
गांधीवादी विचारधारा भारतीय इतिहास, समाज और साहित्य के विकास में एक केंद्रीय भूमिका निभाने वाली विचारधारा रही है। मा. गांधी के नेतृत्व में सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और नैतिकता जैसे सिद्धांतों ने केवल राजनीतिक क्रांति को जन्म नहीं दिया, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों में भी गहरा परिवर्तन उत्पन्न किया। गांधीजी का प्रभाव भारतीय समाज के प्रत्येक क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने जाति प्रथा, छुआ-छूत, स्त्री-पुरुष असमानता और उपभोक्तावाद जैसी समस्याओं को चुनौती दी। उन्होंने भारतीयता को न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से परिभाषित किया, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों से भी उसे समृद्ध किया। उनका आदर्श ‘ग्राम स्वराज’ भारत के नवनिर्माण का एक सशक्त प्रतीक बना। हिन्दी साहित्य, जो हमेशा से समाज का दर्पण रहा है, गांधीवादी विचारधारा से अछूता नहीं रहा। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में जब देश स्वतंत्रता संग्राम की आग में जल रहा था, हिन्दी साहित्यकारों ने भी अपनी लेखनी को सामाजिक बदलाव और जनजागरण का माध्यम बनाया। गांधी जी के सिद्धांतों और कार्यों से प्रेरित होकर अनेक रचनाकारों ने हिन्दी साहित्य में नैतिकता, आत्मबल, असहयोग आंदोलन, खादी, और स्वराज जैसे विषयों को स्थान दिया।
प्रस्तावना:-
गांधीवादी विचारधारा भारतीय इत्तिहास, समाज और साहित्य के विकास में एक केंद्रीय भूमिका निभाने वाली विचारधारा रही है। मा. गांधी के नेतृत्व में सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और नैतिकता जैसे सिंद्धांतों ने केवल राजनैतिक दृष्टिकोण से परिभाषित को जन्म नही दिया, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक मूलयों में भी गहरा परिवर्तन उत्पन्न किया। गांधी जी का प्रभाव भारतीय समाज के प्रत्येक क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता हैl उनहोंने जाति प्रथा, छुआ-छूत, स्त्री- पुरुष असमानता और उपभोक्तावाद जैसी समस्याओं को चुनौती दी। उन्होंने भारतीयता को न केवल राजनीतिक दृष्टीकोण से परिभाषित किया, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों से भी उसे समृद्ध किया। उनका आदर्श ‘ग्राम स्वराज’ भारत के नवनिर्माण का एक सशक्त प्रतीक बना। हिंदी साहित्य, जो हमेशा से समाज का दर्पण रहा है, गांधीवादी विचारधारा से अछूता नही रहा। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में जब देश स्वतंत्राता संग्राम की आग में जल रहा था, हिंदी साहित्यकारों ने भी अपनी लेखनी को सामाजिक बदलाव और जनजागरण का माध्यम बनाया। गांधी जी के सिद्धांतों और कार्यो से प्रेरीत होकर अनेक रचनाकारों ने हिंदी साहित्य में नैतिकता, आत्मबल, असहयोग आंदोलन, खादी, और स्वराज जैसे विषयों को स्थान दिया।
इस समीक्षा पत्र का उद्देश्य हिंदी साहित्य में गांधीवादी विचारधारा के प्रभाव की पड़ताल करना है। यह अध्ययन यह स्पष्ट करने का प्रयास करेगा की किस प्रकार गांधीवाद ने हिंदी साहित्य के कथ्य, भाषा, शैली और दृष्टिकोण को प्रभावित किया। साथ ही यह समीक्षा इस विचारधारा की साहित्यिक व्याप्ति, उसकी आलोचना, और आज के परिप्रेक्ष्य में उसकी प्रासंतगिकता को भी उजागर करने का प्रयास करेगी।
गांधीवादी विचारधारा के प्रमुख तत्व:-
महात्मा गांधी की विचारधारा का आधार भारतीय परंपरा, वेदांत, जैन-बौद् सिद्धांतों और पश्चिमी मानवतावादी मूल्यों का समन्वय है। उनके दर्शन का उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नही, बल्कि एक नैतिक और आत्मिक रूप से उन्नत समाज की स्थापना था। गांधीवादी विचारधारा के कुछ प्रमुख तत्व निम्नलिखित है: गांधी जी के समस्त चिंतन का आधार “सत्य” है। वे मानते थे कि ईश्वर का दूसरा नाम सत्य है- “सत्य ही ईश्वर है”। इसके साथ ही उनहोंने ने “अहिंसा” को सत्य तक पहुँचने का मार्ग बताया। उनके अनुसार, किसी भी सामाजिक या राजनीतिक संघर्ष में हिंसा का प्रयोग अनैतिक है और यह मनुष्य की आत्मिक उन्नति में बाधक है। हिंदी साहित्य में यह भाव अनेक रचनाओं में परिलक्षित होता है, जिन्होंने विरोध या संघर्ष को भी अहिंसात्मक तरीकों से प्रस्तुत किया गया है। गांधी जी का “स्वदेशी” का सिद्धांतों आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना से जुड़ा है। उन्होंने ने देशवासियों से आग्र किया कि वे विदेशी वस्त्रों और वस्तुओं का त्याग करें और खादी वस्तुओं का उपयोग करें। यही केवल आर्थिक नीति नही, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक स्वतंत्रता की घोषणा थी। हिंदी साहित्यकरों ने इस विचार को अपने प्रतीकों और कथाओं में प्रमुखता दी। खादी और चरखा इन रचनाओं में आत्मगौरव और स्वदेश प्रेम के प्रतीक बने। गांधी जी ने जातिवाद, छुआ-छूत और वर्गभेद का खुला विरोध कियाl उन्होंने “विरजन” शब्द देकर अछूत समझे जानेवाले वर्गों को समाज में सम्मान दिलाने की चेष्टा की। उनके विचारों में सामाजिक समरसता और मानव-मूल्यों सर्वपरी थे। हिंदी साहित्य में यह तत्व प्रेमचंद, इलाचंद्र जोशी, नागार्जून जैसे रचनाकारों की रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है, जिसे दलितों, किसानों और मजदूरों की स्थिति को प्रमुखता से उठाया गया है। गांधी जी का सपना “ग्राम स्वराज” था एक ऐसा भारत जिसके प्रत्येक गाव आत्मनिर्भर, नैतिक और संगठीत हो। वे मानते थे त्रक भारत की आत्मा गावों में बसती है, और जब तक गाव सशक्त नही होंगे, तब तक राष्ट्र सशक्त नही बन सकता। हिंदी साहित्य में यह विचार ग्राम्य जीवन के यथार्थ चित्रण के रूप में उभरता है, जिस लेखक ग्रामीण भारत की समस्याओं और संभावनाओं को गांधीवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते है। गांधी जी का धर्म सम्प्रदाय से ऊपर था। उनके सहधर्म का अर्थ था नैतिकता, आत्मसंयम, सेवा और करुणा। उन्होंने ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नैतिकता को सर्वपरी रखा, चाहिएl राजनीतिक हो, आर्थिक या नीजी जीवन। हिंदी साहित्यकारों ने इस नैतिक दृष्टिकोण को अपने कथानकों में आत्मसात किया। साहित्य में आदर्शवाद, नैतिक संघर्ष और आत्मबल के प्रसंग इसी सोच का विस्तार है।
हिंदी साहित्य में गांधीवाद का प्रवेश और विकास:-
हिंदी साहित्य में गांधीवादी विचारधारा का प्रवेश बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में उस समय हुआ, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन की लहरों में बह रहा था और भारतीय समाज राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। 1915 में गांधी जी के भारत आगमन और 1919 के असहयोग आंदोलन के पिता हिंदी साहित्य में एक नई वैचारिक चेतना का संचार हआ। इस काल में साहित्य केवल सौंदर्यबोध या मनोरंजन तक सीमित न रह कर सामाजिक जागरूकता और जन संपृक्ति का माध्यम बनने लगा। राष्ट्रवाद, सामाजिक विषमता, ग्रामीण जीवन, श्रमिकों और दलितों की स्थिति जैसे विषय साहित्य में प्रमुख रूप से उभरने लगे। गांधीजी के सत्याग्रह, अहिंसात्मक आंदोलन और स्वदेशी विचारों ने न केवल जनमानस को प्रेरित किया, बल्कि लेखकों को भी अपनी विचारधारा और रचनाशीलता को नवदृष्टि देने के लिए प्रेरित किया। हिंदी साहित्य में यह रुझान केवल विषयवस्तु तक सीमित नही रहा, बल्कि भाषा और शैली पर भी गांधीवाद का प्रभाव पड़ा सरल, जनसामान्य की बोली में लिखी गई रचनाएुँ अधिक लोकप्रिय हुई। इस दौर में हिंदी के प्रमुख साहित्यिक आंदोलनों पर भी गांधीवादी विचारधारा की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। जैसे छायावाद युग, जो मूलतः व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और सौंदर्यबोध को केंद्र में रखता था, उसमें भी राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भर की गूंज सुनाई देने लगी। इसके बाद प्रगतिशील आंदोलन ने सामाजिक विषमता, वर्ग-संघर्ष और जन आंदोलनों को साहित्य का विषय बनाया यद्यपि वह मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्रेरित था, परंतु उसकी जड़ों में गांधीवाद से से प्राप्त नैतिकता और मानवीय दृष्टिकोण भी अन्तर्निहित रहा। इसी प्रकार 1936 में स्थापित प्रगतिशील लेखक संघ की अनेक रचनाओं में गांधीवादी प्रभावों की झलक मिलती है, विशेष रूप से उस समय जब लेखक वर्ग सामाजिक बदलाव की दिशा में अहिंसक और वैचारिक संघर्ष की ओर उन्मुख था। बाद में नई कहानी आंदोलन और जनकवि परंपरा ने भी ग्रामीण भारत, सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों को गांधीवादी फ्रेम में देखने की चेष्टा की।
हिन्दी के अनेक प्रमुख साहित्यकारों पर गांधी जी के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। प्रेमचंद, जो इस युग के सबसे सशक्त कथा-लेखक माने जाते है, अपनी कहानियों और उपन्यासों में ग्राम जीवन, किसानों की दुर्दशा और सामाजिक विषमता को केंद्र में रखते हए गांधीवादी आदर्शों का सशक्त चित्रण किया। उनका उपन्यास “निर्मला” नारी शोषण पर प्रकाश डालता है, जबकि “गोदान” में ग्रामीण भारत की व्यथा और स्वराज की पुकार दोनों का मिलाजुला रूप देखने को मिलता है। मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी काव्य-रचनाओं में राष्ट्र, नारी सम्मान और भारतीय संस्कृति को महत्त्व दियाl जो गांधी जी की विचारधारा से मेल खाता है। सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएुँ वीरता और बलिदान के साथ-साथ स्त्री चेतना और सामाजिक बदलाव को स्वर देती है। जयशंकर प्रसाद, पंत और दिनकर जैसे कवि भी गांधीवाद से सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित थे। कुल मिलाकर, हिंदी साहित्य में गांधीवाद का विकास एक सतत प्रक्रिया रही, जिसमें राजनीतिक चेतना, सामाजिक सुधार और नैतिक मुलधर्मिता का संगम देखने को मिलाता है।
प्रमुख हिंदी साहित्यकारों पर गांधीवाद का प्रभाव :-
मा. गांधी के विचारों का प्रभाव हिंदी साहित्यकारों पर गहरा और व्यापक रहा है। बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य का निर्माण उस कालखंड में हआ जब भारत स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था और गांधीजी इस संघर्ष के प्रमुख नैतिक और राजनैतिक नेतृत्वकर्ता थे। उनके विचारों ने लेखकों को केवल विषयवस्तु नही दी, बल्कि एक वैचारिक दिशा भी प्रदान की। अनेक हिंदी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल गांधीवादी आदर्शों को स्वीकार किया, बल्कि उन्होंने समाज में प्रसारित करने का माध्यम भी बने।
प्रेमचंद हिंदी कथा-साहित्य के ऐसे स्तंभ है, जिनकी रचनाओं में गांधीवादी विचारधारा की स्पष्ट झलक मिलती है। वे ग्रामीण भारत के यथार्थ चित्रण, किसानों की पीडा आर्थिक असमानता और सामाजिक अन्याय को उजागर करने वाले पहले प्रमुख लेखक माने जाते है। “गोदान” में होरी जैसे पात्र गांधीजी के ‘ग्राम स्वराज’ के आदर्श की छाया लिए प्रतीत होते है, जबकि “रंगभूमि” मे सूरदास का चरित्र अहिंसात्मक संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरता है। प्रेमचंद का लेखन सामाजिक सुधार, आत्मबल, नैतिकता और मानवता के गांधीवादी मूल्यों का साहित्यिक रूपांतरण है।
जयशंकर प्रसाद, सुत्रमिानंदन पंत, और मैसथलीशरण गुप्त जैसे कवि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के वाहक थे। गुप्तजी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति, नारी सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता को जो स्थान मिला, वह गांधीजी के दृष्टिकोण से सामंजस्य रखता है। पंत ने जिस प्रकृति और आत्मा की शुद्धता के माध्यम से गांधीजी के नैतिक मूल्यों को छूने का प्रयास किया, वही प्रसाद की कविताओं और नाटकों में सांस्कृतिक गौरव और आत्मसम्मान की भावना का उद्भव गांधीवादी दृष्टीकोण की प्रेरणा से हआ। इन रचनाकारों ने ‘स्वराज’ को केवल राजनीतिक आजादी नही, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक आत्मनिर्भरता के रूप में प्रस्तुत किया।
हरिवंश राय बच्चन और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं में भी गांधीवादी प्रभाव की स्पष्ट उपस्थिति है। बच्चन की कविताओं में आंतरिक संघर्ष, जीवन के नैतिक प्रश्न और मानवीय संवेदना गांधीजी के विचारों की गूंज बनकर उभरती हैl वही दिनकर जैसे राष्ट्रीय कवि की कविताएँ यद्यपि कभी-कभी उग्र राष्ट्रवाद और क्रन्तिकारी भावों से भी प्रेरित रही गांधीजी की अहिंसा, धर्मिकनिष्ठा और लोकसेवा की भावनाओं से भी ओतप्रोत है। “रश्मिरथी” और “संस्कृति के चार अध्याय” जैसी रचनाओं में दिनकर का गांधीवादी दृष्टीकोण गहराई से झलकता है। इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर, यशपाल, अज्ञेय, नागार्जून आदि साहित्यकारों ने भी अपने-अपने ढंग से गांधीवाद को समझा, अपनाया और रचनात्मक रूप दियाl इलाचंद्र जोशी की रचनाएुँ व्यक्ति की आंतरिक सच्चाई और आत्मसंघर्ष को उजागर करती है, जो गांधीजी के ‘आत्मनिरिक्षण’ और ‘आत्मशुद्धि’ के सिद्धांतों से मेल खाती है। अमृतलाल नागर ने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की व्यथा को प्रमुखता से उठाया, जो गांधीजी की ‘हरिजन सेवा’ की अवधारणा से अनुप्रेरित थी। नागार्जुन जैसे जनकवि ने अपने जिस भाषा प्रयोग और जनसरोकारों से गांधीवादी विचारों को लोकभाषा में ढालकर प्रस्तुत कियाl इस प्रकार हिंदी साहित्य के विविध विधाओं और धाराओं में गांधीवादी विचारधारा ने लेखकों को न केवल सामाजिक विषयों की ओर उन्मुख किया, बल्कि उन्होंने लेखनी के माध्यम से जनचेतना जगाने का साधन भी बनाया। यह प्रभाव आज भी साहित्य में नैतिकता, आत्मबल, और समाजसेवा जैसे मूल्यों के रूप में जीवंत बना हआ है।
गांधीवादी विचारधारा और विभिन्न साहित्यिक विधाएँ
मा.गांधी के विचारों ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं को प्रभावित कियाl साहित्य केवल कल्पना या मनोरंजन का माध्यम नही रहा, बल्कि गांधीवादी प्रभाव के कारण यह समाज, राजनीति और नैतिकता का प्रतिबिम्ब बन गया। उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध तथा आत्मकथा जैसी विधाओं में गांधीजी के विचारों सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, सामाजिक समानता, और नैतिक मूल्यों को विविध रुपों में अभिव्यक्त किया गया। गांधीवादी विचारधारा का सर्वाधिक प्रभाव हिंदी उपन्यास साहित्य पर पड़ा। प्रेमचंद के उपन्यासों में गांधीजी के विचारों की गूंज सर्व प्रथम सुनाई देती है। “रंगभूमि” में अंधे पात्र सूरदास की संघर्षशीलता, अहिंसात्मक प्रतिरोध का प्रतीक है, जबकि “गोदान” में ग्राम्य जीवन की जटिलताएुँ, शोषण और नैतिक संघर्ष गांधीवादी चिंतन को आधार बनाते है। बाद के उपन्यासकारों जैसे अमृतलाल नागर, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ आदि ने भी अपने उपन्यासों में सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव और ग्रामीण पुनर्निर्माण जैसे विषयों को उठाया, जो गांधीजी की सोच के केन्द्र में थे। कहानी विधा में भी गांधीवादी प्रभाव अत्यंत स्पष्ट दिखाई देता है। प्रेमचंद की कहानियां जैसे “पंच परमेश्वर”, “सद्गति”, और “कफन” समाज के नैतिक और मानवीय पक्ष को उजागर करती हैl इन कहानियों में सामाजिक, न्याय, करुणा, और अंतःकरण की आवाज को प्राथमिकता दी गई है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अन्य लेखकों जैसे जैनेन्द्र कुमार, यशपाल, विष्णु प्रभाकर आदि ने भी मनोवैज्ञानिक संवेदना और सामाजिक नैतिकता के माध्यम से गांधीवादी विचारों को कहानी के फलक पर लाया। कविता ने गांधीवाद को भावात्मक और जनसामान्य के हृदय तक पहुँचाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रप्रेम और नारी सशक्तिकरण जैसे विषय गांधीवादी दृष्टिकोण से जुड़ते है। दिनकर की कविताओं में शक्ति और नीति का संतुलन गांधीवाद और क्रांतिकारिता के द्वंद्व को दर्शाता है। सुभद्राकुमारी चौहान की “झांसी की रानी” जैसी कविताएुँ जनचेतना और आत्मगौरव की प्रेरणा है, जो गांधीजी के नेतृत्व में जागे जन-मन को स्वर देती है। निबंध साहित्य में गांधीवादी विचारों का व्यापक विवेचन हआ है। आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जैसे निबंधकारों ने गांधीजी के जीवन, विचारधारा और उनके सामाजिक दृष्टिकोण को अपने लेखन का आधार बनाया। इन निबंधों में आत्मावलोकन, नैतिकता, देशभक्ति, सामाजिक सुधार और सत्य, अहिंसा की व्याख्या अत्यंत गंभीरता सेकी गई हैl गांधीजी स्वयं भी एक समर्थ निबंधकार थे, जिनकी रचनाएुँ हिंदी के अनुवादों में लोकप्रिय रही।
गांधीजी की अपनी आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” हिंदी में व्यापक रूप से पढी गई और अनेक लेखकों को आत्मकथात्मक लेखन की प्रेरणा मिलीl हिंदी में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों, समाज सुधारकों और साहित्यकारों की आत्मकथाओं में गांधीजी के संपर्क, प्रभाव और मार्गदर्शन का उल्लेख मिलाता है। विनोबा भावे, राममनोहर लोहिया, राजेंद्र प्रसाद, और कस्तूरबा गांधी से जुड़े संस्मरणों में गांधीजी के जीवन दर्शन की व्याख्या मिलाती है। इससे हिंदी साहित्य में आत्मकथा और संस्मरण लेखन का नया आयाम विकसित हुआ, जो केवल व्यक्तिगत नही, बल्कि वैचारिक और प्रेरणात्मक रही।
गांधीवाद की आलोचना और सीमाएुँ
गांधीवादी विचारधारा ने भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य को एक नई नैतिक दिशा दी, किन्तु इसका पक्ष विपक्ष दोनों ही रूपों में साहित्यकारों और विचारकों द्वारा गंभीरता से विश्लेषण किया गया। जैसे गांधीवाद को नैतिक आदर्शवाद, मानवतावाद और सामाजिक समरसता की प्रेरणा माना गया, वही कई साहित्यकारों ने इसकी व्याहारिक सीमाओं और सैद्धान्तिक विरोधाभासों की ओर भी संकेत किया प्रेमचंद जैसे यथार्थवादी लेखक ने जहाँ गांधीजी की प्रेरणा से अपने लेखन को सामाजिक सुधार की ओर मोड़ा, वही कर्मभूमि जैसे उपन्यास में यह भी दिखाया कि केवल नैतिक शिक्षा से व्यवस्था नही बदलती सामाजिक ढांचे में ठोस बदलाव आवश्यक है। यशपाल, अज्ञेय और नागार्जून जैसे लेखकों ने गांधीजी के अहिंसात्मक मार्ग को असामाजिक शक्तियों के विरुद्ध अर्याप्त माना और उसकी आलोचना की कि यह विचारधारा तत्कालीन क्रन्तिकारी परिस्थितियों के अनुकूल नही थी। गांधीवाद की आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसका आधुनिक सन्दर्भ में मूल्यांकन है। आज जब भारत भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद और तकनीकी विकास की राह पर है, गांधीजी के विचार जैसे स्वदेशी, आत्मनिर्भर, ग्रामव्यवस्था और साधनों की नैतिकता कई लोगों को अप्रासंगिक लग सकते है। तथापि, पर्यायवरण संकट, आर्थिक असमानता और सामाजिक विघटन जैसे समकालीन मुद्दों पर गांधीवादी दृष्टिकोण की प्रासंगिकता और अधिक बढ गई है। उदाहरण स्वरूप, ग्राम स्वराज की अवधारणा आज “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” और “लोकल इकॉनमी” के रूप में पुनर्परिभाषित हो रही है। अहिंसा आज केवल राजनीतिक आंदोलन की पद्धति नही, बल्कि वैचारिक असहमति को शांति से व्यक्त करने का विश्वव्यापी उपकरण बन चुकी है। गांधीवाद की सबसे बड़ी चुनौती उसके विचार और व्यवहार के बीच अंतर में दिखाई देती है। गांधीजी स्वयं अपने आदर्शों पर पूर्ण रूप से अमल करने वाले व्यक्ति थे, किन्तु समाज में जब इन आदर्शों को लागू करने की बात आती है, तो व्यवाहरिक जटिलताएुँ उत्पन्न होती है। उदाहरण स्वरूप, जाति-व्यवस्था का विरोध करते हुए भी गांधीजी ने वर्ण व्यवस्था को पूरी तरह नकारा नही, बल्कि उसमें सुधार की बात की जिसे डॉ. आंबेडकर जैसे विचारकों ने उनकी कमजोरी माना। इसी प्रकार, सत्य और अहिंसा जैसे उच्च नैतिक सिद्धान्तों का अनुप्रयोग राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में कठिन होता है, जहाँ तत्काल निर्भय और शक्तिशाली हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। इसलिए कुछ आलोचक गांधीवाद को एक “आदर्शवादी नैतिक दर्शन” मानते है जो आमजन के जीवन की जटिलताओं में हमेशा कारगर नहीl
निष्कर्ष:-
प्रत्यक्ष भले ही थोड़ी क्षीण हो गई हो, परन्तु उसके मूल्य आज भी अनेक रचनाओं में परोक्ष रूप से विद्यमान है। आज जब साहित्य नई तकनीकों, वैश्विक संकटों, उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों और असमानता से जूझ रहा समाज का चित्रण कर रहा है, तब गांधीवादी दृष्टिकोण – जैसे कि अहिंसा की नीति, आत्मसंयम, साधनों की शुद्धता और सामाजिक समानता– नए रूप में प्रासंगिक हो उठे है। अनेक समकालीन लेखक और कवि ग्रामीण जीवन, पर्यायवरण संरक्षण, नारी सशक्तिकरण और नैतिक गिरावट जैसे हिंदी साहित्य पर गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव व्यापक, गहन और दूरगामी रहा है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में जब भारत स्वतंत्रता के संघर्ष से गुजर रहा था, तब साहित्यकारों ने गांधीजी के विचारों को अपने लेखन का नैतिक और वैचारिक आधार बनाया। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, सामाजिक समरसता और नैतिकता जैसे मूल्यों ने हिंदी साहित्य के विषय, भाषा और दृष्टिकोण को न केवल प्रभावित किया, बल्कि उसे जनमानस से जोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, दिनकर, यशपाल, नागार्जून जैसे साहित्यकारों ने गांधीवादी दृष्टिकोण को कथा, कविता, निबंध और संस्मरणों के माध्यम से व्यापक रूप में अभिव्यक्त किया। गांधीवाद ने हिंदी साहित्य को सामाजिक यथार्थ, जनचेतना और नैतिक विमर्श का मंच प्रदान कियाl समकालीन हिंदी साहित्य में गांधीवादी विचारधारा की उपस्थिति मुद्दों पर गांधीवादी विचारों को नए संदर्भों में प्रस्तुत कर रहा है। भविष्य की दृष्टी से देखा जाए तो गांधीवादी साहित्यिक दृष्टिकोण की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता है। बदलते सामाजिक ढांचे, तकनीकी युग की जटिलताओं और वैश्विक समस्याओं के संदर्भ में गांधीवाद को केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से नही, बल्कि एक सक्रिय और सजीव विचारधारा के रूप में देखा जाना चाहिए। हिंदी साहित्य, जो सदैव मानवीय संवेदना और सामाजिक न्याय का पक्षधर रहा है, गांधीवाद को एक नई ऊर्जा के साथ आत्मसात कर सकता है न केवल अतीत के स्मरण के रूप में, बल्कि वर्तमान और भविष्य के नैतिक मार्गदर्शन के रूप में भी।
सन्दर्भ सूची :-
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- नागार्जून। यात्री के कविता संग्रह (जनकवि के रूप में गांधीवादी स्वर का प्रयोग)
डॉ. सुनील मुरलीधर पाटिल
आर.सी.पटेल कला,वाणिज्य एवं
विज्ञान महाविद्यालय शिरपुर,धुलियाँ.





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