भारतीय चिंतन में विवाह को एक पवित्र एवं पुण्य संस्कार के रूप में स्वीकार किया गया है। यह मानव को दायित्ववान और परिपक्व बनाने के लिए आवश्यक है। सरल शब्दों में कहूं तो विवाह एक ऐसी नींव है जिस पर पूरा परिवार टिका रहता है। यह बंधन मानव उत्पत्ति की प्रथम कड़ी है। जहां से फिर माता-पिता प्रथम शिक्षक की भूमिका ग्रहण करते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में विवाह को एक पवित्र बंधन माना गया है। जहां किसी भी प्रकार की कोई जोर जबरदस्ती अवैध कहलाती है। पुरुष हो या स्त्री विवाह की बात सुनते ही उनके हृदय में प्रेम की वह हिलोर उठाती है जिसे शब्दों के माध्यम से लेखक कुछ यूं व्यक्त करता है :- “वैवाहिक जीवन के प्रभात की लालसा अपने गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजीत कर देती है।”¹

दांपत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच की आपसी मीठी नोंक झोंक को भी प्रेमचंद अपने पात्रों की वाणी के माध्यम से बड़े ही मर्मस्पर्शी, प्यारे और लचीले ढंग से पेश करते हैं :-“होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा –

गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूं। जरा मेरी लाठी दे दे।

धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथ कर आई थी।

बोली – अरे, कुछ रस पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है?

होरी ने अपने झुर्रीयों से भरे हुए माथे को सिकोड़ कर कहा – तुझे रस पानी की पड़ी है,

मुझे यह चिंता है की अबेर हो गई तो मालिक से भेंट न होगी।

असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।

‘इसी से तो कहती हूं, कुछ जलपान कर लो और आज न जाओगे तो कौन हर्ज होगा! अभी तो परसों गए थे।’

तू जो बात नहीं समझती, उसमें टांग क्यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख।”²

एक और संवाद देखिए:-

“उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तंबाकू का बटुआ लाकर सामने पटक दिए।

होरी ने उसकी ओर आंखें तरेर कर कहा – क्या ससुराल जाना है, जो पांचो पोसाक लाई है?

ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जा कर दिखाऊं। होरी के गहरे सांवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कुराहट की मृदुता झलक पड़ी।

धनिया ने लजाते हुए कहा – ऐसे ही बड़े सजीले जवान हो की साली-सलहजें तुम्हें देखकर रीझ जाएंगी।

होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा – तो क्या तू समझती है, मैं बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए।

मर्द साठे पर पाठे होते हैं।

‘जाकर सीसे में मुंह देखो। तुम जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते।

दूध-घी, अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे।

तुम्हारी दसा देख-देख कर तो मैं और भी सूखी जाती हूं कि भगवान यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार भीख मांगेंगे?”³

श्रीमती प्रभा सिहंल का मत है :-“परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन उपार्जन करना तथा उसकी बचत करना भी परिवार के गुण हैं। धन की सुरक्षा के लिए उसका उचित विनियोग करना, ताकि धन सुरक्षित रह सके, इन जैसे कार्यों की व्यवस्था करना परिवार के विशेष गुण हैं। परिवार के सदस्यों का समाज में आदर तथा सम्मान हो और वह कायम रहे इससे संबद्ध कार्य करना परिवार की मूलभूत विशेषता है।”

एक साधारण स्त्री अपने दांपत्य जीवन में सभी सुखों-दुखों, कष्टों, मुश्किलों को सहती हुई अपनी व्यवहार कुशलता से आर्थिक शोषण और सामाजिक रूढ़ियों के दलदल में भी अपने परिवार की गाड़ी को खींचती चली जाती है। जो बात उसके सहृदय  को उचित प्रतीत हो, जो संपूर्ण परिवार के हित में हो, उसके लिए वह अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार है। पर झूठ, अन्याय, लोभ या लालच के वश पड़े किसी व्यक्ति या समाज पर वह कड़े शब्दों अपनाने में भी पीछे नहीं हटती :- “धनिया इतनी व्यवहार-कुशल ना थी उसका विचार था कि हमने जमींदार के खेत जोते हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी खुशामद क्यों करें, उसके तलवे क्यों सहलाएं। यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस वर्षों में उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो, चाहे एक-एक कौड़ी को दांत से पकड़ो; मगर लगान का बेबाक होना मुश्किल है। फिर भी वह हार ना मानती थी, और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आए दिन संग्राम छिड़ा रहता था।”

गोदान उपन्यास में लेखक होरी की मेहरारू धनिया के जीवन की एक झलक पाठक के सामने प्रस्तुत करता है। जहां दांपत्य जीवन के बोझ की चक्की में पिसकर समय से पहले ही उसके बूढ़े हो जाने पर वह सोचती है :- “उसकी ही उम्र अभी क्या थी। छत्तीसवां ही साल तो था; पर सारे बाल पक गए थे, चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई थीं। सारी देह ढल गई थी, वह सुंदर गेहुंआ रंग संवला गया था, और आंखों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिंता ही के कारण तो। कभी तो जीवन का सुख ना मिला। इस चिरस्थाई जीर्णावस्था ने उसके आत्म सम्मान को उदासीनता का रूप दे दिया था।”

भारतीय नारी का सब कुछ उसका सुहाग ही होता है। सुहाग छिन जाने पर वह इतने बड़े संसार में निराश्रित हो अकेले पड़ जाती है। अपने सुहाग की रक्षा के लिए मंगल कामना करना उसके लिए स्वाभाविक ही है और धनिया अपने इसी नारी धर्म का निर्वाह करती दिखाई देती है :-

“होरी कि वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आंच में झुलस गई। लकड़ी संभालता हुआ बोला – साठे तक पहुंचाने की नौबत ना आने पाएगी धनिया, इसके पहले ही चल देंगे।

धनिया ने तिरस्कार किया – अच्छा रहने दो, मत असुभ मुंह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।

होरी कंधों पर लाठी रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखते रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाए हुए हृदय में आतंकमय कंपन- सा डाल दिया था। वह जैसे अपने नारीत्व के संपूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभयदान दे रही थी। उसके अंत: करण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकालकर होरी को अपने अंदर छिपाए लेता था।”

लेखक ने अपनी रचनाओं में परंपरागत भारतीय वैवाहिक पद्धति के माध्यम से हुए अनमेल विवाह से उत्पन्न विषम दांपत्य जीवन के अनेक पहलुओं पर चर्चा की है। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में ऐसे बहुत से उदाहरण पाठकों के सामने प्रस्तुत किए हैं जहां विवाह जैसे पवित्र बंधन को किसी पर किसी विशेष दबाव मजबूरी या धन का लोभ देकर थोपा गया है या कहीं-कहीं विवाह केवल एक समझौते के रूप में दिखाई पड़ता है। उनके प्राय प्रत्येक उपन्यास में विषम दांपत्य जीवन से जुड़ी किसी ना किसी घटना का वर्णन अवश्य मिल जाता है। सेवा सदन उपन्यास में कृष्ण चंद्र (दरोगा) की बड़ी लड़की सुमन का विवाह पैसों की तंगी के कारण वृद्ध दुहाजू गजाधर से कर दिया जाता है। जहां सुमन बिल्कुल भी खुश नहीं रहती। उपन्यास में सुमन के संवाद देखिए :-“हम अपने गार्हस्थ्य जीवन की ओर से कितने बेसुध हैं, उसके लिए किसी तैयारी, किसी शिक्षा की जरूरत नहीं समझते। गुड़िया से खेलने वाली बालिका, सहेलियों के साथ विहार करने वाली युवती, गृहणी बनने के योग्य समझी जाती है। अल्हड़ बछड़े के कंधे पर भारी जुआ रख दिया जाता है ऐसी दशा में यदि हमारा गार्हस्थ्य जीवन आनंदमय न हो, तो कोई आश्चर्य नहीं।”

दहेज की समस्या के कारण फूल सी कन्या को अधेड़ या वृद्ध आदमी से बांध देना, कहीं अधेड़ दुहाजू से ब्याह देने की विषम परिस्थिति तो कहीं शिक्षा और अंध परंपरा से बाल विवाह की कुरीति दिखाई पड़ती है। कहीं वृद्ध विवाह की लालसा दिखाई पड़ती है तो कहीं स्वयं माता-पिता किसी कारण वश कर्ज उतारने के लिए पैसा लेकर या दहेज की मांग  न होने के कारण अपनी लड़की को बूढ़े के हवाले कर देते हैं। कहीं-कहीं माता-पिता लोभ या लालच वश अपने पुत्र या पुत्री का विवाह किसी आयोग्य से करने का निर्णय करते हैं। सेवा सदन उपन्यास में सुमन की शादी बूढ़े गजाधर से होने के पश्चात सुमन अपने माता-पिता को कोसते हुए कहती है:-“मेरे जीवन के दिन रो-रोकर कट रहे हैं। मैंने आप लोगों का क्या बिगाड़ा था कि मुझे इस अंधे कुएं में धकेल दिया। यहां न रहने को घर है, ना पहनने को वस्त्र, न खाने को अन्न । पशुओं की भांति रहती हूं।”

झूठी सामाजिक मर्यादाओं के बंधन में बंध कर लड़की के माता-पिता उसे अपनी मर्जी से विवाह के बंधन में बांधते हैं लोग क्या कहेंगे, समाज क्या रहेगा इसकी परवाह की जाती है परंतु जिसने सदा-सदा के लिए विवाह बंधन में बंधना है उसकी इच्छा-अनिच्छा की कद्र नहीं की जाती। बिरजन अमीर माता-पिता की लड़की है, प्रताप निर्धन है। दोनों का बाल्यावस्था का प्रेम समाज की जात-पात, ऊंच-नीच की दीवार से टकराकर रह जाता है। धन एवं वैभव से संपूर्ण एक अमीर खानदान का पिता एक गरीब साधारण परिवार के लड़के से अपनी पुत्री का विवाह कैसे कर सकता है। वह बिरजन की इच्छा के विरुद्ध धनवान एवं प्रतिष्ठित परिवार डिप्टी श्याम चरण के लड़के कमल चरण को योग्य वर मानकर बिरजन की शादी उससे कर देते हैं।”¹

श्री देवेंद्र इस्सर का कथन है :- “वैयक्तिक रिश्तों और संयुक्त जीवन के विघटन के कारण मनुष्य एक ऐसी स्थिति से गुजर रहा है, जिसे कई नाम दिए गए हैं – एकाकीपन, अजनबीपन, अलगाव और एलियनेशन।”¹¹ प्रतिज्ञा में पति-पत्नी के स्वभाव और विचारों की विषमता से तहस-नहस होते पारिवारिक मूल्यों को दिखाया गया है। कमला प्रसाद और सुमित्रा दोनों विवाह के बंधन में तो बंध जाते हैं पर दोनों जीवन में एक दूसरे को नहीं अपना पाए क्योंकि उन दोनों के विवाह की नींव प्रेम न होकर माता-पिता की हैसियत धन दौलत रुतबा पैसा इत्यादि है। कमला प्रसाद और सुमित्रा के वैवाहिक जीवन में दो-चार महीने ही चैन से गुजरे होंगे कि दोनों में मनमुटाव पैदा होने लगा। अनमोल विवाह से जो विषमता उत्पन्न होती है वह समझौते के लिए भी गुंजाइश नहीं छोड़ती।

“ज्यों-ज्यों दोनों की प्रकृति का विरोध प्रकट होने लगा दोनों एक दूसरे से खींचने लगे। सुमित्रा में नम्रता विनय और दया थी, कमला में घमंड उच्च शृंखलता और स्वार्थ । एक वृक्ष का जीव था, दूसरा पृथ्वी पर रहने वाला । उनमें मेल कैसे होता कामलोलुपता में अंधा होकर कमला प्रसाद विधवा पूर्वा को फंसाना चाहता है।”¹²

प्रेमचंद जी विधवा के जीवन के लिए भी समाज पर एक सवालिया निशान खड़ा करते हैं। क्या विधवा को जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं ? क्या उसकी कोई महत्वाकांक्षाएं नहीं ? गोदान उपन्यास में भी वह दुनिया के माध्यम से विधवा स्त्री के जीवन की चर्चा करते हैं। समाज में बेचारी विधवा का जीवन अभिशाप बना हुआ है। विधवा विवाह निषेध और विधवा नारी के संरक्षण और जीवन निर्वाह की व्यवस्था का अभाव उसके जीवन की विडंबना बन जाते हैं।

सेवा सदन और निर्मला उपन्यास में दहेज की प्रथा के कारण ही सुमन के मामा उमानाथ और निर्मला की माता अपनी-अपनी कन्या के लिए योग्य युवक प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं । निर्मला के पिता की मृत्यु के पश्चात धन के लोभी लालची बाप बेटों ने रिश्ता तोड़ने का फैसला किया। वह निर्मला से शादी करने से इंकार करता हुआ अपने पिता से कहता है :- “भुवन- इसमें शर्म की कौन सी बात है? रुपये किसे काटते हैं? लाख रुपए तो लाख जन्म में भी ना जमा कर पाऊंगा। इस साल पास भी हो गया, तो कम से कम पांच साल तक रूपयों की सूरत नजर ना आएगी। फिर सौ-दौ सौ रुपए महीने कमाने लगूंगा। पांच-छ: तक पहुंचते-पहुंचते उम्र के तीन भाग बीत जाएंगे। रुपए जमा करने की नौबत ना आएगी। दुनिया का कुछ मजा ना उठा सकूंगा। किसी धनी लड़की से शादी हो जाती तो चैन से कटती। मैं ज्यादा नहीं चाहता बस एक लाख नगद हो या फिर कोई ऐसी जायदाद वाली बेवा मिले, जिसके एक ही लड़की हो।

 रंगीली – चाहे औरत कैसी ही मिले?

 भुवन – धन सारे ऐबों को छिपा देगा। मुझे वह गालियां भी सुनाए, तो भी चूं तक ना करूं। दुधारू गाय की लात किसे बुरी मालूम होती है।”¹³

दहेज में मांगे गए धन की पूर्ति न कर पाने के कारण निर्मला की माता विवश होकर निर्मला का विवाह तोताराम से करती है। तोताराम पेशे से वकील है और एक सम्पन्न परिवार से है परंतु वह दुहाजू है । उम्र 40 वर्ष के लगभग है और निर्मला केवल 15 वर्ष की सुकोमल कन्या। अब यह मेल कहां तक उचित ठहरता है और परिणाम वही होता है कि निर्मला जीवन भर संकट भोगते हुए ईश्वर को प्यारी हो जाती है और अपने अंत समय में वह अपनी ननद से जो शब्द रहती है वह अत्यंत मार्मिक हैं –

“दीदी जी, अब मुझे किसी वैद्य की दवा फायदा ना करेगी। आप मेरी चिंता ना करें। बच्ची को आपकी गोद में छोड़े जाती हूं। अगर जीती-जागते रहे तो अच्छे कुल में विवाह कर दीजिएगा।

मैं तो इसके लिए अपने जीवन में कुछ ना कर सकी।

केवल जन्म देने भर की अपराधिनी हूं।

चाहे कुंवारी रखिएगा चाहे विष देकर मार डालियेगा पर कुपात्र के गले ना मढ़ियेगा।

इतनी ही आपसे मेरी विनय है।” ¹

किसी भी रिश्ते की नींव प्रेम एवं विश्वास पर ही टिकी होती है और विशेषकर पति-पत्नी में तो प्रेम और विश्वास अटूट होना चाहिए। पर जीवन में जब एक दूसरे के प्रति मन में किसी प्रकार का कोई संशय या संदेह उत्पन्न हो जाता है तो वह संपूर्ण परिवार और समाज का अहित ही करता है ।

सेवा सदन में सुमन का विवाह अधेड़ अवस्था के एक कुरूप एवं निर्धन व्यक्ति गजाधर प्रसाद से होता है। कहां तो लाड़ प्यार में पली फूल सी सुंदर कली सुमन और कहां गजाधर प्रसाद। पति का संशयालु स्वभाव जीवन में ऐसे सर्प सा काम करता है की सुमन ही नहीं बल्कि समाज की सारी मान मर्यादाओं को भी वह निगल लेता है।

निर्मला उपन्यास की पात्र सुधा के जीवन के माध्यम से लेखक ने नारी जीवन की एक और विषमता का चित्र भी प्रस्तुत किया है। हमारी वैवाहिक पद्धति में दो कुंडलियों के मिलान पर तो बल दिया जाता है। उसे अनिवार्य समझा जाता है। परंतु स्वभाव और मन के मेल का यहां ख्याल ही नहीं रखा जाता। रुपयों की थैलियां से विवाह के सौदे होते हैं। उपन्यास में सुधा और डॉ. सिन्हा का जीवन भी ऐसा ही है, जहां डॉ. सिन्हा को अपने लालच का फल भुगतना पड़ता है।

जब इस पौरूष प्रधान समाज में पुरुष को किसी नारी के द्वारा नकार दिया जाता है तो पुरुष अपना वर्चस्व दिखाते हुए स्त्री को अपने वश में करने का प्रयास करता दिखाई पड़ता है :- “वह अपने प्रेम और परिश्रम से फल न पाकर, उसे अपने शासनाधिकार से प्राप्त करने की चेष्टा करने लगा। इस प्रकार रस्सी में दोनों और से तनाव होने लगा।”¹

अत: प्रेमचंद अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को यह सन्देश देते प्रतीत होते हैं कि अनमेल विवाह पति-पत्नी दोनों के लिए, परिवार, समाज और देश सभी के लिए एक अभिशाप साबित होता है। जिससे नफ़रत, तनाव, कुंठा, पीड़ा, त्रासदी उत्पन्न होती है। जो जीवन में आगे चलकर भयंकर रूप धारण करती है और आज के दौर में भी यह उतना ही सटीक है जितना उस दौर में था।

संदर्भ सूची

  1. प्रेमचंद, गोदान, पृष्ठ-31
  2. प्रेमचंद, गोदान, पृष्ठ-7
  3. प्रेमचंद, गोदान, पृष्ठ-8
  4. सिंहल, प्रभा, ‘आधुनिक परिवारों की गृह-व्यवस्था’ (चंडीगढ़ हरियाणा साहित्य अकादमी, प्रथम संस्करण, सन् 1989) पृष्ठ 81.
  5. प्रेमचंद, गोदान, पृष्ठ-7
  6. प्रेमचंद, गोदान, पृष्ठ-7-8
  7. प्रेमचंद, गोदान, पृष्ठ-8
  8. प्रेमचंद, सेवासदन, पृष्ठ-33
  9. प्रेमचंद, सेवासदन, पृष्ठ-33
  10. प्रेमचंद, वरदान,
  11. इस्सर, देवेंद्र, ‘साहित्य और आधुनिक युग-बोध’

 (अजमेर, कृष्णा ब्रदर्स, प्रथम संस्करण सन् 1973) पृष्ठ 373.

  1. प्रेमचंद, प्रतिज्ञा, पृष्ठ-26
  2. प्रेमचंद, निर्मला, पृष्ठ-22-23
  3. प्रेमचंद, निर्मला, पृष्ठ-159
  4. प्रेमचंद, सेवासदन, पृष्ठ-35

 

डॉ. हरिन्दर कुमार