कबीर की चिंतन धारा – डॉ. माला मिश्र

कबीरदास जी आडंबर एवं बाह्याचार का खंडन केवल खंडन के लिए नहीं है। वे भक्ति को प्रतिष्ठित करना चाहते थे। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में, ‘‘चाहे मुसलमान (इस्लाम) के […]

कबीर की सामाजिक चेतना – डॉ. साधना शर्मा

सामान्यतः सामाजिक से हमारा तात्पर्य किसी देश एवं काल विशेष से संबंधित मानव समाज में अभिव्यक्त परिवर्तनशील जागृति से होता है। इसका उद्भव सामाजिक अन्याय, अनीति, दुराचार, शोषण की प्रक्रिया […]

हिंदी आलोचना में कबीर की विविध छवियाँ – विनय कुमार गुप्ता

कबीर क्या थे? और अब उनकी क्या-क्या छवियाँ हैं? यह मालूम करना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि अतीत से वर्तमान तक कबीर की छवि में बहुत परिवर्तन आया है और […]

मध्यप्रदेश में बालिका शिक्षा की स्थिति एवं स्तर:मध्यप्रदेश राज्य के संदर्भ में एक नीतिगत विश्लेषण – सुधांशु कुमार सिंह

किसी भी राष्ट्र की सामाजिक उन्नति में वहाॅ की शिक्षा व्यवस्था का बहुत अहम योगदान होता है। आजादी के बाद भारत में शिक्षा के क्षेत्र में लगातार क्रान्तिकारी बदलाव देखने […]

कबीर: सामंती समाज का लोकतांत्रिक व्यक्तित्व – आशुतोष तिवारी

कबीर घोर सामंती समाज में पैदा हुए थे। उस समय अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए जमींदारों, पुरोहितों-पंडों, मौलवियों आदि ने समाज को अपनी सुविधा के अनुसार बांट रखा […]

भाषा, पत्रकारिता और हिंदी – प्रभात रंजन

हिंदी को राष्ट्रभाषा या बहुसंख्यकों की भाषा कहकर हम चाहे जी भर अपनी पीठ थपथपा लें, पर हकीकत यही है कि अन्य भाषाई पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में हिंदी पत्रकारिता हीन […]

कबीर : साहित्य का सामाजिक चिंतक – राकेश कुमार दुबे

कबीर एक क्रांतदर्शी कवि थे जिनके दोहों और साखियों में गहरी सामाजिक चेतना प्रकट होती है।वे हिन्दू और मुसलमान के भेद-भाव को नहीं मानते थे। उनका कहना था कि राम […]

कबीर की सामाजिक चेतना के आयाम – ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह

कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ जब समाज अनेक बुराइयों से ग्रस्त था। छुआछूत, अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता, मिथ्याचार, पाखण्ड का बोलबाला था और हिन्दू-मुसलमान आपस में झगड़ते रहते थे । […]

कबीर के अध्ययन की समस्याएँ – ललन कुमार

हिंदी साहित्य के इतिहास में कबीर का स्थान भक्तिकाल के शुरूआती दौर में माना जाता है। कबीर भक्तिकाल और आदिकाल की संधिबेला पर अवस्थित हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, […]

कबीर के काव्य में ब्रह्म का स्वरूप – आरती

हिन्दी साहित्य में मध्यकाल का बहुत महत्त्व है। मध्यकाल को स्वर्ण युग भी कहा गया है। मध्यकाल में बहुत से कवि हुए लेकिन कुछ कवि सूर्य के समान हैं जिनमें […]