कंचन पाण्डेय की कविता

बचपन  वह सौंधी सी खुशबू वह गाँव की चमक वह मिट्टी की महक मिट्टी का उड़ना अंगों का रंगना वह प्यारी सी-डाली छोटी-सी क्यारी             […]

दीपा दिन्गोलिया की कविता

अभिमान   सुबह सुबह उठकर , सोचा कि आज क्यों न, कुछ अलग किया जाये। रिवायतों से हटकर, कुछ नया किया जाए। बीवी को घर से बाहर भेजकर, घर और रसोई खुद संभाल  ली। दिन के आधे होते-होते, कमर जवाब देने लगी। और अब सच में बीवी की याद आने लगी। पर एक पुरुष स्त्री से, कैसे हार मान ले। अपने हिसाब से दुनिया का , बेहतरीन खाना सबको परोसा, चुपचाप सबने लुत्फ़ लिया। कुछ तो कहें  सब मेरी तारीफ़ में… मैंने सोचा। क्यों कि आज…. जो सब मैंने किया है , “वो” कभी न कर पायी। बीवी हंसने लगी, माँ भी हौले से मुस्कुराई। अब चखने की मेरी बारी आयी। तीखा, फीका, बेस्वाद था सब कुछ, शर्म से आँखें झुक गयीं। कैसे “ये” बिना शिकायत रात – दिन , बिना उफ्फ किये सबकुछ कर लेती है। और मेरे घर को बनाने के लिए , अपना तन , मन सब कुछ दे देती है। फिर जिंदगी का ये सच जाना कि , […]

प्रसाद परम्परा के कवि : आलोचक “मुक्तिबोध” – डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय

गजानन माधव मुक्तिबोध नयी कविता के शिखर कवियों में से हैं |आप केवल कवि-आलोचक ही नहीं बल्कि कथाकार और संस्कृति चेता भी हैं।   आप अपने प्रशस्त रूप में एक व्यक्तित्व […]

सबटाइटल लेखन एवं सबटाइटल अनुवाद: हिन्दी के लिए बड़ा अवसर – अरुणा त्रिपाठी

फ़िल्में साहित्य का एक अंग हैं और आर्थिक दृष्टि से बड़ा बाजार भी। बढ़ते वैश्वीकरण और संचार तकनीकी के विस्तार के कारण भारत विदेशी फ़िल्मों के लिए एक बड़ा बाज़ार […]

अलौकिकता के बरक्स साधारण की नियति – डॉ. राम विनय शर्मा

महाभारत का युद्ध समाप्त होने के पश्चात् कृष्ण के मन में जो संकल्प-विकल्प, जय-पराजय और नैतिकता-अनैतिकता के भाव उमड़-घुमड़ रहे थे, उस द्वन्द्वात्मक मनःस्थिति को ‘उपसंहार’ की केन्द्रीय वस्तु के […]

भूमंडलीकरण और मीडिया – रणजीत कुमार सिन्हा

सोवियत संध के विघटन के बाद वैश्वीकरण का दौर शुरू होताहै| भूमंडलीकरण ,उदारीकरण ,वैश्वीकरण आदि जिस नाम से पुकारे इसे फलने –फूलने एवं फैलाने में मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है| […]

ऊँ ‘व्हट्सएप’ नमः – डॉ. राजरानी शर्मा 

दूरियों को नज़दीकियों में बदलना ही सोशल मीडिया है। जब आमने-सामने बैठकर दिल की बात कहने में असमर्थता हो, कोई संगी-साथी, रिश्तेदार, पिता-पुत्र या कोई प्रियजन इतनी दूर हो कि […]

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और राष्ट्रवाद – डॉ. पार्वती यादव

भारतीय नवजागरण में राष्ट्रवाद का दार्शनिक व आध्यात्मिक आधार विवेकानन्द ने रखा। राजनीतिक क्षेत्र में बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रवाद को परिभाषित किया तथा हिन्दी साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी […]

भाषाई अस्मिता के सामाजिक संदर्भ – डॉ. बीरेन्द्र सिंह

अस्मिता का अर्थ है- पहचान तथा भाषाई अस्मिता से तात्पर्य है- भाषा बोलने वालों की अपनी पहचान। ‘अस्मिता’ शब्द के संदर्भ में डॉ. नामवर सिंह ने कहा है कि- “हिंदी […]

वैश्वीकरण के दौर में भाषा के विभिन्न आयाम – डॉ. कमलिनी पाणिग्राही

वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के इस युग में जहां हर तरफ विभिन्न कंपनियों में गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है, उसमें विज्ञापन एक ऐसा हथियार बनकर सामने आया है जिसकी जितनी […]