भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में “स्वराज्य” शब्द का प्रयोग अनेक नेताओं ने किया, किंतु इसे वास्तविक जीवन, नैतिकता, और जनमानस की भाषा में रूपांतरित करने का श्रेय केवल महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी को जाता है। गांधीजी के लिए स्वराज्य केवल अंग्रेजों से राजनीतिक मुक्ति का पर्याय नहीं था; वह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों स्तरों पर आत्मनिर्भरता, आत्मसंयम और नैतिक स्वतंत्रता की अवस्था थी।गांधीजी ने “स्वराज्य” को एक जीवंत दर्शन का रूप दिया, जिसमें सत्य, अहिंसा, नैतिकता, श्रम, ग्राम्यजीवन और आत्मबल जैसे तत्व केंद्रीय स्थान रखते हैं। उनके अनुसार — “स्वराज्य का अर्थ है अपने ऊपर राज्य करना। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने ऊपर शासन करना सीख जाएगा, तभी सच्चा स्वराज्य स्थापित होगा।”

“स्वराज्य” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — “स्व” (स्वयं) और “राज्य” (शासन)। अर्थात् “अपने ऊपर शासन”। गांधीजी ने इसे आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर परिभाषित किया। राजनीतिक दृष्टि से, स्वराज्य का अर्थ है — विदेशी शासन से मुक्ति और जनता द्वारा अपने शासन की स्थापना। आध्यात्मिक दृष्टि से, स्वराज्य का अर्थ है — व्यक्ति की आत्मा पर अपने मन, वासनाओं और लोभ का नियंत्रण। सामाजिक दृष्टि से, स्वराज्य का अर्थ है — समानता, सहयोग और नैतिकता पर आधारित समाज का निर्माण। इस प्रकार गांधीजी के स्वराज्य का स्वरूप केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि समग्र जीवन दर्शन था।

 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक चरण में स्वराज्य की अवधारणा मुख्यतः राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित थी। दादाभाई नौरोजी, बाल गंगाधर तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जैसे नेताओं ने स्वराज्य को भारतीय शासन के अधिकार के रूप में देखा।तिलक का प्रसिद्ध वाक्य — “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” — उस समय के राष्ट्रीय भाव को प्रकट करता है। किन्तु गांधीजी ने स्वराज्य को नैतिक और आध्यात्मिक आयामों से जोड़ा। उन्होंने कहा — “राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक व्यर्थ है जब तक व्यक्ति अपने मन पर शासन करना नहीं सीखता।”इस प्रकार गांधीजी ने स्वराज्य को अंदर से बाहर की यात्रा के रूप में देखा — पहले आत्मसंयम, फिर ग्रामस्वराज्य, और अंततः राष्ट्रीय स्वतंत्रता।

गांधीजी का स्वराज्य दर्शन : मूल तत्त्व

गांधीजी के स्वराज्य दर्शन में कई आयाम हैं। नीचे प्रमुख तत्त्वों का विश्लेषण प्रस्तुत है —

  1. आत्मसंयम और आत्मबल

गांधीजी का मानना था कि स्वराज्य की शुरुआत व्यक्ति से होती है। जो व्यक्ति अपने मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रख सकता है, वही सच्चा स्वतंत्र है। उनके शब्दों में —“सच्चा स्वराज्य आत्मसंयम से आता है, न कि सत्ता से।”इसलिए उन्होंने स्वराज्य को आध्यात्मिक साधना माना।

  1. सत्य और अहिंसा

गांधीजी के अनुसार सत्य और अहिंसा स्वराज्य के दो स्तंभ हैं।

धसत्य का अर्थ था — ईश्वर और आत्मा की खोज।अहिंसा का अर्थ था — किसी प्राणी को, चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो, शारीरिक या मानसिक कष्ट न देना।उनका विश्वास था कि केवल अहिंसक और सत्यनिष्ठ मार्ग से प्राप्त स्वराज्य ही स्थायी और नैतिक होगा।

  1. स्वावलंबन (आर्थिक स्वराज्य)

गांधीजी का स्वराज्य केवल राजनीतिक या नैतिक नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता पर भी आधारित था।उनका “चरखा आंदोलन” और “स्वदेशी का सिद्धांत” इसी विचार से जुड़ा था।उन्होंने कहा —“जब तक गाँव आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे, तब तक भारत सच्चा स्वराज्य प्राप्त नहीं कर सकता।”उनके अनुसार, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग, स्वराज्य की दिशा में आवश्यक कदम था।

  1. ग्रामस्वराज्य

गांधीजी का स्वराज्य “ग्रामों के स्वराज्य” पर आधारित था। उन्होंने भारत को “गाँवों का देश” कहा और यह माना कि सच्चा स्वराज्य तभी संभव है जब प्रत्येक गाँव एक स्वायत्त इकाई बन जाए — जो अपने संसाधनों, निर्णयों और विकास में स्वतंत्र हो। उनका सपना था —“भारत का भविष्य शहरों में नहीं, गाँवों में बसता है।”

  1. राजनीतिक स्वराज्य

राजनीतिक स्तर पर गांधीजी ने स्वराज्य को जनता के नैतिक और सक्रिय सहयोग से जोड़ दिया। उनके अनुसार, स्वराज्य किसी “उपहार” के रूप में नहीं मिलेगा, बल्कि उसे जनता को सत्याग्रह, असहयोग और आत्मबल के माध्यम से अर्जित करना होगा। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध “असहयोग आंदोलन” और “नमक सत्याग्रह” के माध्यम से यह सिद्ध किया कि जनता की एकता और नैतिक शक्ति से विदेशी शासन को झुकाया जा सकता है।

स्वराज्य और सत्याग्रह का संबंध

गांधीजी के स्वराज्य दर्शन का केंद्र “सत्याग्रह” था।सत्याग्रह का अर्थ है — “सत्य पर आग्रह”। यह अहिंसक संघर्ष की ऐसी पद्धति थी जिसमें शत्रु को पराजित नहीं, बल्कि परिवर्तित किया जाता है।गांधीजी ने कहा — “सत्याग्रह स्वराज्य प्राप्त करने का एकमात्र नैतिक मार्ग है।”इस दृष्टि से सत्याग्रह, स्वराज्य की क्रियात्मक विधि थी। सत्याग्रह के माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्मशक्ति और नैतिक बल का प्रदर्शन करता है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संभव होते हैं।

स्वराज्य और धर्म

गांधीजी के स्वराज्य विचारों में धर्म का विशेष स्थान था, किंतु वह किसी संप्रदाय या पंथ का धर्म नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नैतिक धर्म था।उनका मानना था कि धर्म के बिना राजनीति पाप बन जाती है।उन्होंने कहा —“मेरे लिए राजनीति और धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। धर्म से रहित स्वराज्य, नरक का द्वार है।”अर्थात् स्वराज्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि चरित्र परिवर्तन भी है।

स्वराज्य का सामाजिक पक्ष

गांधीजी का स्वराज्य समाज सुधार से अलग नहीं था।उन्होंने सामाजिक असमानताओं, जातिवाद, अस्पृश्यता और स्त्री-पुरुष भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन चलाया।उनके अनुसार, यदि समाज नैतिक रूप से शुद्ध और समान न होगा, तो स्वराज्य केवल नाममात्र का रह जाएगा।उनका विश्वास था — “जब तक हर व्यक्ति स्वतंत्र नहीं, तब तक कोई भी स्वतंत्र नहीं।”इसलिए उन्होंने “हरिजन आंदोलन” चलाया और “सर्वोदय” (सभी का उदय) को स्वराज्य का परम लक्ष्य बताया।

गांधीजी का आर्थिक स्वराज्य दृष्टिकोण

गांधीजी ने औद्योगिक पूंजीवाद और अत्यधिक उपभोक्तावाद का विरोध किया।उनका कहना था कि ऐसी व्यवस्था मनुष्य को मशीन का दास बना देती है।उन्होंने “ट्रस्टीशिप सिद्धांत” दिया — जिसके अनुसार संपन्न व्यक्ति अपनी संपत्ति को समाज की सेवा के लिए ट्रस्टी की तरह उपयोग करे।इस प्रकार उनका आर्थिक स्वराज्य न्याय, समानता और सहयोग पर आधारित था।

राज्य की भूमिका

गांधीजी केंद्रीकृत राज्य सत्ता के पक्षधर नहीं थे।उन्होंने “कम से कम राज्य” की परिकल्पना की“सच्चे स्वराज्य में राज्य की शक्ति न्यूनतम होगी। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का शासक होगा।”इसका अर्थ यह नहीं था कि वे अराजकता चाहते थे, बल्कि उनका विश्वास था कि जब व्यक्ति नैतिक रूप से परिपक्व हो जाएगा, तो उसे बाहरी शासन की आवश्यकता नहीं रहेगी।

स्वराज्य और शिक्षा

गांधीजी ने “नई तालीम” (बेसिक एजुकेशन) योजना के माध्यम से शिक्षा को स्वराज्य से जोड़ा।उनका मत था कि शिक्षा व्यक्ति को आत्मनिर्भर, श्रमशील और नैतिक बनाती है। उनकी शिक्षा पद्धति के मुख्य तत्व थे —कार्य के साथ शिक्षा, मातृभाषा में शिक्षा, नैतिक मूल्यों का विकास, उनका विश्वास था कि ऐसी शिक्षा से ही सच्चे अर्थों में स्वराज्य की भावना विकसित होगी ।

स्वराज्य और आधुनिक सभ्यता की आलोचना

गांधीजी ने अपनी पुस्तक “हिन्द स्वराज्य” (1909) में पश्चिमी सभ्यता की तीखी आलोचना की।उनका कहना था कि आधुनिक सभ्यता मनुष्य को नैतिक पतन की ओर ले जा रही है।विज्ञान और मशीनों की अंधी दौड़ ने मनुष्य को स्वार्थी और असंवेदनशील बना दिया है।उन्होंने लिखा —“जिसे आज हम सभ्यता कहते हैं, वह वस्तुतः असभ्यता है, क्योंकि वह मनुष्य को आत्मसंयम से दूर ले जाती है।”गांधीजी के लिए हिन्द स्वराज्य का अर्थ था — भारतीय परंपरा, संस्कृति और आत्मा के अनुरूप शासन प्रणाली।

स्वराज्य और लोकतंत्र

गांधीजी लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे, परंतु उनके लिए लोकतंत्र केवल चुनावी व्यवस्था नहीं थी।उनके शब्दों में —“लोकतंत्र का अर्थ है जनता की चेतना का विकास। जब जनता अपने कर्तव्यों को समझेगी, तभी सच्चा स्वराज्य संभव होगा।”इस प्रकार गांधीजी का लोकतंत्र कर्तव्यपरक लोकतंत्र था, न कि केवल अधिकार आधारित।

स्वराज्य और नैतिकता

गांधीजी का संपूर्ण स्वराज्य दर्शन नैतिकता पर आधारित था।उनका विश्वास था कि बिना नैतिकता के कोई भी राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था टिक नहीं सकती।उन्होंने कहा —“स्वराज्य तब तक अधूरा रहेगा जब तक व्यक्ति अपने आचरण में ईमानदारी, त्याग और सेवा की भावना नहीं लाएगा।”

स्वराज्य का वैश्विक दृष्टिकोण

गांधीजी के स्वराज्य विचार केवल भारत तक सीमित नहीं थे।उन्होंने इसे मानवता की सार्वभौमिक स्वतंत्रता के रूप में देखा।उनके विचारों ने दक्षिण अफ्रीका से लेकर अमेरिका तक अनेक आंदोलनों को प्रेरित किया — जैसे मार्टिन लूथर किंग जूनियर का नागरिक अधिकार आंदोलन और नेल्सन मंडेला का अपार्थाइड विरोध।इस प्रकार गांधीजी का स्वराज्य दर्शन वैश्विक नैतिक चेतना का प्रतीक बन गया।

गांधी के स्वराज्य की आलोचनाएँ

गांधीजी के स्वराज्य दर्शन की आलोचना भी हुई।कुछ प्रमुख आलोचनाएँ थीं —

  1. अव्यावहारिकता: आलोचकों का कहना था कि ग्रामस्वराज्य आधुनिक औद्योगिक समाज में संभव नहीं।
  2. धीमी गति: अहिंसक तरीकों से परिवर्तन बहुत धीमा होता है।
  3. राज्य की कमजोर भूमिका: गांधीजी का “कम से कम राज्य” सिद्धांत आधुनिक प्रशासन के लिए अनुपयुक्त माना गया। किन्तु यह भी सत्य है कि गांधीजी के विचारों ने भारतीय समाज में नैतिक चेतना, एकता और आत्मबल का संचार किया, जो स्वतंत्रता प्राप्ति का आधार बना।

आज के संदर्भ में गांधीजी का स्वराज्य

आज जब भारत आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक रूप से सशक्त हो चुका है, तब भी गांधीजी का स्वराज्य विचार प्रासंगिक बना हुआ है। राजनीतिक क्षेत्र में — स्वराज्य हमें पारदर्शिता और जवाबदेही की याद दिलाता है। सामाजिक क्षेत्र में — यह समानता और न्याय के लिए प्रेरित करता है। आर्थिक क्षेत्र में — यह स्थानीय उत्पादन, स्वदेशी उद्योग और पर्यावरण-संतुलन पर बल देता है। व्यक्तिगत स्तर पर — यह आत्मसंयम और नैतिक जीवन का संदेश देता है। आज के डिजिटल और उपभोक्तावादी युग में गांधीजी का स्वराज्य दर्शन संतुलन, सादगी और आत्मनियंत्रण की राह दिखाता है।

निष्कर्ष :

महात्मा गांधी का स्वराज्य विचार भारतीय जीवन के हर पहलू को छूता है — व्यक्ति, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म और नैतिकता।उन्होंने स्वराज्य को केवल स्वतंत्रता नहीं, बल्कि जीवन का शुद्धतम रूप बताया।उनके लिए स्वराज्य का लक्ष्य था —“ऐसा भारत, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र हो, प्रत्येक गाँव आत्मनिर्भर हो, और प्रत्येक हृदय में सत्य व अहिंसा का प्रकाश हो।”इस प्रकार गांधीजी का स्वराज्य दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रतासंग्राम के समय था।वह हमें याद दिलाता है कि सच्ची स्वतंत्रता बाहर से नहीं, भीतर से आती है।

 

 

 

 

सन्दर्भ सूची

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  • गांधी, मोहनदासकरमचंद — सत्यकेप्रयोगअथवाआत्मकथा. नवरंगप्रकाशन,अहमदाबाद।
  • गांधी, मोहनदासकरमचंद — यंगइंडिया, हरिजनऔरनवजीवनपत्रोंमेंप्रकाशितलेख।
  • मिश्रा, विद्यानंद — गांधीऔरस्वराज्यकीअवधारणा. राजकमलप्रकाशन, नईदिल्ली।
  • सुरेशचंद्रशर्मा— गांधीविचारऔरआजकाभारत. वाणीप्रकाशन, दिल्ली।
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  • सुभाषत्रिपाठी, — स्वराज्यकीअवधारणाऔरगांधीजी. भारतीयसमाजशास्त्रपरिषद, दिल्ली।
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  • रामशरणपांडेय, — गांधीऔरस्वराज्यकापुनर्मूल्यांकन. साहित्यअकादमी, दिल्ली।

           डॉ. पारेख जी. पारेख

                                                                                             Assistant Professor

                                                                                            Department of Sanskrit

        Smt. C. R. Gardi Arts College

        Munpur (Gujarat)