम बनाना था, प्रचार का नहीं। उन्होंने कहा— “पत्रकारिता जनसेवा का माध्यम है, प्रचार का नहीं।”
गांधीजी के साहित्यिक आदर्श
सत्य और अहिंसा पर आधारित लेखन
जन-भाषा का प्रयोग
सादगी और सहजता
नैतिक उद्देश्य
इन आदर्शों ने न केवल साहित्य के विषय और शैली को प्रभावित किया, बल्कि लेखकों को समाज सुधार और नैतिक चेतना की दिशा में मार्गदर्शन भी दिया।
गांधी युगीन हिन्दी साहित्य की विशेषताएँ
समाज सुधार की भावना: साहित्य समाज में नैतिकता और न्याय की प्रेरणा देता है।
स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रचार: भारतीय संस्कृति और स्थानीय संसाधनों का महत्व बढ़ाया।
स्त्री शिक्षा और अस्पृश्यता–निवारण का समर्थन: समाज में समानता और शिक्षा का प्रचार।
राष्ट्रीय एकता और भाषा की समानता: हिन्दी को जन-जन तक पहुँचाना।
सादगी, यथार्थ और नैतिक आदर्शों की प्रधानता: भाषा और साहित्य को आम लोगों के लिए सुलभ बनाया।
इन विशेषताओं ने गांधी युग हिन्दी साहित्य को स्वर्णकाल बना दिया।
गांधी और भाषा नीति
गांधीजी ने हमेशा हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष किया। उनका मानना था कि जब तक भारत अपनी मातृभाषा में शिक्षा और प्रशासन नहीं करेगा, तब तक वह सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं होगा।
उन्होंने कहा— “मैं नहीं चाहता कि हिन्दी अंग्रेज़ी की नकल करे; वह अपने स्वाभाविक रूप में विकसित हो।”
गांधीजी ने मातृभाषा में शिक्षा का महत्व बताया और इसके लिए कई प्रयास किए। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और नैतिकता का वाहक भी है।
समकालीन सन्दर्भ में गांधी और हिन्दी
आज अंग्रेज़ी के प्रभुत्व के बावजूद, गांधीजी के हिन्दी प्रेम की प्रासंगिकता बढ़ गई है। डिजिटल युग में भी यदि हमें जन-भाषा में संवाद और विचार-विनिमय जीवित रखना है, तो गांधीजी के भाषा-सिद्धांत अपनाने होंगे।
हिन्दी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का संवाहक माध्यम है। गांधीजी का स्वप्न था कि हर भारतीय अपनी मातृभाषा में सोच सके, बोले और लिख सके।
आज की पीढ़ी को गांधीजी के दृष्टिकोण से प्रेरणा लेकर अपनी मातृभाषा में शिक्षा, साहित्य और संवाद को बढ़ावा देना होगा।
निष्कर्ष
महात्मा गांधी का योगदान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भाषिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक भी है। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्र की पहचान बनाया। हिन्दी साहित्य को जन-साहित्य बनने की प्रेरणा दी।
गांधीवादी विचारों ने हिन्दी साहित्य को नैतिकता, सरलता और समाज–सेवा की दिशा दी। आज जब साहित्य में भौतिकता और बाज़ारवाद बढ़ रहे हैं, गांधीजी के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।
हिन्दी साहित्य का सच्चा उद्देश्य तभी पूर्ण होगा जब उसमें गांधीजी की तरह सत्य, अहिंसा और मानवता की भावना जीवित रहे।
संदर्भ (References)
- गांधी, मोहनदास करमचंद — सत्य के प्रयोग (My Experiments with Truth), नवजीवन प्रकाशन, अहमदाबाद।
- प्रेमचंद — गोदान, सरस्वती प्रेस, इलाहाबाद।
- गुप्त, मैथिलीशरण — भारत–भारती, लोकभारती प्रकाशन।
- द्विवेदी, हज़ारीप्रसाद — हिन्दी साहित्य और गांधीजी, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली।
- चौबे, डॉ. रामसेवक — गांधी और आधुनिक हिन्दी साहित्य, राजकमल प्रकाशन, 2004।
- त्रिपाठी, रामावतार शर्मा — हिन्दी साहित्य का इतिहास, प्रयाग विश्वविद्यालय।
- हरिजन पत्रिका — गांधीजी के लेख संग्रह (1933–1948)।
- नंद, बी. आर. — Mahatma Gandhi: A Biography, Oxford University Press, 1958।
- शर्मा, हरिप्रसाद — गांधी और भारतीय भाषा आंदोलन, राजकमल प्रकाशन, 2010।
- अग्रवाल, सुनील — हिन्दी भाषा और राष्ट्रीय चेतना, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2015.
डॉ. ममता सहगल
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग
आदित्य कॉलेज





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