हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य –   डॉ. रूचिरा ढींगरा

साहित्य अपने सर्जक के देशकाल जनित अनुभवों की अभिव्यक्ति होता है। उसकी समकालीनता ही उसे शाश्वतता प्रदान करती है। साहित्य की अन्यविधाओं कीअपेक्षा कविता में यह अधिक समग्रता से रूपायित […]

समानांतर हिन्दी सिनेमा में अभिव्यक्त लोकजीवन-संस्कृति – प्रभात यादव

सिनेमा विचारों की अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम है। सिनेमा का उद्देश्य चाहें जो भी हो व्यवसाय/मनोरंजन करना, या कोई सामाजिक सन्देश प्रदान करना लेकिन उसका अपने समय के यथार्थ से […]

समकालीन मीडिया में पर्यावरण, वैश्वीकरण और भाषा : एक विवेचन – अर्चना पाठक

आज पर्यावरण की सारी समस्याएं इसी के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती हैं। पर्यावरण के अंतर्गत जीव-जन्तु, वनस्पति, वायु, जल, प्रकाश, ताप, मिट्टी, नदी, पहाड़ आदि सभी अजैविक तथा जैविक घटकों […]

‘मिशन’ की मीडिया से ‘मुनाफे’ की मीडिया तक का सफ़र – राकेश कुमार दुबे

वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो नव–उदारवादी ताकतों के द्वारा विकासशील मुल्कों के विकास के नाम पर अपने लाभ को हासिल और निरंतर बनाये रखने की व्यवस्था करता है | […]

जनवादी कवि के रूप में मुक्तिबोध – बिद्या दास

हिंदी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केंद्र में रहने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी मुक्तिबोध की छवि एक प्रगतिशील और संघर्षशील संश्लिष्ट कवि के रूप में अधिक प्रचलित रही है, […]

सामाजिक सरोकार और मृदुला गर्ग की कहानियाँ – सुमिता त्रिपाठी

साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य किसी भी काल का हो, उनमें समाज का यथार्थ चित्राण होता है । लेखक समाज के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है और […]

वैश्वीकरण और आदिवासी समाज – प्रदीप तिवारी

वर्तनाम समाज परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है। समाज एवं राष्ट्र के विकास के केंद्र में मूलत: व्यक्ति है, जब तक व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरकर सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं […]

ठाकुर के काव्य में विद्रोह का स्वर – रेखा

ठाकुर कवि-ठाकुर रीतिकालीन रीतिमुक्त स्वछंद प्रेम परिपाटी के कवि थे । ये जैतपुर (बुंदेलखंड)के राजा केसरी सिंह के दरबारी कवि थे । इनका जन्म सन1770 के आसपास माना जाता है […]

मानस का हंस – डॉ.नयना डेलीवाला

उपन्यास कथा साहित्य की आधुनिक विधा है। इसके अंतर्गत जीवन समग्र के रेशे-रेशे के यथार्थ को  रचनाकार अपनी अद्भुत कल्पना के साथ बुनता है और एक अनोखा विश्व पाठकों के […]

अनुवाद की प्रेरणा : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी – डॉ. आनन्द कुमार शुक्ल

“जो समर्थ हैं और जो अँगरेज़ीदाँ बनकर, अनेक बातों में, अँगरेज़ी की नक़ल करना ही अपना परम धम्र्म समझते हैं, उनको कृपा करके किसी तरह जगा दीजिए। उन्हें अपने साहित्य […]