
सत्य के साधक महात्मा गांधी का नाम केवल भारत में ही नहीं सारे संसार में प्रसिद्ध है। गांधीजी का जन्म गुजरात के पोरबंदर शहर में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। उनकी माता का नाम पुतलीबाई था। वे अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनके पिता उस समय पोरबंदर राज्य के दीवान थे, लेकिन जब गांधीजी सात वर्ष के थे तब उनके पिता राजकोट के दीवान बन गए और गांधी जी ने अपना किशोरावस्था और युवावस्था का समय वहीं बिताया। उनके पिता एक सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, आत्मनिर्भर व्यक्ति थे। उनकी माता एक समर्पित साध्वी थी। उनसे गांधीजी को सत्य,सेवा, नैतिकता और ईश्वर के प्रति समर्पण के मूल्य विरासत में मिले थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में हुई फिर वह इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बने।
गांधीजी ने भारत में अंग्रेज सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन चलाया। गांधीजी के प्रयत्नों से सदियों से गुलामी भोगने वाले भारत को स्वतंत्रता मिली। गांधीजी ने हिंदू और मुसलमान की एकता के लिए काम किया। उन्होंने हरिजन की दुर्दशा सुधारने के लिए भरसक प्रयत्न किया। उन्होंने खादी-प्रचार, ग्राम सुधार, स्त्री-शिक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने जीवन भर हमारे देश की सेवा की। इसलिए वे हमारे देश के राष्ट्रपिता कहलाए। गांधीजी सत्य, प्रेम और अहिंसा के पुजारी थे। वे सरलता और सादगी की मूर्ति थे और बच्चों को बहुत प्यार करते थे।
अहिंसा में अणु से भी बड़ी शक्ति है। अहिंसा का सामान्य अर्थ है किसी के साथ हिंसा न करना। लेकिन गांधीजी ने अहिंसा की विस्मृत आध्यात्मिक भावना को नए रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अहिंसा के मूल्यों को ही बदल दिया। गांधीजी की अहिंसा स्थूल प्रकार की नहीं, बल्कि व्यापक प्रकार की है और इसी अर्थ में उन्होंने अहिंसा का पालन करने पर बल दिया है। गांधी के अनुसार अंडे खाना, मांस खाना, किसी का दिल दुखाना, किसी से धृणा करना, किसी के अधिकारों को छीनना, किसी की दुर्दशा की उपेक्षा करना यह सभी सूक्ष्म अर्थों में हिंसा के विभिन्न रूप है। पापी को मारना भी हिंसा है। गांधीजी कहते थे कि पाप को मारो,पापी को नहीं। इस प्रकार महात्माजी ने हिंसा की उद्दात भावना को पुनर्जीवित किया है। अहिंसा के क्षेत्र में गांधीजी की विशेषता यह है कि उन्होंने इस हिंसा में डूबी राजनीति के क्षेत्र में भी अहिंसा को व्यवहार में लाने का प्रयास किया। उनका मानना था कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अहिंसा का पालन किया जाना चाहिए। राम राज्य की उनकी अवधारणा में पुलिस या सैन्य नहीं थे, उनका दृढ़ विश्वास था की राजनीति में कठिन समस्याओं का समाधान अहिंसा और हृदय परिवर्तन के माध्यम से किया जा सकता है और वह इस अस्त्र में निहित शक्ति से परिचित थे। गांधीजी ने एक ऐसी महाशक्ति को जिसे हिंसा के माध्यम से पराजित करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी,अहिंसा के प्रचंड अस्त्र से चुनौती दी और ब्रिटिश सरकार ने बिना किसी कटुता के भारत को स्वतंत्र कर दिया। इन्होंने हिंसा के माध्यम से ऐसा करने की सोची होती तो हमारे देश की स्थिति कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इस तरह अहिंसा-अहिंसक आंदोलन गांधीजी का देश की आजादी के क्षेत्र में कारगर रहा। गांधी जैसे महान वीरपुरुष ही अहिंसा के शस्त्र का उपयोग कर सकते हैं जो पहले खुद पर विजय प्राप्त कर सकते हैं उसे दुनिया की कोई ताकत पराजित नहीं कर सकती। 14 अगस्त,1947 की मध्य रात्रि को भारत में गुलामी की बेड़िया टूट गई और राष्ट्र का पुनर्जन्म हुआ। सभी को इस बात की खुशी थी कि भारत स्वतंत्र हो गया। साथ ही इस बात का दुख भी था कि स्वतंत्र भारत एक विभाजित भारत था। जहां कांग्रेस और देश की जनता आजादी की आतिशबाजी का आनंद ले रही थी,वहीं राष्ट्रपिता गांधी कोलकाता की सड़कों पर धृणा और वैमनस्य की आग को बुझाने और शांति एवं एकता स्थापित करने के लिए घूम रहे थे। यही गांधीजी के आकांक्षा थी कि भारत के माध्यम से दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया जाए। 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे की गोली से गांधीजी की मृत्यु हुई। मृत्यु के समय गांधीजी का ‘राम’ नाम का स्मरण और अपार पीड़ा के बीच भी ईश्वर में उनकी अटूट आस्था उनकी साधना की झलक देती है।
गांधीजी साहित्य में जिसे व्यक्तिगत अभिव्यक्ति कहा जाता है, उसके लिए नहीं लेकिन शब्द की पूजा किसी सार्वजनिक गतिविधि के संदर्भ में करते थे। गांधीजी के लेखन पर समग्र रूप से विचार करते हुए हम कह सकते हैं कि उनका सत्य, प्रेम अन्याय के प्रति उनका क्रोध, उसे मिटाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने की उनकी तत्परता, अपने विरोधियों के प्रति उनका असीम प्रेम, दलितों के प्रति उनकी गहरी भावना और उनकी स्थिति सुधारने के लिए उनका दृढ़ संकल्प और चिंता-यह सभी उनके लेखन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। गांधीजी का संपूर्ण व्यक्तित्व उनके लेखन में प्रतिबिंबित होता है और इस प्रकार वोल्टर पैटर की प्रसिद्ध कहावत ‘शैली ही व्यक्ति है’ उनके मामले में पूर्णतया चरितार्थ हो गई है। उन्होंने कभी भी केवल लिखने के लिए नहीं लिखा बल्कि जैसा कि हिंद स्वराज की प्रस्तावना में कहा गया है – ‘मैंने तब लिखा जब मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सका।’ उन्होंने साहित्य परिषद के मुख्यालय से कहा था – ‘मैंने कलम को बलपूर्वक अपने अधिकार में लिया है।’ और फिर भी वे कभी-कभी अभिव्यक्ति की सटीकता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच गए हैं।
गांधीजी की साहित्य भक्ति अत्यंत उच्च कोटि की थी। साहित्य उनके लिए कामना की वस्तु नहीं, सत्य की खोज का साधन था। भगवान बुद्ध और महावीर की तरह इस महात्मा को भी अपना संदेश जनमानस तक पहुंचाना था। उन्होंने गद्य को अपना माध्यम बनाया। लोक शिक्षण के उद्देश्य से उन्होंने अपना साहित्य लिखा। उनके संपूर्ण जीवन कार्य का सार उनके साहित्य में समाहित है। निबंध उनके प्रमुख साहित्यिक माध्यम है। निबंध उनके अधिकांश विचारों के वाहक बने हैं। भाषण, व्याख्यान और वार्तालाप भी अधिकांश निबंधात्मक है। उन्होंने आत्मकथा, इतिहास और चरित्र-चित्रण जैसी विधाओं का अद्भुत विकास किया है। उन्होंने कुछ जीवनी संबंधी निबंध भी लिखे हैं।
हिंद स्वराज, सत्य के प्रयोग, दक्षिण अफ्रीका का इतिहास, धर्म मंथन, समग्र धार्मिक विचार, शिक्षा की पहेली, अंतिम निर्णय, धर्मात्मा गोखले, मंगल प्रभात, स्वास्थ्य की कुंजी, व्रत विचार, नैतिकता के विनाश का मार्ग, रचनात्मक कार्यक्रम, सर्वोदय, मेरा जेल अनुभव, आश्रम जीवन, सत्याग्रह आश्रम का इतिहास, वर्ण व्यवस्था, स्वच्छंदता और परिवार नियंत्रण, रामनाम, सत्य ही ईश्वर है, अनासक्तियोग, गीताबोध, त्यागमूर्ति, तथा अन्य लेख, स्त्रियां और स्त्रियों की समस्याएं, सच्ची शिक्षा, बुनियादी शिक्षण, राष्ट्रभाषा पर विचार जैसी अनेक पुस्तके उन्होंने लिखी है। बाल पुस्तक,शत प्रतिशत, स्वदेशी, गौ सेवा, स्वदेशी राज्यों का प्रश्न, सर्वोदय दर्शन, मेरे सपनों का भारत, हम सब एक पिता की संतान हैं, दिल्ली डायरी, ग्राम स्वराज आदि पुस्तके प्रकाशित हुई है। जिन में सत्य, धर्म,नैतिकता, स्वास्थ्य, समाज सुधार, स्वराज, स्वदेशी,खादी ग्राम उद्धार,राष्ट्रीय शिक्षा आदि विषयों पर उनके मौलिक विचारों का ज्ञान उनके साहित्य से लिया जा सकता है।
गांधीजी के साहित्य लेखन में उनके अनुभवों का खजाना महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं – ‘सत्य के प्रयोग या आत्मकथा’ जो सन १९२६ में प्रकाशित हुई, जिनकी चर्चा यहाँ की गई हैं। ‘सत्य के प्रयोग या आत्मकथा’ यह गांधीजी की आत्मकथा ने न केवल गुजराती साहित्य में बल्कि विश्व साहित्य में भी अग्र स्थान प्राप्त किया है। क्योंकि पश्चिम में भी ऐसी आत्मकथा लिखने के अनेक प्रयास हुए थे। इसके अलावा यह स्वाभाविक है कि दुनिया भर के विचारक और आम लोग किसी ऐसे व्यक्ति की जीवन गाथा पढ़ने के लिए आकर्षित होते हैं जिसे दुनिया भर के लोगों ने एक महान व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया और जिसने व्याप्त हिंसा का सामना करने के लिए सर्वशुलभ अहिंसा का हथियार खोज और उसका प्रयोग किया। इस प्रकार आत्मकथा विश्व में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ बन चुकी है। ‘सत्य के प्रयोग’ गांधीजी द्वारा अपने जीवन में किए गए प्रयोगों और प्राप्त अनुभव पर लिखी गई कहानी है। उन्होंने इसमें बचपन से लेकर 1920 तक के अपने जीवन का वर्णन प्रयोग के रूप में किया है। आत्म निरीक्षण और आत्म परीक्षण का द्विअर्थी चित्र, निश्चल सादगी और सौहार्द के साथ प्रकट होने वाली बातचीत, हास्य और नैतिकता का विवेकपूर्ण प्रयोग, अभिरुचि की सीमाओं का कभी उल्लंघन न करने वाली अभिव्यक्ति – इन सबके साथ यहां सर्वश्रेष्ठ आत्मकथा का आदर्श स्थापित हुआ है। इसका स्थान सर्वश्रेष्ठ अत्मकथाओं में अग्रणी है। साहित्य की दृष्टी से उनकी यह आत्मकथा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। गुजराती आत्मकथा के निर्माण में ‘सत्य के प्रयोग’ का योगदान अत्यंत मूल्यवान है।
महात्मा गांधीजी का जीवन मानो सत्य की खोज के लिए ही बना था। उन्होंने जीवन भर एक सत्य की वास्तविकता को समझने का प्रयास किया। इस पुस्तक की प्रस्तावना में गांधीजी ने अपनी मानसिक भूमिका इस प्रकार प्रस्तुत की है –
‘पर मुझे आत्मकथा कहां लिखना है? मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के मैंने जो अनेक प्रयोग किए, उस पर कहानी लिखना चाहता हूं। क्योंकि मेरा जीवन इसमें ही गुंथा हुआ है। इसलिए यह सच है कि कहानी एक जीवनी जैसी बन जाएगी, लेकिन अगर उसमें हर पन्ने पर सिर्फ मेरे प्रयोग का ही निचोड़ निकलेगा तो मैं खुद उस कहानी को निर्दोष मानूंगा।’
इस दृष्टिकोण से ही एक सत्यान्वेषी नायक की स्पष्ट छवि उभरती है। सत्य के प्रयोग पांच भागों में विभाजित एक संतुलित कहानी है। पहले भाग में जन्म से लेकर विद्यार्थी जीवन तक की विभिन्न घटनाएं दर्ज हैं। गांधीजी चोरी, धूम्रपान और मांसाहार जैसी बुरी आदतों को खुलेआम स्वीकार करते हैं । फिर कम उम्र में विवाह, विवाह के बारे में गलत धारणाएं, यौन अभिविन्यास की दुनियादारी आदि का यहां यथार्थ चित्रण किया गया है। दूसरे भाग में इंग्लैंड से मुंबई लौट ने के बाद के उनके जीवन का वर्णन है। तीसरे भाग में शुरुआत उस स्टीमर से होती है जिसमें गांधीजी अपने परिवार के साथ दूसरी बार अफ्रीका पहुंचे और वहां गोरे लोगों द्वारा उनका स्वागत किया गया। चौथे भाग में दक्षिण अफ्रीका में उनके द्वारा शुरू की गई विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों से लेकर हमेशा के लिए भारत जाने की तैयारी तक की कहानी है। पांचवें भाग में कहानी उनके भारत आगमन के समय और 1920 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस के साथ समाप्त होती है।
एक आत्मकथाकार के रूप में गांधीजी का सबसे बड़ा गुण निर्भीकता से सत्य का वर्णन करना है। सत्य के प्रति उनकी निष्ठा उनके पूर्व भारतीय लेखकों की तुलना में कई गुना अधिक प्रबल और गहरी है। प्रश्न यह है कि क्या गुजरात ही नहीं बल्कि विश्व का कोई भी आत्मकथाकर उनके सामान सावधानी बरत कर यह सुनिश्चित कर पाया है कि सत्य को विकृत करने, उसे ढकने या उसे अपूर्ण या एक तरफ ढंग से प्रस्तुत करने का अपराध अनजाने में भी ना हो जाए। उनकी सफलता की कुंजी वह विनम्रता है जो उन्होंने स्वाभाविक रूप से आत्मसात की थी। सत्य से समझौता किए बिना जीवन के सभी पहलुओं से सत्य के साथ अपने स्वयं के प्रयोग को प्रस्तुत करने की महात्मा गांधीजी की बुद्धिमत्ता, अपने उद्देश्य के अनुकूल अवसरों का चयन करने की प्रत्येक चरित्र लेखक को प्रेरित करने योग्य है। आत्मकथा ईश्वर के सच्चे स्वरूप के दर्शन हेतु तड़पती मानव आत्मा के विकास यात्रा की एक मानक और रोचक कहानी है और व्यापक दृष्टिकोण से गढ़ी गई यह नई परिभाषा गांधीजी की सत्य के प्रयोग द्वारा पूरी तरह से चित्रित की गई है। इस अंतर निहित गुण के कारण इसे न केवल भारत में बल्कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ आत्मकथाओं में स्थान मिला है। पुस्तक का वैकल्पिक शीर्षक आत्मकथा है लेकिन वास्तव में यह आत्मकथा का प्रचलित प्रकार नहीं है। गांधीजी के जीवन की अनेक आशाएं और निराशाएं उनके हृदय के अंतर्गत, उनके बौद्धिक चिंतन जिसके परिणाम स्वरुप वह एक सुधारक और साम्राज्यवादी से ‘हिंद स्वराज’ के स्वप्न द्रष्टा बने। उनका प्रकृति प्रेम और भारत के प्रति उनकी भक्ति और गांधीजी के जीवन के अन्य पहलुओं के बारे में उपलब्ध प्रचुर सामग्री की झलक सत्य के प्रयोग में मिलती हैं। गांधीजी ने सत्य के प्रयोग में पाठकों को जिस नि:स्वार्थ भाव की प्रेरणा दी है, वह भागवत गीता के अध्ययन और मनन से आई थी। और असहयोग आंदोलन की असफलता का अनुभव करने के बाद निस्वार्थ कर्म की अवधारणा का वास्तविक रहस्य उनके सामने प्रकट होने लगा। इसी कारण ही सत्याग्रह के अस्त्र के माध्यम से उन्होंने अहिंसा को अपने जीवन में उतारा।
अपनी आत्मकथा के अंत में वे विनम्र भाव से लिखते हैं ‘सत्य की मेरी झलक सूर्य की एक किरण के दर्शन के समान हैं, जिसे हजारों सूर्य को इकट्ठा करने पर भी पूरी तरह से नहीं मापा जा सकता।’ यदि हम सत्य की कसौटी पर इस सत्य के प्रयोग या आत्मकथा का मूल्यांकन करें तो यह एक सुंदर आत्मकथा बन गई है जो न केवल गुजराती भाषा में बल्कि विश्व साहित्य में भी सर्वश्रेष्ठ आत्मकथा के रूप में खरी उतरी है।
संदर्भ सूची : –
- गुजराती साहित्य का इतिहास, गुजराती साहित्य परिषद
सं. उमाशंकर जोशी,
पहला संस्करण 1981
- अर्वाचीन गुजराती साहित्य की विकास रेखा
ले. धीरूभाई ठाकर
3.मेरा जीवन ही मेरी वाणी, प्रथम-द्वितीय खंड,
नारायण देसाई,
प्रथम संस्करण 2003
- गांधी ज्ञानकोष
- सत्य के प्रयोग, महात्मा गांधी,
नवजीवन प्रकाशन मंदिर






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