
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं थी; बल्कि यह समाज और संस्कृति के पुनर्जागरण का भी युग था। मोहनदास करमचंद गांधी ने जनता को केवल राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं किया, बल्कि उन्हें सामाजिक और नैतिक चेतना भी प्रदान की। गांधीवादी सिद्धांतों का साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा, जो मलयालम साहित्य में विशेष रूप से परिलक्षित होता है। केरल के साहित्यकार जैसे वल्लतोल नारायण मेनन, कुमारन आशान, बालामणि अम्मा, जी. शंकर कुरुप, तकष़ि शिवशंकर पिल्लै, केशवदेव और एस. के. पोट्टेक्काट ने अपने काव्य, उपन्यास और निबंधों में गांधीवादी मूल्य—सत्य, अहिंसा, करुणा, समानता और ग्रामस्वराज—को अपनाया। वल्लतोल ने गांधी को ‘राष्ट्रात्मा’ और नैतिक शक्ति का प्रतीक माना, जबकि कुमारन आशान की कविताएँ सामाजिक समानता और जातिवाद-विरोध पर गांधीवादी दृष्टि को प्रतिबिंबित करती हैं। तकष़ि के उपन्यास ‘कयार’ में गांधीवादी विचारधारा की झलक मिलती है, और बालामणि अम्मा की कविताओं में उनकी सादगी, मातृ-भावना और आत्मनिर्भरता दिखाई देती है। गांधीजी की केरल यात्राओं, विशेषकर वायकम सत्याग्रह, ने सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता को मजबूती दी। इस प्रकार, गांधी केवल राजनीतिक नेता नहीं बल्कि मलयालम साहित्य में नैतिक शक्ति, सामाजिक चेतना और मानवतावादी दृष्टि के प्रतीक बने।
बीज शब्द : महात्मा गांधी, मलयालम साहित्य, वल्लथोल नारायण मेनन, कुमारन आशान, बालामणि अम्मा, तकष़ि शिवशंकर पिल्लै, गांधीवाद, अहिंसा, सत्य, सामाजिक सुधार, स्वतंत्रता आंदोलन, केरल पुनर्जागरण, वायकम सत्याग्रह, नैतिक चेतना, ग्रामस्वराज।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज और संस्कृति के नवजागरण का भी प्रतीक था। महात्मा गांधी ने अपने जीवन और विचारों के माध्यम से लोगों के सोच और व्यवहार को गहराई से प्रभावित किया। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत—सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, आत्मशक्ति और अस्पृश्यता-निवारण—केवल राजनीतिक रणनीति नहीं थे, बल्कि समाज को नैतिक आधार प्रदान करने वाली शक्तियाँ भी थे। इन मूल्यों ने साहित्यकारों को नए दृष्टिकोण और रचनात्मक प्रेरणा दी। जैसा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, भारतीय भाषाओं के साहित्य ने गांधी के आदर्शों को आत्मसात किया। हिंदी, बंगला, मराठी और तमिल साहित्य की तरह मलयालम साहित्य में भी गांधीवादी विचारों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
महात्मा गांधी का प्रभाव केवल राजनीतिक या स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य पर भी गहरा प्रभाव डाला। उनके जीवन और विचारों ने साहित्यकारों के चिंतन और सृजन को दिशा दी। मलयालम साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा। गांधी के सिद्धांत—सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, ग्रामस्वराज, अस्पृश्यता-निवारण और स्वदेशी—ने केरल के कवियों, कथाकारों और निबंधकारों में नई जागरूकता और सामाजिक संवेदनशीलता उत्पन्न की। मलयालम साहित्य में गांधी नैतिक आदर्श, समानता, मानवता और स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में दिखाई देते हैं। उन्होंने लेखकों को सामाजिक न्याय, जातिवाद-विरोध, स्त्री-मुक्ति और राष्ट्रीय एकता जैसे मुद्दों पर सोचने और उन्हें साहित्य में व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया।
1920 से 1930 के दशक के दौरान मलयालम साहित्य में जो सामाजिक और राजनीतिक चेतना विकसित हुई, उसकी प्रेरणा का मूल गांधीजी की विचारधारा में निहित था। इस दौर की कविताओं में गांधी का प्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है। कुमारन आशान और वल्लतोल नारायण मेनन जैसे कवियों ने गांधी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर सामाजिक सुधार, करुणा, और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। गद्य साहित्य में भी गांधीवादी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उपन्यासकारों और कहानीकारों ने गांधी को कभी एक चरित्र, कभी विचारधारा, और कभी प्रतीक के रूप में चित्रित किया। तकष़ि शिवशंकर पिल्लै के उपन्यासों में गांधीवादी आदर्शों की गूंज सुनाई देती है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘कयार’ में स्वतंत्रता आंदोलन और गांधीवादी विचारधारा की छाया स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है। इसी प्रकार केशवदेव और एस.के. पोट्टेक्काट जैसे लेखकों ने अपने पात्रों के माध्यम से गांधी के प्रभाव को सजीव किया।
केरल के रंगमंच पर भी गांधीजी को प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत करने के प्रयास हुए। अनेक नाटकों में उन्हें एक जीवंत चरित्र के रूप में मंच पर लाया गया। निबंधकारों और चिंतकों ने गांधी के नैतिक और सामाजिक विचारों — जैसे स्वदेशी, ग्रामोद्योग, नैतिकता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता— पर गंभीर चिंतन किया। मलयालम आलोचकों ने गांधी को केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और नैतिक व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया है। मलयालम साहित्य में गांधी पर आधारित कविताएँ, संस्मरण, विशेषांक और जीवनीपरक ग्रंथों की एक समृद्ध परंपरा देखने को मिलती है। वल्लतोल की कविताओं में गांधी को ‘राष्ट्रात्मा’ और ‘करुणा का प्रतीक’ कहा गया है।
महात्मा गांधी ने अपने जीवन और आदर्शों से जनता पर गहरा प्रभाव डाला। उनके सिद्धांत—सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, सत्याग्रह और अस्पृश्यता-निवारण— केवल राजनीतिक साधन नहीं थे, बल्कि समाज को नैतिक दिशा देने वाले मार्गदर्शन भी थे। इसी कारण हिंदी, बंगला, मराठी, तमिल और मलयालम साहित्य ने गांधी के विचारों को अपनाया और अपने लेखन में समाहित किया। विशेष रूप से 1920–40 के दशक में, जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, केरल के लेखक गांधी को केवल राष्ट्रनायक के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उन्हें मानवता, करुणा, नैतिकता और सामाजिक पुनर्निर्माण का प्रतीक मानते थे। यह स्पष्ट करता है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक क्रांति नहीं था, बल्कि यह साहित्यिक और सांस्कृतिक जागरण का भी युग था। केरल की भूमि पहले से ही सामाजिक सुधार आंदोलनों के लिए जानी जाती थी। श्री नारायण गुरु ने जाति-विरोधी सुधारों का नेतृत्व किया, जबकि कुमारण आशान जैसे कवियों ने अपने काव्य में समानता और मानवता का संदेश फैलाया। जब गांधी स्वतंत्रता आंदोलन का मार्गदर्शन कर रहे थे, तब केरल का साहित्यिक वातावरण पहले से ही सामाजिक चेतना और सुधार के विचारों से परिपूर्ण था। इस कारण गांधी का प्रभाव मलयालम साहित्य में सहज और प्रभावकारी रूप से दिखाई दिया।
गांधीजी का केरल में आगमन केवल राजनीतिक सक्रियता तक सीमित नहीं था। 1920 के दशक में, जब वे असहयोग आंदोलन और खादी-स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा दे रहे थे, उनका प्रभाव केरल तक भी पहुँचा। विशेष उल्लेखनीय है वायकाम सत्याग्रह (1924–25), जो केरल में मंदिर की सड़कों पर अछूतों के प्रवेश के अधिकार के लिए आयोजित किया गया था। यह केरल में अस्पृश्यता-निवारण का पहला बड़ा आंदोलन था, जिसमें गांधीजी ने न केवल मार्गदर्शन किया बल्कि प्रत्यक्ष भागीदारी भी निभाई। इस आंदोलन ने मलयालम लेखकों और कवियों को सामाजिक समानता और जातिवाद-विरोध पर लेखन के लिए प्रेरित किया। गांधीजी के ग्रामस्वराज और शिक्षा पर बल ने भी केरल के साहित्यकारों को गहन चिंतन और लेखन के लिए प्रेरित किया। नवजीवन ट्रस्ट और मैथ्रुभूमि पब्लिशर्स ने गांधीजी के लेखन और विचारों को मलयालम में व्यापक रूप से प्रचारित किया। उनकी आत्मकथा ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हुई। मलयालम पाठकों ने इन पुस्तकों के माध्यम से गांधीजी के जीवन, संघर्ष और उनके सत्य, अहिंसा तथा आत्मसंयम के सिद्धांतों को जाना और आत्मसात किया। इसके अलावा, मलयालम में गांधीजी पर कई जीवनी और आत्मकथात्मक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें उनके जीवन, दर्शन और सामाजिक योगदान का विवरण है।
वल्लथोल नारायण मेनन, जिन्हें ‘केरल वाल्मीकि’ और मलयालम का राष्ट्रकवि कहा जाता है, महान कवि, अनुवादक और केरल कलामंडलम के संस्थापक थे। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का मलयालम में अनुवाद किया और कथकली जैसी पारंपरिक कला के संरक्षण में योगदान दिया। “वल्लथोल एक राष्ट्रवादी थे और मलयालम भाषा में लिखते थे।”1 गांधीजी के विचारों—सत्य, अहिंसा और करुणा—से प्रभावित वल्लथोल ने अपने काव्य में उन्हें राष्ट्रात्मा, करुणा और आत्मबल का प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी प्रमुख रचनाएँ ‘एंटे गुरुनाथन’ और ‘बापूजी’ गांधीजी को श्रद्धांजलि देती हैं। “वल्लथोल महात्मा गांधी के बहुत बड़े प्रशंसक रहे और उनकी प्रशंसा में ” एंटे गुरुनाथन” (“मेरे महान शिक्षक”) कविता लिखी।”2 इसी प्रकार, ‘बापूजी’ कविता गांधीजी की मृत्यु पर लिखा गया एक हृदयस्पर्शी शोकगीत है। वल्लथोल ने कविता को राजनीतिक चेतना और जनजागरण का माध्यम बनाया, खादी, चरखा और ग्रामीण जीवन के महत्व पर विचार व्यक्त किए, और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वल्लथोल ने कई कविताएँ लिखीं, जिनमें गांधीजी को राष्ट्रनायक और आत्मबल का प्रतीक दिखाया गया। “उन्होंने भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन की प्रशंसा करते हुए कई देशभक्ति कविताएँ लिखीं।”3 उन्होंने देशभक्ति और राष्ट्रवादी आंदोलन की प्रशंसा की और उसमें सक्रिय रूप से भाग लिया। गांधीजी के खादी पहनने और चरखा चलाने के संदेश ने केरल के लेखकों को ग्रामीण जीवन और श्रम की गरिमा पर विचार करने और उसे साहित्य में प्रस्तुत करने की प्रेरणा दी। उनकी रचना ‘एंटे गुरुनाथन’ गांधीजी के आदर्शों पर आधारित है और उन्हें गुरु के रूप में सम्मान देती है। “एंटे गुरुनाथन’ गांधीजी के बारे में लिखी गई एक कृति है, जो महात्मा गांधी के आदर्शों में दृढ़ता से विश्वास करते थे और गांधीजी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करते थे।”4 वल्लथोल ने अपनी कविताओं के माध्यम से राजनीतिक चेतना और जनजागरण फैलाया, सत्य और अहिंसा से साम्राज्यवाद को चुनौती दी, राष्ट्रवादी और साम्यवादी विचारों से प्रभावित रहे, और उनकी रचनाएँ स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा और जनचेतना का स्पष्ट प्रतिनिधित्व करती हैं। “उन्होंने 1922 और 1927 में भारतीय कांग्रेस के अखिल भारतीय सम्मेलनों में भाग लिया और 1922 में अपनी भारत यात्रा के दौरान प्रिंस ऑफ वेल्स द्वारा उन्हें दिए गए शाही सम्मान को अस्वीकार कर दिया।”5
कुमारन आशान मलयालम साहित्य के केवल एक महान कवि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विचारक, सामाजिक चिंतक और श्री नारायण गुरु के सक्रिय अनुयायी थे। उन्होंने अपने काव्य में बुद्ध के करुणा, अहिंसा और समता के सिद्धांतों को अपनाते हुए जातिवाद, स्त्री-शोषण और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध आवाज उठाई। उनकी कविताएँ ‘दुर्वस्था’, ‘चंडालभिक्षुकी’, ‘वीणा पूवु’, ‘चिंता-विष्टयाय सीता’, आदि समाज की असमानताओं, स्त्री अस्मिता और जातीय अन्याय पर गहरे आत्मबोध और करुणा के साथ आधारित हैं। कुमारण आशान का निधन गांधीजी के आंदोलन के प्रारंभिक चरण में ही हुआ, फिर भी उनके काव्य में करुणा, समानता और अहिंसा के जो मूल्य हैं, वे गांधी के नैतिक दर्शन से पूर्णतः मेल खाते हैं। कुमारन आशान, श्री नारायण गुरु के अनुयायी और समाज-सुधारक कवि थे, जिनकी कविताओं में गहरी दार्शनिकता, करुणा और सामाजिक जागरूकता का समन्वय मिलता है। उन्होंने केरल की जातिवादी व्यवस्था में निचले पायदान पर खड़े वंचित वर्गों की व्यथा को स्वर दिया। उनकी कविता ‘चंडालभिक्षुकी’ में जातिवाद का विरोध और मानव समानता का संदेश मिलता है। ‘वीणापूवु’’ जैसी कविताओं में करुणा और मानव प्रेम की झलक है, जो गांधी के अहिंसात्मक दृष्टिकोण से मेल खाती है। ‘वीणापूवु’ में जीवन की क्षणभंगुरता के माध्यम से आशान सामाजिक मूल्यों के पतन पर शोक व्यक्त करते हैं।
“अहा! सुंदर पुष्प, तू कभी रानी-सा दमकता था;
अब धूल में पड़ा है, अपनी आभा खोकर!”6
‘दुर्वस्था’ और ‘चंडालभिक्षुकी’ कुमारन आशान की सामाजिक प्रतिबद्धता, स्त्री चेतना और जाति-विरोधी दृष्टिकोण की प्रतिनिधि काव्य रचनाएँ हैं। आशान सीधे गांधी पर नहीं लिखे, पर उनका सामाजिक दृष्टिकोण गांधीवादी नैतिकता से मेल खाता है। ‘चंडालभिक्षुकी’ में एक दलित स्त्री को बुद्ध द्वारा भिक्षा देने का दृश्य करुणा और समता का प्रतीक बनकर ब्राह्मणवादी सोच को चुनौती देता है।
“यह कैसी पीड़ा की कहानी है!
क्या तुमने जाति को भूलकर एक नीच महिला के हाथ से जल माँगा?”7
बालामणि अम्मा और जी. शंकर कुरुप जैसे कवियों ने भी गांधी को युगपुरुष के रूप में स्मरण किया। स्वतंत्रता आंदोलन की कविताओं में गांधी का नाम जन-उत्साह और नैतिक शक्ति का प्रतीक बन गया। शंकर कुरुप की कविताओं में गांधी नैतिक शक्ति के रूप में उभरते हैं, जबकि बालामणि अम्मा ने उन्हें करुणा और मातृत्व का प्रतीक माना। बालामणि अम्मा की कविताओं पर महात्मा गांधी के विचारों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, स्वतंत्रता की भावना, खादी धारण करना और चरखा कातना जैसे गांधीवादी आदर्श झलकते हैं। यद्यपि उनकी कविताओं का मुख्य विषय मातृत्व रहा, फिर भी गांधीजी की सादगी, नैतिकता और मानवता ने उनके जीवन और साहित्य दोनों को प्रभावित किया। स्वतंत्रता आंदोलन के काल में महात्मा गांधी ने बालामणि अम्मा के रचनात्मक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। उनकी कविताओं में गांधीजी के आदर्शों—सादगी, आत्मनिर्भरता और देशप्रेम—की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। उनकी आरंभिक चर्चित कविता ‘गौरैया’ में भी इस गांधीवादी प्रभाव की झलक मिलती है, जिसने उन्हें एक संवेदनशील और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठित किया।आलोचक एम. एन. करास्सेरी ने उन्हें गांधीवादी कवयित्री माना है। गांधीवादी मूल्यों ने उनकी कविताओं को गहरी संवेदना और आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की।
तकष़ी शिवशंकर पिल्लै मलयालम के प्रगतिवादी उपन्यासकार थे जिन्होंने अपने साहित्य में गरीब, उपेक्षित और मछुआरा समुदाय की समस्याओं को उजागर किया। उनके प्रमुख उपन्यासों ‘चेम्मीन’ और ‘कायर’ में सामाजिक असमानता, छुआछूत और सामंती-जमींदारी प्रथाओं का यथार्थ चित्रण मिलता है। “‘चेम्मीन’ के रचनाकार तकष़ी शिवशंकर पिल्लै ऐसे संक्रांतिकालीन साहित्यकार है, जब मलयाली समाज साहूकारी, सामंतवादी, जमींदारी व्यवस्था के साथ-साथ छुआछूत की गंभीर व्याधि से ग्रस्त था |”8. ‘चेम्मीन’ के लिए उन्हें 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और ‘कायर’ के लिए 1984 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। उनके उपन्यासों में गांधीवादी आदर्श—सत्याग्रह, अहिंसा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता—स्पष्ट रूप से झलकते हैं। “तकषि की रचनाशीलता की खूबी यह है कि उन्होंने हमेशा समाज के बेहद सामान्य चरित्रों को ही अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा और सामान्य लोगों के जीवन में व्याप्त विषमता के बीच उनके संघर्ष, उनकी जिजीविषा, उनकी पीड़ा और दुखों का बखूबी वर्णन किया |”9 पिल्लै का साहित्य सामान्य लोगों के जीवन, उनके संघर्ष और पीड़ा को केंद्र में रखते हुए समाज की विषमताओं और नैतिक मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करता है। उनके अलावा, केशवदेव और एस.के. पोट्टेक्काट की रचनाओं में भी गांधीवादी मूल्य—सत्य, नैतिकता और साधारण जीवन—प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े साहित्य में गांधीजी के सत्याग्रह, नमक और खादी आंदोलनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। कई पात्र उनके अनुयायी के रूप में प्रस्तुत हुए। मलयालम रंगमंच और नाटकों में गांधीजी की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपस्थिति रही। निबंधों, आलोचनाओं और पत्र-पत्रिकाओं में उनके खादी, स्वदेशी, शिक्षा, नैतिकता और अहिंसा संबंधी विचारों पर व्यापक चर्चा हुई। इस तरह, गांधीजी केवल राजनीतिक नेता नहीं बल्कि साहित्य और समाज के लिए प्रेरणा स्रोत और सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति बने। मलयालम साहित्य में गांधी को नैतिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखा गया। उनके जीवन और आंदोलन पर कई जीवनीपरक ग्रंथ, संस्मरण और कविताएँ प्रकाशित हुईं। आलोचक मानते हैं कि गांधी ने केरल साहित्य को सामाजिक यथार्थ, जनचेतना और नैतिक संघर्ष की दिशा दी। आज भी मलयालम साहित्य में गांधी के विचार प्रासंगिक हैं। आधुनिक कवि और कथाकार जातिगत भेदभाव, हिंसा और भ्रष्टाचार के खिलाफ गांधी के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर लिखते हैं। गांधी नैतिकता और प्रतिरोध का प्रतीक हैं। वल्लतोल ने गांधी को राष्ट्रात्मा कहा, आशान ने उनकी मानवीय दृष्टि साझा की। थकाझी ने गांधीवादी आंदोलन को अपने उपन्यास में जीवंत किया। निबंध और आलोचना ने उन्हें सामाजिक चेतना और नैतिक दिशा का वाहक माना।
महात्मा गांधी ने केरल में पांच यात्राएँ (1920, 1925, 1927, 1934, 1937) कीं, जिनका उद्देश्य सामाजिक सुधार, वायकोम सत्याग्रह का समर्थन और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना था। उन्होंने श्री नारायण गुरु से मुलाकात कर सामाजिक न्याय के नए रास्ते खोले। इन यात्राओं और उनके विचारों ने मलयालम साहित्य में नैतिक दिशा, सामाजिक यथार्थ और प्रेरणा का गहरा प्रभाव डाला।
महात्मा गांधी केवल राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि मलयालम साहित्य में प्रेरणा, नैतिक दिशा और सामाजिक यथार्थ के प्रतीक बने। उनकी केरल यात्राओं और विचारों ने आधुनिक मलयालम साहित्य पर गहरा बहुआयामी प्रभाव डाला। गांधीजी के अहिंसा, सत्याग्रह, आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों ने वल्लतोल, कुमारण आशान, तकष़ि शिवशंकर पिल्लै, केशवदेव और एस.के. पोट्टेक्काट जैसे लेखकों को प्रभावित किया। इन लेखकों ने अपने काव्य, उपन्यास, कहानियाँ और नाटकों में गांधीवादी विचारधारा को व्यक्त किया। वल्लतोल ने गांधी को राष्ट्रात्मा और करुणा का प्रतीक माना, आशान ने जातिवाद और सामाजिक समानता के संदर्भ में उनकी मानवीय दृष्टि अपनाई, और तकष़ि के उपन्यास ‘कयार’ में गांधीवादी आदर्श पात्रों के जीवन और कार्यों में झलकते हैं। गांधीजी के आंदोलनों—खादी, असहयोग और नमक सत्याग्रह—की छाया मलयालम कथा-साहित्य और रंगमंच में भी दिखाई देती है, और निबंधकार तथा पत्रकार उनके विचारों पर गहन लेखन करते रहे। महात्मा गांधी ने मलयालम साहित्य को नैतिक दृष्टि, सामाजिक चेतना, मानवीय करुणा और राष्ट्रभाव से समृद्ध किया। उनके आदर्श वल्लथोल, आशान, बालामणि अम्मा और तकष़ि जैसी साहित्यिक हस्तियों में अलग रूपों में दिखाई देते हैं। गांधीजी के विचारों ने लेखकों और कवियों को समानता, न्याय और मानवता के मूल्यों को केंद्र में रखकर रचनात्मक सृजन के लिए प्रेरित किया। आज भी उनका प्रभाव केरल के साहित्य और सांस्कृतिक जीवन में स्पष्ट रूप से देखा जाता है।
संदर्भ सूची
1.Raman Varadara (1993). Glimpses of Indian Heritage. Popular Prakashan, p.138.
2.A Sreedhara Menon (1982). The Legacy of Kerala. DC Books, p.77
3.Cir̲pi: A Comparative Study of Bharati and Vallathol. Kolam Veliyeedu: 1991
4.“वल्लथोल नारायण मेनन – पुक्कलम”। 2022-09-21 को मूल से संग्रहीत। 2022-09-2 को पुनःप्राप्त]
5.Malayalam Literary Survey, Vol.13. Kerala Sahitya Akademi, 1991, p.26.
6.कुमारन आशान: वीणापूवु: डीसी बुक्स: कोट्टायम: 2015: पृ. 64
7.कुमारन आशान: चांडालभिक्षुकी: डीसी बुक्स: कोट्टायम: 2015: पृ. 142
8.Menon A: Kerala’s Literary Landscape: The Role of T. Shivshankar Pillai. Journal of South Asian Studies: 2010: 25(2), 145-160
9.Nair R: Social Realities in Malayalam Literature. Kerala Literary Review: 2015: 12(1): 78-95.
डॉ. दीपा कुमारी
सहायक प्राध्यापक & एच.ओ.डी
डी. बी. कॉलेज, थालायोलापरम्बु
केरल





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